Home दस्तावेज़ केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू को एक मानवाधिकार कार्यकर्ता का खुला पत्र

केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू को एक मानवाधिकार कार्यकर्ता का खुला पत्र

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वेंकैया नायडू जी,

सुकमा में हुए माओवादी हमले के बाद आपने मानवाधिकार संगठनों पर यह सवाल उठाया है कि वे सरकारी हिंसा की तो आलोचना करते हैं लेकिन जब माओवादी या अलगाववादी इस तरह के हमले करते हैं तो वे चुप्पी साध लेते हैं। आपका यह लेख आज के (1 मई, 2017) इण्डियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ है। मैं इस पत्र के माध्यम से एक मानवाधिकारकर्मी होने के नाते कोई सफाई नहीं देने जा रही, जैसा कि आपके बयान के बाद हमारे कुछ साथी करने भी लगे हैं। मैं इस पत्र के माध्यम से आपके पत्र में दी हुई कुछ बातों की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहती हूं, जो कि बेहद असंवैधानिक हैं और उससे भी महत्वपूर्ण कि जो खुद यह बता देती हैं कि मानवाधिकार संगठन आपका विरोध क्यों करते हैं। इसके अलावा आप लोगों के दोहरे चरित्र और कुछ झूठ को भी सामने रखना चाहती हूं।

नायडू जी, मानवाधिकार संगठन मानवाधिकारों की हिफाजत के साथ मूल तौर पर संविधान की रक्षा का काम करते हैं। संविधान कहता है कि किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा ही उसके किसी भी अधिकार से वंचित किया जा सकता है। इसके लिए कानून बनाए गए हैं, जो कि यह तय करते हैं कि व्यक्ति का अपराध क्या है और उसे क्या दण्ड मिलना चाहिए। जब भी इसका उल्लंघन होता है, मानवाधिकार संगठन इसके खिलाफ बोलते हैं। इसका ज्यादा उल्लंघन संविधान को मानने की कसम खाने के बावजूद आप ही लोग करते हैं, जैसे कि आपने पत्र में खुद ही संविधान विरोधी बात कही है कि ‘मानवाधिकार मानवों का होता है, आतंकवादियों का नहीं।’

नायडू साब, ये किसने तय किया कि कौन मानव है और कौन आतंकवादी? क्या आतंकवादी मानव नहीं हैं या इस देश के नागरिक नहीं हैं? आपकी यह बात घोर गैरकानूनी, असंवैधानिक और फासीवादी है। और आप लोगों ने यह बात राज्य की सारी संस्थाओं यानि एटीएस, एसटीएफ, एनआईए के दिमाग में भी बिठा दी है। खुद मुझसे और कई अन्य मानवाधिकारकर्मियों से इन संस्थाओं के अधिकारियों ने अभिरक्षा के समय आपकी इसी बात को दोहराया है, कि ‘ऐसे लोगों को तो देखते ही गोली मार देना चाहिए।’

आतंकवादियों के सारे मानवाधिकारों को खत्म कर देने की बात एक बार को मान भी लें, तो पहले विधि द्वारा उन्हें साबित तो होने दीजिये कि वे आतंकवादी हैं, जैसा कि संविधान में लिखा है। आपकी परिभाषा के हिसाब से तो पूरे देश का बड़ा हिस्सा आतंकवादी ही है- जो अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़े वो आतंकवादी, जो आपके द्वारा थोपे गए विकास का विरोध करे वो आतंकवादी, जो बोलने की आजादी की रक्षा की बात करे वो आतंकवादी, जो रोटी, कपड़ा और मकान की मांग सड़क पर उतर कर करे वो आतंकवादी, जो आदिवासी महिलाओं, कश्मीर की महिलाओं और आंदोलन के इलाकों में महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार का विरोध करे वो आतंकवादी, अपना जंगल-नदी बचाने के लिए लड़ रहा आदिवासी आतंकवादी, विस्थापन के खिलाफ खड़े नागरिक आतंकवादी, दूसरा धर्म मानने वाले आतंकवादी, फीस वृद्धि का विरोध करने वाले छात्र आतंकवादी, आपकी विचारधारा न मानने वाला पूरा विश्वविद्यालय आतंकवादी… सूची इतनी लम्बी है कि पूरा देश इसके दायरे में आ सकता है। क्या आप जैसे संविधान विरोधी बात बोलने वालों के कहने से हम मान लें कि कौन आतंकवादी है, कौन नहीं?

दूसरी बात ये कि आपकी इस सोच पर भी आपका चरित्र कितना दोहरा है, इसके भी बहुत सारे उदाहरण हैं। एक उदाहरण साध्वी प्रज्ञा का है। आपकी विचारधारा की इस साध्वी पर आतंकवाद का मुकदमा चल रहा है, आपकी संस्थाएं साध्वी और इनके साथ इसी तरह की आतंकवादी कार्यवाहियों में पकड़े गए इन सारे लोगों को बचाने के लिए कितनी नरमी से पेश आ रही हैं, इसकी बात मैं यहां नहीं करूंगी। मैं ये याद दिलाऊंगी कि इन पर आतंकवाद का केस लगा तो आपकी सोच के मुताबिक तो ये आतंकवादी हो गए और इनके सारे अधिकार छीन लिए जाने चाहिए। फिर भी जेल के भीतर साध्वी का कैंसर का इलाज हुआ।  फिर आपने इनका विरोध क्यों नहीं किया? अगर इसका दोष साबित भी हो जाए (हालांकि आपकी सरकार के रहते यह नहीं होगा) तो भी संविधान और कानून इन्हें कुछ अधिकार देता है, जो कि हम मानवाधिकार वालों के हिसाब से लागू होना भी चाहिए, लेकिन आपके विचार के हिसाब से तो इनका मानवाधिकार नहीं होना चाहिए। नायडू साब, ऐसे कई उदाहरण हैं जो ये साबित करते हैं कि मानवाधिकारों के मामलों में दोहरा चरित्र आप और आपकी तरह से सोचने वालों का है, किसी मानवाधिकार संगठन का नहीं।

दूसरी बात ये है कि आप लोग केवल संविधान और कानून के उल्लंघन के साथ शुद्ध हिंसा ही नहीं करते हैं जिसका हम विरोध करते हैं, बल्कि संरचनागत हिंसा भी करते ही जा रहे है। संकेत में आपने जिन लोगों के मानवाधिकारों के न होने की बात कही है, उन लोगों पर आप और आपकी पूर्ववर्ती सरकारें लगातार संरचनागत हिंसा करती ही जा रही हैं। कारपोरेट घरानों के विकास (मुनाफे) के लिए आप पूरे देश की एक बड़ी आबादी को उजाड़ रहे हैं। आप तो शहरी विकास मंत्री हैं, ‘स्मार्ट सिटीज’ के नाम पर लाखों लोगों को आप खुद उजाड़ने की योजना तैयार कर रहे हैं। लेकिन इसे आप हिंसा नहीं मानते हैं, जबकि हम मानवाधिकार संगठन इस हिंसा के खिलाफ भी बोलते हैं। हमारा यह बोलना आपको काफी अखरता है, इसलिए इस बार आपने हम पर भी निशाना साधा है।

तीसरे, कुछ झूठे तथ्यों की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहते हैं। आपने लिखा है कि हम ‘तब भी नहीं बोलते जब माओवादी विकास विरोधी काम करते हैं यानि स्कूल और सड़कें उड़ा देते हैं।’ नायडू जी, हम जानते हैं कि आप आदिवासी क्षेत्रों में स्कूलों की इमारत खड़ी कर उससे सेना की छावनी का काम लेते हैं, उनमें बच्चे पढ़ने कभी नहीं जाते। आप जब सड़कें बनाते हैं, तो उनसे गांव वालों को कोई फायदा नहीं मिलता, बल्कि कारपोरेट घरानों की बड़ी गाड़ियां इस देश का संसाधन इस पर से ढो कर ले जाती हैं, जिनमें उस क्षेत्र के लोगों का खून भी मिला होता है। वे ऐसी सड़कों से डरते हैं। पर आप इसे ही विकास कहते हैं।

नायडू जी, आप लोगों के ऐसे कारनामों के कारण ही हिंसा नहीं रुक रही है बल्कि यह बढ़ती ही जा रही है। हम आपसे अपील करते हैं कि हम पर दोषारोपण करने के बजाय आप बातचीत के रास्ते इस समस्या को हल कीजिए। इस वक्त आपकी सरकार में संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जिस तरह से आपकी पार्टी की विचारधारा से जुड़े तमाम समूहों का असंवैधानिक निगरानी समूह पनप गया है, उससे यह हिंसा और बढ़ रही है। यदि मानवाधिकारों को और भी मजबूत करने के लिए कुछ भी नहीं कर सकते हैं तो कम से कम कृपया संविधान और कानून को मानें (बेशक कुछ कानूनों को हम मानवाधिकार विरोधी मानते हैं और उसकी लड़ाई लड़ते रहेंगे)। वरना हम तो बोलते ही रहेंगे। आप का यह हमलावर पत्र हमें इसकी रक्षा करने से नहीं रोक सकता।

सीमा आज़ाद

मानवाधिकार कार्यकर्ता

9 COMMENTS

  1. Ref: para 2, last 2 lines. MR NAIDU IF terrorist HAVE NO HUMAN RIGHTS .THEN WHY TO EVEN LODGE AN FIR AGAINST MODI JI( as said by ex Chief Justice of India J. V N Kate),Amit shah ,kodnani,babu bajrangi ? And why to leave Mohan BHAGVAT, VHP chief etc?

  2. Refer to : Indian journal of medical ethics, 1 Jan to 31 march,2011. A paper by dr binayak send,ETHICS, EQUITY AND GENOCIDE. As per this article more than 40 % children, women, SC/st population have a BMI( BODY MASS INDEX) below 18.5. And as per a UNITED NATION COVENANT ( India agreed 2 it)it is GENOCIDE. So, here NDA( your first spell) as a whole is TERRITORIST as per RSS BJP PARLANCE . Why not to APPLY YOUR judgment ON YOU ? I think this letter complementary to RUDRA PRATAP PATHAK.

  3. Remember ! I think revolutionary struggle is ON in INDUSTRIAL BELTS like NCR ,DELHI where TERRORIST OSAMU SUZUKI ETC are hiring UNEMPLOYED YOUTH as BOUNCERS, who assault even kill PRO WORKER H R MANAGER LATE AVNISH KUMAT DEV .You give me 100 crore and I will make your REAL BROTHER your rel ENEMY. You give me just Rs 1 lakh and I can buy your DESBHAKTA BJP chief like Bengaru Laxman. I( I think a conspiracy was there by some of your BJP brahmins against him. After all how can u tolerate an SC as your head)

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