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नेशनल मीडिया क्‍लब सम्‍मान कांड: पत्रकार अनिल शुक्‍ला ने सफाईकर्मी को दिया अपना पुरस्‍कार

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लखनऊ में नेशनल मीडिया क्लब नाम की एक संस्‍था ने पिछले दिनों हिंदी पत्रकारिता दिवस के दिन उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के नाम का इस्‍तेमाल करते हुए कुछ वरिष्‍ठ पत्रकारों को बदनाम करने का काम किया था। इस संस्‍था ने 30 मई को एक ऐसा भयंकर पुरस्‍कार घोटाला किया जिसमें 60 साल की उम्र पार कर चुके ऐसे पत्रकारों को पुरस्‍कार दिलवा दिया गया जिन्‍हें न तो अब तक पुरस्‍कार मिलने की ख़बर दी गई थी, न ही वे वहां सशरीर मौजूद थे और जिन्‍होंने पुरस्‍कार की पेशकश पर अपनी सहमति तक नहीं दी थी। इन्‍हीं में एक पत्रकार थे आगरा के अनिल शुक्‍ला, जिनके घर पर बाद में क्‍लब का कोई प्रतिनिधि पुरस्‍कार लेकर पहुंचा तो उन्‍होंने एक असाधारण काम किया। यह पुरस्‍कार उन्‍होंने अपने मोहल्‍ले में काम करने वाली महिला सफाईकर्मी को दे डाला। इसकी एक तस्‍वीर और इस पर एक टिप्‍पणी उन्‍होंने फेसबुक पर डाली है जिसे हम अविकल नीचे दे रहे हैं।


तस्वीर में खड़ी महिला श्रीमती गीता वाल्मीकि हैं। गीता के कन्धों पर मेरे आवासीय परिसर की साफ़-सफाई का ज़िम्मा है। इस परिसर में लगभग 50 लोग रहते हैं और गीता उस तमाम गंदगी की रोज़ सफाई करती है जिसका हम सभी कचरे के तौर पर परित्याग करते हैं। इनके हाथ में जो पुरस्कार है, वह स्वच्छता के लिए किये जाने वाले सम्मान का ‘मोमेंटो’ है और जिस शॉल को मैं उढ़ा रहा हूँ, वह इसी सम्मान का एक हिस्सा है। इस सम्मान को प्रदान करने वाली एजेन्सी का नाम है ‘नेशनल मीडिया क्लब।’ अब इस बात को जानने में किसी की भी दिलचस्पी हो सकती है कि यह ‘ नेशनल मीडिया क्लब’ क्या है, आगरा के एक छोटे से मोहल्ले ‘घटिया आज़म खां’ की एक उप बस्ती में काम करने वाली गीता वाल्मीकि के स्वच्छता सम्बन्धी काम की जानकारी इस ‘क्लब’ तक पहुंची कैसे और मैं किस हैसियत से क्लब का यह शॉल गीता को उढ़ा रहा हूँ?

सच बात तो यह है कि यह ‘नॅशनल मीडिया क्लब’ न तो गीता को जानता है, न गीता उसे जानती है और न ही उस ‘क्लब’ ने उसे इस किस्म का कोई सम्मान दिया है। तो फिर यह माजरा क्या है? यह एक दिलचस्प कहानी है।

हुआ दरअसल यूँ कि 3-4 रोज़ पहले मुझे नोएडा स्थित एक मीडिया समूह के आगरा ब्यूरो की तरफ से किसी युवा पत्रकार का फ़ोन आया। उस पत्रकार बंधू ने बड़े प्रसन्नता के भाव से मुझे यह बताया कि ‘राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान’ में मेरे’ नाम का चयन हुआ है और मुझे उप्र के मुख्यमंत्री के हाथों सम्मानित किया गया है, मैं उक्त कार्यक्रम में न पहुँच सका इसलिए मेरा सम्मान मोमेंटो आगरा भेजा गया है। अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री के हाथों सम्मानित होने पर किसी भी नागरिक का गौरवान्वित होना ज़ाहिर है बड़ी सहज प्रतिक्रिया होती है लेकिन मुझे दो बातों के चलते बड़ा आश्चर्य हुआ!

एक तो यह कि यदि मुझे मुख्यमंत्री के हाथों सम्मानित होना था तो इसकी पूर्व सूचना से मुझे क्यों वंचित रखा गया और दूसरी बात यह कि किसी प्रकार के ‘स्वच्छता अभियान’ से मेरा कोई लेना-देना नहीं है, सिवाय इसके कि मैं ह्रदय से अपने और देश के परिवेश में साफ़-सफाई का पक्षधर हूँ। लेकिन मेरे ह्रदय की बात इस सम्मान के चयनकर्ताओं तक पहुंची कैसे जिन्हें मैं जानता तक नहीं? कहीं किसी और का सम्मान गलती से मेरे पते पर तो नहीं पहुँचने वाला है? मैंने फोनकर्ता से अपना संशय प्रकट किया, उसने पलट कर जवाब दिया “अरे सर आपको कौन नहीं जनता, आपके नाम में भला कैसे किसी को गलतफहमी हो सकती है।”

अपने सर्वव्यापी और महापुरुष होने की मुझे कोई गलतफहमी है नहीं, लिहाज़ा मन में सोचा कि आजकल मार्केटिंग का युग है और इस होड़ में मीडिया वाले सबसे तेज धावक साबित हो रहे हैं, हो सकता है यह इस मीडिया समूह की अपनी कोई मार्केटिंग इवेंट की घेराबंदी हो। बहरहाल मैंने पत्रकार बंधु को अपने यहाँ आने का न्यौता दे दिया। तीन दिन बाद गत सोमवार को वह सज्जन मुझे एक बड़ा सा बैग सौपने आये जिस पर स्वच्छता अभियान, नेशनल मीडिया क्लब और किन्ही सचिन अवस्थी(अध्यक्ष) का नाम छपा था। बैग में एक बेहद खूबसूरत ‘मोमेंटो’ और एक जोड़ा शॉल थे। मैंने आगंतुक पत्रकार से पूछा कि ये मीडिया क्लब में कौन लोग हैं और स्वच्छता का सम्मान मुझे क्यों भेजा गया है? बेचारे ने हथियार डालते हुए कहा “सर हमारे दिल्ली ऑफिस से आया है और आपको देने का हुक्म है, इससे ज्यादा हमें कुछ नहीं मालूम।”

बंधुवर के जाने के बाद मैंने दिल्ली के कुछ पत्रकार दोस्तों को फोन करके इस ‘नेशनल मीडिया क्लब’ के सर-पैर जानने की कोशिश की और यह मालूम करने को कहा कि कहीं यह सम्मान प्राप्तकर्ता के नाम-पते में भूल-चूक का मसला तो नहीं? उन लोगों ने हालिया गठित इस ‘क्लब’ की मई माह की प्रेस विज्ञप्ति देखकर बताया कि मेरा नाम उसमें मौजूद है। यानी पात्र मैं ही हूँ लेकिन जिस मक़सद से दिया गया है, उसके लिए अपात्र हूँ। अब स्वच्छता अभियान का सम्मान भी करना था और इस ‘सम्मान’ का सम्मान भी, लिहाज़ा इसे सही हाथों तक ‘फॉरवर्ड’ करने के लिए मैंने गीता वाल्मीकि को चुना।

अगले दिन यानि कल मंगलवार की सुबह, जब वह मोहल्ला ‘कमाने’ आईं तो मैंने उन्हें काम निबटा कर आने को कहा। जब वह ‘साफ़-सफाई’ करके लौटीं तो मैंने उन्हें ‘सम्मान काण्ड की सम्पूर्ण कथा’ सुनाते हुए यह कहकर उन्हें सौंप दिया कि इसकी उचित पात्र वह हैं, मैं नहीं। वह बेहद प्रसन्न हुईं। उनके प्रसन्न चेहरे को देखकर मुझे अपने ‘अपात्र’ होने से पैदा हुई ग्लानि से मुक्ति मिली। मैं अपनी और श्रीमती गीता वाल्मीकि की ओर से ‘नॅशनल मीडिया क्लब’ और उसके अध्यक्ष सचिन अवस्थी को धन्यवाद देना चाहूंगा, इस अनुनय-विनय के साथ, कि आगे से इस प्रकार के सम्मानों के चयन के लिए सुपात्र ही ढूंढें, अपात्र नहीं।

 

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