Home काॅलम सिद्धांतों पर अडिग रहूँँगा, हम पद नहीं अधिकारों के लिए लड़ रहे...

सिद्धांतों पर अडिग रहूँँगा, हम पद नहीं अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं-डॉ.आंबेडकर

SHARE


डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी – 29

पिछले दिनों एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में डॉ.आंबेडकर को महात्मा गाँधी के बाद सबसे महान भारतीय चुना गया। भारत के लोकतंत्र को एक आधुनिक सांविधानिक स्वरूप देने में डॉ.आंबेडकर का योगदान अब एक स्थापित तथ्य है जिसे शायद ही कोई चुनौती दे सकता है। डॉ.आंबेडकर को मिले इस मुकाम के पीछे एक लंबी जद्दोजहद है। ऐसे मेंयह देखना दिलचस्प होगा कि डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की शुरुआत में उन्हें लेकर कैसी बातें हो रही थीं। हम इस सिलसिले में हम महत्वपूर्ण  स्रोतग्रंथ  डॉ.अांबेडकर और अछूत आंदोलन  का हिंदी अनुवाद पेश कर रहे हैं। इसमें डॉ.अंबेडकर को लेकर ख़ुफ़िया और अख़बारों की रपटों को सम्मलित किया गया है। मीडिया विजिल के लिए यह महत्वपूर्ण अनुवाद प्रख्यात लेखक और  समाजशास्त्री कँवल भारती कर रहे हैं जो इस वेबसाइट के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य भी हैं। प्रस्तुत है इस साप्ताहिक शृंखला की  उन्तीसवीं कड़ी – सम्पादक

 

 

187.

कोंकण पंचमहल महार सम्मेलन

(दि बाम्बे सीक्रेट अबस्ट्रेक्ट, 21 मई 1938)

 

435। डा. बी. आर. आंबेडकर ने 14 मई को रत्नागिरी जिले के कंकावली में कोंकण पंचमहल महार सम्मेलन को सम्बोधित किया, जिसमें 1500 व्यक्ति उपस्थित थे। उन्होंने महारों की दयनीय स्थिति पर दुख व्यक्त किया और उन्हें एक सभ्य जीवन जीने और अपने कानूनी अधिकारों, जैसे सार्वजनिक कुओं, धर्मशालाओं और शिक्षा का पूरा लाभ उठाने की सलाह दी। उन्होंने उनसे इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी में शामिल होने को कहा, क्योंकि काॅंग्रेस ने दलित वर्गों के हित में कुछ भी नहीं किया है, जितना कि उसने उन ब्राह्मणों और व्यापारियों के हित में किया है, जो उनकी गरीबी के लिए जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि वे भारत से ब्रिटिश साम्राज्यवाद को दूर भगाने के उतने इच्छुक नहीं हैं, जितना इच्छुक वे काॅंग्रेस से पूॅंजीपतियों को हटाने के हैं। अन्त में उन्होंने ‘खोती प्रथा उन्मूलन’ बिल का समर्थन करने का आह्वान किया।

एकअन्य प्रस्ताव महार वतन बिल और खोती प्रथा उन्मूलनबिल के समर्थन में पास किया गया, जो डा. आंबेडकर द्वारा विधान सभा में रखा गया है।

 

(हस्ताक्षर) अधीक्षक,

एस. बी., सी. आई. डी.

30 मई

188.

 

संघ के खिलाफ संगठित हों

देश के इतिहास में डा. आंबेडकर का निर्णायक मोड़

बोस की पार्टी को इंलेपा के पूर्ण समर्थन का आश्वासन

(दि बाम्बे क्रानिकल, 21 जुलाई 1938)

 

‘संघ के मुद्दे पर देश के समस्त प्रगतिशील तत्वों को पार्टी मतभेदों से ऊपर उठकर अपनी सारी ताकत लगा देनी चाहिए, जिससे देश खतरे में नहीं पड़ सके। यह संकट का पल सभी से उच्चतम बलिदान की माॅंग करता है।’यह विचार बम्बई की इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के नेता डा. बी. आर. आंबेडकर ने संघ के वर्तमान विवाद पर अपनी पार्टी के दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए ‘यूनाइटेड प्रेस’ को दिए गए वक्तव्य में व्यक्त किए हैं।

 

काॅंग्रेस और संघ

 

डा. आंबेडकर ने आगे कहा, ‘वर्तमान समय में अगर इस देश में राष्ट्रीय महत्व का कोई राजनीतिक विषय है, तो वह भारत सरकार के अधिनियम 1935 में सन्निहित संघीय योजना को स्वीकार करने या अस्वीकार करने की है। ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि शीघ्र से शीघ्र इस संघ को लागू करने के लिए हर तरह से दबाव बना रहे हैं। स्पष्ट रूप से पूरा देश भारत सरकार के उस अधिनियम का विरोध कर रहा है, जो संघीय योजना से सम्बन्धित है। हालाॅंकि, विपक्ष में विभिन्न मत हैं और काॅंग्रेस पार्टी में भी, जो संघीय योजना को खारिज करने के प्रति वचनबद्ध है, ऐसा प्रतीत होता है कि उसे स्वीकार करने या न करने के बारे में मत-विभाजन हो गया है। इस बात पर विश्वास करने के कई कारण हैं कि इस सबके बावजूद अधिकाॅंश पुराने नेता अपने विरोध में उतने असंगत नहीं हैं, जितने इस विषय पर काॅंग्रेस के मंच से पारित शाब्दिक प्रस्ताव हैं,जिसे कुछ लोगों को मानना पड़ सकता है और उनमें से कुछ सकारात्मक रूप से संघ की स्थापना का स्वागत भी कर सकते हैं।़

‘आगे, इस तरह के मामलों में पिछले अनुभवों की बिना पर यह डर ठीक ही ध्यान में आ सकता है कि पुराने नेता आखिरकार युवा नेताओं के विरोध को शान्त करने में सफल होंगे, या तो इसके महत्व को स्वीकार करने के आधार पर या उसे नष्ट करने के आधार पर। यह बात पर विश्वास करने के लिए परिस्थितिक प्रमाण भी है कि सभी छल के बावजूद हाल ही में भारत और इंग्लैण्ड में गुप्त वार्ताएॅं हुई हैं। इसलिए बस यही सम्भावना है कि इन वार्ताओं के परिणामस्वरूप संविधान में कुछ परिवर्तन की प्रक्रिया होगी और उसके बाद उसे स्वीकार करने के योग्य घोषित कर दिया जायेगा।’

 

एक मोड़

 

इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की नीति का उल्लेख करते हुए डा. आंबेडकर ने कहा, ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी अनुभव करती है कि यह राष्ट्र के जीवन में एक मोड़ है और इस देश की प्रत्येक पार्टी का यह कर्तव्य है कि वह इस विषय पर पार्टी के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि देश के दृष्टिकोण से विचार करे। भारत सरकार के अधिनियम में संघीय योजना की प्रतिक्रियात्मक प्रकृति अनेक हलकों में ठीक से और पूरी तरह महसूस नहीं की गई है। बहुत से भारतीय राजनेता नए संविधान के साथ महज इसलिए असन्तुष्ट प्रतीत होते हैं, क्योंकि यह स्व-शासन की सम्पूर्ण शक्तियों को रोकता है। इसके खतरे उनको पर्याप्त रूप से महसूस नहीं हुए हैं। और इन नेताओं के मामले में संविधान के काम न करने का खतरा केवल एक झाॅंसे के रूप में माना जा सकता है। मैं इस बात से डरा हुआ हूॅं कि उस मामले के लिए काॅंग्रेसजनों का बहुमत, या नेताओं का बहुमत, इसी श्रेणी का है।

‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी पूर्ण राष्ट्रवाद के विकास के लिए देश की स्वतन्त्रता को दूर करने का काम अपने लाभ की खातिर कभी नहीं करेगी। विकास की प्रक्रिया में, संघ अनिवार्य हो सकता है, परन्तु निश्चित रूप से यह वह संघ नहीं है, जिसकी परिकल्पना नए संविधान में की गई है।’

 

संघ में दोष

 

संघ के विरुद्ध अपनी पार्टी के द्वारा की गई आलोचना के आधार का उल्लेख करते हुए डा. आंबेडकर ने कहा, ‘आलोचना के दो आधार हैं- (1) अपूर्णता और (2) अन्तर्निहित दोष। पहले में राज्यों को दिया गया प्रमुख प्रतिनिधित्च, नामाॅंकन के माध्यम से राज्यों का प्रतिनिधित्च, ब्रिटिश भारत और राज्यों के बीच वित्तीय भार का असमान वितरण, संघीय असेम्बली का अप्रत्यक्ष चुनाव और गवर्नर-जनरल की विशेष जिम्मेदारियाॅं शामिल हैं। दूसरे में इनत तीन चीजों का उल्लेख किया जा सकता है- (1) एक आरक्षित विषय के रूप में सर्वोच्चता को मानना, (2) सेना पर पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त करने की असम्भावना, और (3) वित्त पर पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त करने की असम्भावना। हालाॅंकि ये अपूर्णताएॅं गम्भीर हैं, पर समय के दौरान खत्म हो सकती हैं, या हटाईं जा सकती हैं या कम हो सकती हैं। किन्तु अन्तर्निहित दोषों के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। ये दोष तब तक नहीं हटाए जा सकते, जब तक कि सम्पूर्ण संघीय संविधान ही न हटाया जाए। किसी को भी संविधान के साथ झगड़ा नहीं चाहिए, क्योंकि इसमें कुछ अपूर्णताएॅं हैं। ये अपूर्णताएॅं परस्पर समझ से काम करके दूर की जा सकती हैं और अनुभव बताता है कि यह असम्भव नहीं है। अगर वे ऐसी हैं कि परस्पर समझ से भी काम करके दूर नहीं की जा सकतीं, तो उन्हें पुनरीक्षण का समय आने पर अच्छा बनाया जा सकता है। लेकिन मामला तब बिल्कुल भिन्न हो जाता है, जब संविधान दोषपूर्ण सिद्धान्तों पर आधारित होता है, और उनमें बदलाव की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसलिए संघीय संविधान अपनी अवधारणा और अपने आधार में गलत है।’

 

घातक जहर

 

अन्त में डा. आंबेडकर ने कहा, ‘भारत सरकार के अधिनियम में संघीय योजना की प्रस्तुति इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की दृष्टि में हर सम्भव तरीके से विरोध करने योग्य है। अतः नए संविधान के संघीय भाग को एक घातक जहर के रूप में छोड़ देना चाहिए। यदि काॅंग्रेस पूर्ण बहुमत से नए संविधान से लड़ने का निर्णय लेती है, तो उसे इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का पूरा समर्थन मिलेगा। किन्तु यदि काॅंग्रेस में बहुमत प्रतिक्रियावादी तत्वों से प्रभावित हो जाता है, और मि. सुभाष चन्द्र बोस अपनी बन्दूकें उठाने का निश्चय करते हैं, तो इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी उनकी पार्टी से हाथ मिला लेगी। हमारी पार्टी हर उस पार्टी या पार्टियों के गठबन्धन के साथ सहयोग करेगी, जो हर सम्भव तरीके से नए संविधान के संघीय भाग से लड़ने का आश्वासन देगा।’

(यूनाइटेड प्रेस)

 

 

 

189.

दो बम्बई बिल गिरे

खोती बिल और बम्बई आनुवंशिक सेवा अधिनियम

(दि बाम्बे क्रानिकल, 2 अगस्त 1938)

 

डा. बी. आर. आंबेडकर को बम्बई विधानसभा के सचिव ने निम्नलिखित पत्र दिया है, जो उनके खोती प्रथा उन्मूलन बिल तथा बम्बई आनुवंशिक सेवा अधिनियम 1874 (3) संशोधन बिल के सम्बन्ध में है-

मुझे माननीय सभापति के द्वारा बम्बई विधानसभा के स्थायी आदेशों के स्थायी आदेश 14 (8) के प्रति आपका ध्यान आकर्षित करने का निर्देश दिया गया है, निम्नलिखित है-

‘यदि बिल का प्रभारी सदस्य मुकम्मल दो सत्रों के दौरान कोई उल्लेख नहीं करता है, तो बिल तब तक समाप्त हो जायेगा, जब तक कि विधानसभा अगले सत्र में उस सदस्य के प्रस्ताव पर बिल को बनाए रखने के लिए विशेष आदेश नहीं देता है।’

चूॅंकि विधानसभा के पिछले दोनों पूर्ण सत्रों में उपर्युक्त बिलों के सम्बन्ध में कोई प्रस्ताव नहीं किया गया था, इसलिए कथित स्थायी नियमों के प्राविधानों के अनुसार ये बिल समाप्त हो गए हैं, और इसके परिणामस्वरूप अगले सत्र के लिए भी ये बिल एजेण्डे में नहीं रखे जायेंगे।

हालाॅंकि अगले सत्र में आपके द्वारा किए गए प्रस्ताव पर अगर विधानसभा बिलों की निरन्तरता बनाए रखने के लिए विशेष आदेश देती है, तो बिलों को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसलिए यदि आप बिलों पर आगे कार्यवाही चाहते हैं, तो आपको बिलों का नया नोटिस देना होगा या बिलों की निरन्तरता कायम रखने के लिए प्रस्ताव का नोटिस देना होगा।’

 

 

190

 

काॅंग्रेस मन्त्रिमण्डल में हरिजन

बम्बई मन्त्रिमण्डल में आंबेडकर की सम्भावना

(दि बाम्बे क्रानिकल, 8 अक्टूबर 1938)

(हमारे संवाददाता द्वारा)

अहमदाबाद, 7 अक्टूबर।

 

कुछ हलकों में खबर है कि काॅंग्रेस आला कमान ने उत्तर-पश्चिम सीमान्त प्रान्त को छोड़कर सभी प्रान्तों के प्रधानमन्त्रियों को अपने मन्त्रिमण्डल में एक योग्य हरिजन सदस्य को शामिल करने के निर्देश जारी किए हैं। कहा जाता है कि गाॅंधी जी योग्यता के आधार पर ऐसे सदस्यों को शामिल के सिद्धान्त से सहमत हैं। यह माना जाता है कि हाल ही में दिल्ली में इस विषय पर अनौपचारिक चर्चा हुई थी और गाॅंधी जी ने शेरगाॅंव में हरिजनों के सत्याग्रह को देखतें हुए कहा था कि इस समस्या को योग्यता के आधार पर गम्भीरता से निपटाना चाहिए। आशा की जाती है कि डा. आंबेडकर को बम्बई के मन्त्रिमण्डल में और करन सिंह काने को यू.पी. मन्त्रिमण्डल में शामिल कर लिया जायेगा।

 

191.

 

आंबेडकर का विस्फोट

जिन्नाह से काॅंग्रेस विरोधी मोर्चे में आने को कहा

(दि बाम्बे क्रानिकल, 22 अक्टूबर 1938)

(हमारे संवाददाता द्वारा)

अहमदाबाद, 22 अक्टूबर।

 

‘मुझे नहीं लगता कि बम्बई के काॅंग्रेस मन्त्रिमण्डल ने व्यापार और किराएदार बिलों को प्रस्तुत करने के बाद उसमें  कोई प्रगति हुई है। काॅंग्रेस के साथ हमारे सालों से मौलिक मतभेद हैं। हम प्रान्त में पदों के लिए नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि हम अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।’

ये विचार आज सुबह डा. आंबेडकर ने प्रेस के साथ एक वार्ता में कहे।

उन्होंने आगे कहा, ‘यदि मैं आज काॅंग्रेस से हाथ मिला लेता हूॅं, तो मैं वह हासिल कर सकता हूॅं, जो मुझे पसन्द है। किन्तु हमारा मामला पूरी तरह भिन्न है। मुझे इस बात की भी परवाह नहीं है कि मेरे काॅंग्रेस में जाने से मेरा सम्पूर्ण समुदाय मुझसे अलग हो जाता है। लेकिन मैं अपने सिद्धान्तों पर अडिग रहूॅंगा और उसके लिए अकेले ही लड़ता रहूॅंगा।’

मि. जिन्ना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, ‘मि. जिन्ना मुसलमानों को गलत रास्ते पर ले जा रहे हैं। मैं नहीं जानता कि काॅंग्रेस के साथ उनके क्या मतभेद हैं। यदि मुस्लिम लीग वास्तव में अल्पसंख्यकों का हित चाहती है, तो मैं उन दलों के साथ हाथ मिलाने के लिए उनका स्वागत करता हूॅं, जो काॅंग्रेस से अलग हैं और जो काॅंग्रेस के विरुद्ध उन सभी दलों का एक संयुक्त मोर्चा बनाते हैं। लेकिन मेरी नजर में मुस्लिम लीग सिर्फ मन्त्री पद पाने के मकसद से चुनावों के लिए लड़ रही है।

‘मि. जिन्ना एक ओर काॅंग्रेस से लड़ रहे हैं, जबकि दूसरी ओर, वह काॅंग्रेस के साथ समझौता करने के भी इच्छुक हैं, जो पूरी तरह अर्थहीन है। उनसे मेरी अपील है कि वह पूना पैक्ट से सबक सीखें।’

 

192

 

बम्बई सरकार और हरिजन

(दि बाम्बे क्रानिकल, 31 अक्टूबर 1938)

 

‘डा. आंबेडकर के इस आरोप का कि बम्बई सरकार ने हरिजनों के लिए कुछ नहीं किया, अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ के महासचिव ए. वी. ठक्कर ने जवाब देते हुए ठीक ही इस आरोप को निराधार बताया है और सरकार द्वारा हरिजनों के लिए किए गए कार्यों का वर्णन किया है- ‘हरिजनों के लिए छात्रावास और कालेजों तथा माध्यमिक स्कूलों में आदिवासी की फीस में छूट दी गई है; पिछड़े वर्ग के पात्र विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति की घोषणा की गई है; मन्दिर प्रवेश बिल पास कराया गया है; उनके लिए सार्वजनिक कुॅंएॅं खोले जा रहे हैं; और अन्त में हरिजन वर्ग के लिए मद्यनिषेध योजना बहुत अच्छा काम कर रही है। इस सम्पूर्ण कार्य के बारे में डा. आंबेडकर जो चाहे कह सकते हैं, पर उस समुदाय का विशाल हिस्सा, जिसका वे प्रतिनिधत्व करते हैं, इन कार्यों का अत्यन्त प्रशंसक है। इस आरोप के सम्बन्ध में कि सरकार में कोई हरिजन मन्त्री नहीं है, मि. ठक्कर दृढ़ता से बताते हैं कि सिर्फ इसी वजह से डा. आंबेडकर और उनके साथी बम्बई विधानसभा मे हमेशा सरकार के विरोध में रहते हैं। असम में काॅंग्रेस मन्त्रिमण्डल में दो हरिजन मन्त्री हैं, एक मद्रास में है और एक बिहार में है, और जैसे ही कोई योग्य हरिजन काॅंग्रेसी मिल जायेगा, शीघ्र ही बम्बई में भी हरिजन मन्त्री हो जायेगा।

 

पिछली कड़ियाँ —

 

28.डॉ.आंबेडकर का ग्रंथ रूढ़िवादी हिंदुओं में सनसनी फैलाएगा- सीआईडी रिपोर्ट

27ब्राह्मणों तक सीमित नहीं है ब्राह्मणवाद, हालाॅंकि वह इसका जनक है-डॉ.आंबेडकर

26. धर्मांतरण का आंदोलन ख़त्म नहीं होगा- डॉ.आंबेडकर

25. संविधान का पालन न करने पर ही गवर्नर दोषी- डॉ.आंबेडकर

24. ‘500 हरिजनों ने सिख धर्म अपनाया’

23. धर्म बदलने से दलितों को मिली सुविधाएँ ख़त्म नहीं होतीं-डॉ.आंबेडकर

22. डॉ.आंबेडकर ने स्त्रियों से कहा- पहले शर्मनाक पेशा छोड़ो, फिर हमारे साथ आओ !

21. मेरी शिकायत है कि गाँधी तानाशाह क्यों नहीं हैं, भारत को चाहिए कमाल पाशा-डॉ.आंबेडकर

20. डॉ.आंबेडकर ने राजनीति और हिंदू धर्म छोड़ने का मन बनाया !

19. सवर्ण हिंदुओं से चुनाव जीत सकते दलित, तो पूना पैक्ट की ज़रूरत न पड़ती-डॉ.आंबेडकर

18.जोतदार को ज़मीन से बेदख़ल करना अन्याय है- डॉ.आंबेडकर

17. मंदिर प्रवेश छोड़, राजनीति में ऊर्जा लगाएँ दलित -डॉ.आंबेडकर

16अछूतों से घृणा करने वाले सवर्ण नेताओं पर भरोसा न करें- डॉ.आंबेडकर

15न्यायपालिका को ‘ब्राह्मण न्यायपालिक’ कहने पर डॉ.आंबेडकर की निंदा !

14. मन्दिर प्रवेश पर्याप्त नहीं, जाति का उन्मूलन ज़रूरी-डॉ.आंबेडकर

13. गाँधी जी से मिलकर आश्चर्य हुआ कि हममें बहुत ज़्यादा समानता है- डॉ.आंबेडकर

 12.‘पृथक निर्वाचन मंडल’ पर गाँधीजी का अनशन और डॉ.आंबेडकर के तर्क

11. हम अंतरजातीय भोज नहीं, सरकारी नौकरियाँ चाहते हैं-डॉ.आंबेडकर

10.पृथक निर्वाचन मंडल की माँग पर डॉक्टर अांबेडकर का स्वागत और विरोध!

9. डॉ.आंबेडकर ने मुसलमानों से हाथ मिलाया!

8. जब अछूतों ने कहा- हमें आंबेडकर नहीं, गाँधी पर भरोसा!

7. दलित वर्ग का प्रतिनिधि कौन- गाँधी या अांबेडकर?

6. दलित वर्गों के लिए सांविधानिक संरक्षण ज़रूरी-डॉ.अांबेडकर

5. अंधविश्वासों के ख़िलाफ़ प्रभावी क़ानून ज़रूरी- डॉ.आंबेडकर

4. ईश्वर सवर्ण हिन्दुओं को मेरे दुख को समझने की शक्ति और सद्बुद्धि दे !

3 .डॉ.आंबेडकर ने मनुस्मृति जलाई तो भड़का रूढ़िवादी प्रेस !

2. डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी

1. डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी

 



कँवल भारती : महत्‍वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक चिंतक, पत्रकारिता से लेखन की शुरुआत। दलित विषयों पर तीखी टिप्‍पणियों के लिए विख्‍यात। कई पुस्‍तकें प्रकाशित। चर्चित स्तंभकार। मीडिया विजिल के सलाहकार मंडल के सदस्य।