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सुभाषचंद्र बोस के भारी विरोधी थे पटेल ! लड़ा था संपत्ति का मुक़द्दमा !

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रामचंद्र गुहा

 

मई 2014 के चुनाव से पहले भाजपा समर्थकों ने जवाहरलाल नेहरू पर हमला करने के लिए वल्लभभाई पटेल के नाम का उपयोग किया था। इसी मंशा के साथ हाल ही में उन्होंने जिस नए हथियार का इस्तेमाल किया, वह है, सुभाष चंद्र बोस की विरासत। इससे वैचारिक निरंतरता के साथ-साथ ऐतिहासिक सटीकता पर भी सवाल खड़े होते हैं। मगर सबसे बड़ा सवाल है कि क्या नेहरू को कमतर दिखाने के लिए पटेल और बोस दोनों को एक ही खांचे में रखा जा सकता है? ऐतिहासिक प्रमाणों की अनदेखी करके ही ऐसा करना मुमकिन होगा। दरअसल, वल्लभभाई पटेल के सुभाष बोस के साथ रिश्तों में तनाव ज्यादा था। 1933 में वल्लभभाई के बड़े भाई विट्ठलभाई के निधन के बाद तो यह तनाव और भी ज्यादा बढ़ गया। अपने आखिरी दिनों में विट्ठल भाई की देखभाल के लिए सुभाष उनके साथ थे। अपनी वसीयत में अग्रज पटेल ने अपनी तीन-चौथाई संपत्ति बोस के नाम की, ताकि उसका उपयोग दूसरे देशों में भारत के प्रचार के लिए किया जा सके। वल्‍लभभाई ने इस वसीयत की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए। लंबे चले मुकदमे में वल्लभभाई को जीत मिली, और सारा पैसा सुभाष के बजाय विट्ठलभाई के नातेदारों को मिल गया।

उसके पांच वर्ष बाद वल्‍लभभाई ने कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर बोस का नाम प्रस्तावित करने के गांधी के फैसले का विरोध किया। पर गांधी ने इस पर कोई तवज्जो नहीं दी, और बोस कांग्रेस अध्यक्ष बने। 1939 में जब दूसरी बार बोस के अध्यक्ष बनने की बात आई, तब पटेल ने फिर इसका विरोध किया। उस वक्त सार्वजनिक तौर पर उन्होंने बोस को चेतावनी दी थी कि अगर उन्हें चुना जाता है, तो उनकी नीतियों की जांच होगी, और जरूरत पड़ने पर उस पर वर्किंग कमिटी (जिसमें पटेल के वफादार ज्यादा थे) वीटो करेगी।

जैसा कि वल्लभभाई की जीवनी लिखते वक्त राजमोहन गांधी उल्लेख करते हैं, ‘उन्हें सुभाष की क्षमता पर संदेह था। इसके अलावा सुभाष के साथ उनके तमाम मतभेद भी थे।’ पटेल चाहते थे कि 1937 में चुनी गई कांग्रेस सरकारें अपना काम जारी रखें, जबकि बोस की इच्छा यह थी, ‘सभी सरकारें पदत्याग करके अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में शामिल हो जाएं। पटेल ऐसे कदम को बेबुनियाद और मूर्खतापूर्ण मानते थे।’ राजमोहन जिक्र करते हैं, ‘दूसरा मतभेद गांधी पर था, जिन्हें सुभाष गैर-जरूरी, मगर सरदार पटेल बेहद अहम मानते थे।’

जब सुभाष ने वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं से अपने पुनर्निर्वाचन का समर्थन करने को कहा, तब पटेल हैरत में पड़ गए। उन्होंने राजेंद्र प्रसाद को लिखा, ‘मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह (सुभाष) अपने पुनर्निवाचन के लिए इस हद तक नीचे गिरेंगे।’ सुगत बोस अपनी किताब हिज मैजेस्टी’स अपोनेंट में पटेल के इस कथन का हवाला देते हैं, ‘सुभाष का फिर से चुना जाना देश के लिए नुकसानदायक होगा।’ जवाब में, सुभाष्‍ा ने आरोप लगाया कि वल्लभभाई उन्हें दोबारा चुनाव लड़ने से रोकने के लिए ‘नैतिक दबाव’ बना रहे हैं।

फिर जैसा कि सभी जानते हैं, पटेल और गांधी के विरोध के बावजूद पट्टाभि सीतारमैया को हराते हुए बोस ने फिर से चुनाव जीता। कांग्रेस के बड़े नेताओं के लिए यह बेहद शर्मनाक स्थिति थी। ऐसे में, पटेल ने राजेंद्र प्रसाद को लिखा, ‘सुभाष्‍ा के साथ काम करना हमारे लिए नामुमकिन है।’ गांधी-पटेल खेमा बतौर अध्यक्ष बोस की शक्तियों को कमजोर करते हुए उन पर पहले इस पद से, और फिर पार्टी से इस्तीफा देने का दबाव बनाने लगा।

दोनों के बीच के इस तकरार पर राजमोहन गांधी द्वारा किया गया शानदार शोध पटेल और बोस के बीच की इस कड़वाहट को स्पष्ट करता है। राजमोहन उल्लेख करते हैं, ‘ऐसा लगता था मानो, बोस के समर्थकों की सारी नफरत पटेल तक सीमित थी, हालांकि सुभाष को लेकर गांधी का रुख कुछ नर्म था। बोस के भाई शरत ने पटेल पर आरोप लगाया था कि वह सुभाष के खिलाफ एक घटिया, द्वेषपूर्ण और बदला लेने से प्रेरित प्रचार अभियान छेड़े हुए हैं।

पटेल कहां पीछे रहने वाले थे? जब बोस ने उन्हें ‘अलोकतांत्रिक’ कहा, तब अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए वह बोले, ‘शेर जंगल में चुनाव के जरिये नहीं, बल्कि जन्म से ही राजा होता है।’ राजमोहन यह टिप्पणी करते हैं, ‘बाद में दिखाए गए सुभाष के साहस के बावजूद यह कहना होगा कि ऐसी अभद्र टीका-टिप्पणियां बिल्कुल नामुनासिब थीं। मगर 1939 में कांग्रेस के अंदरूनी संघर्ष के मद्देनजर इन हालात को समझा जा सकता था।’

इसके कई वर्षों बाद 1946 में इंडियन नेशनल आर्मी के सदस्यों की देश वापसी के वक्त पटेल ने उनका साथ देकर, दोनों पक्षों के बीच चली आ रही कटुता की कुछ हद तक क्षतिपूर्ति की। राजमोहन ऐसा करना उनकी मजबूरी मानते हैं, क्योंकि उस वक्त सुभाष लोगों के दिल-ओ-दिमाग पर पूरी तरह छाए हुए थे। इसी वजह से निर्वासन काल में दिखाई गई बहादुरी के लिए पटेल ने सुभाष की प्रशंसा भी की।

राजनीतिक असहमतियों से इतर पटेल और बोस के बीच विचारधारा से जुड़े मतभेद भी थे। बोस सामाजिक नियोजन पर बेहद भरोसा करते थे, जबकि पटेल का झुकाव निजी उद्यमों की ओर था। हिंदू-मुसलमान सौहार्द को लेकर पटेल की तुलना में सुभाष कहीं ज्यादा प्रतिबद्ध थे। 1935 में पहली बार प्रकाशित होने वाली अपनी किताब द इंडियन स्ट्रगल में सुभाष ने हिंदू महासभा की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने लगातार इसे प्रतिक्रियावादी कहकर पुकारा। वह इसमें इस्लामी कट्टरता की छवि देखते थे। दरअसल, जिस हिंदू-मुस्लिम एकता को गांधी और खुद सुभाष जरूरी मानते थे, उसे कमजोर करके, बकौल सुभाष, ‘हिंदू महासभा अंग्रेजों के हाथों की कठपुतली बनी हुई है।’

बोस लिखते हैं, ‘मुस्लिम लीग की भांति हिंदू महासभा न केवल पुरातन राष्ट्रवादियों से, बल्कि ऐसे लोगों से मिलकर बनी थी, जो राजनीतिक आंदोलन में शरीक होने से घबराते हैं, और खुद के लिए एक सुरक्षित मंच भी चाहते थे।’ इस तर्क में वजन भी था। बोस, नेहरू और पटेल के ठीक उलट, जिनमें से हर एक ने तमाम वर्ष जेल में बिताए, 1930 और 40 के दशक के हिंदुत्ववादियों ने अंग्रेजों के विरोध में कोई कदम नहीं उठाने का फैसला किया था। इन्हीं में से एक जनसंघ के संस्‍थापक और भाजपा के आइकन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे।

मुस्लिम लीग की विचारधारा की तरह हिंदुत्व की विचारधारा भी धार्मिक हठधर्मिता को सत्य पर तरजीह देती है। मगर पिछले कुछ दिनों में जो हुआ, वह वाकई हैरत में डालने वाला है। नियोजन और धर्मनिरपेक्षता के मुद्दों पर बोस और नेहरू को एक साथ देखा जा सकता है। इसी तरह, गांधी के प्रति झुकाव और इस विचार को लेकर कि दूसरे विश्वयुद्ध में धुरी शक्तियां, मित्र राष्ट्रों की तुलना में ज्यादा बुरी थीं, नेहरू और पटेल की सोच एक जैसी थी। मगर भारत को स्वतंत्र देखने की इच्छा को छोड़कर राजनीतिक, निजी या विचारधारा के मोर्चे पर बोस और पटेल में कुछ भी समानता नहीं थी।

जो यह मानते हैं कि मुस्लिमों को देश के प्रति अपनी वफादारी साबित करने की जरूरत है, वे नेहरू पर हमला बोलने के लिए पटेल के कंधे का सहारा ले सकते हैं। वहीं, जिनका यह मानना है कि अंग्रेजों की तुलना में जापानी कम क्रूर उपनिवेशवादी थे, वे नेहरू के खिलाफ बोस को खड़ा कर सकते हैं। मगर नेहरू को कठघरे में खड़ा करने के लिए पटेल और बोस के नाम का एक साथ उपयोग करना, न केवल राजनीतिक अवसरवादिता है, बल्कि इससे भी बदतर, बौद्धिक दिवालियापन है।

 

लेखक मशहूर इतिहासकार हैं। यह लेख 2015 में अमर उजाला में छपा था।