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इस्‍लामिक आतंकवाद हो या हिंदुत्‍व, सब अमेरिका की इंडोनेशियाई प्रयोगशाला का प्रोडक्‍ट है!

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रूस की अक्‍तूबर क्रांति की सौवीं सालगिरह के मौके पर नेपाल की राजधानी काठमांडो में 8 नवंबर से 10 नवंबर के बीच तीन दिन का एक अंतरराष्‍ट्रीय सेमीनार आयोजित किया गया। सेमीनार तीन देशों का संयुक्‍त आयोजन था- चीन, भारत और नेपाल। इसमें तीनों देशों के कई अहम वामपंथी विद्वानों ने आयोजन में शिरकत की। भारत की ओर से जेएनयू के प्रभात पटनायक, उत्‍सा पटनायक और सीपी चंद्रशेखर, चेन्‍नई के प्रोफेसर वेंकटेश आत्रेय और समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक व नेपाल के जानकार आनंद स्‍वरूप वर्मा इस सेमीनार में गए थे। इस सेमीनार में दिया गया आनंद स्‍वरूप वर्मा का व्‍याख्‍यान मीडियाविजिल अपने पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहा है। आनंद स्‍वरूप वर्मा मीडियाविजिल के सलाहकार मंडल के सम्‍मानित सदस्‍य हैं और तीसरी दुनिया के देशों की राजनीति को हिंदी का पाठक लंबे समय से इन्‍हीं के लिखे के माध्‍यम से जानता और समझता रहा है। भारत सहित दुनिया के अन्‍य देशों में नए सिरे से उठी दक्षिणपंथ की लहर, उभरती मज़हबी/नस्‍ली कट्टरताओं तथा वामपंथ की कमज़ोर होती धारा के परस्‍पर संबंध को समझने के लिए इस लेख को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। 



अक्तूबर क्रांति की शतवार्षिकी के अवसर पर काठमांडो (नेपाल) में आयोजित तीन देशों के अंतरराष्‍ट्रीय सम्मेलन में दिया गया पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा का भाषण

साथियो,

रूस की महान समाजवादी क्रांति न केवल रूस की जनता के लिए बल्कि पूरे विश्व समुदाय के लिए एक ऐसी महत्वपूर्ण परिघटना थी जिसने मार्क्सवाद-लेनिनवाद के वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांत को मूर्त रूप दिया और दुनिया की मेहनतकश जनता को मुक्ति का रास्ता दिखाया। इसने विभिन्न देशों में चल रहे जन आंदोलनों को एक नई ऊर्जा दी लेकिन खास कर लैटिन अमेरिका, अफ्रीका एवं अन्य औपनिवेशिक देशों की जनता को जगाने में भी इसने अहम भूमिका अदा की। इसने चीन एवं भारत समेत दुनिया के दर्जनों देशों में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। इस क्रांति ने यह भी साबित किया कि सर्वहारा एक ऐसा क्रांतिकारी वर्ग है जिसे इतिहास ने तमाम शोषित-पीड़ित जनता के संघर्षों को नेतृत्व प्रदान करने का दायित्व सौंपा है। इस प्रकार हम देखते हैं कि रूस की समाजवादी क्रांति ने पूरे विश्व समुदाय को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से काफी प्रभावित किया लेकिन दुर्भाग्य है कि इसका प्रभाव लंबे समय तक कायम नहीं रह सका। 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में सोवियत गणराज्य के विघटन के साथ ही दुनिया का इतिहास एक नए मोड़ पर पहुंच गया। आज 2017 में जब हम रूसी समाजवादी क्रांति की सौंवीं वर्षगांठ मना रहे हैं तो हमें इसकी उपलब्धियों को याद करने के साथ ही उन चुनौतियों को भी रेखांकित करना होगा जो आज हमारे सामने मौजूद हैं।

1924 में लेनिन की मृत्यु के बाद सोवियत संघ में स्तालिन युग का प्रारंभ हुआ और उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में जर्मनी का नाजीवाद और इटली का फासीवाद सामने आया। वह एक ऐसा दौर था जब समूचा विश्व एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया था। उस संघर्ष के इतिहास में विस्तार से जाए बगैर यह कहा जा सकता है कि अगर स्तालिन का कुशल नेतृत्व नहीं रहा होता तो दुनिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा फासीवाद की चपेट में आ जाता। दूसरे शब्दों में कहें तो रूसी क्रांति से उत्पन्न ऊर्जा ने ही फासीवाद को रोकने में प्रमुख भूमिका निभाई।

Anand Swaroop Verma

1950 और 1960 के दशक में अमेरिकी साम्राज्यवाद का आक्रामक स्वरूप सामने आया जब वियतनाम में अमेरिकी सेनाएं उस छोटे देश को नेस्तनाबूद करने पर आमादा थीं। वह एक ऐसा दौर था जब अमेरिकी साम्राज्यवादियों को समूचे दक्षिण पूर्व एशिया में साम्यवाद का खतरा दिखाई देने लगा था और वे इससे निपटने के तरह-तरह के उपाय कर रहे थे। अरब देशों में भी समाजवादी चेतना बहुत तेजी से विकसित हो रही थी। इन देशों में समाजवादी विचारों ने ‘इस्लामिक समाजवाद’ के अंतर्गत अपनी गतिविधियां तेज कर दी थीं। मिस्र में नासिर के नेतृत्व में 1952 में ब्रिटिश समर्थक राजतंत्र का तख्ता पलटा गया और एक स्वतंत्र अरब समाजवादी गणराज्य की स्थापना हुई। 1956 में मिस्र के बाद अरब देशों में सीरिया ने समाजवादी विचारों से प्रेरणा ली और सोवियत खेमे में शामिल हो गया। मिस्र और सीरिया ने ‘बाथ सोशलिज्म’ नाम से एक सिद्धांत दिया और इसी को आधार बनाकर 1958 में दोनों के बीच एकता कायम हुई और संयुक्त अरब गणराज्य की स्थापना हुई हालांकि अनेक कारणों से यह एकता लंबे समय तक टिकी नहीं रह सकी। इस विचारधारा से ही प्रेरित होकर अल्जीरिया के क्रांतिकारियों ने 1950 के दशक में फ्रांसीसी उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। इन्होंने एफ.एल.एन. नाम से राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा का गठन किया और फ्रांस के खिलाफ मुक्ति आंदोलन का संचालन किया। 1962 में फ्रांस को अल्जीरिया से हटना पड़ा और एफ.एल.एन. स्वतंत्र अल्जीरिया की पहली सत्ताधारी पार्टी बनी। इसके अलावा यमन, लीबिया, सोमालिया, सूडान, इराक आदि देशों में बड़ी तेजी से समाजवादी विचारों का प्रसार हुआ जो निश्चित रूप से सोवियत क्रांति और इस क्रांति से पैदा उस ऊर्जा से प्रेरित था जिसने फासीवाद को परास्त किया था। ये सारी घटनाएं अमेरिका के लिए एक चिंता का सबब थीं जो समाजवादी विचारधारा के खिलाफ पूंजीवादी विचारधारा का विश्व स्तर पर नेतृत्व कर रहा था।

मैं इस्लामिक देशों में समाजवादी विचारधारा की चर्चा इसलिए कर रहा हूं क्योंकि आज विश्व स्तर पर जिस तथाकथित इस्लामिक आतंकवाद की चर्चा जोरों पर है उसके मूल में मैं यह मानता हूं कि इसे अमेरिका ने ही पैदा किया है और प्रश्रय दिया है। इस नजरिए से अगर देखें तो यह समूचा मामला पूंजीवाद बनाम समाजवाद की लड़ाई से सीधे-सीधे जुड़ा हुआ है। यहां मैं याद दिलाना चाहूंगा कि काफी पहले जब बाथ सोशलिज्म की शुरुआत हुई थी तो उसके प्रतिपादकों ने यूरोप के उपनिवेशवाद के साथ ही अरब देशों के राजघरानों और अरब समाज में व्याप्त इस्लामिक कट्टरता को जनता का दुश्मन घोषित किया था। उनका यह भी मानना था कि मौलवियों और उलेमाओं ने समूचे समाज को पिछड़ेपन के दलदल में फंसा दिया है जिससे इसे निकालने की जरूरत है।

1955 में इंडोनेशिया के बांदुंग में एक सम्मेलन हुआ जिसमें गुट निरपेक्ष आंदोलन की स्थापना हुई। इस सम्मेलन के आयोजन में इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्णों की महत्वपूर्ण भूमिका थी और इसमें भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर, युगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो, घाना के राष्ट्रपति एन्क्रूमा आदि ने भाग लिया था। बांदुंग सम्मेलन कहने के लिए तो गुट निरपेक्ष राष्ट्रों का सम्मेलन था लेकिन इसका पूरा फोकस अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ था। अमेरिका ने महसूस किया कि उपनिवेशवाद से अभी अभी आजाद हुए एशिया और अफ्रीका के देशों का झुकाव वामपंथ की ओर हो रहा है। यही वह दौर था जब वियतनामी जनता ने फ्रांस को हराने के बाद अमेरिकी सेना के खिलाफ मोर्चा संभाल रखा था।

इसके अलावा इंडोनेशिया में कम्युनिस्टों का जबर्दस्त बोलबाला था। अमेरिका के लिए चिंतित होना स्वाभाविक था क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े इस्लामिक देश में दुनिया की सबसे बड़ी (चीन और रूस के बाद) कम्युनिस्ट पार्टी का अस्तित्व एक खतरे की घंटी थी। उस समय इंडोनेशिया की आबादी तकरीबन 11 करोड़ थी जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों और समर्थकों की संख्या लगभग तीन करोड़ थी। वहां की कम्युनिस्ट पार्टी (पीकेआई) के महासचिव ऐदित अत्यंत लोकप्रिय थे और स्थानीय चुनावों में अधिकांश सीटों पर कम्युनिस्ट पार्टी को सफलता मिली थी। राष्ट्रपति सुकर्णों के मंत्रिमंडल में भी पार्टी के कुछ सदस्य शामिल थे।

अमेरिका ने इंडोनेशिया को अपनी प्रयोगशाला के रूप में चुना। उसने वहां के कट्टरपंथी इस्लामिक तत्वों को मदद पहुंचाई और सुकर्णों के सेनाध्यक्ष जनरल सुहार्तो की मदद से एक ऐसी योजना तैयार की जिसको अमल में लाते हुए 1965-66 के दौरान तकरीबन 30 लाख कम्युनिस्टों का सफाया हुआ। ‘इंडोनेशियाई नरसंहार’ के नाम से कुख्यात इस कांड के सारे तथ्य अब सामने आ चुके हैं और पता चलता है कि किस तरह सीआइए ने दूर-दराज के गांवों में रहने वाले कम्युनिस्ट समर्थकों तक की सूची तैयार की थी जिसे उसने सुहार्तो को सौंपा और जनरल सुहार्तो ने कट्टरपंथी इस्लामिक गिरोहों की मदद से इस सफाया अभियान को अंजाम दिया। 8 जून 1966 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जानसन को भेजे गए एक पत्र में राष्ट्रपति के विशेष सहयोगी वाल्ट ने लिखा- ‘‘इंडोनेशिया में हमारी दिलचस्पी इस बात में थी कि देश को कम्युनिस्टों के नियंत्रण से मुक्त किया जाय और इस प्रकार इंडोनेशिया को कम्युनिस्ट चीन के प्रभाव में जाने से रोका जाय। चूंकि अक्तूबर 1965 से पहले राष्ट्रपति सुकर्ण की सरकार तेजी से चीन के प्रभाव में जा रही थी इसलिए अमेरिका को इसका मुकाबला करना ही था क्योंकि फिलिपींस, दक्षिण चीन सागर, वियतनाम और थाईलैंड में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के लिए खतरा पैदा होता जा रहा था।’’ कम्युनिस्टों का पूरा सफाया करने के बाद धीरे-धीरे सत्ता की बागडोर सुकर्णों के हाथ से खिसक कर सुहार्तो के हाथों में चली गई और तीस साल तक जनरल सुहार्तो का निरंकुश शासन बना रहा।

इंडोनेशिया में कट्टरपंथी तत्वों को मदद पहुंचा कर प्रगतिशील तत्वों और वामपंथियों का सफाया करने का अमेरिका का प्रयोग सफल रहा। इसके बाद उसने जगह-जगह इसी प्रयोग को दोहराया। अफगानिस्तान में वामपंथी ‘पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी’ (पीडीपी) में वहां के कम्युनिस्टों के दो गुट ‘खल्क’ (जनता) और ‘परचम’ (झंडा) शामिल थे। इस पार्टी ने निरंकुश दाऊद शाह का तख्ता पलटा था और अफगानिस्तान में एक समाजवादी गणराज्य की स्थापना की थी। अमेरिका ने वहां किस तरह कट्टरपंथी तत्वों को जुटाया, उन्हें आर्थिक मदद दी, ओसामा बिन लादेन को पैदा किया और तालिबान का गठन किया–इसे अब सभी जानते हैं। फिलीपींस में कम्युनिस्टों की ‘न्यू पीपुल्स आर्मी’ के खिलाफ मुस्लिम बहुल क्षेत्र में अबू सैयफ नामक एक आतंकवादी को अमेरिका ने खड़ा किया और उसके जरिए फिलीपींस के कम्युनिस्टों के नरसंहार की कोशिश की। समूचे अरब देश में जहां-जहां भी प्रगतिशील इस्लाम के समर्थक सत्ता में थे, उनका बहुत सुनियोजित ढंग से सफाया किया गया और कट्टरपंथी इस्लामिक तत्वों को सत्ता तक पहुंचाया गया।

दाएं से दूसरे प्रो. प्रभात पटनायक और तीसरे आनंद स्‍वरूप वर्मा व अन्‍य विद्वान

दुनिया के एकमात्र हिंदू राष्ट्र नेपाल में सबसे बड़े माओवादी आंदोलन का होना अमेरिका के लिए उसी तरह खतरनाक परिघटना थी जिस तरह दुनिया के सबसे बड़े इस्लामिक देश में दुनिया की सबसे बड़ी गैर सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी का होना। इंडोनेशिया में कम्युनिस्टों की मौजूदगी को अमेरिका ने अपने राष्ट्रीय हित के लिए खतरा बताया था और इसी प्रकार अमेरिका से हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण एशिया के अत्यंत छोटे और गरीब देश नेपाल में माओवादी आंदोलन को भी उसने अमेरिका के राष्ट्रीय हित के लिए खतरा घोषित किया। 28 फरवरी 2003 को वाशिंगटन में अमेरिका के उपसहायक विदेशमंत्री डोनाल्ड कैंप ने अपने एक भाषण में कहा- ‘‘अमेरिका नहीं चाहता कि माओवादियों का अस्तित्व बना रहे। माओवादियों से अमेरिकी हितों को खतरा है। उनके नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि वे संवैधानिक राजतंत्र को समाप्त कर पूर्ण कम्युनिस्ट व्यवस्था लागू करना चाहते हैं और ऐसी व्यवस्था खुले तौर पर अमेरिका के प्रति शत्रुतापूर्ण रुख रखती है।’’

इससे पहले 7 अप्रैल, 2002 को वाशिंगटन पोस्ट में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसकी इन पंक्तियों पर गौर करें- ‘‘सोवियत संघ और पूर्व यूरोपीय साम्यवाद के पतन के एक दशक से भी अधिक समय और माओत्से तुंग की सांस्कृतिक क्रांति के लगभग 25 वर्ष बाद माओवादी कम्युनिस्ट आंदोलन का अस्तित्व में आना एक अजीब दहला देने वाली घटना है। नेपाल में माओवादियों का न केवल अस्तित्व है बल्कि ढाई करोड़ की आबादी वाले इस पर्वतीय राष्ट्र के अधिक से अधिक हिस्से पर उनका नियंत्रण होता जा रहा है…सबसे हैरान करने वाली बात उनकी हर जगह मौजूदगी है। ऐसा लगता है जैसे आप कोई (हॉरर) मूवी देख रहे हों जिसमें किसी दानव को मार दिया गया हो और वह फिर जिंदा हो जाए…।’’ 18 जनवरी 2002 को तत्कालीन अमेरिकी विदेशमंत्री कॉलिन पॉवेल ने नेपाल की यात्रा की और किसी अमेरिकी विदेश मंत्री की यह पहली नेपाल यात्रा थी। उन्हीं दिनों तत्कालीन प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा (जो इत्तफाक से आज भी प्रधानमंत्री हैं) ने रायटर को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा कि अगर अमेरिका ने पर्याप्त हथियार नहीं दिए तो माओवादियों से निपटने में सरकार को अभी और दस साल लग जाएंगे।

अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता रिचर्ड बाउचर ने 30 अप्रैल, 2002 को कहा कि नेपाल ने माओवादी विद्रोह का मुकाबला करने के लिए हमसे जो भी मदद मांगी थी, वह हम दे रहे हैं। अमेरिका और ब्रिटेन सहित अनेक पश्चिमी देशों और भारत की सैनिक सहायता एवं अन्य साजिशों के बावजूद माओवादी आंदोलन अगर ढाई सौ साल पुराने राजतंत्र को उखाड़ फेंकने में सफल रहा तो इसकी एकमात्र वजह यह थी कि उसे व्यापक जनसमर्थन के साथ-साथ उसके पास एक जनमुक्ति सेना थी जो शाही नेपाली सेना को अधिकांश मोर्चों पर परास्त कर रही थी। इंडोनेशिया के कम्युनिस्ट नेता ऐदित ने अगर जनमुक्ति सेना के गठन को प्राथमिकता दी होती तो इतनी आसानी से अमेरिका को वहां पार्टी का सफाया करने में कामयाबी नहीं मिलती।

आज हमारे सामने भारत में भी हिंदू कट्टरवाद की चुनौती मौजूद है जिसे अमेरिका का भरपूर समर्थन प्राप्त है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जो सरकार काम कर रही है वह उस कट्टरपंथी हिंदू संगठन का प्रतिनिधित्व करती है जिसका मुख्य एजेंडा भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है। कहने के लिए भारतीय जनता पार्टी का शासन है लेकिन मूलतः सत्ता में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही है। जो लोग इसकी स्थापना के इतिहास को जानते हैं उन्हें अच्छी तरह पता है कि किस तरह मुसोलिनी के फासीवाद से प्रेरणा लेकर इस संगठन का जन्म हुआ। यह एक तरफ तो हिंदू कट्टरपंथियों को प्रश्रय देती है और दूसरी तरफ प्रकारांतर से इस्लामिक कट्टरपंथी तत्वों को भी मदद पहुंचा रही है ताकि देश के अंदर धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण हो सके। आज जब हम रूसी क्रांति की सौंवीं वर्षगांठ मना रहे हैं और चुनौतियों की चर्चा कर रहे हैं तो हमारे सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है कि किस तरह हम धार्मिक कट्टरता का मुकाबला करें। यह केवल मेरे देश भारत का मामला नहीं है बल्कि हमारे यहां जो कुछ होगा उससे समूचे दक्षिण एशिया की राजनीति प्रभावित होगी। नेपाल भी इससे अछूता नहीं रहेगा। अमेरिका आज भारत के माध्यम से नेपाल की राजनीति को संचालित कर रहा है क्योंकि 1965 के इंडोनेशिया की तरह उसे अभी भी इस बात का डर है कि अगर नेपाल में कम्युनिस्ट मजबूत स्थिति में रहेंगे तो वह चीन के ज्यादा करीब होगा जिससे विश्व राजनीति में अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती मिलेगी।

इन सारे पहलुओं पर विचार करके ही हम नई परिस्थिति में कोई रणनीति तैयार कर सकते हैं।

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