Home दस्तावेज़ महात्मा गांधी: ‘‘जख्मों पर मरहम रखता एक बूढ़ा आदमी’’

महात्मा गांधी: ‘‘जख्मों पर मरहम रखता एक बूढ़ा आदमी’’

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यह एक बहुत ही लंबा आर्टिकल है. इसे तैयार करने में मुझे छह महीने से ज्यादा का वक्त लगा था. यहां आपको वह महात्मा मिलेगा, जो अपौरुषेय है. कैसे गांधी ने दंगा पीडि़त नोआखाली में मुसलमानों के हाथों मंदिर में देव प्रतिमाएं लगवाईं. कैसे बिहार में दंगों में शामिल कांग्रेसियों से खुद को पुलिस के हवाले करने को कहा. और बाकी नेता जब सिर्फ राम भजते हैं तब वह किस तरह जलती हुई बस्तियों में अकेले ही नंगे पांव घूमता रहा. कैसे उसने भारत की आत्मा की तरफ बढ़ रही नाथूराम गोडसे की तीन गोलियों को अपनी छाती पर झेलकर भारत को हमेशा के लिए बरबाद होने से बचा लिया. साथ ही गांधी के आखिरी उपवास के एक-एक दिन का ब्योरा भी है. तो आइए वैष्णवजन इसे पढ़ते हैं:


अंग्रेजों का जाना तय था. आजादी भारत के दरवाजे पर दस्तक दे रही थी. लेकिन आजादी के दीवाने हिंदुस्तानी, अब हिंदुस्तानी कहां रह गए थे. वे तो मजहब की निर्मम तलवार से काट दिए गए थे. हिंदू कुछ और ज्यादा हिंदू हो गए थे और मुसलमान कुछ और ज्यादा मुसलमान. सदियों पुरानी हिंदू-मुस्लिम एकता की भव्य इमारत को अंग्रेजी तंत्र का दीमक चाट चुका था. जिन्ना पाकिस्तान बनाने की उतावली में पागलपन की हद तक पहुंच गए थे. 15 अगस्त, 1946 को उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ ‘‘डायरेक्ट एक्शन’’ (सीधी कार्रवाई) का फरमान जारी कर दिया. हिंदू महासभा भी ‘‘निग्रह-मोर्चा’’ बनाकर प्रतिरोध की तैयारियों में जुट गई. गृहयुद्ध की सारी परिस्थितियां सामने थी. हिंदुस्तान की धड़कनों को पहचानने वाले महात्मा गांधी आने वाले समय की भयंकरता समझ रहे थे. बापू ने आखिरी वाइसराय माउंट बेटन से अपनी दूसरी मुलाकात में साफ-साफ कह दिया, ‘‘अंग्रेजी तंत्र की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति ने वह स्थिति बना दी है, जब सिर्फ यही विकल्प बचे हैं कि या तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अंग्रेजी राज ही चलता रहे या फिर भारत रक्त स्नान करे. अवश्य ही, भारत रक्त-स्नान का सामना करने को तैयार है.’’

‘‘जल उठा नोआखाली’’ (अगस्त 1946 से मार्च 1947 तक)

गांधी जिस रक्त स्नान की बात कर रहे थे, पूर्वी बंगाल का नोआखाली जिला उसका पहला शिकार बना. जिन्ना के जिन्ना के ‘‘डायरेक्ट एक्शन’’ प्लान को संयुक्त बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री शहीद सोहरावर्दी ने अमली जामा पहनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. मुस्लिम बहुल इस जिले में हिंदुओं का व्यापक कत्लेआम हुआ. पंद्रह दिन तक तो बाकी दुनिया को इस नरसंहार की कानोकान खबर तक नहीं पहुंची. इसे नियति की विडंबना ही कहेंगे कि जिन मुसलमानों ने यह बर्बर कृत्य किया, दरअसल नोआखाली के वे गरीब, अशिक्षित, बहकाए हुए मुसलमान मुश्किल से पचास वर्ष पूर्व के धर्म-परिवर्तित हिंदू थे.

नोआखाली नरसंहार ने समूचे हिंदुस्तान को स्तब्ध कर दिया. हिंदू-मुस्लिम एकता के गांधी के प्रयासों को यह एक बहुत बड़ा धक्का था. बापू के लिए परीक्षा की असली घड़ी आ गई थी. उन्होंने तुरंत दिल्ली से नोआखाली जाने का निर्णय लिया. कई लोगों ने आशंका व्यक्त की कि हथियार बंद, उन्मादी गुंडों के सामने नोआखाली जाना बेकार है. अक्तूबर के आखिर में दिल्ली से कूच करते वक्त बापू ने इन चिंतित लोगों से कहा, ‘‘मेरी अहिंसा लूले-लंगड़े की असहाय अहिंसा नहीं है. मेरी जीवंत अहिंसा की यह अग्निपरीक्षा है. अगर हुआ तो मर जाऊंगा, लेकिन वापस नहीं लौटूंगा.’’

अनोखा राहत कार्यः महात्मा जी ने नोआखाली पहुंचकर अकेले ही पीड़ित गांवों का पैदल भ्रमण करना शुरू कर दिया. इस यात्रा के दौरान उन्होंने चप्पल पहनना भी छोड़ दिया. उन्हें लगता था कि नोआखाली एक श्मशान भूमि है, जहां हजारों आदमियों की मजार बनी है. ऐसी मजार पर चप्पल पहनकर चलना उन मृत आत्माओं का अपमान करना है. वे जिस गांव में जाते वहां किसी मुसलमान के घर में ही ठहरते. गांव का दौरा करते तो मुस्लिम व्यक्तियों को साथ लेते और उनसे बेघर-बार हिंदुओं को सांत्वना देने और सहायता करने को कहते. जब भयभीत हिंदू सैनिक सुरक्षा की मांग करते तो बापू समझाते कि उन्हें बहादुरी से काम लेना चाहिए क्योंकि दुनिया की कितनी भी बड़ी सेना कायरों की रक्षा नहीं कर सकती. उलटे, सेना की उपस्थिति भय और अविश्वास को और गहरा बना देती है.

उन्होंने गांव-गांव में हिंदू-मुस्लिम ग्राम रक्षा समितियां बनाईं. समितियां भी ऐसी जिनके हिंदू प्रतिनिधि का चुनाव मुसलमान करते और मुस्लिम प्रतिनिधि को हिंदू चुनते थे. इन्हीं प्रतिनिधियों पर अमन-चैन कायम रखने की जिम्मेदारी रहती. इन असैनिक समितियों का मुसलमानों के हृदय पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा. यहां भटियारपुर गांव का घटनाक्रम बहुत प्रासंगिक है. जहां एक मंदिर को तहस-नहस कर डाला गया था. गांधी के प्रभाव में मुस्लिम युवकों ने स्वयं उस मंदिर का पुनर्निर्माण किया और बापू ने अपने हाथों से वहां देव प्रतिमा स्थापित की. धीरे-धीरे तनाव कम हो रहा था. अब गांधी की चिंता हिंदू स्त्रियों को लेकर थी. तमाम शारीरिक और मानसिक अत्याचार झेल चुकी इन स्त्रियों को उनके ही परिवार वाले पुनः स्वीकार करने को तैयार नहीं थे. गांधी जी ने हिंदुओं को समझाया कि इन स्त्रियों की घर वापसी शर्मिंदगी नहीं बल्कि गौरव करने योग्य बात होगी.

कई हिंदू परिवार अपनी करनी पर लज्जित हुए और स्त्रियों को सम्मानपूर्वक अपने घरों में वापस ले आए. धीरे-धीरे तनाव में कमी आती जा रही थी. बापू अब बिहार जाना चाहते थे जहां कौमी दंगे बहुत उग्र रूप ले चुके थे. लेकिन वे यह भी सुनिश्चित कर लेना चाहते थे कि नोआखाली फिर से सुलग न उठे. गांधी जी की दुविधा देखते हुए नोआखाली के पुलिस अधीक्षक श्री अब्दुल्ला ने वादा किया ‘‘आपके रहते दंगे नहीं होंगे.’’ बापू ने कहा, ‘‘तब ठीक है, अगर अब दंगे हुए तो गांधी तुम्हारे दरवाजे पर मर जाएगा.’’ अब्दुल्ला गांधी जी का मनतव्य समझ गए और कहा, ‘‘मेरे जीते जी दंगे नहीं होंगे.’’ गांधी जी अब संतुष्ट थे. पांच महीने नोआखाली में रहने के बाद वे बिहार के लिए रवाना हो गए.

बिहार की कौमी आग (5 मार्च, 1947 से 48 तक)

5 मार्च, 1947 को गांधी जी बिहार पहुंच गए. वहीं बिहार जहां 1916 में उन्होंने चंपारण में आंदोलन शुरू किया था. यही तो वह भूमि थी जिसने मोहनदास गांधी को महात्मा गांधी बनाया था. आज उसी बिहार को नोआखाली और कलकत्ता में अपने हिंदू परिजनों की हत्या ने उकसा दिया था. समाचार पत्र आग में घी की तरह काम कर रहे थे. ‘‘नोआखाली और बंगाल का हत्याकांड देश के पुरुषत्व पर लांछन है.’’ ऐसा समाचार पत्रों का सार था. यही नहीं जब हिंदुओं ने बंगाल में मारे गए लोगों के शोक में दीपावली न मनाने का फैसला किया तो छपरा शहर में मुस्लिम लीग के एक नेता ने मस्जिद वक्तव्य दिया, ‘‘हिंदुओं के घरों में मातम मनाया जा रहा है इसलिए इस मुसलमानों को जश्न मनाना चाहिए.’’ यह जले पर नमक छिड़कना था. फिर क्या था, बिहारी हिंदू के सब्र का बांध टूट गया. पटना, छपरा, मोधीर, भागलपुर, संथाल परगना और गया जिले कौमी दंगों से दहल उठे. लेकिन इस बात की दाद देनी होगी कि बिहारी हिंदू अपने दुख और आक्रोश में भी गांधी की अदब करना नहीं भूला था. 6 नवंबर को नोआखाली में गांधी की इस घोषणा के बाद कि जब तक बिहार का पालगपन बंद नहीं होता, वे हर रोज आधे दिन का उपवास रखेंगे, बिहार की हिंसा में एकदम से कमी आ गई थी.

बिहार की हिंसा पर तो गांधी के नोआखाली वाले उपवास ने ही काफी हद तक नियंत्रण कर लिया था, अब असल काम था उजड़े हुए घरों को फिर से बसाना. बिहारियों की गांधी पर अटूट श्रद्धा थी इसीलिए यहां का राहत कार्य नोआखाली से अलग था. नोआखाली में गांधी बहुत चौकन्ने और शांत थे पर यहां उन्होंने अपने कांग्रेसी साथियों को फटकार लगाई और यहां तक कह दिया, ‘‘कांग्रेसी सत्ता पाकर सुस्त हो गए हैं, उनकी अहिंसा एशोआराम में डूबी जा रही है.’’ जब राजेंद्र बाबू ने बापू का ध्यान इस ओर दिलाया कि मुस्लिम लीग ने अलीगढ़ से गुंडे और हथियार मंगाए हैं, जिससे कांग्रेस को शांति स्थापना में दिक्कत हो रही है, तो गांधी जी ने कहा, ‘‘सच्चे पश्चाताप में बचाव करना एकदम असंगत बात है.’’

उन्होंने कांग्रेस से तुरंत गलती स्वीकारने और जांच आयोग बैठाने को कहा. जिन कांग्रेसियों ने दंगों में हिस्सा लिया था, उन्हें पुलिस के सामने आत्मसपर्पण करने का आदेश दिया. उन्होंने शरणार्थी मुसलमानों से नोआखाली के हिंदुओं की ही तरह बहादुरीपूर्वक अपने घरों को लौट जाने को कहा. मुसलमानों से अपील की कि वे नोआखाली जाकर हिंदुओं का रक्षण करें, बिहार की रक्षा गांधी अपने प्राण देकर भी करेगा. उन्होंने मुसलमानों को राहत पहुंचाने के लिए चंदा इकट्ठा करना शुरू कर दिया. कांग्रेस के स्वयंसेवकों ने गांव-गांव जाकर पुनर्निर्माण का कार्य शुरू कर दिया. इसी बीच 20 मार्च 1947 को बिहार पुलिस ने हड़ताल कर दी. बापू ने जैसे-तैसे जयप्रकाश नारायण के सहयोग से हड़ताल समाप्त करवाई. विस्थापित कैंपों का दौरा वे लगातार कर रहे थे, इन कैंपों के लिए उन्होंने एक लिखित नियमावली भी तैयार कर दी. गैर-सरकारी संगठनों का तौर-तरीका कैसा होना चाहिए, लोकतंत्र में मंत्री का क्या दायित्व है, ये सब बातें उन्होंने कांग्रेस मंत्रिमंडल को विस्तार से समझाईं. उधर मुस्लिम लीग से बराबर अनुरोध करते रहे कि वह श्पाकिस्तान दिवस्य मनाकर पंजाब और बंगाल को हिंसा की आग में न धकेलें. बिहार जैसे-तैसे पटरी पर आया था कि दिल्ली से सरदार पटेल की सूचना आ गई कि दिल्ली में आपकी सख्त जरूरत है. बापू दिल्ली पहुंच गए, पर दिल्ली में ज्यादा रूक न पाए.

कलकत्ता का चमत्कारी उपवास (9 अगस्त से 9 सितंबर, 1947)

भारत की आजादी और बंटवारे का दिन 15 अगस्त करीब आता जा रहा था. गांधी महसूस कर रहे थे कि लाल किले पर होने वाले आजादी के भव्य समारोह की बजाए नोआखाली के आम आदमी को उनकी ज्यादा जरूरत है. वे नौ अगस्त को कलकत्ता पहुंच गए. कलकत्ते के मुसलमानों ने उन्हें रोक लिया, वे नोआखाली नहीं जा सके. कलकत्ते की स्थिति बहुत गंभीर थी. वहां तो जैसे 15 अगस्त, 1946 के बाद से डायरेक्ट एक्शन कभी खत्म ही नहीं हुआ. कलकत्ते की गलियों और घरों में हिंदू-मुसलमानों ने सशस्त्र मोर्चे संभाल रखे थे. गांधी जी ने कलकत्ता की गलियों का दौरा शुरू कर दिया. बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री सोहरावर्दी अब तक मुस्लिम लीग की राजनीति से दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंके गए थे. वे भी गांधी के साथ हो लिए. दोनों हैदरमेंशन की टूटी-फूटी हवेली में रहकर शांति प्रयास करते रहे. जैसे-तैसे शांति स्थापित हो गई. 15 अगस्त, 1947 को स्वाधीनता दिवस सौहार्दपूर्ण माहौल में मनाया गया. लेकिन यह शांति अस्थायी थी, ऐसा लगता है जैसे स्वाधीनता दिवस पर राष्ट्रपिता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए हिंदू और मुसलमानों ने थोड़ी गम खा ली थी.

27 अगस्त तक पंजाब और सिंध से आने वाले हिंसा के समाचारों ने कलकत्ता में भी सांप्रदायिक उफान ला दिया. ऊपर से छाई हुई नकली शांति का गुब्बारा फूट गया. घटनाक्रम किसी तूफान की गति से आगे बढ़ा. 30 अगस्त को सोहरावर्दी पर कुपित भीड़ ने हैदर-मेंशन वाले गांधी के निवास पर धावा बोल दिया. सोहरावर्दा तो वहां था नहीं, सो एक गुस्साए युवक ने अपनी लाठी गांधी पर ही भांज दी. हिंदुस्तानियों के सौभाग्य से वार खाली चला गया, बापू सुरक्षित बच गए. बापू के मुंह से बेसाख्ता निकल गया, ‘‘यह क्या हो गया? 15 अगस्त की शाम झूठी थी.’’

उनके सत्कर्मों का मूल्य समझने की ताकत हिंदू और मुसलमान दोनों खो चुके थे. अब 78 साल के बुढ़े गांधी के पास सिर्फ अपनी देह बची थी, जिसे वे दांव पर लगा सकते थे. 1 सितंबर को महात्मा ने आमरण उपवास का निर्णय कर लिया. आजाद भारत में गांधी का यह पहला उपवास था. माउंटबेल के प्रेस सलाहकार एलन कैंपबेल जॉनसन ने इस उपवास के बारे में लिखा, ‘‘गांधी के उपवास में लोगों के अंतर्मन को झकझोर देने की कैसी अद्भुत शक्ति है, इसे तो सिर्फ ‘‘गांधी उपवास्य का साक्षी ही समझ सकता है.’’ उपवास का चमत्कारी प्रभाव पड़ा. फारवर्ड ब्लॉक के नेता शरत बोस जो काफी दिनों से गांधी से नाराज थे, उपवास के दूसरे दिन दौड़े चले आए. हिंदू महासभा के प्रमुख डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने वादा किया कि कल से हिंदू महासभा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुस्लिम लीग के गार्ड शहर की गलियों में गश्त करेंगे. दोनों संप्रदायों के कट्टरपंथी गुटों ने अपने हथियार बापू के चरणों में डाल दिए और उपवास तोडऩे की प्रार्थना की. बापू ने कहा, ‘‘परिवर्तन हो रहा है, लेकिन अभी नहीं. जीने की लालसा करना ईश्वर को द्रोह होगा. अभी और दृढ़ता से शांति का काम करो.’’ उपवास का तीसरा दिन था, बापू ने मुख्यमंत्री श्री प्रफुल्ल चंद्र घोष ने कहा, ‘‘मेरी जान बचाने के लिए दबाव मत डालो. जब स्वेच्छा से, यथार्थ से दिल्ली में एक्य हो जाएगा तो ही जीना चाहूंगा, अन्यथा मृत्यु श्रेयस्कर है. बंगाल प्रचार विभाग के डायरेक्टर ने चाहा कि गांधी जी की उपवास मुद्रा का फोटो छापने से प्रचार कार्य में सहायता मिलेगी. बापू ने मना कर दिया, ‘‘लोगों की क्षणिक दया-माया के लिए मैं अपनी क्षीण मुद्रा से अपील नहीं करना चाहता हूं.’’

उपवास के चौथे दिन सोहरावर्दी, हिंदू महासभा के प्रांतपति ए.सी. चटर्जी और सरदार निरंजन सिंह तालीब ने गांधी जो को शहर में अमन-चैन बहाल होने की रिपोर्ट सौंपी और कहा कि अगर अब अशांति पैदा हुई तो वे तीन नेता स्वयं जिम्मेदार होंगे. मिशन कलकत्ता पूरा चुका था. समय भागा जा रहा ता, 30 जनवरी आने में अभी पांच महीने बाकी थे. बापू अब सरहदी प्रांत पंजाब पहुंचने को ब्याकुल थे.

बदहाल दिल्ली में आखिरी उपवास (9 सितंबर 1947 से 30 जनवरी 1948 तक)

9 सितंबर को बापू दिल्ली पहुंच गए. सरदार पटेल उन्हें लेने स्टेशन पर आए थे. पाकिस्तान की मक्कारियों, देशी राजाओं की तिकड़मों और दिल्ली में दिन पर दिन बढ़ती जा रही शरणार्थियों की तादाद से निबटने में सरदार अकेले पड़ गए थे. सरदार ने बापू को बताया कि दिल्ली सुलग रही है और सेना के जोर पर मरघट जैसी शांति थोपी गई है. पुरानी दिल्ली में मुसलमानों ने बेशुमार हथियार इकट्ठा कर लिए हैं, कई जगह हथियारों की फैक्टरियां तक पकड़ी गई हैं. लेडी हार्डिंग अस्पताल के पास सेना और कट्टरपंथियों के बीच गोलीबारी चल रही है.
गांधी समझ रहे थे कि दिल्ली की आग बुझाए बिना, भारत में कहीं भी स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकती. लेकिन दिल्ली की स्थिति कलकत्ता से अलग थी. उनके साथ दिल्ली की गलियों में घूमने को न तो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे कद्दावर नेता थे जो उग्र हिंदुओं पर पकड़ रखते हों और न ही यहां के मुसलमानों पर सोहरावर्दी का कोई प्रभाव था. कांग्रेस के नेता राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उलझनों में फंसे थे. ऊपर से लाखों की संख्या में आए शरणार्थियों ने स्थिति को और पेचीदा बना दिया था.

गांधी ने अपनी प्रार्थना सभाओं में लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की. शरणार्थी शिविरों का दौरा शुरू किया. किंग्जवे कैंप में सिंध से आए हिंदू शरणार्थी अपने परिजनों की हत्या से दुखी थे. उन्होंने ‘‘गांधी मुर्दाबाद’’ के नारे लगाए. बापू ने बमुश्किल उन्हें शांत कराया और कहा कि शरणार्थी पुरुषार्थ से काम लें, रोने-धोने या क्रोध करने से मरे हुए परिजन तो वापस आ नहीं जाएंगे, उलटे उनकी शक्ति ही घिसेगी. जामा मस्जिद में कहा कि बिना हथियार डाले मुसलमान हिंदुओं की श्रद्धा नहीं पा सकेंगे. इसी दौरान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से आए कुछ छात्रों ने बापू से निवेदन किया कि वे हिंदू शरणार्थियों की सेवा करना चाहते हैं. गांधी जी ने उन्हें समझाया कि यहां की सेवा दिखावटी होगी, असली सेवा तो तब होगी जब आप लोग पाकिस्तान जाकर वहां के हिंदुओं का कत्लेआम रुकवाएं. एक अन्य शरणार्थी शिविर में जब एक सिख ने अपनी बहू-बेटियों पर हुए नृशंस अत्याचारों की व्यथा सुनाई तो गांधी ने कहा कि तुम्हारी मर्दानगी पर धिक्कार है, तुम्हें तो अपनी स्त्रियों को बचाते हुए मर जाना चाहिए था.

14 सितंबर को दिल्ली में भारी बारिश हुई. थोड़ी ही दिनों में सर्दियां आने वाली थी. गांधी शरणार्थियों को समझाने लगे कि उन्हें सरकार का मोहताज नहीं रहना चाहिए. वे उन्हें ठंड से बचने के नुस्खे भी बताते चलते कि कैसे कंबल के ऊपर अखबार रख लेने से ठंड और ओस से बचा जा सकता है आदि.
15-20 दिन के प्रयासों से ऊपरी शांति स्थापित होने लगी परंतु दिलों के फफोले तो अब भी जल रहे थे. भारत और पाकिस्तान के बीच 55 करोड़ रु. देने का विवाद उलझता जा रहा था. जनवरी के महीने में पाकिस्तान के गुजरात शहर के रेलवे स्टेशन पर फ्रंटियर मेल से आने वाले हिंदू सिख शरणार्थियों को गाजर-मूली की तरह काट डाला गया. पाकिस्तान की ये घटनाएं कलकत्ता और दिल्ली को कभी भी जला सकती थी.

चारो तरफ फैल रही हिंसा की लपटों ने सत्य और अहिंसा के साधक गांधी को हिलाकर रख दिया. कोई नया आंदोलन वे छेड़ नहीं सकते थे, आखिर अपने ही लोगों की सरकार के खिलाफ कोई आंदोलन करे भी तो कैसे? उनकी 125 वर्ष तक जीने की अभिलाषा समाप्त हो चुकी थी. अपनी अंतरात्मा की पुकार पर 12 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी ने अंतिम आमरण उपवास की घोषणा कर दी. बापू ने कहा कि इस उपवास का अंत तभी होगा, ‘‘जब मैं संतुष्ट हो जाऊंगा कि सभी संप्रदायों के दिल अपने कर्तव्य बोध की भावना से और बिना किसी बाहरी दबाव के फिर से एक हो गए हैं. ईश्वर को अपना सर्वोच्च संचालक और साक्षी मानते हुए, मैंने महसूस किया कि अवश्य ही, मुझे यह निर्णय, बिना किसी से परामर्श लिए करना है.’’ महात्मा गांधी का यह उपवास आजाद भारत की सबसे बड़ी घटना है. इस उपवास का प्रत्येक दिन अपने आप में युगांतकारी था. कुल छह दिन चले इस उपवास ने ही वास्तव में आज के अखंड और मजबूत भारत की नींव डाली थी.

उपवास का पहला दिन हिंदू शरणार्थी गांधी जी के इस निर्णय से कुपित हो उठे. बिड़ला हाउस के बाहर सिखों की भीड़ ने नारे लगाए- ‘‘खून का बदला खून से’’ ‘‘गांधी को मर जाने दो.’’ दरअसल सिख इस उपवास को मुस्लिम तुष्टीकरण का औजार मान रहे थे.

उपवास का दूसरा दिन महात्मा जी ने अपनी प्रार्थना सभा में पाकिस्तानियों के लिए संदेश दिया, ‘‘अगर हिंदुओं का नरसंहार न रुका तो दस गांधी मिलकर भी मुसलमानं को बचा नहीं पाएंगे.’’

उपवास का तीसरा दिन भारत सरकार ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रु. देने का निर्णय किया. शरणार्थियों के कई समूहों ने आकर बापू से व्रत भंग करने की प्रार्थना की. गांधी जी की हालत बिगड़ती जा रही थी. नेहरू जी ने लाखों की जनसभा में कहा, ‘‘बापू मरे तो देश की आत्मा मर जाएगी.’’

उपवास का चौथा दिन (16 जनवरी)-मंत्रियों ने अपने बंगले शरणार्थियों के रहने के लिए खोल दिए. दिल्ली शहर की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार होने लगा. गांधी की हालत बहुत खराब हो गई, पेशाब के साथ एसीटोन आने लगा.

उपवास का पांचवां दिन (17 जनवरी)-सभी मजहबों के लोगों ने स्वेच्छा से राष्ट्रपिता के सम्मान में दिल्ली की सभी दुकानें बाजार और उद्योग धंधे बंद रखे.

उपवास का छठवां और अंतिम दिन (18 जनवरी)-दिल्ली शहर के सभी रेस्तरां, ढाबों और होटलों के कर्मचारियों ने भोजन परोसने से मना कर दिया. जब तक उनके बापू खाना नहीं खाएंगे, वे लोग किसी और को भी नहीं खिलाएंगे. सभी शरणार्थी शिविरों से शांति स्थापना के लिखित संदेश महात्मा गांधी के पास पहुंचे. इन संदेशों का सार था-‘‘अब दंगे नहीं होंगे और न ही अव्यवस्था होगी.’’

बापू को लगा कि लोगों के भीतर का पिशाच मर रहा है और कर्तव्यबोध अंगड़ाई लेने लगा है. उपवास अब तोड़ा जा सकता था. बापू ने कहा, ‘‘अगर दिल्ली संभल जाएगी तो पाकिस्तान की स्थिति भी संभल जाएगी. अगर यह आश्वासन, वादे टूटे तो दूसरा उपवास अनिवार्य हो जाएगा.’’ अंत में उन्होंने कहा, ‘‘अगर अब दिल्ली संभल जाए तो मैं पाकिस्तान जाना चाहूंगा.’’

इस महान उपवास ने लाखों जान बचा लीं. भारत को अराजकता की आंधी से निकालकर सृजन और विकास की बयार के सुपुर्द कर दिया. करोड़ों लोग संतुष्ट हुए तो कुछ खफा भी हो गए. जिस उपवास का अर्थ संपूर्ण शांति की स्थापना था उसका अर्थ कुछ लोगों ने मुस्लिमपरस्ती लगा लिया. यद्यपि, पाकिस्तान को रु. देने के निर्णय के बाद भी उपवास जारी रहा तब भी कई लोगों ने यही माना कि पाकिस्तान को धन दिलवाना ही उपवास का ध्येय था. धर्मांध लोगों का कोई धर्म नहीं होता. महात्मा गांधी की अच्छाई ही उनके लिए सबसे बड़ी बुराई साबित हुई. 30 जनवरी, 1948 को महामानव की हत्या कर दी गई. 31 जनवरी, 1948 को ‘‘हिंदुस्तान स्टैंडर्ड’’ समाचार पत्र का मुख्य पृष्ठ कोरा पड़ा था और उस पर सिर्फ इतना लिखा था, ‘‘गांधी जी अपने ही लोगों द्वारा मार दिए गए, जिनकी मुक्ति के लिए जीये. विश्व इतिहास का यह दूसरा क्रूसीफिक्शन भी एक शुक्रवार को किया गया-ठीक वही दिन जब आज से एक हजार नौ सौ पंद्रह साल पहले ईसा मसीह को मारा गया था. परमपिता, हमें माफ कर दो.’’

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