Home दस्तावेज़ हिंदुस्तान के लिए पाकिस्तान का ‘घर-बार’ छोड़ने वाला एक ‘राजा!’

हिंदुस्तान के लिए पाकिस्तान का ‘घर-बार’ छोड़ने वाला एक ‘राजा!’

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अजित साही

 

आप ने तो यही सुना है कि विभाजन के वक़्त करोड़ों मुसलमान भारत छोड़ कर पाकिस्तान जा बसे थे. लेकिन क्या किसी ऐसे मुसलमान को जानते हैं जो पाकिस्तान का था मगर भारत में बस गया?

ये थे राजा मेहदी अली ख़ान.

मेहदी अली पाकिस्तान के झेलम ज़िले के एक जानेमाने ख़ानदान में 1928 में पैदा हुए. इनके वालिद बहावलपुर रियासत के वज़ीर हुआ करते थे. जब मेहदी चार बरस के थे तो वालिद चल बसे. माँ एक ज़हीन शायरा थीं. अल्लामा इक़बाल तक ने उनकी शायरी की तारीफ़ की थी. यानी शायरी मेहदी अली के ख़ून में थी.

बड़े हुए तो मेहदी अली दिल्ली आकर ऑल इंडिया रेडियो में काम करने लगे. वहीं मुलाक़ात हुई मशहूर उर्दू लेखक सआदत हसन मंटो से, जो मेहदी अली से कोई सोलह साल बड़े थे. बाद में मंटो ने मुंबई जाकर फ़िल्म जगत में अपने आप को एक नामी लेखक और कथाकार की हैसियत से स्थापित किया. एक प्रोड्यूसर को गीतकार की ज़रूरत पड़ी तो मंटो ने फटाफट ख़त लिख मेहदी अली को मुंबई बुला लिया. थोड़े वक़्त में मेहदी अली ने फ़िल्मों की दुनिया में एक बेहतरीन गीतकार के रूप में अपनी जगह बना ली.

उनके लिखे गानों की लिस्ट देखेंगे तो आप अचरज करेंगे कि, अरे, इतने ज़बरदस्त और सुपर-डुपर हिट गाने लिखने वाले के बारे मुझे ठीक से मालूम तक नहीं?

“मेरा सुंदर सपना बीत गया”
“आपकी नज़रों ने समझा प्यार के क़ाबिल मुझे”
“तू जहाँ जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा”
“एक हसीन शाम को, दिल मेरा खो गया”
“नैना बरसे रिमझिम रिमझिम”
“आपके पहलू में आके रो दिये”
“आप यूँ ही अगर हमसे मिलते रहे देखिए एक दिन प्यार हो जाएगा”
“मेरी याद में तुम ना आँसू बहाना”
“जिया ले गओ जी मोरा सांवरिया”
“है इसी में प्यार की आबरू, वो जफ़ा करें, मैं वफ़ा करूँ”
“गर्दिश में हो तारें, न घबराना प्यारे”
“झुमका गिरा रे, बरेली के बाज़ार में”
“मैं प्यार का राही हूँ, तेरी ज़ुल्फ़ के साये में, कुछ देर ठहर जाऊँ”
“वतन की राह में वतन के नौजवाँ शहीद हो”
“सिकंदर ने पोरस से की थी लड़ाई”

शायद ही उस दौर का कोई बड़ा संगीतकार था जिसके साथ मेहदी अली ने काम नहीं किया — खेमचंद्र प्रकाश, सी. रामचंद्र, चित्रगुप्त, ग़ुलाम हैदर, एस. डी. बर्मन, मदन मोहन, रवि, रोशन, ओ. पी. नय्यर, हेमंत कुमार, सरदार मलिक, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी, उषा खन्ना. शायद ही कोई महान गायक और गायिक थे जिन्होंने मेहदी अली के शब्दों को स्वर नहीं दिया — मोहम्मद रफ़ी, तलत महमूद, लता मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, मन्ना डे, मुबारक बेगम, मुकेश, गीता दत्त, हेमंत कुमार, शमशाद बेगम, सुधा मलहोत्रा, किशोर कुमार, आशा भोसले, महेंद्र कपूर. शायद ही कोई उस ज़माने के हीरो-हीरोइन थे जिनपर मेहदी अली के लिखे गाने नहीं फ़िल्माए गए — दिलीप कुमार, मनोज कुमार, मीना कुमारी, धर्मेंद्र, सुनील दत्त, माला सिन्हा, साधना, जॉय मुखर्जी, कामिनी कौशल.

मुंबई प्रवास की शुरुआत में मंटो और मेहदी अली एक और दोस्त के साथ कमरा लेकर रहते थे. फिर आया साल 1947 का. हर ओर हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे. देश तक़सीम होने लगा. अविभाजित भारत के मुसलमानों के लिए मादरे-वतन चुनने का मुश्किल वक़्त आ गया. मंटो लुधियाना के रहने वाले थे जो भारत के हिस्से आया. लेकिन मंटो पाकिस्तान चले गए. मेहदी अली मुंबई में अकेले रह गए. उनके पुश्तैनी घर-द्वार रिश्ते-नाते सब पाकिस्तान में थे. लेकिन मेहदी अली ने सब को पीछे छोड़ भारत में रहने का फ़ैसला किया.

1966 में अड़तीस की उम्र में राजा मेहदी अली ख़ान अल्लाह मियाँ को प्यारे हो गए. मरने से सिर्फ़ दो साल पहले उन्होंने फ़िल्म “वो कौन थी” के लिए संगीतकार मदन मोहन के सुर में अपनी ज़िंदगी का सबसे अमर गीत लिखा:

“लग जा गले कि फिर ये हंसी रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो”

शायरी के ज़रिए राजा मेहदी अली ख़ान ने मोहब्बत का जो पैग़ाम दुनिया को दिया उसे दुनिया भर की नफ़रत नहीं हरा सकती. आज कोई भी हिंदुस्तान के मुसलमानों पर सवाल उठाए तो आप सिर्फ़ एक नाम लेकर उसका मुंह बंद कर सकते हैं- राजा मेहदी अली ख़ान।

 

अजित साही देश के जाने-माने पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं।