Home अख़बार अख़बारों में गला काट होड़ है, लेकिन कंटेंट ‘पूल’ होता है !

अख़बारों में गला काट होड़ है, लेकिन कंटेंट ‘पूल’ होता है !

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भाऊ कहिन-18

यह तस्वीर भाऊ की है…भाऊ यानी राघवेंद्र दुबे। वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे को लखनऊ,गोरखपुर, दिल्ली से लेकर कोलकाता तक इसी नाम से जाना जाता है। भाऊ ने पत्रकारिता में लंबा समय बिताया है और कई संस्थानों से जुड़े रहे हैं। उनके पास अनुभवों ख़ज़ाना है जिसे अपने मशहूर बेबाक अंदाज़ और सम्मोहित करने वाली भाषा के ज़रिए जब वे सामने लाते हैं तो वाक़ई इतिहास का पहला ड्राफ़्ट नज़र आता है। पाठकों को याद होगा कि क़रीब छह महीने पहले मीडिया विजिल में ‘भाऊ कहिन‘ की पाँच कड़ियों वाली शृंखला छपी थी जिससे हम बाबरी मस्जिद तोड़े जाते वक़्त हिंदी अख़बारों की भूमिका के कई शर्मनाक पहलुओं से वाक़िफ़ हो सके थे। भाऊ ने इधर फिर से अपने अनुभवों की पोटली खोली है और हमें हिंदी पत्रकारिता की एक ऐसी पतनकथा से रूबरू कराया है जिसमें रिपोर्टर को अपना कुत्ता समझने वाले, अपराधियों को संपादकीय प्रभारी बनाने वाले और नाम के साथ अपनी जाति ना लिखने के बावजूद जातिवाद का नंगानाच करने वाले संपादकों का चेहरा झिलमिलाता है। ये वही हैं जिन्होंने 40 की उम्र पार कर चुके लोगों की नियुक्ति पर पाबंदी लगवा दी है ताकि भूल से भी कोई ऐसा ना आ सके जिसके सामने उनकी चमक फ़ीकी पड़ जाए ! ‘मीडिया विजिल’ इन फ़ेसबुक संस्मरणों को ‘भाऊ कहिन’ के उसी सिलसिले से जोड़कर पेश कर रहा है जो पाँच कड़ियों के बाद स्थगित हो गया था-संपादक

 

हम अपने लिये कब लड़ेंगे साथी ? 

 

इस सुपर फास्ट ट्रेन के बैठ – बैठ , हांफ – हांफ चलने और खासी दूर तक बस सरकने वाली स्पीड ने , कुढ़ और खीज पैदा कर दी थी ।

पंख होने के बावजूद मन अपेक्षित गति नहीं रच पा रहा था ।
एक सहयात्री ने शायद तंज कसा हो —

बुलेट ( ट्रेन ) आ जाने दीजिये , देखा – देखी सब तेज हो जाएंगी ।
गति एक – दूसरे तक संक्रमित होगी , ऐसे ही बदलता है देश । आइ मीन इंडिया ।
मैंने कुछ नहीं कहा । यादों की उड़ान में भी जड़ता आ रही थी । हां , चुनौटी निकाली और खैनी जरूर मल ली ।
26 फ़रवरी के बाद , गोरखपुर – दिल्ली ( बीच में कभी – कभी लखनऊ ) की कुछ ही अंतराल बाद , तकरीबन लगातार यात्रा सुखकर उड़ान की नहीं है । न पेशे की ज़रूरतों से जुड़ी ।
लेकिन ट्रेन के साथ कभी – कभी सुस्त चाल होकर भी स्मृतियों ने साथ नहीं छोड़ा । सहयात्री रहीं ।
किसी ने सुझाया था लेकिन , इस कड़ी को नहीं करना है , संपादित । न सिंक्रोनाइज ( क्रमबद्ध )।
यादें जहां – जहां ला पटकेंगी , वहीं से जूम – इन करके लिखना शुरू कर दूंगा । पात्र भी कहां गढ़ने हैं ? सब सामने हैं ।
10 की शाम गोरखपुर से चला । 11 जुलाई को डेढ़ बजे दोपहर दिल्ली पहुंचा ।
कुछ याद आया ।
यहां तो नाम लिख सकते हैं ।
हिन्दी अखबार अमूमन गला काट होड़ के भी एक अघोषित सहयोग ( पूल ) में एक – दूसरे की नकल का अपना कंटेंट तय करते हैं ।
मेले में छूट जाने के डर से कभी – कभी एक दूसरे का हाथ चांप कर पकड़े , भकुआये बच्चों की तरह भी ।
‘ मेक योर ओन हेडलाइंस ‘ यहां , तकरीबन क्रियान्वित न हो पाने वाला केवल आदर्श कथन है । जो कार्यकारी संपादक अपने प्रजेंटेशन में दिखाता है ।
दरअसल कुछ अनपढ़ और कमतर संपादकों के पास अपनी कोई दृष्टि ही नहीं होती ।
वह सुबह 11 बजे वाली रिपोर्टरों की मीटिंग के पहले वहां से प्रकाशित सारे स्थानीय अखबारों से अपने अखबार की मिलान करता है । कुछ छूट तो नहीं गया ।
एक अखबार में तो अपना अंतिम डाक संस्करण छोड़ने और नगर संस्करण की तैयारी से पहले , रेलवे स्टेशन से स्पर्धी अखबार ( डाक संस्करण ) मंगा लेने का रिवाज आज तक कायम है ।
दूसरा अखबार भी शायद ऐसा ही करता हो ।
यह सिलसिला इधर भले तेज हो गया हो , मानसिकता पुरानी है ।

 

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‘प्लेग’ पहली ख़बर बनी तो गालियाँ बरसाईं ‘डॉन’ संपादक ने !

 

वरिष्ठ हैसियत में तब रामेश्वर पाण्डेय ‘ काका ‘

दैनिक जागरण , लखनऊ का पहला पन्ना संभाल
रहे थे ।
पीटीआइ से खबर ( बहुत दिनों तक तार , जो कई – कई टेक में आता था ) आयी ।
सूरत ( गुजरात ) में जिस बीमारी से दो लोग मरे
उसके बारे में पता चला कि वह प्लेग था ।
जिसे कभी, हमारे पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाके में ताऊन कहा जाता था ।
1918 तक भारत के गांव से गांव तक लील लेने वाली इस महामारी की डरावनी याद मैंने भी अपने बाबा से सुनी थी । तब सात या आठ साल का था ।
आजादी की बाद की सरकार की पॉलिटिकल विल और उससे प्रेरित मेडिकल अनुसंधान ने इस महामारी को कैसे काबू किया , इसका अलग ही इतिहास है । इससे कभी गांव के गांव लाशों की ढेर में बदल जाया करते थे ।
औद्योगिक शहर सूरत ( गुजरात ) और महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में इस महामारी के फन 1994 – 95 में दिखना , वाकई चिंतित कर देने वाली बात थी । काका ने पीटीआइ की खबर दो – तीन बार पढ़ी । खुद उसका अनुवाद और संपादित किया । इसे ही पहली सुर्खी बना दी ।

दूसरे दिन सुबह , लखनऊ से प्रकाशित किसी अखबार में यह खबर थी भी तो भीतर के किसी पन्ने पर सिंगिल कॉलम । किसी ने इसे वह स्पेस नहीं दिया था जो काका ने जागरण में तय किया । स्थानीय संपादक , सीनियर मैनेजर और शायद निदेशक मंडल में भी शामिल विनोद शुक्ल डॉन ने यह देखा तो सनक गये ।

फिर अपनी आदत के मुताबिक काका को छोड़ दूसरे जिम्मेदारों को फोन पर न लिखने लायक गालियां दीं।

माथे की अपनी एक लट को तर्जनी और अंगूठे की मदद से घुमाते रहने वाले , काका के एक सहकर्मी बुरी तरह हदस गये । उन्हें लगा बीते कल तक का दिन ही यहां ( जागरण में ) आखिरी था ।
बिना चाय पिये वह काका के घर भागे ।
उनसे पूरी बात बताई । और रो पड़े । काका ने उन्हें ढाढ़स बढ़ाया और कहा आप घर चलिये । सो जाइये । मैं शाम को देख लूंगा , जब दफ्तर आऊंगा ।
काका ने बहुत देर तक सोचने के बाद , अपनी किताबों वाली आलमारी से अल्वेयर कामू का कालजयी उपन्यास ‘ प्लेग ‘ निकाला और आंख बंद करके छाती से चिपटा लिया ।

मैं तब तक डेनियल डेफो के उपन्यास ‘ द जर्नल ऑफ द प्लेग इयर ‘ के बारे में नहीं जानता था । मार्केज का साक्षात्कार पढ़ रहा था , कुछ साल पहले। उसी में इस उपन्यास का जिक्र था ।

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साहित्य से ‘दुश्मनी’  ने अख़बारों को दरिद्र बना दिया !

 

मैंने आजादी के बाद से अबतक , संक्रमण ( ट्रांजीशन ) के तीन चरणों की बात , पीछे की पोस्ट में की है ।

1990 – 92 के बाद के संक्रमण में जरूरी और वास्तविक सरोकार के कंटेट , अखबारों से गायब होने शुरू हो गये । इस कदर की इसी दौर में हिन्दी अखबार, हिन्दू भी हुये ।

भूमण्डलीकरण की झिलमिल , सटोरिया पूंजी के उभार और धर्मान्धता की साजिशी एका ने विवेकजन्य विमर्श किनारे लगा दिये । 2000 तक कुछ अपवाद को छोड़ जो अपनी जिद और जुनून से कायम रह सके , अखबार में लिखने – पढ़ने वालों की जगह नहीं रही ।
साहित्य से तकरीबन दुश्मनी के से रिश्ते ने अखबारों को शब्द , सन्दर्भ और दृष्टि का दरिद्र बना दिया ।

हाल ही की बात है । एक अखबार के प्रिंसपल संवाददाता की रिपोर्ट में एक शब्द को लेकर किचकिच हो गयी । संपादक ने स्टाइल शीट का हवाला दिया । इस अखबार ने शब्दों का अपना रजिस्टर तैयार किया है । संवाददाता भी अड़ गया । उसने आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के लिखे को दिखाकर , अपने लिखे को सही ठहराना चाहा । संपादक ने कहा – .. ये ब्रह्मा हैं , गलत नहीं हो सकते ?
लेकिन विनोद शुक्ल थोड़े से अलग थे । कुछ लोगों की शराब पर की संगत ने , उनमें बौद्धिक और साहित्य सजग दिखने का शौक जगा दिया था । इसका फायदा भी हम कुछ लोगों ने उठाया । कोई भी बड़ा नाम खासकर यूरोपीय , उठाकर सामने रख देने पर , वह चाहे जितने गरम हों , ठंडे पड़ जाते थे ।
काका अल्वेयर कामू की ‘ प्लेग ‘ लेकर विनोद शुक्ल के कक्ष में दाखिल हुये । शक्तिशाली एसी होने और चलने के बावजूद , यहां हवा खासी गरम थी ।
— यह पढ़िये
— क्या है
— दुनिया के कुछ महान साहित्यकारों में से एक अल्वेयर कामू का उपन्यास … आप के लिए ही लाया हूं ।
विनोद शुक्ल ने किताब उलटी – पलटी और संजीदा हो गये ।
— … महामारी , जिसने किसी युद्ध से अधिक जानें लीं ,… जिसके बारे में दावा है कि वह इरैडिकेट हो गयी , उसका फिर सिर उठाना , छोटी बात है ..?. किताब तो ख़ैर पढ़िये ही .. महानतम उपन्यासों में एक है …

शुक्ल जी चुप सुन रहे थे ।
— अफसोस है , मुझे रामेश्वर
( उनपर कामू चढ़ चुके थे )
उन्होंने चाय मंगाई । काका जब मुस्कराते हुए कक्ष से बाहर आये , विघ्नसंतोषी चेहरों पर जैसे जूता पड़ चुका था ।
लेकिन गजब यह कि दूसरे दिन सारे अखबारों में प्लेग था । डान खुश हुआ ।

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संपादकों को तख़्तापलट का दु:स्वप्न आता रहता है !

 

बौने लोगों की लंबी परछाहीं में , कोई खिड़की खुली भी तो , ‘ जेनुइन ‘ लोगों पर उनके तिरस्कार की तरह ।
पदानुक्रम में कुछ हिन्दी अखबारों की दूसरी कतार मालिक के लठैतों की तरह व्यवहार करने लगी ।
यहां अपने टिक जाने , अपनी बचा लेने  ( ‘ अपनी बचा लेना ‘ एक खास इलाकाई मुहावरा है , लेकिन, मेरा मतलब यहां नौकरी बचाने से है ) की छटपटाहट ने आपस में ही घात – प्रतिघात  साजिश , कुचरई ( चुगलखोरी ) की आंधी उठा दी ।

नये संपादकों / स्टेट हेड को हमेशा तख्तापलट का दु:स्वप्न आता रहता है , वे कान के कच्चे लोग भी हैं।
इन लोगों ने अपने चारो ओर तंग , उसमें भी और तंग , नजरिये के दायरे कसने शुरू किये । उन्होंने अपनी जात ( जाति ) शाखा , गोत्र और जीजा – साले , मामा – भांजे जैसी रिश्तेदारियों के बालू – सीमेंट – छड़ से अपने चारो और सुरक्षा की दीवाल खड़ी की ।

अखबार की चिंता , अभिनय पटुता के सापेक्ष हो गयी । एक कार्यकारी संपादक तो रीजनल या नेशनल मीट के दौरान , कंटेट की चिंता में लो ब्लड प्रेशर या छाती में बायीं तरफ हल्के दर्द की चपेट में आ जाता था ।
उसका अभिनय यह कहता था कि इस टीम से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती । लिहाजा संस्थान ( विभिन्न राज्यों के सभी शहरों की यूनिट और मॉडम सेंटर सहित ) की कुल वर्क फोर्स का 5 प्रतिशत हर साल छांट देने की नीति ही बन गयी ।
मालिक कहता था , बहुत पहले से —
…. हम हाथी हो गये हैं । हमें छरहरी , फास्ट मूविंग , स्मार्ट टीम चाहिए ।
( ताली …. ताली ..)
यह वही दौर था जब बाजार चालित फैशन के बार्बी सिंड्रोम में , हर महिला जीरो फ़ीगर पाने की कोशिश करने लगी थी । तब मैने एक लेख लिखा था , जिसकी हेडिंग अंग्रेजी में थी । देवनागरी लिपि में — डे आर डाइंग टू बी स्लिम …।
यह वही काल था जब अखबार बाजार के दवाब में कंटेट रीडिफाइन करने की कोशिश कर रहे थे ।
कार्यकारी संपादक ने होंठ भींचे । मालिक को दया आयी , एक अकेला कितना टेंशन ले रहा है ।
जारी …..

पिछली कड़ियों के लिए नीचे लिंक पर चटका लगाएँ..

भाऊ कहिन-17- जो कुछ नहीं लिख सकते, ख़ुद को न्यूज़ का आदमी कहते हैं !

 

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