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हिंदुत्व के ‘गोरखधंधे’ ने मुस्लिम जोगियों को किया अपने ‘नाथ’ से दूर !

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हसिबा खेलिबा रहिबा रंग
काम क्रोध न करिबा संग
हसिबा खेलिबा गाइबा गीत
दिढ करि राखि अपना चीत
हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान
अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियान
हसै-खेलै न करै मन भंग
ते निहचल सदा नाथ के संग.

ये गुरु गोरखनाथ की मूल शिक्षा से परिचित कराने वाली सबदी है। हँसते-खेलते काम-क्रोध से मुक्ति और ब्रह्मज्ञान पाने का रास्ता दिखाने वाले गुरु गोरखनाथ ने धर्म के नाम पर जारी तमाम आडंबरों और रिवाजों को दरकिनार कर दिया था। उनकी शिक्षाओं का असर जाति-धर्म की तमाम दीवारों को पार कर गया था। ‘गोरखवाणी’ गाने वाले जोगी हिंदू ही नहीं मुसलमान भी हुए। यह संख्या छोटी-मोटी नहीं थी। मुस्लिम जोगियो के गाँव-गाँव के बसे जो जोगिया चोला ओढ़कर सारंगी बजाते हुए घूमते देखे जाते थे। लेकिन गोरखपुर का नाथपीठ जैसे-जैसे हिंदुत्व का गढ़ बनता गया, मुस्लिम जोगियों की मुश्किलें बढ़ती गईं। वे अपनी परंपरा त्यागने को मजबूर होते जा रहे हैं। इस परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रक्रिया पर वरिष्ठ पत्रकार और गोरखपुर न्यूज़ लाइन के संपादक मनोज सिंह ने एक महत्वपूर्ण लेख लिखा है। मीडिया विजिल ने इसके पहले गोरखधंधा शब्द के सफ़र और उसके अर्थ  उलटने की प्रक्रिया पर पाठकों के सामने यह अहम लेख पेश किया था। अब पढ़िये मनोज सिंह का यह ज़रूरी लेख-

पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुसलमान जोगियों के दर्जनों गांव हैं. इन गांवों में ऐसे मुसलमान जोगी रहते हैं जो नाथ पंथियों की तरह गेरूआ रंग का वस्त्र (गुदरी, कंथा) पहनते हैं और हाथ में सारंगी लिए गांव-गांव गोपीचंद्र और राजा भर्तृहरि के गोरखनाथ के प्रभाव में संन्यासी हो जाने की लोककथा गीत गाते फिरते हैं. ग्रामीण इन्हें भेंट स्वरूप अनाज व नकदी देते हैं और बड़े चाव से उनसे गोरखनाथ की महिमा का वर्णन करने वाले गीत सुनते हैं.

ये जोगी कौन हैं, उनका क्या इतिहास है और उनका गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित नाथ संप्रदाय से क्या संबंध है, इसको आज बहुत कम लोग जानते हैं. पहले ये मुसलमान जोगी खूब देखे जाते थे लेकिन अब बहुत कम दिखते हैं.

हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नाथ संप्रदाय पर लिखी अपनी पुस्तक में इनके बारे में जानकारी दी है. उन्होंने लिखा है, ‘नाथमत को मानने वाली बहुत सी जातियां घरबारी हो गई हैं. देश के हर हिस्से में ऐसी जातियों का अस्तित्व है. इनमें बुनाई के पेशे से जुड़ी तमाम जातियां हैं. इनमें मुसलमान जोगी भी हैं. पंजाब के गृहस्थ योगियों को रावल कहा जाता है और ये लोग भीख मांगकर, करामात दिखाकर, हाथ देखकर अपनी जीविका चलाते हैं. बंगाल में जुगी या जोगी कहने वाली कई जातियां हैं. योगियों का बहुत बड़ा संप्रदाय अवध, काशी, मगध और बंगाल मे फैला हुआ था. ये लोग गृहस्थ थे और पेशा जुलाहे या धुनिए का था. ब्राह्मण धर्म में इनका कोई स्थान नहीं था.’

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बताया है कि बंगाल के रंगपुर जिले के योगियों का काम कपड़ा बुनना, रंगसाजी और चूना बनाना है. इनमें स्मरणीय महापुरूष गोरखनाथ, धीरनाथ, छायानाथ और रघुनाथ आदि हैं. इनके गुरू और पुरोहित ब्राह्मण नहीं होते बल्कि इनकी अपनी ही जाति के लोग होते हैं. इनके यहां बच्चों के कान चीरने और मृतकों की समाधि देने की परम्परा है.

हैदराबाद के दवरे और रावल भी नाथ योगियों के गृहस्थ रूप हैं. कोंकण के गोसवी भी अपने का नाथ योगियों से संबद्ध बताते हैं. इस प्रकार की योगी जातियां बरार, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और दक्षिण भारत में भी पाई जाती हैं.

जार्ज वेस्टन ब्रिग्स ने अपनी पुस्तक ‘गोरखनाथ एंड दि कनफटा योगीज’ में 1891 की जनसंख्या रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि भारतवर्ष में योगियों की संख्या 2,14,546 हैं. आगरा व अवध प्रांत में 5,319 औघड़, 28,816 गोरखनाथी और 78,387 योगी थे. इनमें बड़ी संख्या मुसलमान योगियों की है.

इसी वर्ष की पंजाब की रिपोर्ट में बताया कि मुसलमान योगियों की संख्या 38,137 है. वर्ष 1921 की जगगणना में इनकी जोगी हिंदू 6,29,978, जोगी मुसलमान 31,158 और फकीर हिंदू 1,41,132 बताई गई हैं. इस जनगणना में पुरूष और स्त्री योगियों की संख्या भी अलग-अलग बताई गई है.

बाद की जनगणना रिपोर्टों में इन लोगों का अलग से उल्लेख नहीं है. ब्रिग्स ने अपनी किताब में योगी जातियों का विस्तार से जिक्र किया है.

इससे स्पष्ट होता है कि आज भी गोपीचंद और भर्तहरि को गाने वाले मुसलमान योगी नाथपंथ से जुड़े गृहस्थ योगी हैं जो अपने को जोगी कहते हैं. इन मुसलमान जोगियों के गांव गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, संतकबीरनगर, आजमगढ़ बलरामपुर में मिलते हैं लेकिन अब ये अपनी परम्परा को छोड़ रहे हैं.

मुसलमान जोगियों पर समुदाय के भीतर और समुदाय के बाहर दोनों तरफ से अपनी इस परम्परा को छोड़ने का दबाव बढ़ रहा है. सांप्रदायिक हिंसा और कटुता बढ़ने के कारण अब ये जोगी गेरूआ वस्त्र में खुद को असहज पाते हैं. उनके घरों में नौजवान मुसलमान इस कार्य को हेय दृष्टि से देखते हैं.

उनका कहना है कि यह कार्य ठीक नहीं है. वे इसे सिर्फ भीख मांगने के एक तरीके के रूप में देखते हैं. दूसरी तरफ हिंदू कट्टरपंथी संगठन इनको अपने लिए खतरा मानते हैं क्योंकि जिस दर्शन और सिद्धांत पर वे घृणा की राजनीति खड़ा करना चाहते हैं उस पर मुसलमान जोगियों की यह परम्परा बहुत गहरा चोट करती है.

वर्ष 2007 से मैंने मुसलमान जोगियों के बारे में खोजबीन शुरू की. मेरी मुलाकात एक कबीरपंथी साधु से हुई जिसने बताया कि गोरखपुर जिले के पाली ब्लाक के बड़गो गांव में मुसलमान जोगी रहते हैं. जब मै वहां पहुंचा जो गांव के बाहर कुछ नौजवानों से मुलाकात हुई. मैंने उनसे जब जोगियों के घर के बारे में पूछा तो उन्होंने नफरत से कहा कि पता नहीं क्यों वे मुसलमान होकर गेरूवा वस्त्र पहनते हैं? हम चाहते हैं कि वे जल्दी से इस कार्य को छोड़ दें. ये सभी हिंदू युवक थे. इनमें से कुछ अपने को हिंदू युवा वाहिनी से जुड़ा बता रहे थे.

बड़गो इस गांव में 75 घर मुसलमानों के हैं जिसमें दो दर्जन मुसलमान जोगी है. बख्शीश इनमें से एक था. हमारी जब उससे भेंट हुई तो वह खेत में काम कर रहे थे. 35 वर्षीय बख्शीश के पिता दिलशफी और ससुर अलीहसन भी जोगी हैं. बख्शीश ने अपने पिता और ससुर से भर्तृहरि और गोपीचंद के गीत तथा कबीर के भजन को गाना सीखा.

उसके पास एक बहुत पुरानी सारंगी थी जिसके आयु के बारे में उसका कहना था कि वह दो पीढ़ी पुरानी है. उसके पास खेती योग्य एक बित्ता भी जमीन नहीं थी. उसने कहा कि वह अब वह जोगी नहीं बने रहना चाहता क्योंकि उसकी बिरादरी के लोग इसे पसंद नहीं कर रहे हैं. जब हमने उसकी सारंगी देखनी चाही तो उसने असमर्थता जता दी.

बहुत कुरेदने पर उसने बताया कि उसकी पत्नी मायके गयी है और सारंगी को कमरे में बंद कर ताले की चाभी भी अपने साथ लेती गयी है. वह नहीं चाहती कि उसकी गैरहाजिरी में बख्शीश सारंगी लिए गीत-भजन गाते गांवों में निकल पड़े.

इस गांव के दूसरे जोगी एक शादी में गए थे इसलिए उनसे मुलाकात नहीं हो पाई. गांव के प्रधान मुख्तार अहमद भी इस बात की हिमायत कर रहे थे कि बख्शीश और दूसरे जोगियों को सारंगी बजाते हुए गांवों में गोरखनाथ की महिमा गाने की परंपरा से मुक्त हो जाना चाहिए और इसके बजाय उन्हें दूसरा काम करना चाहिए.

मुख्तार ने कहा कि वह जोगियों का जॉब कार्ड बना रहा है और वह चाहता है कि वे सारंगी छोड़ कर हाथ में फावड़े थाम लें. बख्शीश ने बहुत अनुनय-विनय करने पर उज्जैन के राजा भर्तृहरि के राज-पाट छोड़ योगी हो जाने की लोक कथा को गाकर सुनाया. जोगी गोपीचंद भर्तहरि को गाकर सुनाने के पहले गोरखनाथ की ख्याति के बारे में पद सुनाता है जिसे वह झाप लेना कहता है-

गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ
मगहर में संत कबीर
आजमगढ़ में बाबा भैरवनाथ
तीनों एक तपस्वी जीव
ले ल गुरू जी का नाम
इसके बाद उसने सुनाया…

जग में अमर राजा राज भर्तृहरि
छोड़े गढ़ उज्जैन का राज
बड़गों गांव के पास के गांव में कुछ जोगी रहते हैं. लोगों ने बताया कि हमीद जोगी बहुत अच्छा गाते है. हमें उनसे मिलना चाहिए. हमीद के घर उनकी पत्नी मिलीं. उन्होंने बताया कि हमीद को गुजरे तीन-चार वर्ष हो गए.

वह जीवन भर गोपीचन्द और भर्तृहरि की लोककथा लोगों को सुनाते रहे. उनके पास बहुत पुरानी सारंगी थी. जब बीमार पड़े और उन्हें लगा कि नहीं बचेगें तो पत्नी से कहा-इसका (सारंगी ) क्या करें ? आज के युग के लड़के हमारी परम्परा को आगे नहीं बढाएंगें. उन्होंने अपने पट्टीदार को बुलाकर उन्हें इस उम्मीद में सारंगी दे दी कि शायद वह इस परम्परा को आगे बढ़ाएं. हमीद का बेटा फेरी लगाकर बर्तन बेचता है.

लौटते वक्त रास्ते में कालू जोगी से भेंट हो गई. वह बड़गो गांव का रहने वाला था. वह जोगी बाने में सारंगी बजाते हुए बंगाल के राजा गोपीचंद के गोरखनाथ के प्रभाव में योगी बन जाने की लोककथा को गा रहा था.

केहू ना चीन्ही गोपीचंद
केहू ना चीन्ही
माई न चीन्ही
बहिना ना चीन्ही
जोगी क सुरतिया नाहीं विरना
बहिनिया नाहीं चिन्हेले
(गोपीचंद योगी हो गया है. योगी होकर वह भिक्षा मांगने घर आया है. योगी वेष में न मां उसे पहचान पा रही है न बहन )

कालू ने मुसलमान जोगियों के कुछ और गांवों के बारे में जानकारी दी. उसने बताया कि गोरखपुर जिले में भीटी, महेशपुर, सेमरी, चैकड़ी में मुसलमान जोगी रहते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी इस परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं.

मुसलमान जोगियों से मिलने वर्ष 2008 में हम देवरिया जिले के रूद्रपुर क्षेत्र का जगत मांझा गांव गए. यहां जोगियों के 15 परिवार हैं. गांव के बाहर सलाउद्दीन मिल गया जिसके पिता मो शफी जोगी हैं. उसने बताया कि पिता घर पर नहीं हैं. यह पूछने पर कि क्या वह हमको गोपीचंद या भर्तृहरि का कोई गीत सुना सकता है, सलाउद्दीन चिढ़ गया. उसने कहा कि हमें यह पसंद नहीं है. हमारे लिए यह अच्छा काम नहीं है. इसलिए मैने पिता को बाहर काम करने के लिए भेज दिया गया है.

इसी गांव के मुसलमान जोगी कासिम उर्फ डा. दुर्गा बताते हैं कि उन्होंने अब आर्केस्टा शुरू कर दिया है और शादी-विवाह के मौके पर फिल्मी गीत गाते हैं. वह कहता है कि पास खेती की जमीन नहीं है. परिवार का खर्च कैसे चलाएं ? कुछ तो करना पड़ता है. कासिम से कुछ सुनाने का अनुरोध करते हैं तो वह एक लड़के से सारंगी लाने को कहता है लेकिन फिर मना कर देता है.

वह पूछता है कि आप लोग कौन हैं और हमारे बारे क्यों जानना चाहते है? यह बताने पर कि हम पत्रकार हैं और जोगियों की परंपरा के बारे में काम कर रहे हैं, बड़ी मुश्किल से एक गीत गाने को तैयार होता है.

जब हमने उससे जोगी वेश में सारंगी के साथ गाने की सिफारिश की तो वह नाराज हो गया और सारंगी को एक तरफ रखते हुए बोला कि आखिर हम समझ नहीं पा रहे हैं कि आप लोग ऐसा क्यों करवाना चाहते है. कुछ हो जाएगा तो. मै पूछता हूं-क्या हो जाएगा तो उसका जवाब था कि आप नहीं समझेंगे. वह कहता है कि हम गुदरी ( गेरूआ रंग का यह कपड़ा जो गले से शरीर में डाला जाता है और पैर तक आता है. इस कपड़े को कंथा और चोलना भी कहा जाता है. कुछ मुसलमान जोगी पीला कंथा भी पहनते हैं ) पहने बिना गाना सुना देते हैं. काफी अनुरोध के बाद उसने जोगी वेश धारण किया.

गुदरी पहनने के बाद उसने सिर पर गेरूए रंग का साफा बांधा और सारंगी बजानी शुरू की. तभी उसकी पत्नी आ गई और उसने सारंगी बजाने से रोक दिया. उसका कहना था कि वह डर रही है. कासिम ने पत्नी को आश्वास्त करने के बाद सारंगी की 36 खूंटियों में बंधे 36 तारों में से कुछ तारों को कसा और गाया…

अरे राम के माई बनवा भेजवलू
भरत के देहलू राजगद्दी
बताव माई राम कहिया ले अइयन
अरे पतझर बगिया में फूलवो न फूलेला
भंवरों ने खिलेला फूलवो न फूलेला
बताव माई राम कहिया ले अइयन

(अरे माई ! आपने राम को वन भिजवा दिया और भरत को राजगद्दी दिला दी. मै इससे दुुखी हूं. बताओ राम कब तक आएंगे. राम बिना कुछ अच्छा नहीं लग रहा है. बाग में न फूल दिख रहे हैं न भंवरे. बताओ मां राम कब तक आएंगे )

यह गीत राम के वन जाने के बारे में है. यहां बताना जरूरी है कि जोगी अब गोपीचंद-भर्तहरि के अलावा भजन भी गाने लगे हैं. यह श्रोताओं के फरमाइश का दबाव है. कुछ जोगी शंकर-पार्वती विवाह और रामकथा को भी गाते हैं लेकिन सभी कहते हैं कि उनके गायन के केंद्र में गोरखनाथ, गोपीचंद और भर्तहरि ही हैं.

फूल मोहम्मद जोगी ने गोपीचंद की मां मयनावती का दर्द अपने गीत में बयां किया…

अरे इतना बचनिया हो माई
भर-भर माई रोयेली
फटही गुदरिया हो माई
झरि-झरि रोयेली
कौने करनिया हो बचवा
बनल तू जोगी हो
अरे जनम देहलू हो माई
अरे करम न देहलू हो माई
अरे बारह बरसवे हो बचवा बन गइल जोगी हो
अरे बड़-बड़ तपस्या हो बचवा
बड़-बड़ पूजवा हो गोपीचंद

(गोपीचंद को जोगी के भेष में भिक्षा मांगते देख उसकी मां मैनावती रो रही है और उससे पूछ रही है कि किस वह 12 वर्ष की छोटी उम्र में जोगी हो गया है. मैने बहुत पूजा-पाठ कर और तपस्या कर उसे बेटा के रूप में पाया था. गोपीचंद अपनी मां से कहता है कि उसने उसे बेटे के रूप में जन्म तो दिया लेकिन उसका कर्म बनाने वाला तो कोई और है. मेरे कर्म में जोगी बनना लिखा था इसलिए जोगी बन गया. इसलिए तुम दुखी मत हो )

कासिम के बेटे ने भी एक गीत गाया…

हथवा लिये संरगिया
बना है राजा भिखरिया हो
गुदरिया गल में डाले भर्तहरि
राजा भर्तहरि बना भिखारी
राजपाट बिसराई
गोरख के अजब
तन में भस्म रमाई
राजा बना भिखरिया हो
( हाथ में सारंगी लेकर राजा भर्तहरि भिखारी बन गया है. उसके शरीर पर गुदरी ( जोगियों का कपड़ा ) है. उसने राज-पाट छोड दिया है. बाबा गोरखनाथ के प्रभाव राजा भर्तहरि जोगी हो गया है. उसने शरीर में भस्म लगा लिया है और घूम-घूम कर भीख मांग रहा है )

कासिम ने कहा कि माहौल खराब हो गया है. हम मुसलमान हैं लेकिन हमारे घर में कुरआन के साथ रामायण भी है. हम बाबा गोरखनाथ और उनके शिष्यों गाोपीचंद, भर्तृहरि के वैरागी बन जाने की कथा लोगों को सुनाते हैं. गांवों में जब हम जाते थे तो लोेग कहते थे कि जोगी आ गए. कोई हमसे नहीं पूछता कि हम हिंदू हैं या मुसलमान. आज डर लगता है. हर जगह हिंदू-मुसलमान की बात होती है.

हम डरते हैं कि कोई हमसे कोई यह कह न दे कि मुसलमान होकर गेरूवा रंग का गुदरी क्यों पहनता है और सारंगी पर बाबा गोरखनाथ को क्यों गाता है? कोई कुछ कहे नहीं तब भी एक डर दिल में बैठा रहता है कि कोई कुछ कह देगा. कहीं कुछ हो जाए. आज 12 वर्ष बाद हाथ में सारंगी ली है और गाया है.

मुसलमान जोगी जिस सारंगी को बजाते हैं, कहा जाता है कि उसका अविष्कार गोपीचंद ने ही किया था. गोपीचंद बंगाल के राजा मानिकचंद्र के पुत्र थे जिनका संबंध पालवंश से बताया जाता है.

डा. मोहन सिंह ने अपनी पुस्तक में पंजाब यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में मौजूद कई हस्तलिखित प्रतियों के आधार पर ‘उदास गोपीचंद गाथा, गोरखपद’ नाम से एक अंश छापा है जो गोपीचंद और उनमी मां मयनावती के संवाद के रूप में है. अधिकतर मुसलमान जोगी इसी कथा को गाते हैं. कुछ कहानियों में कहा गया है कि गोपीचंद बंगाल के राजा थे. उनकी मां मयनावती ने गोरखनाथ से दीक्षा ली थी और बेटे के राजा बन जाने पर उन्होंने ही योगी बन जाने को प्रेरित किया.

मुसलमान जोगी ‘भरथरी चरित्र’ की कथा को गाते हैं जो सबसे पहले दूधनाथ प्रेस हाबड़ा से छपा है. इस पुस्तक में भरथरी या भर्तहरि को उज्जैन के राजा इंद्रसेन का पौत्र व चंद्रसेन का पुत्र बताया गया है.

राजा भर्तहरि का विवाह सिंहल देश की राजकुमारी सामदेई से हुआ था. गोरखनाथ से मुलाकात के बाद भर्तहरि योगी हो गए. मुसलमान जोगी जो गीत गाते हैं उसमें भर्तहरि और सामदेई के बीच संवाद है. एक जोगी ने मुझे जो गीत सुनाया था उसमें सामदेई, भर्तहरि को धिक्कारती हैं और कहती हैं कि योगी बन कर उसने पति धर्म का निर्वाह नहीं किया.

कुशीनगर जिले के हाटा में रहने वाले जोगी सरदार शाह ने कहा कि जोगियों के पास भर्तहरि के जीवन चरित्र के बारे में दो किताबे हैं. ‘भरथरी चरित्र’ और ‘भरथरी हरि’. भरथरी हरि में भरथरी की पत्नी के बतौर पिंगला दर्ज हैं. सरदार शाह भरथरी चरित्र को ही असली मानते हैं.

72 वर्षीय सरदार शाह ने बताया कि अधिकतर मुसलमान जोगी अकेले या समूह में पांच-छह महीने के लिए निकल जाते हैं और घूमते-फिरते बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल तक पहुंच जाते हैं. वह खुद भी जवानी के दिनों में लंबी यात्राएं करते थे.

उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल में मुसलमान जोगियों का काफी सम्मान है और लोग उन्हें गोरखनाथ की भूमि से आया बताते हुए खूब दान देते हैं. शाह सरकार की उपेक्षा से दुखी हैं और तीखा व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि बलमुआ टाइप का गीत गाने वाले हीरो बन रहे हैं लेकिन हम जैसे कलाकारों की कोई पूछ नहीं है.

सरदार शाह के बेटे और पौत्र, उनकी कला साधना से दूर हैं. बेटा टैक्सी चलाता है और उसकी सारंगी और गोपीचंद-भर्तहरि कथा गायन में कोई रूचि नहीं हैं. वह सरदार शाह को भी यह सब छोड़ देने के लिए कहता है लेकिन उनका कहना है कि जब तक जिंदगी है वह कलाकार बने रहेंगे.

पहले मुसलमान जोगी गोरखनाथ मंदिर जाते थे और भंडारे में भाग लेते थे लेकिन अब उनका मंदिर से रिश्ता उतना जीवंत नहीं है. वर्ष 1935 में दिग्विजयनाथ के महंत बनने के बाद गोरखनाथ मंदिर हिंदुत्व की राजनीति का केंद्र हो गया जिसको उनके बाद के महंत अवैद्यनाथ और फिर योगी आदित्यनाथ ने और आगे बढ़ाया. ऐसे में मुसलमान जोगियों का नाथ सम्प्रदाय की सबसे बड़ी पीठ से संबंध और संपर्क कमजोर होना स्वभाविक ही था.

नाथ संप्रदाय और गोरखनाथ

नाथ संप्रदाय की स्थापना आदिनाथ भगवान शिव द्वारा मानी जाती है. आदिनाथ शिव से मत्स्येन्द्रनाथ ने ज्ञान प्राप्त किया. मत्स्येन्द्र नाथ के शिष्य गोरखनाथ हुए.

गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित बारह पंथी मार्ग नाथ संप्रदाय के नाम से प्रसिद्ध हुआ. इस संप्रदाय के साधक अपने नाम के आगे नाथ शब्द जोड़तेे हैं. कान छिदवाने के कारण इन्हे कनफटा, दर्शन कुंडल धारण करने के कारण दरशनी और गोरखनाथ के अनुयायी होने के कारण गोरखनाथी भी कहा जाता है.

हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं कि गोरखनाथ के बारे में ऐतिहासिक कही जाने वाली बातें बहुत कम रह गई. दंतकथाएं केवल उनके और उनके द्वारा प्रवर्तित योगमार्ग के महत्व प्रचार के अतिरिक्त कोई विशेष जानकारी नहीं देती.

वे कहते हैं कि गोरखनाथ के समय में समाज में बड़ी उथल-पुथल थी. मुसलमानों का आगमन हो रहा था. बौद्ध साधना मंत्र-तंत्र, टोने-टोटके की ओर अग्रसर हो रही थी. ब्राह्मण धर्म की प्रधानता स्थापित हो गई थी फिर भी बौद्धों, शाक्तों और शैवों का एक भारी संप्रदाय था जो ब्राह्मण और वेद की प्रधानता को नहीं मानता था. गोरखनाथ के योग मार्ग में ऐसे अनेक मार्गों का संघटन हुआ. इन संप्रदायों में मुसलमान जोगी अधिक थे.

गोरखनाथ ने ब्राह्मणवाद, बौद्ध परम्परा में अतिभोगवाद व सहजयान में आई विकृतियों के खिलाफ विद्रोह किया. उन्होंने हिंदू-मुसलमान एकता की नींव रखी और ऊंच-नीच, भेदभाव, आडम्बरों का विरोध किया. यही कारण है कि नाथ सम्प्रदाय में बड़ी संख्या में सनातन धर्म से अलगाव के शिकार अस्पृश्य जातियां इसमें शामिल हुईं. नाथपंथियों में वर्णाश्रम व्यवस्था से विद्रोह करने वाले सबसे अधिक थे. हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के लोग बल्कि कहीं-कहीं तो मुसलमान बड़ी संख्या में नाथ संप्रदाय में शामिल हुए.

डा. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ द्वारा रचित 40 पुस्तकों की खोज की जिसमें अधिकतर संस्कृत में है. कुछ पुस्तकें हिंदी में हैं. डा. बड़थ्वाल ने गोरखनाथ की सबदियों को ‘गोरखबानी ’ में संग्रहीत और संपादित किया. गोरखनाथ के संस्कृत ग्रंथ जहां साधना मार्ग की व्याख्या है वहीं उनके पद और सबदी में साधना मार्ग की व्याख्या के साथ-साथ धार्मिक विश्वास, दार्शनिक मत है. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार गोरखनाथ की हिंदी की रचनाएं दो संतों के संवाद के रूप में है जो नाथपंथियों की अपनी खोज है. ‘मछिन्द्र गोरखबोध’ में गोरखनाथ के सवाल हैं जिसका जवाब उनके गुरू मत्स्येन्द्रनाथ ने दिया है.

गोरखनाथ का प्रभाव निर्गुण संतो कबीर, दादू और सूफी कवियों मुल्ला दाउद, जायसी पर खूब पड़ा. गोरखवाणी पर ओशो ने खूब प्रवचन दिया है जो आडियो व लिखित रूप में उपलब्ध है.

ओशो कहते हैं कि महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने उनसे एक बार पूछा कि भारत के धर्माकाश में वे कौन से 12 लोग हैं जो सबसे चमकते सितारे हैं. ओशो ने कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, शंकर, गोरख, कबीर, नानक, मीरा, रामकृष्ण का नाम लिया.

सुमित्रानंदन पंत ने ओशो से इनमें से सात, फिर पांच और बाद में चार के नाम लेने को कहा तो ओशो ने कहा कि कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध और गोरखनाथ. फिर पंत ने कहा कि यह सूची में से सिर्फ तीन व्यक्ति चुने तो ओशो ने जवाब दिया कि इन चार में से मै किसी को छोड़ न सकूंगा. पंत का फिर सवाल था कि आप गोरख को क्यों नहीं छोड़ सकते.

ओशो ने कहा कि मै गोरख को नहीं छोड़ सकता क्योंकि गोरखनाथ से इस देश में एक नया सूत्रपात हुआ. उनसे एक नए प्रकार के धर्म का जन्म हुआ. गोरख के बिना न कबीर हो सकते हैं न नानक. न दादू, न वाजिद, न फरीद, न मीरा. भारत की सारी संत परम्परा गोरख की ऋणी है. गोरख ने जितना अविष्कार मनुष्य के भीतर अंतर-खोज के लिए किया उतना शायद किसी ने नहीं की.

(यह लेख सबसे पहले द वायर में छपा। आभार सहित प्रकाशित।)

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