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प्रेमचंद के कायाकल्प को ‘कोकशास्त्र’ बनाने वाला ‘सर्वश्रेष्ठ’ प्रकाशक और मीडिया की चुप्पी !

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चंद्र प्रकाश झा

खबर 30; बरस पुरानी है।  फिर भी उसका जिक्र करना गैर- मुनासिब नही होगा , खास कर वर्ष 1986 के बाद पैदा हुई नई  पीढ़ी के लिए और शायद उनके लिए भी जिनकी नज़र इस पुरानी खबर पर नहीं। मीडिया की निगरानी करने वालों को  आज भी इस तरह की खबर को याद रखने की दरकार है ताकि फिर ऐसा कोई हादसा न हो और अगर ऐसे हादसे हों तो  उन पर नज़र पड़ते ही यह सोचने कि क्या क्या कुछ किया  सकता है , क्या नहीं.

वर्ष 1986 में प्रेमचंद साहित्य पर उनके पुत्र अमृत राय का ‘ स्वत्वाधिकार ‘ समाप्त  हुआ तो बाजारू बाज़ार के लोगों ने प्रेमचंद की कृति में कोकशास्त्र मिला दिया. उस वर्ष प्रेमचंद के निधन के 50 बरस पूरे हो गए थे .भारत के कानूनों के तहत किसी  कृतिकार के निधन के 50 बरस बाद उनकी कोई भी कृति पर किसी का स्वत्वाधिकार नहीं रह जाता है। एकमात्र अपवाद गुरदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कृतियाँ  हैँ जिनका कॉपीराईट उनके ही द्वारा स्थापित शैक्षणिक संस्थान , विश्व भारती के पास ही बने रहने देने के लिए भारतीय संसद ने नया अधिनियम बना दिया।  इस अधिनियम के पीछे की सोच संभवतः प्रेमचंद सम्बंधित उपरोक्त प्रकरण की खबर फैलने से भी मिली होगी।
बाजारू लोगों  की कंपनियों में से एक ने यह सोच कर कि अब प्रेमचंद साहित्य छापने में कोई रोक -टोक नहीं रहेगी और दूसरे प्रकाशक भी बहती  गंगा में हाथ धोने आ जायेंगे , प्रेमचंद  के निधन के 50  बरस  पूरे होने के पहले से ही प्रेमचंद की कृतियाँ ताबड़ -तोड़ छापनी शुरू कर दी. मध्य वर्ग में मशहूर , हिन्द  पॉकेट बुक्स ने बाज़ार में सस्ती कीमत के प्रेमचंद साहित्य की बाढ़ – सी ला दी। तुर्रा यह कि इस प्रकाशक ने  दंभ भरते हुए यह  मुनादी भी कर दी  कि ये सब प्रेमचंद के सुपुत्र अमृत राय के निर्देशन में प्रेमचंद साहिय का प्रामाणिक प्रकाशन है.
लेकिन देश में मुद्रित पॉर्न  के विशाल बाज़ार का जहरीला असर यूँ हुआ कि उस  नव-प्रकाशित  ” प्रामाणिक ”  प्रेमचंद साहित्य  में भी अश्लील कोकशास्त्र घुस गया ! प्रेमचंद लिखित उपन्यास , कायाकल्प के उस प्रकााशक  द्वारा 1986  के प्रारम्भ में प्रकाशित भाग -2  में पेज नंबर  97  से पेज नंबर 122  तक स्त्री-पुरुष नामक कोकशास्त्र-नुमा पुस्तक के अंश शामिल थे. उसकी प्रति दिल्ली में बहादुरशाह ज़फर मार्ग पर इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग में तब अवस्थित एक सरकारी बैंक के पुस्तकालय से एक पत्रकार को पढ़ने मिली। वह पत्रकार प्रेमचंद के उपन्यास में कोकशास्त्र का घालमेल देख सनक गया और उसने इसे मुद्दा बनाने की ठान ली. वह जिस न्यूज एजेंसी में कार्यरत था उसके सम्पादक ने ताकीद कर दी कि वह पहले इसे उन्हें पढ़ने दे और कोई भी रिपोर्ट लिखने के लिए प्रकाशक का भी पक्ष दे और यही नहीं कम- से- कम पांच शीर्ष साहित्यकारों के साथ भेंटवार्ता कर उनके कथन का भी रिपोर्ट में समावेश करे।  तबतक सम्पादक ने उपन्यास की वह प्रति अपने पास रख ली.
इस  प्रकरण के बारे में उस  पत्रकार के सम्पर्क साधने पर अमृत राय ने मौन साध लिया , प्रेमचंद के स्वघोषित मानस उत्तराधिकारी राजेंद्र यादव ने , जो अब हमारे बीच नहीं रहे , फोन पर बातचीत में छूटते ही मामला खारिज कर कहा , ” तो क्या हुआ “. लेकिन उनकी पत्नी और स्वयं लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार मन्नू भंडारी ने और जनवादी लेखक संघ के तत्कालीन पदाघिकारी मुरली मनोहर प्रसाद सिंह समेत अन्य साहित्यकारों ने इस प्रकरण का कड़ा विरोध व्यक्त  किया। श्री सिंह ने , जो दिल्ली विश्विद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष भी रहे , इस मामले पर हमख़याली अन्य संगठनों और लोगों को एकजुट कर आंदोलन छेड़ने  की सलाह भी दी.
इस बीच प्रकाशक के लोगों ने उस सनकी पत्रकार को शांत करने एक तरकीब निकाल उसके सम्पादक और सहकर्मियों को प्रेमचंद की अन्य कृतियों की दर्जनों प्रतियां भेंट कर दी।  उन्होंने उस सनकी पत्रकार को एक लिखित माफीनामा थमा दिया  जिसमें आश्वस्त किया गया था कि प्रकाशक प्रेमचंद के कोकशास्त्र -मिश्रित उस उपन्यास की सारी प्रतियां बाजार से वापस ले लेगा। सम्पादक के निर्देश पर उस  सनकी पत्रकार की रिपोर्ट कुछ क़तर दी गई।
 रिपोर्ट जिस सुबह अखबारों में छपनी थी संयोग से उसी दिन उक्त प्रकाशक दीनानाथ मल्होत्रा  को राष्ट्रपति भवन  में ‘ उत्कृष्ट  ” प्रकाशन का राजकीय पुरस्कार दिया जाना था। उन्होंने यह पुरस्कार ग्रहण किया भी जिसकी खबर अखबारों में प्रमुखता से छपी। लेकिन उक्त  प्रकाशक के लोगों के दबाब से या जो भी कारण रहे हों उस सनकी पत्रकार की वह रिपोर्ट दिल्ली के एक अखबार , वीर अर्जुन , को छोड़ किसी अखबार में नहीं छपी .लेकिन दिल्ली के बाहर , मध्य प्रदेश के उस शहर , शहडोल समेत विभिन्न स्थानों  के अनेक अखबारों में वह रिपोर्ट छप ही गई जहाँ प्रेमचंद की सुपुत्री बसी हुई थीं. बताया जाता है कि उन्होंने उक्त प्रकाशक की करतूत पर क्षोभ और सनकी पत्रकार की साहित्य -परायण तत्परता की सराहना में उस न्यूज़ एजेंसी को पत्र भी लिखे.
आलेख में और विषयांतर ना हो जाए पर इतना तो कहा ही जा सकता है उस सनकी पत्रकार और उसे थमाए गए लिखित माफीनामा की क्या औकात। उस  प्रकरण के 30 बरस बाद बाजारू बाजार की शह पर अश्लील साहित्य और पोर्न का कारोबार बहुत आगे बढ़ चुका है और हमारी मिडिया को फुरसत नहीं जो इस गोरखधंधे की खबर ले जिसका वैश्विक कारोबार  सालाना 15  अरब डॉलर पहुँच जाने का फौरी अनुमान है।   यूँ तो भारत में अश्लील ‘ साहित्य ‘ और पॉर्न  का धंधा गैर-कानूनी है पर इसके धंधेबाज कम नहीं  और उनका गोरखधंधा येन- केन -प्रकारेण चल निकला है.
पॉर्न ‘ उधोग ‘ के में अव्वल तो करीब आधी हिस्सेदारी के साथ अमरीका है जहां 1953 से प्लेबॉय जैसी अश्लील पत्रिका छपती है . स्वघोषित रूप से ” पुरुषों के लाइफस्टाइल और मनोरंजन ”  की इस पत्रिका के संस्थापक ह्यू हेफनर का 91 बरस  की उम्र में हाल में निधन हुआ तो वह बड़ी खबर बन गई . इस खबर में यह चाशनी भी घोल दी गई कि  हेफनर  को हॉलीवुड की दिवंगत मशहूर अदाकारा मर्लिन मुनरो के बगल में  दफ़नाया गया जाएगा जिनकी नग्न तस्वीर प्लेबॉय के सर्वप्रथम अंक के कवर पर छापी  थी। पॉर्न इंडस्ट्री के इस बेताज बादशाह ने यह  जगह अपने पार्थिव शरीर को मुनरो का बगलगीर होने की हसरत से 25   बरस  पहले ही खरीद  ली थी। पॉर्न कारोबार  के लोगों की  मरने बाद की भी हसरतें अश्लील होती हैं.
बहरहाल , अमरीका में ही ऑडियो -वीडियो पॉर्न उद्योग पनपा जिसका कारोबार दुनिया  भर में पसर कर अब  ऑनलाइन हो चुका है. भारत में ऑनलाइन  पॉर्न कारोबार के अवैध होने के नाते उसकी कमाई का कोई विश्वसनीय  अनुमान लगाना संभव नहीं है। वैसे , यह माना जाता है कि भारत में ऑनलाइन  पॉर्न के मुरीदों में से 80 प्रतिशत मुफ़्त के ही पॉर्न चाहते हैं। पर इस गोरखधंधा की यह खासियत है कि वह मुफ्तखोरों की भी ‘ सेवा ‘ कर विज्ञापनों से कमाई कर लेता  है।  मनोवैज्ञानिक शोध पुष्टि करते हैं कि पॉर्न के साथ जुड़े विज्ञापन गहरी चेतना में दर्ज हो जाते हैं.
ऑडियो -वीडियो पॉर्न उद्योग के भारत में  फले- फूले कम से कम तीन  दशक तो हो ही गए हैं . यह उद्योग , वीडियो कैसेट और प्लेेयर के जरिए जल्द ही  ऊच्च वर्ग से निम्न वर्ग तक पसर गया। उसके पहले यह धंधा  ब्लू फिल्म के नाम से रील और प्रोजेक्टर के जरिए ‘ ऊँचे ‘ लोगों तक ही सीमित था जो इसे बड़े खर्च से अपने ठिकानों पर देखा करते थे. 1970 के दशक से भारत में समुद्री रास्ते  से तस्करी के जरिये  मध्य वर्ग की भी खरीद क्षमता के वीडियो प्लेयर और औसत किताब के आकार -वजन के कैसेट में भरे ट्रिपल एक्स फिल्मों की आमद शुरू हो गई. निम्न वर्ग के लिए झुग्गी झोपड़ी बस्तियों तक में पॉर्न वीडियो दिखाने के पार्लर खुल गए. नई सहस्त्राब्दी का आगमन होते-होते  , पहले पॉर्न सीडी और फिर ऑनलाइन पॉर्न भी भारत में प्रचलित होने लगा. वाय -फाय डिजिटल इंडिआ में पॉर्न का इसका जहरीला असर तेजी से बढ़ने लगा है।

पॉर्न कारोबारियों ने भारत  में अपना गोरखधंधा चमकाने के लिए कई नुस्खे अपनाये हैं।  सनी लियोन नाम से मशहूर , कनाडा में पैदा हुई अमरीकी नागरिक लेकिन भारतीय मूल की पूर्व पॉर्न स्टार  , करनजीत कौर वोहरा को  पहले टीवी शो ‘  बिग बॉस ‘ में जगह मिली और फिर उनका 2012 में हिन्दी फिल्म , जिस्म -2  में बतौर नायिका पदार्पण हो गया। यह फिल्म वयस्कों के लिए थी लेकिन उस फ़िल्म के बड़े -बड़े अर्धनग्न होर्डिंग और पोस्टर शहरों के चैराहे पर लगाए गए। इस फिल्म से जुड़े दिग्गज फिल्मकार महेश भट्ट ने  राज्यसभा  टीवी पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के मीडिया मंथन कार्यक्रम में इस तरह के होर्डिंग -पोस्टर चैराहों पर अवयस्कों को भी नज़र आने देने के औचित्य पर इस स्तम्भकार के पूछने पर कहा कि इसमें कोई दोष नहीं और इनके लिए नगरीय निकायों को पैसे दिए जाते हैं !

चंद्र प्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार हैं। पत्रकारों के ट्रेड यूनियन आंदोलन से जुड़ा महत्वपूर्ण नाम।  इस ख़बर में जिस सनकी पत्रकार का ज़िक्र है, वह दोस्तों में सी.पी. के रूप में मशहूर चंद्र प्रकाश झा ही हैं।

 

 



1 COMMENT

  1. वह संस्करण मेरे पास है, उसमें आपके पास पुस्तक में गलती से वह फार्म लग गया होगा, बाइ​न्डिंग की गलती थी, जिस दौरान दूसरी पुस्तक के पन्ने जुड गए….सभी किताबो में ऐसा नहीं था, एक पुस्तक में ही गलती से ऐसा हुआ था….यह खबर दमदार नहीं….कोई दम नहीं इसमें बंधुवर….
    Farhana Taj

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