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सिनेमा पर चंद लोगों के क़ब्ज़े की चिंता के साथ शुरु हुआ 13वां गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल

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गोरखपुर. गोरखपुर फिल्म सोसाइटी और जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित 13वें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल का 19 जनवरी को आगाज हुआ. सिविल लाइंस स्थित गोकुल अतिथि भवन में आयोजित फेस्टिवल में आये फिल्मकारों के संबोधन और दो म्यूजिक वीडियो ‘रंग.एक गीत ‘ और ‘ एक देश बड़ा कब बनता है’ को दिखाए जाने के साथ फिल्म फेस्टिवल शुरू हुआ.

समानांतर सिनेमा के प्रमुख स्तम्भ मृणाल सेन की याद और हाशिए के लोगों को समर्पित इस फेस्टिवल में छह दस्तावेजी फिल्म, दो फीचर फिल्म, एक बाल फिल्म के अलावा म्यूजिक वीडियो व लघु कथा फिल्म दिखाई जा रही है.

उद्घाटन समारोह में युवा फ़िल्मकार एवं ‘ लाईफ आफ एन आउटकास्ट’ के निर्देशक पवन श्रीवास्तव ने कहा कि सिनेमा जैसे माध्यम पर चंद लोगों का कब्जा है जबकि सिनेमा को आम लोगों की समझदारी विकसित करने के लिए बड़े पैमाने पर मुक्त करने की जरूरत है। उन्होने कहा कि आज बाज़ार – हम क्या खाएं, क्या पहनें ही नहीं बल्कि हम कैसे सपने देखें , यह भी तय कर रहा है। बाज़ार के इसी एकाधिपत्य से मुक्ति के लिए जरूरी है कि सिनेमा जैसे माध्यम को जन सहयोग से बनाने और दिखाने के माध्यम विकसित किए जाएँ। उन्होने कहा कि ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ ऐसा ही मंच है। पवन श्रीवास्तव ने मुख्यधारा के भारतीय सिनेमा को सिर्फ शहर का सिनेमा कहा जिसमे गाँव और हाशिये का नाममात्र का प्रतिनिधित्त्व है। उन्होंने कहा कि जिस तरह के राजनीतिक माहौल में हम हैं वहां ऐसे आयोजन महत्वपूर्ण हैं। सिनेमा वह माध्यम है जिसमें दृश्य है, ध्वनि है जो जीवन को बेहतर ढंग से जोड़ता है।

फ़िल्मकार एवं ‘ अपनी धुन में कबूतरी ‘ के निर्देशक संजय मट्टू ने कहा कि फिल्मकारों का दर्शकों से रूबरू होना जरुरी है। अब तक सामान्य फिल्में व मीडिया वही दिखाते थे जो वह दिखाना चाहते थे। लेकिन इस तरह के आयोजन से यह पता चलता है कि दर्शक फिल्मों के विषय वस्तु से क्या क्या अर्थ निकालते हैं। यह जरूरी है। इससे विविधता का पता चलता है और नये अर्थ व मायने निकलते हैं।

प्रतिरोध के सिनेमा के राष्ट्रीय सयोजक संजय जोशी ने कहा कि ‘प्रतिरोध का सिनेमा ’ की शुरूआत वर्ष 2006 में पहले गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल के रूप में हुई थी. इसके बाद से हर वर्ष यह आयोजन होता है. इस वर्ष फिल्म फेस्टिवल का 13वां संस्करण आयोजित हो रहा है. वर्ष 2006 से 2019 तक प्रतिरोध का सिनेमा के 68 फ़िल्म फ़ेस्टिवल देश में हो चुके हैं.

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कवि कौशल किशोर ने कहा कि गोरखपुर में 13 वां फिल्म फेस्टिवल ऐतिहासिक है। 2006 से शुरू हुई इसकी यात्रा सुदूर ग्रामीण अंचल तक पहुंची है। उन्होंने कहा कि प्रतिरोध का सिनेमा अपने आप में विविध कला व साहित्य को समेटे हुए है। इसको और आगे बढ़ाने की जरूरत है जिससे कि लोगों में विमर्श बढ़े। उन्होंने कहा कि जब हाशिये के लोगों की अभिव्यक्ति पर हमले बढ़े हैं तो यह जरूरी हो जाता है कि इस माध्यम से जन-जन की भावना को जोड़ा जाए।

इसके पहले आयोजन समिति के अध्यक्ष वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने स्वागत वक्तव्य देते हुए कहा कि अन्याय, शोषण, उत्पीड़न, कुरूचि, अपसंस्कृति और बाजारवाद के विरूद्ध प्रतिरोध की सांस्कृतिक कार्यवाहियों में साझेदारी करके उसे और सशक्त बनाना और धार देना हमारा एकमात्र उद्देश्य है. यर्थाथ की कलात्मक प्रस्तुति के साथ जनसामान्य को सचेतन बनाने में फिल्म कला का महत्व सर्वोपरि है क्योंकि यह अपनी उन्नत तकनीकए चित्रात्मक और सहज सम्प्रेषणीय होने के नाते व्यापक दर्शकों के रूबरू होती है. फिल्म कला और विभिन्न जन कलाओं के साथ हम व्यापक जनता के बीच जाना चाहते हैं.

गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक मनोज कुमार सिंह ने फेस्टिवल में शिरकत करने आये फ़िल्मकारों और आयोजन में सहयोग देने वालों को धन्यवाद दिया. संचालन फ़ेस्टिवल संयोजक गोरखपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफ़ेसर डॉ चन्द्रभूषण अंकुर ने किया.

फिल्म फेस्टिवल की शुरूआत दिखाई गई म्यूजिक वीडियो ‘रंग.एक गीत ‘ और ‘ एक देश बड़ा कब बनता है ‘ कवि लाल्टू के गीत पर आधारित था जिसको हैदराबाद की युवा संगीत टीम होई चोई ने तैयार किया है.

‘ भुवन शोम ’

इसके बाद प्रख्यात फिल्म निर्देशक मृणाल सेन की याद में उनकी फिल्म ‘ भुवन शोम ’ दिखाई गई . यह मृणाल सेन की पहली हिंदी फ़िल्म थी हालांकि इससे पहले वे बांगला भाषा में कई महत्ववपूर्ण फिल्में बनाकर प्रतिष्ठित हो चुके थे. उत्पल दत्त, साधू मेहर, सुहासिनी मुले जैसे कुशल कलाकारों, विजय राघव के संगीत, सौराष्ट्र के खास लोकेल के साथ –साथ जिस चीज ने मृणाल सेन की फ़िल्म को महत्वपूर्ण बनाने मेंनिर्णायक भूमिका अदा की वह थी के के महाजन की श्वेत और श्याम फ़ोटोग्राफ़ी. हिन्दुस्तानी नई लहर की इस फ़िल्म की कहानी बहुत पेंचदार नहीं है. एक हैं रेलवे के ईमानदार और खडूस शोम साहब (उत्पल दत्त) जो अपनी ईमानदारी के कारण नितांत अकेले भी हो गए हैं. दरअसल फ़िल्म की कहानी भी उनके दौरे से शुरू होती है. वे अपने महकमे के एक छोटे कर्मचारी जाधव पटेल (साधू मेहर ) की जांच के लिए सौराष्ट्र आते हैं. वैसे जाँच के अलावा रेगिस्तान के विशाल मैदान में पंछी का शिकार खेलना भी उनकी इस यात्रा का एक मकसद है, बल्कि यही फ़िल्म की मुख्य कहानी बन जाती है. फ़िल्म में बहुत जल्दी शिकार कथा शुरू हो जाती है. शोम साहब गावं की एक अल्हड़ किशोरी गौरी (सुहासिनी मुले) के साथ पंछी के शिकार पर निकल जाते हैं.

‘ अपनी धुन में कबूतरी ’

‘ अपनी धुन में कबूतरी ’उत्तराखंड की लोकगायिका कबूतरी देवी की जिंदगी और गायकी पर बनी संजय मट्ट निर्देशित दस्तावेजी फिल्म है. कबूतरी देवी पचास वर्ष पूर्व की बहुचर्चित लोकगायिका थी जो शनैः शनैः गुमनामी के अंधेरे में चली गईं। बीते दशक में उत्तराखंड के कुछ जागरूक संस्कृतिकर्मियों की पहल पर पुनः उनके कार्यक्रम हुए और इस भूली हुईविरासत की ओर लोगों का ध्यान गया। फिल्म के प्रदर्शन के बाद निर्देशक संजय मट्टू ने फिल्म के निर्माण से जुड़े किस्सों दर्शकों से साझा किए और सवालों के जवाब दिए.

‘ नाच भिखारी नाच ’

‘ नाच भिखारी नाच ’ प्रसिद्ध लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के साथ काम किये चार नाच कलाकारों की कहानी के जरिए भिखारी ठाकुर की कला को समझने का प्रयास है. इस दस्तावेजी फिल्म का निर्देशन शिल्पी गुलाटी और जैनेन्द्र दोस्त ने किया है. 72 मिनट की यह फ़िल्म भिखारी ठाकुर के साथ काम कर चुके चार कलाकारों रामचंद्र मांझी, शिवलाल बारी, लखिचंद मांझी एवं रामचंद्र मांझी की स्मृतियों, गीत-संगीत की उनकी प्रस्तुतियों और बातचीत पर आधारित है. इनके जीवनानुभवों के जरिए महान लोक नाटककार और लोकनर्तक भिखारी ठाकुर भी एक तरह से मूर्त हो उठते हैं. इस फिल्म को जर्काता में गोल्ड अवार्ड, बोस्टन में बेहतरीन डाक्युमेंटरी का एवार्ड मिल चुका है. कोरिया, नेपाल और अपने देश के दिल्ली, कोलकाता, गोवा आदि शहरों में इसका प्रदर्शन हो चुका है.

‘ लाइफ़ ऑफ़ एन आउटकास्ट ’

फेस्टिवल के पहले दिन की आखिरी फिल्म थी पवन श्रीवास्तव की फीचर फिल्म ‘ लाईफ आफ एन आउटकास्ट ’. फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट ’ ही हाशिये के लोगों की कथा कहने वाली फ़िल्म है जिसमें समाज में फैले जातिगत वैषम्य को दिखाया गया है। यह फीचर फिल्म हाशिये में रह रहे एक पिछड़े और गैर सवर्ण परिवार के लगातार उखड़ने की कहानी है जो हमारे समाज का असल अक्स भी है.

फ़िल्म के प्रदर्शन के बाद पवन श्रीवास्तव से दर्शकों का संवाद हुआ.

फ़िल्म फेस्टिवल में पुस्तकों की प्रदर्शनी दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र रही. जन संस्कृति मंच के घुमंतू पुस्तक प्रदर्शनी के अलावा प्रेमचंद साहित्य संस्थान, सावित्री बाई फूले पुस्तकालय ने अपने स्टाल लगाये थे।

गोरखपुर न्यूज़लाइन से साभार।

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