Home दस्तावेज़ सत्ता के नरेंद्र (मोदी) के लिए सिद्धांतों के नरेंद्र (देव) को भुलाया...

सत्ता के नरेंद्र (मोदी) के लिए सिद्धांतों के नरेंद्र (देव) को भुलाया नीतीश ने !

SHARE

पंकज श्रीवास्तव

तो सुशासन बाबू ने वही किया जिसके बारे में काफ़ी दिनों से चर्चा चल रही थी। राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविद का समर्थन कोई ‘अलग-थलग परिघटना’ नहीं थी जैसा कि वे बार-बार दावा कर रहे थे। शाम को इस्तीफ़े के तुरंत बाद उनके घर पर ही बीजेपी विधायकों की बैठक होना और अगले ही दिन बीजेपी को साथ लेकर फिर मुख्यमंत्री बनने का फ़ैसला करना इस बात की मुनादी है कि पूरी पटकथा बहुत तरीक़े से तैयार की गई थी।

बहरहाल नीतीश को अपनी राजनीतिक लाइन चुनने का पूरा हक़ है। लेकिन समस्या यह है कि वे अपने फ़ैसले को सैद्धांतिक जामा पहना रहे हैं। पर क्या सचमुच उनका यह क़दम सिद्धांतों की कसौटी पर कसने लायक़ भी है ?

आइए ज़रा नीतीश कुमार के एक वैचारिक पुरखे आचार्य नरेंद्र देव की बात करते हैं जो कभी देश में सबसे बड़े समाजवादी विचारक माने जाते थे। आचार्य नरेंद्र देव जैसी साख उस दौर के बहुत कम नेताओं को नसीब थी। वे काँग्रेस के अंदर समाजवादियों के गुट सीएसपी यानी काँग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य थे। डॉ.लोहिया और जयप्रकाश नारायण भी इसी गुट में थे। काँग्रेस के दक्षिणपंथी नेताओं को ये लोग अखरते थे और उन्होंने आज़ादी के बाद पार्टी के अंदर समानांतर पार्टी चलाने का सवाल उठाना तेज़ किया। हालात ऐसे बने कि सीएसपी ने काँग्रेस से अलग होने का फ़ैसला किया।

यह 1948 की बात है। आचार्य नरेंद्र देव तब यूपी विधानसभा में काँग्रेस के सदस्य थे। वे चाहते तो पार्टी से अलग होने के बाद भी विधानसभा में रह सकते थे। लेकिन उन्होंने कहा कि जब पार्टी छोड़ रहा हूँ तो विधानसभा से भी इस्तीफ़ा दूँगा। वे कैसे भूल सकते थे कि जनता ने उन्हें काँग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में चुना है। उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। वह अयोध्या से विधायक थे। उपचुनाव की घोषणा हुई। आचार्य नरेंद्र देव के प्रशंसक प्रधानमंत्री नेहरू चाहते थे कि वे दोबारा विधानसभा पहुँचें लेकिन दक्षिणपंथी खेमा मौक़ा चूकना नहीं चाहता था। उसने देवरिया के संत बाबा राघवदास को मैदान में उतार दिया।

इस चुनाव में आचार्य नरेंद्र देव के विचारों की वजह से उन्हें नास्तिक और धर्मविरोधी के रूप में प्रचारित  किया गया। यह दुष्प्रचार इस क़दर था कि आचार्य जी चुनाव हार गए। बहरहाल उनका इस्तीफ़ा राजनीतिक शुचिता का अमिट इतिहास लिख गया।

नीतीश कुमार भी उसी समाजवादी धारा के हैं। यह बिलकुल संभव हो कि लालू यादव या उनके परिवार को लेकर उनकी शिकायतें सही हों, लेकिन यह भी सच है कि ‘दाग़ी’ लालू यादव से उन्होंने चुनाव पूर्व गठबंधन किया था और जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तमाम कोशिशों के बावजूद गठबंधन के पक्ष में मतदान किया था।

ऐसे में अगर कहा जाए कि नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ सरकार बनाने का फ़ैसला करके बिहार की जनता के जनादेश का अपमान किया है तो क्या ग़लत होगा ? अगर नीतीश सिद्धांत की बात करते हैं तो क्यों आचार्य नरेंद्र देव की तरह उन्होंने अपनी पार्टी के विधायकों समेत विधानसभा से इस्तीफ़ा नहीं दिया। जनता ने उन्हें बीजेपी के समर्थन नहीं, उसके विरोध के लिए वोट दिया था। लेकिन नीतीश ने बड़ी आसानी से सत्ता के नरेंद्र (मोदी) का हाथ थामने के लिए सिद्धांत के नरेंद्र (देव) को भुला दिया।

वैसे, नीतीश की छवि निर्माण की सारी कवायद के बावजूद उनका ‘सिद्धांतवादी’ होना हमेशा संदिग्ध रहा है। बीजेपी के साथ सरकार चलाते हुए उन्होंने हमेशा सामंती शक्तियों के दबाव में झुकना कबूल किया।

उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद अमीरदास आयोग भंग कर दिया था जो दलितों के नरसंहारों की ज़िम्मेदार रणवीर सेना और नेताओं के संबंधों की जाँच कर रहा था। आयोग की रिपोर्ट तैयार हो चुकी थी और कहा जाता है कि इसमे बीजेपी के कई नेताओं का नाम था।

यही नहीं, उन्होंने भूमि सुधार के लिए बनाई गई डी. बंदोपाद्याय कमेटी की सिफ़ारिशों को ख़ारिज करके ज़मींदारों का बचाव किया था। समान स्कूल प्रणाली के लिए उन्होंने ही मुचकुंद दुबे कमेटी का गठन किया था, लेकिन उसकी सिफ़ारिशें रद्दी की टोकरी में डालने में उन्हें हिचक नहीं हुई।

ये कुछ ऐसे मसले थे जिन पर ईमानदार पहल बिहार की तस्वीर बदल सकती थी। लेकिन नीतीश ने बिहार को सामंती जकड़न से निकालने की कोई कोशिश नहीं की। यही वजह है कि बीजेपी नेता उनके साथ सहज महसूस करते हैं।

यह संयोग नहीं कि सिद्धांतों और आदर्शों की तमाम दुहाई देने वाले नीतीश कुमार ने आचार्य नरेंद्र देव पर नरेंद्र मोदी को तरजीह दी। वही नरेंद्र मोदी जिनके पीएम पद के प्रत्याशी बनने के सवाल पर उन्होंने एनडीए छोड़ दिया था और जिन्होंने उनके नीतीश के डीएनए पर सवाल उठाया था।

नीतीश कुमार ठीक कहते हैं कि क़फ़न में जेब नहीं होती, लेकिन वे भूल जाते हैं कि क़फ़न पर करमों का दाग़ ज़रूर लगता है जिन्हें ना चिता भस्म कर पाती है और ना वे क़ब्र की मिट्टी में ग़ुम हो पाते हैं। वे आदमी के नाम के साथ नत्थी होते हैं और युगों तक दिखाई पड़ते रहते हैं।

 

LEAVE A REPLY