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जो कुछ नहीं लिख सकते, ख़ुद को न्यूज़ का आदमी कहते हैं !

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भाऊ कहिन-17

यह तस्वीर भाऊ की है…भाऊ यानी राघवेंद्र दुबे। वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे को लखनऊ,गोरखपुर, दिल्ली से लेकर कोलकाता तक इसी नाम से जाना जाता है। भाऊ ने पत्रकारिता में लंबा समय बिताया है और कई संस्थानों से जुड़े रहे हैं। उनके पास अनुभवों ख़ज़ाना है जिसे अपने मशहूर बेबाक अंदाज़ और सम्मोहित करने वाली भाषा के ज़रिए जब वे सामने लाते हैं तो वाक़ई इतिहास का पहला ड्राफ़्ट नज़र आता है। पाठकों को याद होगा कि क़रीब छह महीने पहले मीडिया विजिल में ‘भाऊ कहिन‘ की पाँच कड़ियों वाली शृंखला छपी थी जिससे हम बाबरी मस्जिद तोड़े जाते वक़्त हिंदी अख़बारों की भूमिका के कई शर्मनाक पहलुओं से वाक़िफ़ हो सके थे। भाऊ ने इधर फिर से अपने अनुभवों की पोटली खोली है और हमें हिंदी पत्रकारिता की एक ऐसी पतनकथा से रूबरू कराया है जिसमें रिपोर्टर को अपना कुत्ता समझने वाले, अपराधियों को संपादकीय प्रभारी बनाने वाले और नाम के साथ अपनी जाति ना लिखने के बावजूद जातिवाद का नंगानाच करने वाले संपादकों का चेहरा झिलमिलाता है। ये वही हैं जिन्होंने 40 की उम्र पार कर चुके लोगों की नियुक्ति पर पाबंदी लगवा दी है ताकि भूल से भी कोई ऐसा ना आ सके जिसके सामने उनकी चमक फ़ीकी पड़ जाए ! ‘मीडिया विजिल’ इन फ़ेसबुक संस्मरणों को ‘भाऊ कहिन’ के उसी सिलसिले से जोड़कर पेश कर रहा है जो पाँच कड़ियों के बाद स्थगित हो गया था-संपादक

 

हम अपने लिये कब लड़ेंगे साथी ? 

 

— अपना हाथ मुझे दे दो ठाकुर
— नहीं …..हीं ईं …ईं … ( लंबी चीख )
फिल्म शोले जैसा कोई दृश्य नहीं बन सका था ।
यह कड़ी अभी अपने 29 वें में थी कि शनिवार की रात यानि 8 जुलाई को 11. 30 बजे एक फोन आया ।
अननोन नम्बर ।
मैंने उठा लिया —
आप झूठी स्मृतियां गढ़ने के उस्ताद हैं ..
— जी
— आप परपीड़ा का सुख ले रहे हैं , मंहगा पड़ सकता है
— जी
— आपके दिमाग की रासायनिक प्रयोगशाला में ये सब क्या चल रहा है ?
कुछ धमकी , चेतावनी और सुधर जाओ जैसी कुछ और बातें ।
मुझे तो मजा आ गया । कुछ किसी के मर्म को छू गया था । पता नहीं वो कौन थे जिनको मैंने छेड़ दिया था ।
हां याद आया , जाहिर है वे ‘ लोग ‘ वही थे जिन्होंने किसी की सुबह अपहृत कर ली थी । वे पैसे में और पैसे से खेलने वाले लोग थे । इतिहास द्वारा जिन लोगों का चैन छीन लिये जाने की चिंता में कोई बहुत दुबला हुआ था , वे लोग वही थे ।
लेकिन फोन करने वाला कौन था ? जिसे मेरी स्मृतियों से चोट पहुंची ?
— ठीक है , नमस्कार
( मैंने उनसे उनका नाम नहीं पूछा , न परिचय , फोन काट दिया )
मुझे तो कुछ और याद आ रहा था ।
— अज्ञेय कौन थे ?
— वात्स्यायन कौन थे ? ( मैंने शरारत की )
— यार मैंने अज्ञेय को पूछा है ।
सांस्कृतिक संवाददाता ने कहा – मैं दोनों को नहीं जानता ।
वह पता नहीं क्यों संपादक का बहुत खास था ।
संपादक ने कहा — .. इन लोगों को जान कर क्या करोगे ? खबरों पर कंसंट्रेट करो ।
एक दिन मेरे मित्र दो अच्छे कथाकारों के साथ , 7 – 8 लोग आफिस आये ।
शहर में देश के विभिन्न अंचलों से आये कथाकारों का तीन दिवसीय आयोजन चल रहा था ।
मैंने उन लोगों को देखा तो दौड़ा । लगा जो कुछ छप रहा है , उससे खुश होकर आये होंगे ।
लेकिन ऐसा नहीं था ।
मेरे मित्र कथाकार ने पूछा –
संपादक कहां हैं ?
मैंने कहा – बताइये , मुझसे बताइये ।
उन्होंने कहा – हम लोग नहीं चाहते कि आपका अखबार इस आयोजन को कवर करे ।
मैंने माथा पीट लिया ।
लेकिन उन लोगों की संपादक से मिलने की इच्छा पर एक किस्सा जरूर याद आ गया ।
एक आदमी ने अपने गांव में सार्वजनिक जगह पर एक लड़के को खड़े होकर पेशाब करते देखा ।
वह इसकी शिकायत लेकर उसके बाप के पास जा रहा था ।
बाप छत पर से ही मूत रहा था , खड़े होकर ।
एक फैशन चल पड़ा है इन अखबारों में । ऐसे लोग जो कुछ नहीं लिख सकते , खुद को न्यूज का आदमी कहते हैं ।
रिपोताज या फीचर ( रिपोर्टिंग की ही एक विधा ) में दक्ष लोगों को न्यूज का आदमी नहीं मानते ।
अपनी लटों में ही उलझे एक संपादक का भी यही मानना है । और हार्ड कोर खबर का मतलब होता है —
उन्होंने कहा … , आगे कहा .. जोर देकर कहा ..।
 

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हटा दी गई निराला की तस्वीर..

 

मैंने जिस ब्राडशीट साप्ताहिक में कुछ माह काम किया , आलोक जोशी मेरे सीनियर थे ।
मधु लिमये का देहावसान हुआ था ।
आलोक जी की इच्छा थी कि उनपर किसी साहित्यकार से लिखवाया जाये । किसी साहित्यकार पर राजनीतिक से और राजनीतिक पर साहित्यकार से , उस समय तक ऐसा प्रयोग मैंने नहीं देखा था ।
साहित्य और राजनीति के गहन सबंध ( जो होना ही चाहिए ) को लेकर , उनकी दृष्टि बहुत साफ है ।
कौन नहीं जानता कि गोर्की की ‘ मां ‘ , रूसी क्रान्ति की पूर्व पीठिका थी । दुनिया की तमाम महानतम रचनाएं अपने समय की राजनीति , अर्थव्यवस्था और इतिहास का आईना रही हैं ।
किसी ने तो यह भी कहा कि साहित्य , उत्कृष्ट राजनीति है ।
बहरहाल यह काम मेरे जिम्मे आया और मैंने यशस्वी कथाकार स्व. शिवप्रसाद सिंह को इसके लिये मना भी लिया । ‘ नीला चांद ‘ आ चुका था ।
शिव प्रसाद जी ने मधु लिमये पर लिखा भी । जबकि वह प्रभाष जोशी जी के आग्रह के बावजूद , जनसत्ता में जाने क्यों अपना स्तंभ जारी रखना , मना कर चुके थे ।
मैं जिस अखबार की बात अब कर रहा हूं वहां कैलेण्डरिंग पर बहुत जोर था ।
अगले दिन बसंत पंचमी थी । मैंने पहले पन्ने पर संक्षेप वाले कॉलम में महाप्राण ( सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ) की एक छोटी सी तस्वीर लगवा दी । महाप्राण का जन्मदिन बसंत पंचमी को ही मनाया जाता है ।
कैप्सन था — मैं बसंत का अग्रदूत ।
आज का मौसम और बाजार भाव शायद छूट गया था । या जो वजह हो । सुबह के नगर संस्करण में निराला जी की तस्वीर नहीं थी ।
15 या 20 दिन बाद मैं अखबारों की फाइल पलट रहा था । बहुत सुखद आश्चर्य हुआ जब मैंने ‘ द हिन्दू ‘ के एडिट अपोजिट का पूरा पन्ना निराला पर देखा ।
जो यहां से प्रकाशित किसी हिंदी अखबार में नहीं था ।
याद आता है जब संकट मोचन संगीत महोत्सव में बहुत पहले , तकरीबन 4 बजे भोर में मैंने संयुक्ता पाणिग्रही का इंटरव्यू किया । बहुत मुश्किल से वह राजी हुईं । (मेरे साथ अनन्य मित्र स्व. मनोज श्रीवास्तव थे )
टाइम मैगजीन के मुताबिक मैन ऑफ द प्लैनेट , दुनिया के सात पर्यावरणविद् में एक , काशी हिन्दू विश्वविद्यालय प्रौद्योगिकी संस्थान में सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर और संकट मोचन मन्दिर के महंत वीरभद्र मिश्र के आग्रह पर ।
बातचीत में मैं यह नहीं बता पाया था कि किस अखबार से हूं ।
इंटरव्यू खत्म होने पर उन्होंने कहा –
यह तो आपने बताया नहीं कि आप किस अखबार से हैं ?
मैंने अखबार का नाम बताया ।
उन्होंने हैरत से पूछा था –
हिन्दी अखबारों में हमलोग छपते हैं … ?
जारी….

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भाऊ कहिन -17-यह अख़बार औरत को देखकर हिंस्र हो जाने वालों को पुरस्कृत करता है !

 

 

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