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परमाणु ऊर्जा नीति पर प्रधानमंत्री को एक खुला पत्र

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महोदय,

भारत के ऊर्जा क्षेत्र पर और विशेष तौर से परमाणु ऊर्जा क्षेत्र पर हाल ही में मीडिया में आई कुछ रिपोर्टों ने नागरिक समाज समूहों के बीच थोड़ी घबराहट पैदा कर दी है। इन समाचार रिपोर्टों को जब हम समग्र सामाजिक कल्‍याण के परिप्रेक्ष्‍य में देखते हैं तो एक सरोकारी नागरिक के लिहाज से भयाकुलता से भर उठते हैं।

Kakodkar moots solar-like subsidy for nuclear power
https://economictimes.indiatimes.com/…/article…/63014653.cms

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Govt. gives administrative approval, financial sanction to build 12 nuclear power reactors

https://economictimes.indiatimes.com/…/article…/62825529.cms

जहां दुनिया भर से आ रही तमाम विश्‍वसनीय रिपोर्टें और विश्‍लेषण भारत जैसे एक देश के लिए परमाणु ऊर्जा की तकनीकी प्रासंगिकता और सामाजिक-आर्थिक व्‍यवहार्यता पर सवाल खड़ा कर रही हैं, वहीं 12 अतिरिक्‍त रिएक्‍टरों को सरकारी मंजूरी से संबंधित मीडिया में आई रिपोर्टें बहुत हैरत और अचरज पैदा करती हैं। जो लोग थोड़ा बहुत भी परमाणु ऊर्जा से जुड़े मुद्दों से वाकिफ़ हैं- कि कैसे देश के लिए परमाणु आधारित ऊर्जा नीति की अव्‍यवहार्यता पर केंद्र सरकारों को दी गई सिफारिशों और सौंपी गई रिपोर्टों के बावजूद पिछली सरकारों ने परमाणु ऊर्जा क्षमता को लगातार विस्‍तारित करने की अपुष्‍ट नीति जारी रखी है- आज उनके भीतर हताशा का भाव है।

बिजली क्षेत्र के जानकारों ने लगातार यह सवाल उठाया है कि आखिर तमाम सरकारें परमाणु ऊर्जा नीति को क्‍यों जारी रखे हुए हैं जबकि तथ्‍य यह है कि परमाणु ऊर्जा की हमारे ऊर्जा क्षेत्र के साथ कोई सादृश्‍य प्रासंगिकता तक नहीं है (जैसा कि हमेशा से ही रहा है) और इसके साथ जुड़े जोखिम और लागत (प्रत्‍यक्ष और परोक्ष दोनों) हमारे जैसी सघन आबादी वाले गरीब देश के लिए अस्‍वीकार्य रूप से काफी ज्‍यादा हैं। ऐसे में यह चौंकाने वाली बात है कि परमाणु ऊर्जा के लिए सौर ऊर्जा जैसी सब्सिडी की पैरवी की जा रही है। आश्‍चर्य होता है कि एक समाज के बतौर क्‍या हम देश के समग्र हित में तार्किक तरीके से सोचने-समझने की क्षमता खो चुके हैं।

परमाणु ऊर्जा को हमेशा ही विभिन्‍न किस्‍म की प्रत्‍यक्ष व परोक्ष सब्सिडियों से सहायता की गई है, ऐसे में यह सोचना मुश्किल है कि समाज के लिए इसकी प्रासंगिकता की तुलना सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से कैसे की जा सकती है। परमाणु ऊर्जा को कोई भी अतिरिक्‍त सब्सिडी हमारे समाज द्वारा न केवल अतर्कसंगत ठहरायी जा सकती है बल्कि इसे एक भ्रष्‍टाचार के रूप में भी देखा जा सकता है क्‍योंकि ऐसी किसी नीति से इस देश में केवल मुट्ठी भर छिटपुट समूहों को वाणिज्यिक लाभ मिलने की गुंजाइश है। पवन और सौर ऊर्जा प्रौद्योगिकियों को जहां पहले ही बिना सब्सिडी के पूरी दुनिया में सबसे कम लागत वाली ऊर्जा प्रौद्योगिकी का दरजा हासिल है और समाज के लिए इनकी कुल लागत लगातार कम होती जा रही है, परमाणु ऊर्जा के मामले में ठीक उलटी बात सच है और साथ ही परमाणु कचरा निस्‍तारण व हादसों से जुड़े अतिरिक्‍त लागत व जोखिम तो मौजूद हैं ही।

परमाणु ऊर्जा से जुड़ी वास्‍तविक लागत व भयावह खतरों की उपेक्षा किया जाना तथा अतिरिक्‍त प्रत्‍यक्ष सब्सिडी के साथ या उसके बगैर नए परमाणु रिएक्‍टर बनाते जाना हमारे सघन आबादी वाले निर्धन समुदायों के लिए बेहद जोखिम भरा है। यह समझना ही मुश्किल है कि हमारी सरकारें यह मानकर चल रही हैं कि चेर्नोबिल और फुकुशिमा जैसे परमाणु हादसों के लिए हमारे सघन आबादी वाले गरीब समुदाय तैयार होंगे और उन्‍हें इन हादसों से जुड़ा विनाशक परिदृश्‍य उन्‍हें स्‍वीकार्य होगा।

हम जब भारतीय ऊर्जा क्षेत्र के समग्र परिदृश्‍य पर निगाह डालते हैं- जहां तमाम आधिकारिक रिपोर्टें/विश्‍लेषण/बयान यहां अतिरिक्‍त ऊर्जा उत्‍पादन क्षमता की ओर संकेत कर रहे हैं- और जब हम इस तथ्‍य को देखते हैं कि यहां के समाज में बेहद कम लागत पर नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की गुंजाइश मौजूद है, तब नए सब्सिडीयुक्‍त परमाणु रिएक्‍टर बनाने के फैसले में छुपी अतार्किकता बिलकुल स्‍पष्‍ट हो जाती है।

भारतीय ऊर्जा क्षेत्र के संदर्भ में परमाणु ऊर्जा की वास्‍तविक प्रासंगिकता का पता इस तथ्‍य से चलता है कि बीते पांच दशक में इसकी उत्‍पादन क्षमता देश की कुल बिजली उत्‍पादन क्षमता के मुकाबले कभी भी 5 फीसदी से ज्‍यादा नहीं रही है और लगातार बढ़ते नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को भी जोड़ लिया जाए तो यह दर और कम हो जाती है। ऐसे में परंपरागत ऊर्जा प्रौद्योगिकी के स्रोतों में कोई भी इजाफा किए जाने के फैसले की समीक्षा हाल में सामने आई अतिरिक्‍त बिजली क्षमता के संदर्भ में की जानी चाहिए।

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National Electricity Plan (Dec. 2016) – CEA confirms no new coal power required to power India’s growth ambition

http://www.cea.nic.in/reports/committee/nep/nep_dec.pdf

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India to explore foreign markets for surplus power: Power Minister R K Singh

https://energy.economictimes.indiatimes.com/…/indi…/62899963

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Intra-state network constraints affecting power supply in India: Power Secretary A K Bhalla
https://economictimes.indiatimes.com/…/article…/63100439.cms

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इस घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्‍य में भारतीय ऊर्जा क्षेत्र की सामान्‍य समझदारी भी किसी तार्किक व्‍यक्ति को यही संदेश देगी कि जो लोग भी केंद्रीय ऊर्जा मंत्री और प्रधानमंत्री को ऊर्जा से जुड़े ऐसे मसलों पर सलाह दे रहे हैं, उन्‍हें या तो इससे जुड़े मुद्दों का ज्ञान ही नहीं है या फिर वे हमारे समुदायों के कल्‍याण की समग्र दृष्टि की उपेक्षा करने के सचेत दोषी हैं।

एक ऐसे वक्‍त में जब तमाम देश नवीकरणीय ऊर्जा आधारित अर्थव्‍यवस्‍था की ओर बढ़ने के लिए वचनबद्ध हैं और जब परमाणु ऊर्जा के ऊपर दुनिया भर में विश्‍वसनीयता का संकट बना हुआ है, स्‍टैनफर्ड युनिवर्सिटी द्वारा किए गए एक हालिया अध्‍ययन ने स्‍पष्‍ट रूप से दिखाया है कि भारत सहित 139 देशों में ऊर्जा की जरूरतों (केवल बिजली ही नहीं) को नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत पर्याप्‍त तरीके से न्‍यूनतम लागत के बल पर पूरा कर सकते हैं (बिना परमाणु ऊर्जा के) और साथ ही समुदायों को कई अतिरिक्‍त लाभ भी पहुंचा सकते हैं। देश के भीतर और बाहर ऐसे कई विश्‍वसनीय अध्‍ययन हो चुके हैं।

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India should aim for 50 per cent renewable energy by 2030: Piyush Goyal

https://energy.economictimes.indiatimes.com/…/indi…/62764634

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Meeting energy needs with renewables in 139 countries

http://web.stanford.edu/…/Combinin…/WorldGridIntegration.pdf

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Tamil Nadu is India’s model for low-cost renewables

http://reneweconomy.com.au/tamil-nadu-indias-model-low-co…/…

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Action Plan for Comprehensive Renewable Energy Development in Tamil Nadu

http://wisein.org/WISE_Projects/TN_ActionPlan_Web.pdf

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​​Power Sector Road Map for Tamil Nadu – 2050

http://mitramaadhyama.co.in/archives/2791

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Integrated Power Policy

http://freebookculture.com/?p=172

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मौजूदा एनडीए सरकार जहां यह दावा करने में गौरव महसूस करती है कि उसका भ्रष्‍टाचार से कोई लेना-देना नहीं, वहीं समाज के कई तबके यह मानते हैं कि समाज की सूचित सहमति लिए बगैर और बिना किसी विश्‍वसनीय लागत-लाभ विश्‍लेषण के समुदायों के ऊपर उच्‍च लागत वाली ऐसी परियोजनाओं को थोपा जाना भी एक किस्‍म का भ्रष्‍टाचार ही है।

जनता की स्‍वीकार्यता के बगैर परमाणु ऊर्जा नीति हमारे समुदायों के सच्‍चे हित में हो ही नहीं सकती क्‍योंकि न सिर्फ मौजूदा पीढ़ी बल्कि आने वाली पीढि़यों के कंधों पर भी यह भारी लागत (प्रत्‍यक्ष और परोक्ष) का बोझ थोप देगी। सभी संबद्ध अधिकरणों को इसके लिए जनता की स्‍वीकार्यता हासिल करने का प्रयास करना होगा वरना बार-बार दुहराया जाने वाला नारा ”सबका साथ सबका विकास” अविश्‍वसनीय बनकर रह जाएगा। चूंकि तमाम संबद्ध अधिकरणों ने विभिन्‍न नागरिक समाज संगठनों और उनके प्रतिष्ठित सदस्‍यों जैसे एडमिरल रामदास (अवकाश प्राप्‍त नौसेना प्रमुख), डॉ. एके गोपालकृष्‍णन (एईआरबी के पूर्व अध्‍यक्ष), डॉ. ईएएस सरमा (भूतपूर्व केंद्रीय ऊर्जा सचिव) की गंभीर चिंताओं और सरोकारों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लिहाजा यह मानना मुश्किल है कि आपकी सरकार में ऐसा एक भी व्‍यक्ति है जो ”सबका साथ सबका विकास” के पीछे छुपे उद्देश्‍य से सहमत है।

इसीलिए सरोकारी नागरिक समाज संगठन यह उम्‍मीद करेंगे कि परमाणु ऊर्जा नीति सहित समूचे ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी नीतियों और आचारों की सघनता से समीक्षा की जाए जिसमें सभी हितधारकों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित हो ताकि प्रस्‍तावित राष्‍ट्रीय ऊर्जा नीति प्रौद्योगिकीय व आर्थिक स्‍तर पर व्‍यवहार्य बन सके, सामाजिक स्‍तर पर स्‍वीकार्य बन सके और पर्यावरणीय स्‍तर पर टिकाऊ बन सके।

सादर,

शंकर शर्मा

ऊर्जा नीति विशेषज्ञ

1026, 5th मेन रोड, E&F ब्‍लॉक

रामकृष्‍ण नगर, मैसूर, भारत – 570022

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