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बनारस के यूपी कॉलेज में ‘गांव के लोग’ पत्रिका के आयोजन पर विद्यार्थी परिषद का हमला

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राजेश चंद्र

‘गांव के लोग’ पत्रिका एवं उदय प्रताप महाविद्यालय, वाराणसी के हिन्दी विभाग द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित और ‘साम्राज्यवादी बाज़ारवाद के दौर में भारतीय किसान और अतीत के निशान’ विषय पर केन्द्रित आज की विचार-गोष्ठी की शुरुआत में ही भगवा छात्र संगठन एबीवीपी के तथा कुछ अन्य अज्ञात गुण्डों ने आकर काफी उपद्रव किया और आयोजन को असंभव बना दिया। यह घटना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक ही नहीं है, बल्कि चिन्तित भी करती है कि क्या अब इस देश में जनतांत्रिक विमर्शों और संवादों के लिये कोई जगह नहीं बची है? क्या असहमति की तमाम संभावित आवाज़ों का गला इसी प्रकार घोंट दिया जायेगा और हम हाथ पर हाथ धरे सब देखते रह जायेंगे?

ग़ौरतलब है कि यह आयोजन प्रख्यात कथाकार और इतिहासकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा की चर्चित पुस्तक “अवध का किसान विद्रोह” के सन्दर्भ में था और इसके लिये न केवल महाविद्यालय के प्राचार्य से पूर्व में अनुमति ली गयी थी, बल्कि महाविद्यालय का हिन्दी विभाग स्वयं इसका सह-आयोजक भी था। आयोजन शुरु होते ही भगवा गमछा वाले कुछ छात्र आकर शोर -शराबा करने लगे और उन्होंने माइक दूर हटा दिया। मंच पर मौज़ूद मुख्य वक्ता और इतिहासकार प्रोफेसर कपिल कुमार ने उग्र छात्रों की भीड़ को यह समझाने की कोशिश भी की कि आयोजन की पहले अनुमति ली गयी थी, पर वे नहीं मान रहे थे। फिर इस शोर-शराबे के बीच उनके दो गुट बन गये और उन्होंने एक-दूसरे पर भी कुर्सियों से हमला कर दिया। उन्होंने आयोजकों और आमंत्रित वक्ताओं को लक्ष्य कर जाति से सम्बंधित भद्दी टिप्पणियां कीं और कहा कि यहां कोई प्राचार्य नहीं है और वे किसी की परवाह नहीं करते।

सवाल उठता है कि जब महाविद्यालय प्रशासन और हिन्दी विभाग ने इस आयोजन के लिये सहमति देते हुए इसका सह-आयोजक होने की ज़िम्मेदारी ली थी तो क्या छात्रों को इसकी सूचना देना उनका काम नहीं था? और यदि सूचना दी गयी थी तो ये लोग कौन थे और किसके इशारे पर उन्होंने आयोजन को बाधित कर दिया? हंगामे के बाद जब पुलिस आयी तो उसने भी उत्पातियों को पकड़ने के बजाय आयोजकों से ही कार्यक्रम बंद करने के लिये कहा। इस बात से भी यह सन्देह उत्पन्न होता है कि घटना सुनियोजित थी और पुलिस को पहले से ही समझा दिया गया था कि उसे छात्रों का कुछ नहीं करना है। यह सवाल भी अपनी जगह है कि यदि प्रशासन को आयोजन से कोई दिक्कत थी तो उन्होंने अनुमति दी ही क्यों थी?

यह छिपी हुई बात नहीं हे कि आज देश में किसानों, दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों एवं छात्रों के सुलगते सवालों को लेकर काम करने वाले लोगों से किस विचारधारा और संगठन को परेशानी है और कौन से लोग असहमति की तमाम आवाज़ों को डराने-धमकाने और चुप कराने का देशव्यापी अभियान चला रहे हैं। ऐसे लोगों को मुंहतोड़ जवाब अब नहीं तो कब दिया जायेगा?