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पत्रकारों की काव्य गोष्ठी में पीएमओ का भेदिया ! नवीन कुमार की कविता पर हंगामा !

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रविवार को नोएडा की फिल्म सिटी में टीवी पत्रकारों के काव्य समागम पर पीएमओ के एक भेदिये न केवल कब्ज़ा कर लिया बल्कि आरएसएस की लाइन लेंथ बिगाड़ने वाली कविताओं पर अच्छा-ख़ासा तमाशा भी खड़ा कर दिया। एबीपी न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार विजय शर्मा ने कविता लिखने-पढ़ने वाले टीवी पत्रकारों को एक मंच पर लाने के इरादे से ‘शब्दोत्सव’ नामक कार्यक्रम की रूपरेखा बनाई थी और इसमें अशोक चक्रधर, शम्मी नारंग और नवाज़ देवबंदी को बुलाया गया था।

सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि इस कार्यक्रम के आरंभ में एक दिन पहले गुज़रे कवि और पत्रकार नीलाभ ‘अश्‍क’ को श्रद्धांजलि दी गई जबकि अकेले पत्रकार नवीन कुमार की ओर से प्रतिरोध की कविता के पाठ की जब बारी आई, तो श्रद्धांजलि देने वाले आयोजकों और संचालकों को वह नागवार गुज़री और उन्‍होंने अश्‍लील तरीके से हस्‍तक्षेप करते हुए बीच में ही कविता-पाठ रुकवा दिया। जिंदगी भर प्रतिरोध की राजनीति करने वाले और प्रतिरोध का लेखन करने वाले कवि नीलाभ के लिए इससे बड़ी दुख की बात कोई नहीं हो सकती।



जब कार्यक्रम शुरू हुआ तो पता चला कि पत्रकारों के नाम पर हो रहे कार्यक्रम में पीएमओ की सेंध लग चुकी है। आरएसएस के पुराने कैडर और पत्रकारिता से मोहभंग के बाद वेतन आयोगों की शरण में जा चुके मोदी दफ्तर के मुलाजिम दुर्गा नाथ स्वर्णकार को संचालन का जिम्मा थमा दिया गया। यह भेद कार्यक्रम के बीच-बीच में अतिथियों ने खोला कि खेल क्या है। नवाज़ देवबंदी और शम्मी नारंग से लेकर कई लोगों ने खुलेआम कहा कि कार्यक्रम की रूपरेखा तय करने में मोदी दफ्तर के मुलाज़िम दुर्गा नाथ स्वर्णकार शुरू से शामिल थे। इसका कारण तो विजय शर्मा ही जानते होंगे लेकिन इस उपस्थिति ने पूरे कार्यक्रम को राजनैतिक तौर पर संदिग्ध बना दिया।

इतने पर भी सब कुछ ठीक से चल रहा था, लेकिन दुर्गानाथ स्‍वर्णकार ने सहयोगी मंच संचालिका और इंडिया न्यूज की एंकर शीतल राजपूत के साथ मिलकर अच्छी-खासी काव्य मंडली को उस वक्त तमाशे में बदल दिया जब न्यूज़ 24 के वरिष्ठ पत्रकार नवीन कुमार ने अपनी कविता “इस देश की गलियों में जबतक आदम का लोहू बहता है” का पाठ शुरू किया। नवीन कुमार का तेवर और मिजाज़ छुपा नहीं है और उनकी पत्रकारिता समेत कविताओं में भी यह स्‍पष्‍ट दिखता है। जैसे-जैसे मौजूदा राजनीति पर नवीन की कविता का प्रहार तेज़ होता गया, दुर्गा नाथ स्‍वर्णकार और शीतल राजपूत के चेहरे तमतमाने लगे, लेकिन मंचीय मर्यादाओं ने उन्हें खामोशी ओढ़ने पर मजबूर कर दिया था।

जैसे ही नवीन कुमार की पहली कविता रुकी, दुर्गानाथ के भीतर का स्वयंसेवक जाग उठा और काव्य गोष्ठी संचालन की मर्यादा को ताक पर रखकर वे अपने अफसरी रूप में आ गए। उन्होंने यह कहकर नवीन को रोकने की कोशिश की कि यह मंच किसी के पक्ष में या किसी के खिलाफ नहीं है। नवीन ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया और दुर्गानाथ को काव्य अनुशासन सीखने की नसीहत देते हुए कहा कि कविता अपनी बात कहेगी, वो किसी के पक्ष में हो या किसी के खिलाफ। देखें यह वीडियो:

इसके बाद नवीन कुमार ने अपनी दूसरी कविता “हिंदू होने की शर्त” शुरू की। उनकी यह कविता हिंदुत्व के नाम पर कत्लेआमों और अराजकता की हिमायती भगवा बिरादरी पर तीखे सवाल खड़े करती है। इलाहाबाद, लखनऊ, मुंबई और दिल्ली के कई मंचों और मैदानों में वह इस कविता का निर्बाध पाठ कर चुके हैं। तीन अंतरे के बाद ही उनकी कविता दुर्गानाथ स्वर्णकार और शीतल राजपूत के बर्दाश्त से बाहर हो गई। शीतल राजपूत ने नवीन को कविता के आधे में हो रोकते हुए कहा कि उनका समय खत्म हो गया है। दुर्गानाथ पहले से जले-भुने बैठे थे। उन्हें शीतल राजपूत का साथ मिला तो उन्हें फिर से मौका मिल गया।

इसके बाद तो मंच से नवीन कुमार ने पूरे आयोजन की नैतिकता पर ही सवाल खड़ा कर दिया और कहा कि अगर आयोजकों को केवल इश्क-मोहब्बत-गेसू-फूल की ही कविताएं सुननी थी तो यह पहले से बताया जाना चाहिए था। उन्होंने मंच पर बैठे अशोक चक्रधर से हस्तक्षेप की मांग की। नवीन अड़ गए वो बिना अपनी कविता पूरी किए बगैर जाएंगे ही नहीं। जब यह तमाशा चल रहा था तो एक मंच पर बैठे आजतक के पुराने मुलाज़िम आलोक श्रीवास्तव हाथ से चेहरा छिपाकर थोथी हंसी हंसते हुए नज़र आए। आलोक श्रीवास्तव वैसे तो खुद को कवि कहते हैं लेकिन पता नहीं उन्होंने कैसी कविताई की कि मोदी सरकार के आते ही उनकी प्रतिभा में विस्फोटक उछाल आया। वे एक प्रोड्यूसर से सीधे दूरदर्शन के सलाहकार बन बैठे। एक कवि जब सत्ता की गोद में बैठकर रचना को देखना शुरू करता है तो उसकी हालत वैसी ही हो जाती है जैसी आलोक श्रीवास्तव की हो गई थी।

इस पूरे प्रकरण में अच्छी बात यह रही कि मंचासीन मठाधीशों से ज्यादा तमीज़दार और लोकतांत्रिक दर्शक व आमंत्रित कवि निकले जिन्होंने एक स्वर में फरमान जारी कर दिया कि नवीन कुमार को अपनी कविता पूरी करनी ही चाहिए। इसके बाद आयोजकों के सामने कोई चारा नहीं रह गया था। विजय शर्मा को दुर्गानाथ और शीतल राजपूत से माइक लेकर कहना पड़ा कि नवीन कुमार की कविता हम पूरी सुनेंगे। इसके बाद इंडिया न्यूज़ के प्रबंध संपादक राणा यशवंत ने भी दखल देते हुए कहा कि हर कविता की एक विचारधारा होती है और उसे सुना ही जाना चाहिए। नवीन कुमार ने इसके बाद अपनी पूरी कविता पढ़ी।

इस घटनाक्रम को आप नीचे दिए वीडियो में देख सकते हैं:

इस कार्यक्रम ने अनजाने में ही टीवी पट्टी की अलोकतांत्रिकता और कुंठाओं का पोस्टमार्टम कर दिया है। जो लोग मामूली कविता के प्रतिरोध को पचाने के तैयार नहीं हैं वो राजनैतिक बहस के तीखेपन से कैसे हमलावर हो जाते होंगे, यह समझना मुश्किल नहीं है। नवीन कुमार को कविता पाठ से दो बार रोके जाने में निहित सोच को समझने की जरूरत है। ये वही सोच है जो कलबुर्गी, पानसरे या दाभोलकर की जान ले लेती है। पत्रकारों की आपसी गोष्ठी में पीएमओ के भेदिये का घुस आना दूर की कहानी कह रहा है।

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