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इस्लाम और पूँजीवाद के घालमेल से ठिठुरे ईरान को नई सुबह का इंतज़ार !

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ईरान से लौटकर रामशरण जोशी

मज़िल से  कितनी दूर -कितनी पास :  ईरान की  इस्लामी क्रांति -2

रामशरण जोशी

प्रस्तुत  यात्रा टिप्पणी ईरान की राजधानी  तेहरान  के सात दिवसीय प्रवास के  दौरान हुए अनुभवों  और अवलोकन पर आधारित है।ईरान  को  सम्पूर्णता  से जानने का दावा लेखक का नहीं क्योंकि  शहर की सरहदों के पार जिंदगी कैसी है, उसमें झाँकने का  मौक़ा ही नहीं मिला। बीते साल 24  से 30 नवम्बर  के  प्रवास में राजनेताओं, राजनयिकों, बुद्धिजीवियों, मीडिया-वृतचित्र कर्मियों, विद्याथियों, समाजकर्मियों, सामान्यजनों, उद्योगपतियों  जैसों के साथ संवाद करने में  वक़्त कैसे गुज़र गया, पता ही नहीं  चला! सो, इस  टिप्पणी की  अन्तर्निहित  सीमाएं  होंगी! अतः आरम्भ में ही इसे  स्पष्ट कर दिया गया है।

1979 में  ईरान के इस्लामी गणतंत्र के संस्थापक इमाम रूहोल्लाह खोमैनी  के विचारों का अध्यन करें तो देखेंगे कि उन्होंने शुरू से अंत  दुनिया भर के “ दबे-कुचलों की एकता और संगठित ताक़त” की बात कही है। वे अपने सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक सरोकारों के दायरे में दक्षिण अमेरिका,उत्तरी अमेरिका,अफ्रीका,एशिया जैसे सभी महाद्वीपों -उपमहाद्वीपों की  उत्तपीड़ित-शोषित मानवता को संबोधित करते हैं। सभी प्रकार के अन्याय,जुल्म,असमानता के खिलाफ उठ खड़े होने का आह्वान करते हैं। वे यह भी कहते हैं “ एक देश और सभी देशों के दबे-कुचलों को चाहिए कि वे अपनी मुट्ठी की ताकत को समझें  और उसके बल पर अपने हक़ों को हासिल करें।उन्हें इसका इंतज़ार नहीं करना चाहिए कि उनके हक़ उन्हें दे दिय जायेंगे। अहंकारी, किसी को भी उसका हक़ नहीं देगा।”

वे अपने अनुयायियों को यह भी ताक़ीद करते हैं- “दुनिया भर के दबे-कुचलों, चाहे मुस्लिम रहें या गैर-मुस्लिम, की  एक पार्टी होनी चाहिए। गैर -मुस्लिम सरकारें भी अपने अवाम का दमन-उत्तपीड़न करती हैं …..”( 24 अगस्त,1979) । इस नज़र से देखें तो इमाम अयातुल्लाह खोमैनी ने मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच कोई फ़र्क नहीं किया है। हालाँकि, उनकी चिंताओं के केंद्र में मुसलमान हैं। अपने सरोकारों में इमाम साहब राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर भी उठ जाते हैं। वे मानते हैं कि  महाशक्तियाँ राष्ट्रवाद के हथियार के माध्यम से अपना आधिपत्य स्थापित करती हैं। इसलिए इन शक्तियों के खिलाफ़ उठ खड़ा होना चाहिए।

वास्तव में, 1978 -79 की इस्लामी क्रांति  ईरान में अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी दादागीरी के खिलाफ हुई थी। ईरान के तत्कालीन शासक, शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी ने अपने देश का निर्ममता के साथ पश्चिमीकरण कर दिया था। यूरो-अमेरिकी ब्लॉक को  खुल कर खेलने -लूटने की इज़ाज़त दे रखी थी। ईरान की आर्थिक प्राण वायु -तेल पर विदेशी कंपनियों का अधिकार था। सारांश में, जिस तरह दक्षिण अमेरिका में उत्तरी अमेरिका का आधिपत्य था, वैसी ही कम-अधिक स्थिति ईरान में थी। इससे समाज में निर्मम असमानता पैदा हो गई थी। गरीबी -बेरोजगारी बेइंतिहा थी। ज़ाहिर है, लोगों में शाह और उनके सरपरस्त विदेशी राष्ट्रों के खिलाफ असंतोष व गुस्सा फैलता चला गया.। इस्लामी क्रांति, इसका अंतिम मुकाम या मज़िल थी। शाह रज़ा पहलवी को देश छोड़ भागना पड़ा। इसके बाद  ‘इस्लामी गणतंत्र’ स्थापित हुआ, लम्बे संघर्ष और कुर्बानियों से।

अब सवाल यह है कि क्या  इमाम साहब के सपनों का ईरानी समाज बन पाया है ? क्या ईरान में दबे-कुचलों का निजाम क़ायम हो गया है ? क्या ईरान की इस्लामी क्रांति ने वह सब कुछ कर दिखाया है जिसे  पूंजीवादी क्रांति और साम्यवादी क्रांति करने में असफल रही हैं ? क्या  मज़हबी ईरानी राज्य से जहालत, गुरबत, नाइंसाफी का सफाया कर दिया गया है ? इस्लामी ईरान में  न कोई छोटा है ,न कोई बड़ा; न कोई गरीब है, न कोई अमीर ?सब बराबर हैं? क्या चालीस साल में ऐसा  राज स्थापित हो सका ? कम से कम, इसकी तस्दीक, ईरानी गणतंत्र की वर्तमान सूरत तो नहीं करती है। ऐसा मुझे लगा।

कुछ तथ्यों की कहानी इस प्रकार है। ईरान प्रवास के आखरी दिन चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स के चेयरमैनके सलाहकार डॉ.ए.आर.गोल्पयेगनी  ने इस सच्चाई को खुले दिल से स्वीकार किया,”ईरान में में ११ फीसदी से अधिक बेरोज़गारी है। समाज में असमानता बढ़ी है।” उन्होंने इस बात को भी स्वीकार किया कि इस्लामी क्रांति के बाद निजी पूँजी का दबदबा कम नहीं हुआ है, “ईरान में तेजी से निजीकरण हो रहा है। केन्द्रीय उद्योग का निजीकरण किया गया है। बैंकों और उद्योग का निजीकरण किया गया है।” देश का आर्थिक ढांचा त्रिस्तरीय है: सरकार, निजी क्षेत्र और सहकारी क्षेत्र। देश के प्रभावशाली पदों पर रहनेवाले  इस सरमायेदार ने यह दिलचस्प -नायाब दावा भी किया- “ईरान का निजीकरण, पश्चिम के निजीकरण से अलहदा है.दोनों में फरक है.” क्या निजीकरण उर्फ़ पूंजीवाद के चरित्र में बुनियादी अंतर हो सकता ! मूलतः निजीकरण,पूंजीवाद का ही विस्तार है।निजीकरण या निजी मल्कियत से ही पूंजीवाद प्रतिबिंबित होता आया है।उन्होंने यह ज़रूर माना-“लेकिन चंद हाथों में दौलत जमा नहीं होनी चाहिए। इससे विषमता बढ़ती है। सामजिक न्याय नहीं हो पाता है। लेकिन मुझे यकीन है,ईरान में निजीकरण से सामजिक न्याय अस्तव्यस्त नहीं होगा।” इसके साथ ही उन्होंने साफ़ शब्दों में यह भी कहा-“वैसे विषमता नहीं बढ़नी चाहिए। मगर अगले दस सालों में क्या होगा,कैसी स्थिति जन्म लेगी, मैं नहीं जानता।” इमाम साहब सादगी पसंद थे। जिस घर में उन्होंने अंतिम साँसें लीं थीं, वे  बेहद सादा-साफ़ -सुथरा लगा। लेकिन, क्या उनके उत्तराधिकारियों की जीवन शैली भी उतनी ही सादा व प्रेरक है ? आम लोग ऐसा नहीं मानते है। यहाँ तक की इमाम खोमैनी का समाधि-स्थल भी भव्य है। उनके जीवन से ठीक विपरीत।भारत भी इससे अलहदा कहाँ है, गांधीजी की विरासत के मालिक उन्हें ही चिढ़ा रहे हैं!

विभिन्न कंपनियों में उच्चपदों पर आसीन गोल्पयेगनी के कथन से इतना तो स्पष्ट है कि ईरान में अपेक्षित सामजिक साम्य व्यवस्था अभी अपनी मज़िल से बहुत दूरस्थ है। निजी पूंजीवाद का अन्तर्निहित  चरित्र है विषमता को जन्म देना, अन्यथा उसका ही अस्तित्व संकटग्रस्त हो जाएगा। चूँकि,ईरान एक अच्छा -खासा औद्योगिक देश है तो पूंजीवाद के विस्तार की सम्भावना कम नहीं है। यदि राज्य पूंजीवाद और निजी पूंजीवाद परस्पर आश्रित हो जाएँ तो स्थिति और विकट हो सकती है और सामजिक खाईं और अधिक चौड़ी हो सकती है।

बेशक, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले चार दशकों में स्थिति में क्रांतिकारी सुधार हुआ है। 99% हवाई अड्डे कार्यरत हैं; 80 %आबादी के पास स्मार्ट फ़ोन हैं ; करीब 2 लाख कि.मी.सड़कें हैं; 1लाख 50 हज़ार कि.मी. हाईवे हैं; प्रतिबधों के बावजूद विदेशी पूँजी नियोजन हो रहा है; 38 लाख बैरल तेल का उत्पादन प्रतिदिन किया जाता है जिसमें से 10 लाख का निर्यात होता है और 8% की जीडीपी है। प्रतिवर्ष 140 फ़िल्में बनती हैं।शिक्षा के मामले में भी ईरान पीछे नहीं है। इन सबके बावजूद, ईरान के अधिकृत क्षेत्रों ने स्वीकार भी किया कि “समाज का एक हिस्सा वर्तमान व्यवस्था से संतुष्ट नहीं है।” देश में भ्रष्टाचार है। अमेरिका समर्थित आतंकवाद है। वैसे  इस्लामी स्टेट के एक्टिविस्ट सफल नहीं हो सके हैं। वैश्विक सूचना सीमित है। देश में ऐसे भी लोग ज़रूर हैं जो इस्लामिक व्यवस्था का विरोध भी करते हैं। नीतियों को पसंद नहीं करते हैं। अधिकृत लोग मानते हैं,”सरकार युवाओं के साथ पटरी बैठने में नाकाम हो रही है।”वैसे अमेरिकी प्रतिबंधों से मुकाबला करने में निजी पूँजी व क्षेत्र को काफी तरजीह दे जा रही है।

ज़िम्मेदार क्षेत्रों का यह भी कहना है-“ईरान में तलाक की घटनाएँ बढ़ रहीं हैं। शादियाँ टूट रही हैं।तलाक की असली वजह है पतियों द्वारा नशीलें पदार्थों का सेवन। करीब 50% ओरतें होती हैं जिन्हें तलाक चाहिए जबकि पति इससे बचना चाहते हैं। युवाओं में अफीम की लत बढ्ती जा रही है।अफीम को सस्ती दरों पर चोरी-छिपे बेचा जाता है। अफीमची पति अपनी पत्नियों पर अत्यचार करते हैं और इसके बाद फैमिली कोर्ट में मामला पहुच जाता है।” हालाँकि महिला मामलों की विभाग की निदेशक डॉ. सिद्दीक़ी एज़ाज़ी का दावा है, “पश्चिम की तुलना में ईरान में तलाक़ का प्रतिशत कम है। समाज में ओरतों का और उनके प्रति नजरिये में  जबरदस्त बदलाव आया है; अब वे अपनी सुन्दरता के प्रति जागरूक बनी हैं; उन्हें आज़ादी चाहिए.;उन्हें आनंद चाहिए.मगर इस जागरूकता के साथ साथ विकृतियाँ भी पैदा हुई हैं। इसे रोकने की इस्लामी क्रांति कोशिश कर रही है। सामाजिक कार्यों में महिलाओं को १०० प्रतिशत सक्रिय किया जा रहा है; आज महिलाएं चांसलर,वाइसचांसलर बन रही हैं,जबकि क्रांति से पहले 30 % महिलाएं शिक्षित थीं। हम चाहते हैं कि आधुनिकाएं बनने के साथ साथ एक अच्छी माताएं भी बनें,पत्नी बनें और समाज सुधारिका भी बनें।”

अमेरिकी के सांस्कृतिक हमलों या पश्चिम के  ‘सॉफ्ट वार ‘ के कारण युवा वर्ग में व्यक्तिवाद व भटकाव बढ़ रहे हैं। महिलाएं फैसला ले रही हैं। उनमें अस्मिता बोध तेज़ी से जाग रहा है, जिसके साथ पुरुष समाज अपनी पटरी नहीं बैठा पा रहा है। वैसे  अब शादियाँ परिपक्व होने के बाद की जा रही हैं। लड़कियां 25-26 की होने के बाद शादी करती हैं,जबकि लड़के 27-28 के बीच। परोक्ष रूप से एक वर्ष के लिए ‘लिव इन रिलेशन’ की व्यवस्था है। सरकार को कोई आपति नहीं है। लेकिन युवक मूलतः परिवार विरोधी नहीं हैं, लेकिन सरकार के आलोचक हैं। भारत में रहे ईरान के पूर्व राजदूत ,जो बंगलूर में  विद्यार्थी के रूप में भी रहे थे, डॉ.अंसारी ने स्वीकार किया “ हमने इस्लामिक क्रांति से काफी कुछ उपलब्ध किया है, लेकिन 100 फीसदी से काफी दूर हैं। सामजिक न्याय से दूर हैं। अभी इसके लक्ष्यों को प्राप्त करना बाकी है।”

राजसत्ता के बतौर  समाजवादी क्रांति अभी “बैकफुट” पर है। 1991 में सोवियत संघ के पतन और चीन में बढ़ते पूंजीवाद के कारण कुछ बुनियादी सवाल ज़रूर पैदा हो गए हैं; क्या इस्लामी क्रांति या धार्मिक क्रांतियाँ समाजवादी क्रांति का विकल्प बन सकती हैं ? क्या इस क्रांति की कोख से नए मानव के निर्माण का वैकल्पिक नैरेटिव अस्तित्व में आ सकता है ?

जहाँ तक मैं समझता हूँ, इस मज़हबी क्रांति से मुमकिन नहीं है। ईरान राज्य का सम्पति चरित्र बरकरार है। ठीक है,शाह की तानाशाही का खत्म ज़रूर हुआ है लेकिन क्या सामन्ती और पूंजीवादी अंतर्विरोधों का समाधान किया जा सका? मध्ययुगीनता  और आधुनिकता; ग्रामीण और शहरी के अंतर्विरोधों का शमन हो सका है ? धर्म एक सीमा तक प्रतिरोध को रोक सकता है, अंतर्विरोधों को डिफ्यूज कर सकता है, उन पर भावनाओं की खाक़ डाल सकता है, लेकिन उनका स्थाई समाधान नहीं कर सकता। इस्लामी क्रांति के प्रणेता इमाम साहब जीवन भर राष्ट्रवाद से ऊपर उठने और मुसलमानों के बीच बिरादराना भाव पैदा करने का उपदेश देते रहे। उन्होंने कहा है कि ‘इस्लाम और मुसलमानों की  अच्छाइयों के खिलाफ है राष्ट्रवाद’,लेकिन क्या इस्लामी क्रांति मस्लिम संसार के अंतर्विरोधों का माकूल समाधान कर सकी ? क्या मुसलमान और इस्लामी राष्ट्र एक हो सके ?क्या शिया,सुन्नी,खुर्दिश तथा कबाईली मुस्लिम समाज के बीच व्याप्त अंतर्विरोधों को दूर किया जा सका है ? क्यों आज भी मुस्लिम संसार अशांत और युद्धग्रस्त है ? मैं समझता हूँ, ईरान में इस्लामी क्रांति ‘ठिठुर ‘गयी है. इस सदी में इसे नए विज़न का ‘पुश’ चाहिए।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विजिल संपादक मंडल के सम्मानित सदस्य हैं।

इस यात्रावृत्तांत का पहला भाग पढ़ें-

जन्नत और दोज़ख़ के बीच झूलते ईरान में तूफ़ानी बदलाव की आहट !

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