Home आयोजन ‘मैं बाज़ार से आज़ाद होना चाहता हूँ, क्या आप मेरी मदद करेंगे?’

‘मैं बाज़ार से आज़ाद होना चाहता हूँ, क्या आप मेरी मदद करेंगे?’

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पवन के. श्रीवास्‍तव

निओ-लिबरल कैपिटलिज्म आने के बाद हमारे देश में बहुत कुछ बदला है। वृहद पैमाने पर हमारे देश की पॉलिसी बदली है तो थोड़ा-बहुत हम सब भी बदले हैं। भारतीय सिनेमा का कभी कोई इतिहास लिखेगा (चाटुकारों के अलावा) तो वह सिनेमा के भी प्री और पोस्ट निओ-लिबरलिज्‍म को ज़रूर ध्यान में रखेगा। निओ-लिबरलिज्‍म के बाद हमारा सिनेमा बिलकुल बदल गया है। FOX, UTV, ViaCom18, Walt Disney Pictures, Warner Bros, Sony जैसी कंपनियां अब हमारे सिनेमा को कंट्रोल करती हैं। यही निर्णय लेती हैं कि आप क्या देखेंगे।

रणवीर कपूर जब कचौड़ी खाने के बजाय डूनट्स में जाते हैं या रोहित शेट्टी जब अपनी फिल्मों में फॉक्‍सवैगन उड़ाते हैं, तो ये सब यही कंपनियां तय करती हैं। फिल्मों की कहानियां अब बाइ-प्रोडक्ट हैं, मेन प्रोडक्ट अब कुछ और है। यूं ही आप लिवाइस और ज़ारा के कपड़े नहीं पहनते, ये सब बहुत हद तक सिनेमा का असर है। ये कंपनियां भारत में सिनेमा बनाने नहीं आई हैं, इनका मकसद भारतीय बाज़ार को बदलना है। सिनेमा एक मास मीडियम है और इससे मास की चेतना प्रभावित होती है। आज भारतीय सिनेमा का अधिकतम व्यापार और कंटेंट इन्हीं कंपनियों के कब्जे में है।

ये सारी कंपनियां सिनेमा को मास से छीन कर केवल उन लोगो तक सीमित कर चुकी हैं जिनके पास क्रय शक्ति है। जो इस ग्लोबल मार्केट का हिस्सा हैं। आज का भारतीय सिनेमा केवल मध्यम वर्ग और इलीट वर्ग को ध्यान में रख कर ही बनाया जाता है क्योंकि बाज़ार के लिए यही दर्शक उपयुक्त हैं। आप मानेंगे नहीं लेकिन आपके साथ एक बहुत बड़ा खेल खेला जा रहा है।

आपने अमरीकी सिनेमा तो देखा ही होगा! उसमें आपने अकसर देखा होगा कि पृथ्वी या कोई ख़ास महाद्वीप बर्बाद होने वाला है और एक अमरीकी वैज्ञानिक या CIA का एजेंट आकर उसे अपने कौशल से बचा लेता है। आपने हॉलीवुड की फिल्मों में अकसर देखा होगा की तबाही कहीं भी हो, बचाता उसे अमरीकी नागरिक ही है। क्या आपको ये सब बहुत नैचुरल लगता है? ये सारी कहानियां एक प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं। दुनिया के सारे देशों में अगर अमरीकी एम्बेसी के आगे वीजा के लिए लम्बी-लम्बी कतारें लगती हैं तो उसके पीछे इन फिल्मों का भी हाथ है।

आज का सिनेमा पूरी तरह पूंजीवाद की गिरफ्त में है। अगर बीच-बीच में आपको हैदर, कोर्ट और फैंडरी जैसी फिल्में देखने को मिल जाती हैं तो आप इसे वैसे ही देखिये जैसे मीडिया में ‘रवीश कुमार’ को देखते हैं।

व्यापक तौर पर आपको अगर सिनेमा को बदलना है तो आप सब को आगे आना होगा। सिनेमा को डेमोक्रेटिक बनाना होगा वर्ना ये कहना बंद कर दीजिये कि सिनेमा एक मास मीडियम है।

मैं एक बहुत ही छोटा फिल्ममेकर हूं। मैं इस बाज़ार से आज़ाद होना चाहता हूं। आप ‘Life of an Outcast’ का ट्रेलर देखिये और अगर आपको लगता है कि इस समाज को ऐसी फिल्मों की जरुरत है तो हमें www.studiosarvahara.com पर डोनेट कर सकते हैं।

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