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IIMC पूर्व छात्र संघ के बिहार चैप्‍टर में ऐसे उठी राजनीति और पत्रकारिता की अर्थी…

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स्‍वामी बकुल आनंद

स्‍वामी कल पाटलिपुत्र में था। IIMCAA (य़ानी आइआइएमसी के पूर्व-छात्रों का संगठन इमका) के बिहार चैप्टर में वह भी तमाशाई बना। इमका पर लिखने को बहुत कुछ है, पर संक्षेप में यह बता दिया जाए कि यह भारतीय जनसंचार संस्थान (आइआइएमसी) के पूर्व छात्रों का एक जबरिया संगठन है जो एनजीओ की तरह चलता है, बाकायदे पंजीकृत है, जहां सदस्‍यता के पैसे लगते हैं, जिसको लेकर पहले दो-तीन बार तीखी बहसें भी हो चुकी हैं।

स्‍वामी उस दौर में आइआइएमसी से निकला था जब यहां अपने बिहार के ही पूर्व छात्र और सीनियर गोपाल कृष्‍ण IIMCOSA यानी आइआइएमसी ओल्‍ड स्‍टुडेंट्स असोसिएशन नाम का पूर्व छात्र संगठन चलाते थे। आज भी इसमें 1000 के आसपास सदस्‍य हैं, लेकिन इनकी निष्क्रियता के चलते 2005-06 में संस्‍थान से निकले कुछ बहुमुखी प्रतिभा के पत्रकारों ने कुछ शिक्षकों की शह पर एक ‘फर्जी’ संगठन IIMCAA खड़ा कर लिया और कालांतर में वही पूर्व छात्रों के ‘असली’ संगठन के रूप में काम करने लगा। आज के कई नामचीन ‘पत्रकार’ इससे जुड़े हैं।

खैर, स्‍वामी तयशुदा समय 6.30 बजे कपिल्स एलेवन में था। भारतीय परंपरा के मुताबिक सबसे पहले, क्योंकि समय पर था। बाक़ी लोग 7.30 तक आए। कुल जमा 30 पत्रकार। पटना के नामचीन, लिक्खाड़, बोलक्कड़ और दिक्खाड़। प्रिंट से लेकर टीवी तक।

बात जब शुरू हुई तो ठेठ संघी परंपरा में पहिले ‘परिचय’ सत्र चला। उसके बाद तकरीबन आधे घंटे तक आत्ममुग्धता और छिछले अहंकार का थोथा प्रदर्शन। फिर पुरस्कार दिया गया, हालांकि मज़े की बात रही कि जिन चार को पुरस्कार मिलना था, वैसे ‘कैंपस वाले टीचर्स’ में से तीन लोग गायब थे। इसके बाद दिल्ली चैप्टर से आए IIMCAA के अघोषित कर्ताधर्ता रितेश जी ने पूरे आधे घंटे तक हिसाब-किताब समझाया, कई लाखों का, जो आइआइएमसीएए के विभिन्न चैप्टर्स को मिल रहा है। उसे किस तरह से खर्च होना है, कौन उसका ‘जुगाड़’ कर रहा है, किसको इसके लिए धन्यवाद मिलना चाहिए आदि पूरी तफसील से समझाया गया, कि आपको जुगुप्सा से उल्टी कर देने की इच्छा हो जाती।

तुरुप का पत्ता अभी बाकी था। बाक़ी के आधे घंटे रितेश जी ने यह समझाया, बल्कि ताकीद की, बल्कि धमकाया, कि इमका के मंच पर किसी भी तरह की राजनीतिक चर्चा नहीं होगी। है न मज़ेदार! जो राजनीति आपके रोजाना की रोटी तय करती है, उस पर आप बात भी नहीं करेंगे! और यह बात कह कौन रहा है? भारत के शीर्षस्थ पत्रकारिता संस्थान का पूर्व छात्र! बाक़ी बचे 29 नामचीन पत्रकार-संपादक उस पर सिर हिला रहे हैं, सहमति दे रहे हैं।

मतलब, कल इमका की बैठक में यह तय हो गया कि इतिहास का अंत हो गया है, विचारधाराएं मर चुकी हैं और इसके साथ ही पत्रकारिता की अर्थी उठ चुकी है! IIMC के इन पूर्व छात्रों के लिए  देश मर चुका है। यहां के इंसान बस चलती-फिरती लाशें हैं जो अपना ही सलीब ढोकर चल रहे हैं।

इसी आइआइएमसी की पूर्व छात्रा नवारुणा का मामला एक बार भी किसी की जुबान पर नहीं आया।  किसी ने उसे श्रद्धांजलि के लायक भी नहीं समझा। बात यहीं नहीं रुकी। साफ तौर पर 30 पत्रकारों ने कल पटना में यह तय कर दिया कि राजनीति की बातें नहीं होंगी। केवल नेताओं के चरण-चुंबन होंगे, पीआर होगा, नीरा राडिया आदर्श होंगी और तिहाड़ी पत्रकारिता ही अब मकसद होगा।

इसके बाद? इसके बाद क्या होना था? नीतीश कुमार के राज में मदिरा तो थी नहीं, बढ़िया खाना ज़रूर था। सो खाना हुआ दबाकर। हाहाहीही हुआ और उसके बाद…