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छात्रों के आरोप का क्‍या जवाब देना, कोई संगठन आरोप लगाए तो उसे जवाब दूंगा- विवेक कुमार

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जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर विवेक कुमार का झूठ पकड़ा गया है। सोशल मीडिया पर उनकी एक तस्‍वीर शाया हुई जिसमें उन्‍हें राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के संजय वन, महरौली में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए दिखाया गया। तस्‍वीर आने के बाद उन्‍होंने मीडियाविजिल से बातचीत में कार्यक्रम में जाने का खंडन किया था जिसकी ख़बर हमने छापी थी। उसके बाद दो और तस्‍वीरें आई हैं जिसमें उनके कार्यक्रम में मौजूद होने की बात और पुष्‍ट हुई है। दिलीप खान ने पूरे मामले की पड़ताल करते हुए मीडियाविजिल पर स्‍टोरी की है कि विवेक कुमार ने साफ़ झूठ बोला था, लेकिन वे अब भी इस बात को मानने को तैरूार नहीं हैं कि वे संघ के मंच पर गए थे।

मीडियाविजिल के कार्यकारी संपादक अभिषेक श्रीवास्‍तव ने आरएसएस और दलित राजनीति के रिश्‍तों के बहाने उनसे लंबी बातचीत की है जिसमें उन्‍होंने एक बार फिर से अपनी बात दुहराई है कि तस्‍वीर नकली है। वे तस्‍वीरों की फॉरेंसिक जांच करवाने की चुनौती देते हैं लेकिन मुकदमा करने को तैयार नहीं हैं क्‍योंकि इससे उनके अध्‍यापन कार्य पर असर पड़ेगा। अपने साक्षात्‍कार में वे दृढ़ता से इस बात को रखते हैं कि संघ के साथ कोई संवाद मुमकिन नहीं है, इसीलिए आंबेडकरवादी आंदोलन में डायवर्सिटी की अवधारणा को वे पश्चिमी मानते हैं और सवाल करते हैं कि डायवर्सिटी क्‍या चीज है, लेकिन इसके उलट हिंदू राष्‍ट्र की अवधारणा का खंडन वे विविधता के तर्क से ही करते हैं। उनका साफ़ मानना है कि आंबेडकरवादी आंदोलन का आखिरी उद्देश्‍य वर्ण व्‍यवस्‍था या जाति प्रथा को तोड़ना नहीं है बल्कि पहले सत्‍ता हासिल करना है। सत्‍ता हासिल करने के बाद ही बदलाव संभव है। अपनी बात के समर्थन में वे अरबों और सम्राट अशोक का उदाहरण देते हैं।

प्रो. विवेक कुमार कहते हैं कि आरएसएस के साथ संवाद का कोई मतलब नहीं है। वे कहते हैं कि एक बार बस गफ़लत में वे संजय पासवान के कार्यक्रम में चले गए थे। इस बार तो उनके छात्रों ने ही यह विवाद खड़ा किया है। उनका मानना है कि छात्रों के विवाद का क्‍या जवाब देना, अगर कोई संगठन जैसेस सीपीआइ, सीपीएम आदि आपत्ति करता है तब वे उनका जवाब देंगे। वे जेएनयू के एक वामपंथी शिक्षक हिरामन तिवारी पर भी सवाल खड़ा करते हैं कि वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यक्रम में गए तब सवाल क्‍यों नहीं किया गया। वे दलित आंदोलन को बदनाम करने में आनंद तेलतुम्‍बडे और गोपाल गुरु को सबसे बड़ा दोषी मानते हैं। वे आखिरी इच्‍छा ज़ाहिर करते हैं कि जब वे मरें तो उन्‍हें नीले कपड़े से ढंका जाए।

साक्षात्‍कार के अंत में वे बार-बार कहते हैं कि साक्षात्‍कर्ता के ‘पर्सनल’ आग्रह पर उन्‍होंने मौजूदा विवाद पर टिप्‍पणी की इसलिए अगर वह ‘एथिकल’ है तो इसे छापने के बजाय आंदोलन से जुड़ी बात छापी जाए। चूंकि साक्षात्‍कर्ता ने ‘पर्सनल’ आग्रह एक बार भी नहीं किया था, लिहाजा मीडियाविजिल बिना किसी संपादन के प्रो. कुमार का अविकल साक्षात्‍कार ऑडियो के रूप में प्रसारित कर रहा है। इसे ट्रांसक्राइब कर के छापना वक्‍त लेगा, लिहाजा आधे घंटे के पूरे साक्षात्‍कार का ऑडियो सुनें। 

(संपादक)