Home ओप-एड “प्राकृतिक आपदाएँ रोकने को पर्यावरण केंद्रित दृष्टिकोण ज़रूरी !”

“प्राकृतिक आपदाएँ रोकने को पर्यावरण केंद्रित दृष्टिकोण ज़रूरी !”

"हमें प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए इस तरह की नई रणनीतियों पर विचार करना चाहिए। प्राकृतिक आपदाओं के प्रसार को रोकने के लिए एक समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी जो मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को एक साथ लाता हो और जिससे पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन कर सतत विकास को बढ़ावा दिया जा सके"।

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डॉ सत्यपाल सिंह मीणा

 

इस समय पूरी दुनिया कोरोना वायरस से जंग लड़ रही है। वैज्ञानिक कोरोना वायरस की उत्पत्ति एवं स्वरूप के बारे में अध्ययन कर रहे हैं। अधिकांश शोधकर्ताओं का मानना है कि यह वायरस चमगादड़ से किसी मध्यवर्ती होस्ट पहुंचा फिर उससे लोगों में। इस COVID-19 महामारी ने जूनोटिक (पशुओं से मानव में संक्रमण) संक्रामक रोगों के प्रति लोगों का ध्यान फिर से खींचा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार मनुष्य में ज्ञात सभी संक्रामक रोगों में से लगभग 60% जूनोटिक है। इनमें डेंगू बुखार, इबोला, स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू, मिडिल ईस्ट रेस्पिरेट्री सिंड्रोम (MERS), SARS, HIV/AIDS आदि शामिल है।

पर्यावरणविद एवं संक्रामक रोग विशेषज्ञों का मानना है कि मनुष्य भोजन एवं आजीविका के लिए कृषि, जंगल एवं वन्यजीवों पर निर्भर है और बढ़ती जनसंख्या की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के कारण जंगलों में कृषि का विस्तार हो रहा है। इससे जंगली जानवरों के प्राकृतिक पर्यावास का क्षरण हो रहा है। इससे खतरनाक वायरसों के जंगली जानवरों से मनुष्य तक पहुँचने की संभावना बढ़ी गई है। डेविड क्वामेन ने भी अपनी पुस्तक स्पिलओवर – एनिमल इनफेक्शंस एंड द नेक्स्ट हुमन पेंडेमिक मैं इस ओर संकेत किया है।

सरकारों के समक्ष ऐसी स्थिति में दोहरी चुनौती है। एक तरफ जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक पर्यावासों का विखंडन, जैव विविधता का विनाश, प्राकृतिक आपदाओं जैसे-चक्रवात, बाढ़, सूखा संक्रामक रोगों से निपटना दूसरी तरफ बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण करना, लोगों की खाद्य आवश्यकता के लिए कृषि उत्पादन एवं क्षेत्र में विस्तार करना है। इस दोहरी चुनौती का सामना करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों एवं मानवीय आवश्यकता के मध्य संतुलन बनाने की जरूरत है। सरकार ने देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 33% भाग पर वनावरण का लक्ष्य रखा रहा है। नवीनतम भारत वन स्थिति रिपोर्ट-2019 के अनुसार देश कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 24.56% भाग वनों एवं वृक्षों से आच्छादित है।

सघन वृक्षारोपण एवं वनावरण के लिए भूमि की आवश्यकता होती है। वर्तमान समय में महानगरों कि नज़दीक नये घने जंगल, राष्ट्रीय उद्यान, राष्ट्रीय अभ्यारण का विकास संभव नहीं है; ना ही कई हेक्टेयर में फैले नये जंगल बनाने का। ऐसी स्थिति में वनावरण लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नई रणनीतियों की आवश्यकता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के द्वारा दूर संवेदी उपग्रह आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 29.32% भूमि क्षरण के खतरे का सामना कर रहा है। इस तरह की भूमि देशभर में छोटे-छोटे टुकड़ों में फैली हुई है, इस पर छोटे जंगलों (Tinny Forest) के विकास की नीति को अपनाया जा सकता है। 4 से 5 एकड़ बंजर भूमि को विकसित कर सघन वृक्षारोपण करने के लिए जापानी वनस्पतिशास्त्री और पौधों पारिस्थितिकी में विशेषज्ञ अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित मियावाकी विधि महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है।

मियावाकी विधि परंपरागत पौधरोपण की प्रक्रिया से कई मायनों में अलग है। इस के अंतर्गत सबसे पहले वृक्षारोपण के लिए भूमि का चयन कर स्थानीय प्रजाति के पौधे एकत्रित किए जाते हैं। इन्हें उनकी भौतिक विशेषताओं के अनुसार झाड़ी, उप पेड़, पेड़, कैनोपी में वर्गीकृत किया जाता है। मृदा परीक्षण के बाद लगभग 60 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधारोपण किया जाता है। अंततः भूमि पर पलवार ( मल्चिंग) बिछाई जाती है। इस तरह लगाए गए सघन पौधों को 2 से 3 वर्ष तक देखभाल की आवश्यकता होती है उसके बाद ये अपनी जरूरतों को  स्वयं पूर्ण कर लेते हैं। यह छोटे जंगल सामान्य पौधारोपण से 10 गुना अधिक गति से वृद्धि करते हैं और लगभग 30 गुना अधिक घने होते हैं।

सरकार एवं समुदाय की समान भागीदारी से देशभर में हरित कवर को बढ़ाया जा सकता है। इन छोटे जंगलों की अनेक प्राकृतिक लाभ होते हैं। पौधों का चयन करते समय फलों फूलों के पौधों का मिश्रण कर पक्षियों, तितलियां और मधुमक्खियों के लिए आसरा तैयार किया जा सकता है। ये जीव पौधों एवं कृषि फसलों के लिए परागण सेवाएं प्रदान कर सकते हैं। जिससे कृषि उत्पादकता, जैव विविधता एवं प्राकृतिक कीट नियंत्रण में सहायता प्राप्त होगी। किसानों की आजीविका में वृद्धि होगी एवं जैविक खेती के नए रास्ते खुलेंगे तथा जंगली प्रजातियों के सीधे संपर्क से मनुष्यों को सुरक्षित दूरी पर रखने के लिए संरक्षित क्षेत्रों के आसपास “बफर-डिस्टेंसिंग” बनाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। यह लोगों की प्राकृतिक उत्पादों की आवश्यकता को जंगल में जाए बिना पूरा कर सकती है साथ ही पशु एवं मानव संघर्ष को रोकने में भी सहायक हो सकती है। इस तरह के छोटे जंगल स्वच्छ हवा के साथ कार्बन उत्सर्जन को सीमित करेंगे एवं पेरिस समझौते के लिए 2030 तक 2.5 से 3 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर कार्बन सिंक बनाने में उपयोगी होंगे इसके अतिरिक्त इनसे बारिश के पानी का संग्रहण एवं भूजल रिचार्ज होगा।

इसके धरातल पर क्रियान्वयन के लिए ग्राम स्तर से राज्य स्तर तक सहयोग एवं समन्वय के लिए नीति बनाने की आवश्यकता होगी। जैसे सघन पौधारोपण के लिए खाली पड़ी भूमि का सर्वे करना, कम उपजाऊ भूमि पर समुदाय के साथ लाभ साझाकरण मॉडल के लिए दिशानिर्देश तैयार करना।जिला स्तर पर पौधारोपण के लक्ष्य निर्धारित करना। लोकल प्रजाति के पौधों की उपलब्धता के लिए पंचायत स्तर पर नर्सरी का विकास किया जा सकता है। ग्राम स्तर पर लोगों के प्रशिक्षण के लिए गैर सरकारी संगठनों से सहयोग प्राप्त करना। अप्रयुक्त  सार्वजनिक भूमि पर इस विधि से वृक्षारोपण मनरेगा के अंतर्गत किया जा सकता है। किसानों को अपनी कम उपजाऊ भूमि पर मियावाकी विधि से पौधे रोपण के लिए प्रशिक्षित एवं प्रेरित क्या जा सकता है। केरल एवं पश्चिम बंगाल सरकार ने इसे लागू करने के लिए नीतिगत निर्णय लिए हैं।

शहरी क्षेत्रों में भी ग्रीन आवरण पर्यावरण संतुलन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इससे शहरों को हीट आईलैंड बनने से रोका जा सकता है। फनी, अम्फान जैसे चक्रवाती तूफानो से वनों के नुकसान की त्वरित पूर्ति मियावाकी विधि से की जा सकती है। तमिलनाडु सरकार ने चेन्नई में शहरी जंगलों के विकास के लिए इस विधि को अपनाने का निर्णय लिया है।

हमें प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए इस तरह की नई रणनीतियों पर विचार करना चाहिए। प्राकृतिक आपदाओं के प्रसार को रोकने के लिए एक समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी जो मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को एक साथ लाता हो और जिससे पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन कर सतत विकास को बढ़ावा दिया जा सके।


 

 डॉ सत्यपाल सिंह मीना, भारती रेवेन्यू सेवा अधिकारी (IRS Officer) हैं और सोच बदलो गाँव बदलो टीम (SBGBT) के संस्थापक सदस्य हैं। 

 


 

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