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सत्‍तर साल की आज़ादी में शिलापट्टों का गुलाम बन कर रह गया आज़ाद का गांव

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आजाद का अस्थिकलश
शाह आलम / बदरका (उन्नाव) से लौटकर

बदरका की भूमि वह पवित्र भूमि है जिसकी बराबरी हम काबा-काशी से नहीं कर सकते। यहां तो गरीबी में लिपटे चन्द्रशेखर आजाद ने जन्म लेकर सारे मुल्क ही नहीं दुनिया के परतंत्र देशों को स्वतंत्रता हित बलिदान का रास्ता दिखाया।

– भारत सरकार के उद्योग मंत्री नारायण दत्त तिवारी, 7 जनवरी 1986

आज़ाद की मूल तस्‍वीर जो फ्रेम के भीतर छुपा दी गई थी

किसी बड़े नेता के संदेश वाला इसी तरह का एक और अदद शिलापट्ट स्वत्रंता दिवस के मौके पर बदरका गांव में बढ़ जाएगा। शहीद चन्द्रशेखर आजाद स्मारक ट्रस्ट समिति ने 15 अगस्त 2017 को विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित को यहां नागरिक अभिनंदन के लिए आमंत्रित किया है। अंग्रेजी सत्ता के लिए हमेशा अजेय रहे आजादी के योद्धा चन्द्रशेखर आजाद की उपेक्षा का आलम यह है कि आजाद भारत में उनके गांव बदरका में उनका एक स्मारक है, शासन-प्रशासन हर साल उनका जन्मदिन मनाने वहां जाता है और हर साल यह आयोजन एक शिलापट्ट की संख्‍या को और बढ़ा देता है। इस ऐतिहासिक गांव में मूल रूप से हालांकि कुछ भी नहीं बदलता।

हमारे पास पांच पन्नों का एक सरकारी गोपनीय दस्तावेज मौजूद है जो कि सन् 2006 में आजाद की जयंती मनाने के लिए दक्षिण के एक सांसद ने सरकार को याद दिलाने के लिए लिखा था। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को एक चिट्ठी लिखकर इस क्रांतिवीर का जन्मशताब्दी समारोह मनाने की याद दिलाई गई थी। पत्र में आजाद का जन्मदिन 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भांवरा गांव में होना लिखा बताया गया था। चूंकि उनकी शहादत इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में हुई थी, लिहाजा उत्तर प्रदेश सरकार को भी कुछ करना चाहिए।

आज़ाद भवन

इस पत्र और चूक से सरकार और उलझन में आ गई क्योंकि आजाद की जयंती बदरका में हर साल मनाई जाती रही है जिसमें केन्द्र और राज्य के कद्दावर मंत्री-नेता शामिल होते रहे हैं। उनके जन्मस्थान को लेकर सरकार के पास कोई ठोस सबूत नहीं थे। इसलिए सरकार को आनन-फानन में एक जांच समिति बैठानी पड़ी। सरकार को आजाद के जन्मस्थान की नए सिरे से पड़ताल करानी पड़ी। उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी जांच में माना कि आजाद यहीं बदरका में 7 जनवरी 1906 को पैदा हुए थे। असल में तत्कालीन विशेष सचिव मंत्रिपरिषद कृष्ण गोपाल ने प्रमुख सचिव, राष्ट्रीय एकीकरण विभाग को 20 जून 2006 को हुई बैठक का ब्यौरा 21 जून 2006 को भेजा था जिसमें जन्मशताब्दी समारोह मनाने को लेकर एक राज्यस्तरीय समिति बनी थी जिसमें सूबे के सात मंत्री शामिल थे।

आज़ाद की मां के नाम पर बनी सड़क का उद्घाटन 7 जनवरी, 1988 को उत्‍तर प्रदेश के गृहमंत्री ने किया था

जाहिर सी बात है कि जांच कमेटी को उनके जन्मस्थान के साक्ष्य जरूर मिले क्योंकि यहां आजादी के बाद से ही बदरका में आजाद के जन्मदिवस पर मेले का सिलसिला रहा है। विभिन्न शिलापट्ट गवाही देते हैं कि यहां मुख्यमंत्री संपूर्णानंद, नारायण दत्त तिवारी, इंदिरा गांधी, मोतीलाल वोरा, अजीत सिंह से लेकर प्रमुख नेता आ चुके हैं।

गोपनीय दस्तावेज में आजाद जन्मशताब्दी समारोह के लिए बदरका में सांस्कृतिक कार्यक्रम, पार्को-स्मारकों का जीर्णोद्धार, श्री चन्द्रशेखर आजाद स्मारक ट्रस्ट समिति को प्रतिवर्ष देखरेख के लिए पांच लाख रुपये का वार्षिक अनुदान तथा आजाद की माता जगरानी देवी के नाम पर कन्या इंटर कालेज, आजाद प्राथमिक स्वास्थ केन्द्र, आजाद से जुड़े राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेजों को संरक्षित कर संग्रहालय में रखने तथा आजाद पर डाक्यूमेंट्री/ लघु फिल्म तैयार कर प्रदर्शित करने की बात अभिलेख में शामिल थी। कालेज और स्वास्थ्य केन्द्र विभागीय बजट के अलावा अन्य कार्यक्रमों के लिए 1 करोड़ का बजट निहित था।

शिलापट्ट की राजनीति के 70 साल

बदरका जाएंगे तो आजाद के स्मारकों की उपेक्षा आपको दिख जाएगी। आजादी के योद्धा से साक्षात्कार कराने वाले स्मारकों की बदहाली और गंदगी से आपका साक्षात्‍कार होगा। इसी क्रांतितीर्थ पर कई प्रमुख नेताओं द्वारा किये वाचनालय-पुस्ताकालय के उद्घाटन का शिलापट्ट तो है लेकिन मौके पर किताबें गायब हैं। शहीद चन्द्रशेखर आजाद स्मारक ट्रस्ट समिति ने आज विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित को आमंत्रित किया है। उनका भी सामना यहां की अव्यवस्थाओं से जरूर होगा। एक शिलापट्ट और लग जाएगा। क्‍रूा इससे इस गांव की तस्‍वीर बदलेगी?


 

शाह आलम जुनूनी सामाजिक कार्यकर्ता और खोजी पत्रकार हैं। अवाम का सिनेमा नाम से फिल्‍म फेस्टिवल के क्‍यूरेटर हैं। आजा़दी के आंदोलन के भूले-बिसरे नायकों के दस्‍तावेजकार हैं व फिल्‍मकार हैं। पिछले दिनों इन्‍होंने चंबल घाटी की यात्रा साइकिल से की है और क्षेत्र के विकास के लिए कार्यरत हैं।

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