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इस अँधेरे में उम्मीद के ज़िंदा शब्द: एदुआर्दो गालेआनो

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एदुआर्दो गालेआनो के जन्‍मदिवस पर खास पेशकश

कुमार मंगलम

साल 2015 की 13 अप्रैल को एदुआर्दो गालेआनो हमारे बीच नहीं रहे। अगर वे ज़िंदा होते, तो इस 3 सितम्बर को जीवन के 78 साल पूरे करते। गालेआनो लातीनी अमरीकी देश उरुग्वे से आते थे। उन्हें लातीनी अमरीका से निकले अभी के सबसे मशहूर लेखकों में गिना जाता है।

जाहिर है, एदुआर्दो गालेआनो का परिचय इतना भर कतई नहीं है। हांलाकि, उस 13 अप्रैल को स्पेन के कुछ सबसे ज्यादा बिकने वाले दक्षिणपंथी अखबारों ने गालेआनो की चर्चा ऐसे ही सपाट तरीके से शुरू की थी। फिर उनके लिखे की पूरी लानत-मलामत की गई। वैसे, यह कोई पहली बार नहीं हुआ था। लातीनी अमरीका में 1998 में तो बाकायदा एक किताब आई थी Manual del perfecto idiota latinoamericano (मानुआल देल पेर्फेक्तो इदियोता लातीनोआमेरिकानो– लातीनी अमरीका का सबसे बड़ा बेवकूफ बनने की कुंजी)। इस किताब में गालेआनो की 1971 में आई और अब चारों तरफ पर्याप्त चर्चा बटोर चुकी किताब Las venas abiertas de América Latina (लास बेनास आबिएर्तास दे आमेरिका लातीना-लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) और इसके बहाने लातीनी अमरीकी इतिहास और आर्थिकी के उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्षों का मजाक उड़ाया गया था। वैसे, यह सिर्फ एक संयोग नहीं है कि इस किताब के तीन लेखकों में एक आल्बारो बार्गास ल्योसा थे, जिनके ‘’महान’ पिता मारियो बार्गास ल्योसा 60 के दशक में गाब्रिएल गार्सिया मार्केज़, कार्लोस फुएंतेस तथा खुलियो कोर्ताजार के साथ लातीनी अमरीका के नए और कई स्तरों पर व्यवस्था-विरोधी साहित्य के उस्ताद थे और जो आगे चलकर अपनी तमाम लेखनी को धत्ता बताते हुए नव-उदारवादी धड़े के सबसे मुखर प्रवक्ता बन गए थे!

तो आखिर क्या वजह हो सकती है कि लातीनी अमरीका से लेकर स्पेन तक व्यवस्था की हाँ में हाँ मिलाने वाले तमाम विचारों को गालेआनो खटकते रहे? फिर, इसकी भी क्या वजह हो सकती है कि उस 13 अप्रैल को और उसके बाद भी लातीनी अमरीका, स्पेन और भारत तक बदलाव के लिए लड़ने वालों को वे बड़ी शिद्दत से याद आते रहे हैं?  गालेआनो कौन थे और क्या थे यह समझना  उस लेखन से गुजरना है, जिसने सारी जलालतों, मुसीबतों और मौत की आहटों से लड़ते हुए एक बेहतर दुनिया की जिद कभी नहीं छोड़ी। इस लेखन में गालेआनो के अपने देश उरुग्वे, पूरे लातीनी अमरीका (मेक्सिको, मध्य अमरीका, कैरिबियाई द्वीप-समूह के स्पानी भाषी देश तथा दक्षिण अमरीका) और दुनिया की दूसरी जगहों पर कब्जा जमाए बैठी शोषक व्यवस्थाएं दिल दहला देने वाली स्पष्टता के साथ बेनकाब होती हैं।

लेकिन, इससे कहीं ज्यादा बेबाकी और गहराई से वो सारी उम्मीदें, ख्वाहिशें और कवायदें साथ आती हैं, जो इन तमाम जगहों पर बदलाव की जानी-अनजानी और गुमनाम आवाजें बुनती हैं। यहाँ रोंगटे खड़े कर देने वाली बारीकी गालेआनो के पत्रकारीय अनुभव से, तो हौसला देने वाली किस्सागोई उनकी एक ख़ास तरह की समाजवादी समझ और राजनीति के साथ आकार लेती है।

 

तो शुरुआत गालेआनो की शुरुआत से ही करते हैं। 3 सितम्बर, 1940 को उरूग्वे की राजधानी मोंतेवीदियो में जन्मे गालेआनो ने अपना लेखकीय और राजनीतिक सफर एक साथ, या कहें, एक दुसरे की निगाहबानी में बहुत कम उम्र में शुरू किया। 14 साल की उम्र में उनका पहला राजनीतिक कार्टून वहां के समाजवादी साप्ताहिक El Sol (एल सोल-सूर्य) में छपा था। तब वे कभी बैरा और कभी चपरासी बन सात अलग-अलग तरह के काम कर रहे थे और इन सब से मिला अनुभव अपनी राजनितिक सक्रियता से परख भी रहे थे। इस तरह रोज़ की जिन्दगी के अपने सीधे अनुभवों और उनमें टटोली जाती राजनीतिक दखल से हासिल समझ को वह एल सोल तथा बाद में Marcha (मार्चा-जुलूस) तथा Epoca (एपोका-दौर) जैसी समाजवादी रूझान वाली पत्र-पत्रिकाओं के जरिए विचार की धार भी दे रहे थे। हांलाकि, यह सब कुछ स्थानीय स्तर तक कतई सीमित नहीं नहीं था।

उस दौर में घट रही कुछ घटनाओं ने उन्हें अपनी समझ को व्यापक लातीनी अमरीकी सन्दर्भ में देखने की जरूरत का अहसास कराया। इसी का नतीजा रहा कि तब और बाद में आया उनका सारा लेखन महादेश की उथल-पुथल से इतनी गहराई से जुड़ गया कि पिछली कुछ सदियों का लातीनी अमरीका समझने के लिए गालेआनो एक अनिवार्य सन्दर्भ बन चुके हैं। वही लातीनी अमरीका, जो उत्तरी अमरीका के दक्षिण में बसा एक दूसरा महादेश भर नहीं है, जिसके इतिहास, भूगोल, राजनीति, संस्कृति और नाम तक पर संयुक्त राज्य अमरीका (जी हाँ, सिर्फ एक देश, पूरा अमरीका नहीं) का पंजा गड़ा है। वही लातीनी अमरीका, जो गालेआनो के शब्दों में उम्मीद का वह “दूसरा अमरीका” है जिसके बारे में हम कास्त्रो और चे गेवारा जैसे जलते-बुझते नामों और हालीवुडी मीडिया में गढ़ी गई छवियों से ज्यादा नहीं जानते.

इन घटनाओं में सबसे पहली घटना थी 1954 में मध्य अमरीकी देश ग्वातेमाला के राष्ट्रपति खाकोबो आर्बेंज की सत्ता से बेदखली। आर्बेंज का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने संयुक्त राज्य अमरीका (अब से आगे संयुक्त राज्य) की कंपनी यूनाइटेड फ्रूट के कब्जे से देश की जमीन का बड़ा हिस्सा छुड़ा लेने की कोशिश की थी। दरअसल, बीसवीं सदी की शुरूआत से ही इस कंपनी ने अटलांटिक महासागर के नजदीक के देशों के बड़े भूभाग पर केला उपजाने और उसका निर्यात करने का धंधा शुरू किया था। इन देशों की सरकारों ने संयुक्त राज्य के दबाव में कंपनी को इन जमीनों का मालिकाना भी दे दिया था, जहां स्थानीय मजदूर कौड़ी भर की मजदूरी पर दिन-रात खटा करते थे। किसी भी हड़ताल या विरोध का सीधा मतलब इन मजदूरों का कत्लेआम हुआ करता था। 1928 में कोलंबिया के सिएनागा में ऐसी ही एक हड़ताल में सैकड़ों मजदूरों को मार उनकी लाशें समुद्र में फ़ेंक दी गई थी (अब मिथक बन चुके गाब्रिएल गार्सिया मार्केज़ के उपन्यास ‘एकांत के सौ वर्ष’ का एक पात्र इस कत्लेआम का इकलौता गवाह बनता है। प्रेस और सरकार के झूठ तथा घर और बाहर के बाकी लोगों के अविश्वास के सदमे से पागल होकर वह एक अँधेरे कमरे में घुट-घुटकर मर जाता है)।

आर्बेंज के तख्तापलट और उनकी जगह थोपी गई संयुक्त राज्य की पिट्ठू सैन्य तानाशाही ने लातीनी अमरीका से इतिहास में एक बड़े बदलाव का मौक़ा जबरन छीन लिया था। इस घटना के गहरे असर को याद करते हुए गालेआनो कहते हैं: “मेरी पीढ़ी के लोग माथे पर ग्वातेमाला का निशान लेकर पैदा हुए थे”! आर्बेंज की जगह लाई गई कास्तिल्यो आर्मास की सैन्य तानाशाही संयुक्त राज्य की स्वामीभक्त थी, जिसने पूरा ‘समर्पण’ दिखाते हुए यूनाइटेड फ्रूट को सारी जमीनों का ‘अधिकार’ फिर से देकर उसे किसी भी तरह का कर देने से मुक्त कर दिया था। फिर, 1955 में अर्जेंटीना की ख्वान पेरोन तथा 1964 में ब्राजील की जेतुलियो बार्गास की सरकारों का वहाँ की सेना ने तख्तापलट कर दिया था। कहानी यहाँ भी लगभग ग्वातेमाला वाली ही थी। दोनों ही सरकारों ने हाल ही में शुरू हुए औद्योगीकरण से पैदा हुए मजदूरों की बड़ी संख्या को बेहतर सुविधाएं देने की कोशिश की थी। पहले से चले आ रहे विदेशी पूंजी (खासकर ब्रिटेन, जर्मनी और संयुक्त राज्य) के कुछ बड़े कारखानों पर कर लगाया गया और कुछ का राष्ट्रीयकरण भी किया गया। इस सबसे जाहिरा तौर पर नाखुश विदेशी पूंजी ने सेना को सरकार की सुपारी दे दी थी।

ग्वातेमाला, अर्जेंटीना और ब्राजील के घटनाक्रम ने गालेआनो को एक महादेश के तौर पर लातीनी अमरीका की आर्थिक स्थिति और उससे बनते-बदलते राजनीतिक निजामों से रू-ब-रू करा दिया था। इसी का नतीजा रही 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे आमेरिका लातीना- लातीनी अमरीका की खुली धमनियाँ)। जैसाकि इसके शीर्षक से जाहिर होता है, यह किताब 1492 के बाद कोलंबस के पीछे-पीछे आए स्पेनी आक्रमणकारियों से लेकर आज तक चेहरे, नाम और तरीके बदल-बदलकर लातीनी अमरीका को खोखला करती विदेशी पूंजी और उसके देशी पहरेदारों का खुलासा करती है। यह पूरा खेल कैसे चला और कितना भयावह रहा है, इसका अंदाजा किताब की शुरुआत में गालेआनो के इन शब्दों से लग जाता है:

“श्रम के अंतर्राष्ट्रीय बंटवारे में कुछ इलाके जीतने और कुछ हारने में नाम कमाते हैं। हमारे लातीनी अमरीका को शुरू से ही हारने में महारत हासिल है। हम हारते रहें हैं, ताकि दूसरे जीतते रहें” (गालेआनो 1971) ।

इसी तरह, बिल्कुल आमने-सामने बिठाकर कहे गए दादी-नानी के किस्सों की तरह कह डाली गई लास बेनास… की दास्तान ने जल्द ही खुद को पास और दूर के अनगिनत लोगों से जोड़ लिया था। उस औरत से, जो 1973 में ऊरूग्वे में आई सैन्य तानाशाही के आतंक से भागते वक्त अपनी जरुरी चीजों में यह किताब भी ले गई थी। या, उस गरीब लड़के से जिसने मुफलिसी और बंजारेपन की हालत में इस किताब को अलग-अलग लाइब्रेरियों के चक्कर काटते हुए पढ़ा था। 1996 में इसके 25 साल पूरे होने पर गालेआनो ने उन्हें हौसला देते रहने वाले ऐसे ही कुछ और वाकये साझा किए थे।
उरूग्वे में इस किताब पर प्रतिबंध के तुरंत बाद उन्हें ‘खतरनाक’ लोगों को फेहरिस्त में डाल दिया गया था (गालेआनो बताते हैं कि तानाशाही के शुरू-शुरू में यह इसलिए नहीं प्रतिबंधित हुई क्यूंकि उस निजाम के ‘विद्वानों’ ने इसे शरीर-विज्ञान पर लिखी कोई किताब समझ लिया था!)।

Las venas abiertas de América Latina (लास बेनास आबिएर्तास दे आमेरिका लातीना-लातीनी अमरीका की खुली धमनियां, 1971)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

उरूग्वे के साथ शुरू हुई सैन्य तानाशाहियों का दौर 1973 में चिली पहुंचा और 1976 में अर्जेंटीना को भी लील गया। फिर इसमें ब्राजील (1964) और बोलीविया (1964) सहित दूसरे देशों को जोड़ दें, तो उस दौरान पूरा लातीनी अमरीका तानाशाहियों के पंजे में आ चुका था।

परिस्थितियों और बहानों के थोड़े से हेर-फेर के बावजूद दो ऐसे काम थे, जो इन तानाशाहियों ने सभी जगह किए। पहला, विदेशी पूंजी के लिए सभी रास्ते खोल देना, जिसका मतलब था दो-तीन दशक पीछे शुरू हुए स्वदेशी औद्योगीकरण और संसाधनों के समान वितरण के छिटपुट प्रयासों की हत्या। फिर, उन सारे लोगों, संस्थाओं और प्रयासों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया, जो तानाशाहियों की पूंजीभक्ति पर सवाल खड़ा कर सकते थे। जाहिर है, ऐसे दौर में लास बेनास… और गालेआनो किसको सुहाते! उरूग्वे से भाग कर वह अर्जेंटीना आए, 1976 के बाद वहाँ भी यही सिलसिला दुहाराया गया। अर्जेंटीना के बाद गालेआनो ने स्पेन का रूख किया, जहां से वे 1984 में सैन्य तानाशाही खत्म होने के बाद ही अपने देश वापस आ सके।

1978 में आई उनकी किताब Dias y noches de amor y guerra (दियास नोचेस दे आमोर गेर्रा– प्रेम और युद्ध के दिन और रात) इस पूरे भयावह दौर की दास्तान है, जो जितनी गालेआनो की है उतनी ही उन तमाम लोगों की, जिनसे वह सोच और अहसास के स्तर पर जुड़ गए थे। यह उस पूरे महादेश की कहानी है, जहाँ अलग सोचने का ‘जुर्म’ करती कोशिशों और ख्वाहिशों को किसी बारूदी सुरंग की तरह बिछी हत्यारी निजामें कभी भी, कहीं भी निगल जाया करती थीं। यह उनकी भी दास्तान है, जो जहाँ भी गुंजाईश बने वहीँ उम्मीद की सनक फैला कर तानाशाहियों का पागलपन हज़म कर जाया करते थे। इस तरह, यह किताब एक ऐसा कोलाज़ है, जहाँ झकझोर देने वाले बुरे सपनों की तरह आती मौत की आहटें हैं, तो भींचकर गले लगाती प्यार की खुमारी भी है। यहाँ उस पूरे दौर का वह भयावह सच खुलता है, जब ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की लीक पीट-पीटकर सत्ता दबोचती तानाशाहियों ने सबकुछ कौड़ियों के मोल बेचना शुरु कर दिया था। यह भी कि जब विदेशी कंपनियों के लिए कारोबार और कच्चे माल का दस्तरखान सजाया जा रहा था, तभी हजारों लोगों को ‘खतरनाक’ बताकर गायब भी किया जा रहा था। गालेआनो ब्राजील की बात बताते हैं, जहाँ तानाशाही के सबसे निर्मम दौर में जिलेट जैसी कम्पनियां “ब्राजील, हमें तुम पर भरोसा है” जैसे अश्लील विज्ञापन चलवा रहीं थी। वह अर्जेंटीना में कपड़े बनाने वाली कम्पनी डीजल के उस विज्ञापन को भी सामने लाते है, जो खास तौर पर उन लोगों के लिए डिजायन किया गया लगता था, जिन्हें वहाँ की तानाशाही मार कर समुद्र में फ़ेंक दिया करती थी: “आप यह तो तय नहीं कर सकते कि आप कैसे मरेंगे, कम से कम अपनी लाश को तो सुन्दर दिखने दीजिए”!

दियास नोचेस…. में गालेआनो ख्वान खेल्मान, हारोल्दो कोंती, रोके दाल्तोन और रोदोल्फो वाल्श जैसे लेखकों को भी याद करते चलते हैं, जो आख़िरी शब्द तक तानाशाहियों के खिलाफ अड़े रहे। वह उन लोगों का किस्सा सुनाते हैं, जो हमेशा उरुग्वे से चलकर अर्जेंटीना की सीमा में आया करते और Crisis (क्रिसिस-संकट) ‘का ताज़ा अंक पढ़कर लौट जाया करते थे। क्रिसिस वह पत्रिका थी जिसे गालेआनो अर्जेंटीना में रहने के दौरान कुछ दोस्तों के साथ मिलकर चलाया करते थे। यह उनके अपने देश में प्रतिबंधित तो थी ही, 1976 के बाद इसे अर्जेंटीना में भी बंद करना पड़ा। गालेआनो ग्वातेमाला में अपना सबकुछ गंवा कर भी उम्मीद की लड़ाई लड़नेवाले मूलवासी छापामार लड़ाकों और 1959 की क्रांति के बाद क्यूबा मे तिनका-तिनका जोड़कर, एक नई और बेहतर दुनिया बनाने में जुटे अनजान लोगों की खुशी साझा करते हैं। वह ऐसे ही कई अनजाने और गुमनाम रह गए नायकों की दास्तान सुना हमें उनके रंग में रंगते हैं।

Dias y noches de amor y guerra (दियास इ नोचेस दे आमोर इ गेर्रा- प्रेम और युद्ध के दिन और रात, 1978)

दियास नोचेस….  के पन्ने इसका भी सबूत थे कि गालेआनो तानाशाहियों के दौर में घटते भयावह इतिहास को उसके तमाम राजनीतिक, आर्थिक और रोज घट रहे सांस्कृतिक पहलुओं में पकड़ पा रहे थे। क्रिसिस खासकर उस दौर की संस्कृति को सामने लाने और सहेजने का कम कर रही थी। गालेआनो के शब्दों में:

क्रिसिस  के जरिए हम यह दिखाना चाहते थे कि जनता की संस्कृति का अस्तित्व है। संस्कृति वह नहीं है, जो सत्ता में बैठे लोग बताते और दिखाते हैं। यह इससे बिल्कुल अलग वह चीज है, जिसकी अपनी एक ताकत होती है और जो हमारी सामूहिक स्मृति को अभिव्यक्त करती है[1]

जाहिर है, संस्कृति की इस समझदारी के साथ गालेआनो उन अनुभवों और कोशिशो तक भी पहुँच जाते हैं, जो ‘विशेषज्ञों’ से अक्सर छूट जाया करती हैं। ठीक ठीक कहें, तो मुख्यतः आर्थिकी पर केन्द्रित लास बेनास…. के बाद आई उनकी सभी किताबें जनता के बीच फलती-फूलती संस्कृति के ताने-बाने से गुजरकर कई अहम मुद्दों की तलाश हैं। 1976 से लेकर 1984 तक स्पेन में रहने के दौरान उनकी जो किताबें आईं, वे इसकी खूब तस्दीक करती हैं। ये किताबें थीं Memoria del fuego (मेमोरिया देल फुएगो-आग की यादें) शीर्षक के साथ आई लातीनी अमरीकी इतिहास की तीन कड़ियाँ, जो सैकड़ों साल पहले शुरु होकर 1986 तक चलती हैं। संस्कृति की ही तरह इतिहास और इतिहास-लेखन किस तरह अकादमिक बहसों और सरकारी स्थापनाओं से परे साधारण और गुमनाम लोगों के बीच, उनकी कोशिशों से पनपते और आगे बढ़ते हैं, ये किताबें इसकी बेहतरीन मिसाल हैं। जिस इतिहास की बात यहाँ हो रही है, वह ‘सभ्यता’ और सत्ता के हाशिये पर फेंक दिए गए लोगों की पीड़ा, संघर्षों और जीत का आख्यान है।

Memoria del fuego (मेमोरिया देल फुएगो-आग की यादें, 1982-86)

1986 में आई मेमोरिया देल फुएगो की अंतिम कड़ी 1900 से 1986 तक के दौर का ऐसा ही एक पुनर्पाठ है। यहाँ उस दौर की त्रासदियाँ और इन त्रासदियों से टूटती और जूझती बिल्कुल साधारण जिंदगियों के वो सारे किस्से दर्ज होते हैं, जो हम तक पहुँचने ही नहीं दिए जाते। इन किस्सों का अंदाजेबयां यूँ कि इन्हें पढ़ते समय ये बिल्कुल हमारे आस-पास घटते लगते हैं और उस पूरे दौर का लातीनी अमरीका अपने पूरे अँधेरे और उम्मीद के साथ सामने आ खड़ा होता है। गालेआनो 1903 की बात बताते हैं, जब व्यापार पर अपना दबदबा बढ़ाने के लिए संयुक्त राज्य ने अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ने के लिए पनामा नहर बनांने का अभियान शुरू किया था। तब मध्य अमरीका को दक्षिण अमरीका से जोड़ने वाला पनामा प्रांत कोलंबिया देश का हिस्सा हुआ करता था और कोलंबिया संयुक्त राज्य की शर्तों पर अपनी जमीन देने को राजी नहीं था। फिर क्या था, संयुक्त राज्य के राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट ने कोलंबिया पर हमला कर पनामा को एक ‘स्वतंत्र राष्ट्र’ घोषित किया, फिर उसी स्वतंत्र राष्ट्र पर अपनी मर्जी का राष्ट्रपति थोपकर पनामा नहर के अलावा चौदह सौ वर्ग किलोमीटर जमीन भी हड़प ली। गालेआनो बताते हैं कि इस सबको अंजाम देने के लिए हुई संधि में पनामा की ओर से हस्ताक्षर भी उसके अपने प्रतिनिधि ने नहीं, बल्कि फ्रांस के एक व्यापारी फिलिप बुनाऊ ने किए थे!

यह वह दौर था जब महाशक्ति बनने की हसरत पाले और‘अमरीकन ड्रीम’ की खुमारी पर सवार संयुक्त राज्य लातीनी अमरीका पर अपना शिकंजा और ज्यादा कस रहा था। थोड़ा पीछे जाएं, तो इसकी शुरुआत 19वीं सदी के बीच के सालों में ही हो चुकी थी। 1846 में खनिज संसाधन की भूख में संयुक्त राज्य ने पहले पश्चिम की तरफ चल रहे अपने जमीन हड़प अभियान का मुंह दक्षिण की ओर मोड़ दिया था और टेक्सास, न्यू मेक्सिको, कैलिफोर्निया (जी हाँ, वहीँ जहां आज का हॉलीवुड चमचमाता है!) सहित मेक्सिको की आधी जमीन हथिया ली थी। इसी के साथ, उस पूरे त्रासद प्रक्रिया की शुरुआत भी होती है, जहां पूरी दुनिया में सयुंक्त राज्य ने जो राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दादागिरी कायम की उसकी प्रयोगशाला सबसे पहले लातीनी अमरीका बनता रहा।

दरअसल, यह पूरा दौर वह दौर भी था जब दोनों अमरीकी महादेशों में एक ऐसी व्यवस्था कायम की जा रही थी, जो स्थानीय विविधताओं के बावजूद कुछ खास सूत्रों के स्तर पर एक थी। मसलन, आर्थिक संसाधनों के साथ-साथ राजनीतिक सत्ता पर औपनिवेशिक दौर में पनपे शासक वर्ग का कब्जा, शासन के सभी अंगों तथा तथाकथित स्वतंत्र संस्थाओं जैसे प्रेस आदि का इस वर्ग के सामने पूरा समर्पण तथा आबादी के बहुत बड़े हिस्से का भयंकर दमन, जिसमें अश्वेत, मूलवासी, स्त्रियाँ, मजदूर और उदारवादी-समाजवादी सभी शामिल थे।

गालेआनो हमारे लिए क्यूँ जरूरी हैं

व्यवस्था के जिस भयावह रूप से हिंसक इतिहास और वर्तमान की सच्चाई गालेआनो अपनी कलम से उजागर करते हैं, आज का भारत रोज ही उसके कई रूप देख रहा है। इन दिनों आदिवासियों, दलितों, मुसलमानों, औरतों तथा हाशिए पर फ़ेंक दिए गए दूसरे तबकों की लड़ाई लड़ने वाले जो मानवाधिकार-राजनीतिक कार्यकर्ता, वकील और छात्र-युवा बिना किसी सबूत के जेल में डाल दिए जा रहे हैं, दिनदहाड़े भीड़ की हिंसा का शिकार हो रहे हैं, वो व्यवस्था के इसी खूंखार चेहरे को बेनकाब कर रहे हैं, उससे लड़ रहे हैं। हमारे यहाँ पूंजीवादी-कार्पोरेटी व्यवस्था की जो लूट और हिंसा 1991 के बाद से लगातार दिख रही है और जो पिछले चार सालों में और ज्यादा खूनी ही हुई है, लातीनी अमरीका के लोग उसकी तबाही पिछले पचास सालों से झेल रहे हैं। ऐसे में इस पूरी त्रासदी के देखे-अनदेखे कई पहलू सामने लाता, इस व्यवस्था से लड़ता-भिड़ता गालेआनो का लेखन हमारी मौजूदा और आने वाली लड़ाईयों के लिए उम्मीद और हिम्मत के कई सामान जुटाता है। इस लेखन के यहाँ पेश कुछ हिस्सों में हम इन लड़ाईयों की कई शक्लें देख सकते हैं:आज की भाषा

 

इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के राज में किसी जवान लड़की के सामने अपनी पैंट दिखाना सख्त मना था। आजकल भी कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें खुले रूप में कहना और पेश करना अच्छा नहीं समझा जाता है।

पूंजीवाद को बाजार का लुभावना चेहरा और नाम दिया जाता है।

उपनिवेशवाद को ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण) कहा जाता है।

विकसित देशों का उपनिवेशवाद झेलते देशों को विकासशील कहा जाता है। यह वैसे ही है जैसे कि बौने रह गए लोगों को बच्चा कहा जाए।

सिर्फ़ अपने बारे में सोचने को अवसरवाद नहीं बल्कि व्यावहारिकता कहा जाता है। धोखेबाजी को समय का तकाजा बताया जाता है।

गरीबों को कम आय वर्ग के लोग कहा जाता है।

गैरबराबरी बढ़ाने वाली शिक्षा व्यवस्था जब गरीब बच्चों को शिक्षा से बेदखल करती है तो इसे उनका पढ़ाई-लिखाई छोड़ना बता दिया जाता है।

मजदूरों को बिना किसी कारण और मुआवजे के काम से बेदखल किये जाने को श्रम बाजार का उदारीकरण बताया जाता है।

सरकारी दस्तावेजों की भाषा औरतों के अधिकार को अल्पसंख्यक अधिकारों में गिनती है-मानो पुरुषों का आधा हिस्सा ही सबकुछ हो।

तानाशाही को अखबारों में सामान्य उठापटक की तरह पेश किया जाता है।

व्यवस्था जब लोगों को यातनाएं देती है तो इसे पुलिसिया प्रक्रिया की गलती या शारीरिक-मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश बता दिया जाता है।

जब धनी परिवार का कोई चोर पकड़ा जाता है तो इसे चोरी नहीं बल्कि एक बुरी लत बताया जाता है।

भ्रष्ट नेता जब जनता का पैसा हड़प जाते हैं तो इसे उनकी अवैध कमाई बताया जाता है।

मोटरकारों से सड़क पर बरसती मौत को दुर्घटना कहा जाता है।

नेत्रहीनों को दृष्टिहीन कहा जाता है। काले लोगों को अश्वेत कहा जाता है।

कभी भी लोगों का मार दिया जाना नहीं बताया जाता, वे तो गायब बताए जाते हैं। मरने वाले उन इंसानों को भी नहीं गिना जाता, जिनकी हत्या सेना की कार्यवार्ईयों में होती है।

युद्ध में मारे गए लोग युद्ध से हुए नुकसान में गिन लिए जाते हैं। जो आम जनता इन युद्धों का शिकार होती है, वह तो महज टाली जा सकने वाली मौतें होती है।

1995 में फ्रांस ने दक्षिणी प्रशांत महासागर में परमाणु विस्फोट किये। तब न्यूजीलैंड में फ्रांस के राजदूत ने आलोचनाओं को खारिज करते हुए कहा ‘‘मुझे यह बम शब्द अच्छा नहीं लगता, ये फटने वाले कुछ उपकरण ही तो हैं।’’

कोलंबिया में सुरक्षा के नाम पर लोगों की हत्या करने वाले सैन्य बलों का नाम ‘सहअस्तित्व’ था।

चिली की तानाशाह सरकार द्वारा चलाए गए यातना शिविरों में से एक का नाम ‘सम्मान’ था। उरुग्वे में तानाशाही की सबसे बड़ी जेल को ‘स्वतंत्रता’ का नाम दिया गया था।

मेक्सिको के चियापास क्षेत्र के आक्तेआल में प्रार्थना कर रहे 45 किसानों, ज्यादातर महिलाएं और बच्चे, की हत्या करने वाले अर्धसैन्य बल का नाम ‘शांति और न्याय’ था। उन सभी को पीठ में गोली मारी गई थी।

Patas arriba (पातास आर्रीबा- उल्टी दुनिया), 1998. अनुवाद: पी. कुमार मंगलम.

गालेआनो के लेखन की सबसे बड़ी बात यह है कि वो व्यवस्था की क्रूरता की कई परतें खोल कर रख देने के साथ-साथ एक बेहतर दुनिया के भी कई रंग बुनते हैं। इस नई दुनिया को वे लोग आबाद करते हैं जो हमेशा से ठुकराए गए हैं, इतिहास और वर्तमान से बाहर का रास्ता दिखाए गए हैं। मिसाल के लिए, औरतें ऐसी ही एक किरदार हैं और इंसानी सफ़र के इस अहम किरदार से गालेआनो अपनी सभी किताबों में बाबस्ता होते हैं। वे उनके साथ बैठते हैं, उनकी कहानियां सुनते और सुनाते हैं जो हममें से कईयों के लिए कुछ जानी तो बहुत कुछ अनजानी होती हैं। इतिहास और हमारी सामूहिक चेतना तथा याददाश्त से बाहर कर दी गईं इन औरतों को गालेआनो उनकी पूरी शख्सियत के साथ ढूंढते और हमारे सामने ला खड़ा करते हैं। यह और बात है कि कई बार मर्दों के नजरिए से मर्दों के बनाए इतिहास और समाज के दायरों को दुनिया मानते हम लोग इन औरतों की बेबाकी, उनका अपने आप को दर्ज कर जाने को समझ नहीं पाते या यूँ कहें कि बर्दाश्त नहीं कर पाते। लेकिन ये औरतें हैं कि अपनी शख्सियत के तमाम रंगों और पहलुओं के साथ जमी रहती हैं, गायब नहीं होती और हमें मर्दों की दुनिया से आगे इंसानों की दुनिया देखने को मजबूर करती हैं। एक बेहतर दुनिया की संभावना को इन औरतों में देखती गालेआनो की कुछ कहानियाँ ये रहीं:

पाँच औरतें

1978। ला पास।

सबसे बड़ा दुश्मन, कौन है? फौज की तानाशाही? बोलीबिया को अपने मुनाफे के लिए लूटने वाले पूंजीपति? हम पर दुसरे मुल्कों की गुलामी थोपने वाला साम्राज्यवाद? नहीं, साथियों। मैं आपको ये बताना चाहती हूँ। हमारा सबसे बड़ा दुश्मन डर है। यह हमारे अन्दर बैठा है।

दोमितिला ने टीन के खदान वाले काताबी (Catavi) इलाके में यह बात कही थी। उसके बाद वह चार दूसरी औरतों तथा उनके बीसेक बच्चों के साथ राजधानी ला पास (La Paz) आ गई थी। क्रिसमस के दौरान उन सबने अपनी भूख हड़ताल शुरू की थी। किसी को भी उन औरतों पर यक़ीन नहीं था। कईयों को उनकी लड़ाई एक अच्छा मज़ाक लग रही थी:

अच्छा, तो अब ये पाँच औरतें तानाशाही का तख्ता पलटने चली हैं!

पादरी लुईस एस्पिनाल उनके साथ आ खड़े होने वालों में सबसे पहले होते हैं। थोड़ी ही देर में पूरे बोलीबिया में डेढ़ हज़ार लोग भूख हड़ताल पर होते हैं। ये पाँच औरतें, जिन्हें पैदा होने के बाद से ही भूखा रहने की आदत है, पानी को मुर्गी या बड़े मुर्गे का मांस और नमक को मांस का टुकड़ा कह कर ले लेती हैं। उनकी हंसी उनकी खुराक बन जाती है। उधर भूख हड़ताल पर जाने वाले बढ़ते चले जाते हैं। तीन हज़ार, दस हज़ार और फिर बोलीबिया के वे लोग अनगिनत हो जाते हैं, जो खाना छोड़ देते हैं, सारे काम छोड़ देते हैं। भूख हड़ताल शुरू होने के तेईस दिनों बाद लोग सड़कों पर उतर चुके हैं और यह सब रोकने का अब कोई उपाय नहीं है।

उन पाँच औरतों ने फौजी तानाशाही का तख्ता पलट दिया है।

मानुएला, मानुएला और मानुएला

सारे मर्द। लेकिन वह मानुएला कान्यीसारेस (Manuela Cañizares) एक औरत थी, जो इन मर्दों को चुनती और इकट्ठा किया करती थी, ताकि वे उसके घर से वो साजिशें बुन सकें।

9 अगस्त 1809 की रात को इन मर्दों ने बहस करते-करते घंटों बिता दिए थे। हाँ, नहीं, पता नहीं, ये सोचते वे एक्वादोर (Ecuador) की आज़ादी का ऐलान कर देने का फैसला नहीं ले रहे थे। और एक बार फिर वे ये मसला किसी बेहतर मौके के भरोसे छोड़ने जा रहे थे कि मानुएला उनके सामने खड़ी हो गई तथा कायर, डरपोक, पदाईशी गुलाम कहते हुए उनपर चीख पड़ी थी। और फिर 10 अगस्त की सुबह एक नए दौर का दरवाजा खुल गया था।

एक दूसरी मानुएला, मानुएला एस्पेखो (Manuela Espejo), जो पहली मानुएला की ही तरह अमरीका की आज़ादी की अगुआ रही थी, एक्वादोर की पहली पत्रकार थी। और क्यूंकि ये काम तब बड़े घर की औरतों को शोभा नहीं देता था, अपने वे बेख़ौफ़ लेख वो छ्द्म नामों से छपवाया करती, जो उसके देश को दबाए रखने वाली गुलाम मानसिकता से भिड़ते थे।

एक और मानुएला, मानुएला साएन्स (Manuela Sáenz), आज़ादी के नायक सिमोन बोलिबार (Simón Bolívar) की प्रेमिका होकर हमेशा-हमेशा के लिए मशहूर हो गई थी। लेकिन प्रेमिका होने के साथ-साथ वह वह भी थी: वो औरत जो गुलामी थोपने वाले देश तथा मर्दों की सत्ता और इस सत्ता की महानता के सभी पाखंडों के खिलाफ मोर्चे पर रही थी।

बेस्सी (Bessie)

1927। न्यू यॉर्क।

यह औरत अपने जख्मों को अमर हो जाने वाली आवाज़ में गाया करती है और तब कोई भी उसे सुने बिना नहीं रह सकता और न ही कुछ और सोच या देख सकता है। घनी-गहरी रातों के अन्दर से होती हुई आने वाली आवाज़ है वह। बेस्सी स्मिथ: बेहद मोटी, बेहद काली, ईश्वर की बनाई कायनात को लूटने वालों को लानतें भेजा करती है। उसके गाए गीत या ब्लूज (Blues), जो वहाँ बसे अफ्रीकी-अमरीकियों की ईजाद थे, बस्तियों की काली पियक्कड़ औरतों की खुदा को सौंपी गई उम्मीद बन जाते हैं: वे यह ऐलान करते हैं कि दुनिया को अपने पैरों तले कुचलने वाले गोरे, मर्द तथा अमीर एक दिन अपनी-अपनी तख्तों से उखाड़ दिए जाने वाले हैं।

Mujeres (मुखेरेस-औरतों), 2015. अनुवाद: पी. कुमार मंगलम।

ये औरतें तथा वे सारे लोग, जो गालेआनो के शब्दों में “इतिहास के असल किरदार हैं”, एक ऐसी दुनिया कायम करने वाले हैं जहाँ:

“लोग जीने के लिए काम करेंगे, काम करने के लिए नहीं जिएंगे,

“न्याय और आज़ादी, जो आज तक एक-दूसरे से अलग-अलग हैं, साथ आएँगे, और

“हम सभी उन सारे लोगों के हमवतन होंगे जो इन्साफ और जिन्दगी की खूबसूरती चाहते हैं”।


सन्दर्भ

Galeano, Eduardo. Las venas abiertas de América Latina. México. D.F.: Siglo Veintiuno Editores.1971

Galeano, Eduardo. Días y noches de amor y guerra. Madrid: Alianza Editorial. 1978.

Galeano, Eduardo. Memorias del fuego (3): El siglo del viento. Madrid: Siglo Veintiuno de España Editores. 1986.

Galeano, Eduardo. Patas arriba. Madrid: Siglo Veintiuno de España Editores.    1998.

Mignolo, Walter D. The Darker side of the Renaissance. Michigan: The University   of Michigan Press. 1995.

Sherman, W. John. Latin America in Crisis. Colorado, USA: Westview Press. 2000.

Williams, Raymond. Marxism and Literature. London: Oxford University Press.1977.

 

[1] http://www.revistaenie.clarin.com/literatura/Entrevista-Eduardo-Galeano_0_677932208.html.