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“सत्ता के लिए झूठ ना बोलें मोदी, नेहरू मेरे नेता थे- सरदार पटेल !”

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यह लेख पिछले साल का है, लेकिन संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई बहस का जवाब देते हुए 7 फ़रवरी 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आक्रामक भाषण में एक बार फिर ‘पटेल की जगह नेहरू प्रधानमंत्री होते तो..’ का सवाल उठाकर इसे समीचीन बना दिया है- संपादक 

पंकज श्रीवास्तव

आप इस शीर्षक को देखकर हँस सकते हैं। भला सरदार पटेल निधन के इतने अरसे बाद मोदी को यूँ कैसे झिड़क सकते हैं ! ज़िंदा थे तो ज़रूर आरएसएस पर पाबंदी लगा दी थी। बाद में लिखित संविधान और राजनीति से दूर सांस्कृतिक क्षेत्र में काम करने की शर्त पर ही पाबंदी हटाई थी। लेकिन अब 2017 में कैसे और क्या कर सकते हैं ?

आपकी बात ठीक है। लेकिन यह शीर्षक किसी व्यंग्यलेख से नहीं, इतिहास के दस्तावेज़ से निकला है। सरदार पटेल जैसी शख्सियतों की ख़ासियत यह होती है कि वे मुँह देखी नहीं करते। उनके विचार बाक़ायदा लिखित होते हैं।

इस बात का एक संदर्भ है। 19 फ़रवरी यानी रविवार दोपहर करीब डेढ़ बजे यूपी के फ़तेहपुर में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंंत्री मोदी ने याद दिलाया कि देश अफ़सोस करता है कि पटेल पहले प्रधानमंत्री नहीं बने। मीडिया के सैकड़ों कैमरों के ज़रिये यह बात एक बार फिर घर-घर पहुँची। 2014 लोकसभा चुनाव के पहले भी उन्होंने बाक़ायदा इस ‘अफ़सोस अभियान’ को गति दी थी। मक़सद आम गुजरातियों में पहला प्रधानमंत्री किसी ‘गुजराती के न बन पाने’ की कसक पैदा करना था। चूँकि फ़तेहपुर कुर्मी बहुल क्षेत्र है तो मोदी इस कसक को फिर से जगाना चाहते थे और प्रकारांतर में राहुल गाँधी के पुरखे नेहरू को विलेन साबित करना चाहते थे । यूपी का कुर्मी समुदाय का बड़ा हिस्सा अपने नाम के आगे ‘पटेल’लगाता है और ख़ुद को सरदार पटेल से जोड़ता है।

लेकिन क्या वाक़ई पटेल को भी यह अफ़सोस था। आइये आपको इतिहास के कुछ पन्नों की सैर कराते हैं।

भारत की आजादी का दिन करीब आ रहा था। मंत्रिमंडल के स्वरूप पर चर्चा हो रही थी। 1 अगस्त 1947 को नेहरू ने पटेल को लिखा-

”कुछ हद तक औपचारिकताएँ निभाना ज़रूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूँ। इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं।’

जवाब में पटेल ने 3 अगस्त को नेहरू के पत्र के जवाब में लिखा-

” आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएँ बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी औऱ निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।”

पटेल की ये भावनाएं सिर्फ औपचारिकता नहीं थी। अपनी मृत्यु के करीब डेढ़ महीने पहले उन्होंने नेहरू को लेकर जो कहा वो किसी वसीयत की तरह है। 2 अक्टूबर 1950 को इंदौर में एक महिला केंद्र का उद्घाटन करने गये पटेल ने अपने भाषण में कहा—-“अब चूंकि महात्मा हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं। बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी। अब यह बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें और मैं एक गैरवफादार सिपाही नहीं हूं।”

साफ है, पटेल को नेहरू की जगह पहला प्रधानमंत्री ना बनने पर मोदी जी जैसा अफसोस जता रहे हैं, वैसा अफसोस पटेल को नहीं था। वे आरएसएस नहीं, गांधी के सपनों का भारत बनाना चाहते थे। पटेल को लेकर इस अफसोस के पीछे एक ऐसी राजनीति है जिसे कम से कम पटेल का समर्थन नहीं था।

नेहरू और पटेल को एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा करना आरएसएस का पुराना शगल है। दैनिक भास्कर ने तो मोदी के हवाले से यहाँ तक छाप दिया था कि नेहरू सरदार पटेल की अंतिम यात्रा में भी शामिल नहीं हुए थे जो सरासर झूठ साबित हुआ। दरअसल, नेहरू आरएसएस की आँख में हमेशा हमेशा चुभते रहे। एक योजना के तहत पटेल को ‘भारतीय संस्कृति’ वाला प्रचारित करता है जो ‘मुसलमानों के ख़िलाफ़’ थे (उसे हैदराबाद के निज़ाम के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई इसकी गवाही लगती है।)। पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सख़्ती का अनुवाद आरएसएस ‘मुस्लिम विरोध’ करता है।

लेकिन जब आप पटेल के विचारों को पढ़ें तो यह बात पूरी तरह ग़लत नज़र आती  है। वे हिंदू-मुस्लिम एकता के सख़्त हिमायती थे और मानते थे कि भारत का भविष्य इसी एकता में है। सच है कि पटेल पक्के गाँधीवादी थे और बतौर गृहमंत्री उन्होंने जो भी किया वह नेहरू कैबिनेट के सदस्य बतौर ही किया। हाँ, उनमें मतभेद भी थे, जो स्वाभाविक ही था। क्या गाँधी और नेहरू में मतभेद नहीं थे ?

क्या आपको अब भी लगता है कि इस लेख का शीर्षक ग़लत है ?



(डॉ.पंकज श्रीवास्तव, पत्रकार और इतिहास के विद्यार्थी हैं )

( लेख में जिन पत्रों का ज़िक्र है,वे ‘सरदार पटेल का पत्र व्यवहार’, 1945-50, प्रकाशक नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, अहमदाबाद में दर्ज हैं।)