Home काॅलम जेरूसलम : पहला ‘ग़ुलाम’ शासक जो हिजड़ा भी था !

जेरूसलम : पहला ‘ग़ुलाम’ शासक जो हिजड़ा भी था !

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प्रकाश के रे


नौंवी सदी में अब्बासी ख़िलाफ़त लगातार कमज़ोर होता जा रहा था. इसी के साथ जेरूसलम में ईसाई समुदाय अपने कर्मकांडों और सार्वजनिक गतिविधियों के ज़रिए मुस्लिम श्रेष्ठता की भावना को भी चुनौती देता जा रहा था. साल 831 में ख़लीफ़ा मामून के दिये भरोसे के दो साल बाद ही शहर के तीनों धर्मों के बाशिंदों ने एक किसान विद्रोही- तमीम अबू हर्ब- को आने दिया और उसका स्वागत भी किया, लेकिन 841 में इसने पूरे जेरूसलम को लूट लिया. शहर के निवासियों को भागना पड़ा. इस विद्रोही का दावा था कि वह उम्मयद ख़िलाफ़त को फिर से वापस लाने की कोशिश में है. इसके लोगों ने घर और बाज़ार तो लूटे ही, मस्जिद और चर्च भी न बच सके. होली सेपुखर को ईसाई प्रमुख ने भारी रिश्वत देकर किसी तरह बचा लिया था. जेरूसलम पर हर्ब का फ़ित्ना 868 तक जारी रहा. उस साल मिस्र में अब्बासी ख़िलाफ़त के स्थानीय प्रशासक अहमद इब्न तुलुन अपना ख़ुदमुख़्तार शासन क़ायम कर लिया और उसकी हद में सीरिया और फ़िलिस्तीन भी थे. उसने पूरे इलाक़े में अमन-चैन का माहौल बनाया और आर्थिक हालात को बेहतर किया. साल 877 में एक तुर्की मूल के ग़ुलाम के इस बेटे ने अल्पसंख्यकों- ईसाइयों और यहूदियों- को पूरा मान दिया. बीते तीन दशकों में तबाह हुए चर्चों की उसने मरम्मत कराने के साथ जेरूसलम में उसने ईसाई प्रशासक नियुक्त किया.

मामून के बाद ख़लीफ़ा बने मुस्तसिम ने मध्य एशिया से तुर्की मूल के ग़ुलामों को सेना और शासन में नियुक्त करने का सिलसिला शुरू किया था. ये शानदार घुड़सवार पहले तो ख़लीफ़ा और शाही परिवार की हिफ़ाज़त के काम में लगाए गए थे, पर धीरे-धीरे उनका वर्चस्व शासन के हर क्षेत्र में बढ़ने लगा. ध्यान रहे, तुर्की मूल के यही ग़ुलाम घुड़सवार कुछ अरसे बाद हिंदुस्तान पर क़ाबिज़ होनेवाले थे.

                                                                   तुलुन की मस्जिद, काहिरा

तुलुन ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाते हुए एक नए यहूदी समुदाय को भी जेरूसलम में बसने की अनुमति दी. डैनिएल अल-कुमुसी के नेतृत्व में यह छोटा समूह क़रीब 880 में खुरासान से जेरूसलम आया था. ये कराइट संप्रदाय के एक हिस्से थे, जो तालमुद को न मानकर सिर्फ़ बाइबल के अनुसार आचरण करते थे. शहर में आने के बाद डैनिएल और इस संप्रदाय की कहानी बहुत दिलचस्प है. करेन आर्मस्ट्रॉंग लिखती हैं कि फ़िलिस्तीन में उसे यहूदी धर्म से जुड़ा एक दस्तावेज़ मिला, जिसे कुछ समय पहले बद्दुओं के एक कुत्ते ने खोजा था. इसके आधार पर उसने यह अनुमान लगाया कि जेरूसलम से यहूदियों के निष्कासन की अवधि जल्दी ही समाप्त होनेवाली है. उसने बाहर बसे यहूदियों से जेरूसलम आने का आह्वान किया ताकि मसीहा के आने की प्रक्रिया तेज़ की जा सके. इस पवित्र शहर में बसने के लिए उसने ऐसे यहूदी समुदायों से कम-से-कम पाँच लोगों को भेजने को कहा.

                                                                                 तुलुन के सिक्के

डैनिएल और उसके शिष्य सह्ल इब्न मसलियाह के प्रयासों का असर हुआ और कराइट यहूदी जेरूसलम आने लगे. तुलुन ने उन्हें अलग बस्ती बसाने की अनुमति भी दी. ऐसा इसलिए भी ज़रूरी था कि वे तालमुद माननेवाले रब्बाई परंपरा के यहूदियों के साथ नहीं रह सकते थे. इनकी मान्यताएँ भी अजीब थीं. ये टाट के कपड़े पहनते थे और शहर में माँस का सेवन नहीं करते थे. यूँ तो टेंपल माउंट पर एक ख़ास दिन अपने मंदिर की तबाही का दुःख मनाने का यहूदी रिवाज सदियों पुराना था, पर डैनिएल के संप्रदाय ने इस दुःख को जीने का तरीक़ा ही बना लिया. शहर के दरवाज़ों पर ये लगातार हिब्रू, फ़ारसी और अरबी भाषाओं में शोक मनाते रहते थे. कराइटों का भरोसा था कि इससे ईश्वर जल्दी मसीहा को भेजेगा. जबकि, रब्बाई परंपरा के यहूदियों की मान्यता थी कि ईश्वर अपने हिसाब से मसीहा भेजेगा. वे इस मसीहाई आस्था से चिंतित भी थे क्योंकि ऐसी परंपराओं के कारण अतीत में यहूदियों को कई बार हिंसा का सामना करना पड़ा था. कुछ रब्बाइयों ने मसीहा की आमद के इरादे से जेरूसलम आने की चाह रखनेवाले यहूदियों को ऐसा नहीं करने की सलाह भी दी.

साल 904 में तुलुनी शासन का ख़ात्मा हो गया और कुछ समय के लिए फ़िलिस्तीन पर फिर से अब्बासियों का दख़ल हो गया. तुलुन के बेटे और उत्तराधिकारी की हत्या उसके नज़दीकी हिजड़ों ने ही कर दी थी. साल 935 में मध्य एशिया के एक तर्क सरदार मुहम्मद इब्न तुग़ ने मिस्र का शासन अपने हाथ में ले लिया जिसके इलाक़े में सीरिया और फ़िलिस्तीन भी था. हालांकि वह बग़दाद के ख़लीफ़ा के नाम पर ही शासन कर रहा था, किंतु वह भी ख़ुदमुख़्तार था. जैसा कि मोंटेफ़ियोरे ने रेखांकित किया है, अल-इख़्शीद की पदवी वाले तुग़ और उसके उत्तराधिकारियों का दौर राजनीतिक अस्थिरता और धार्मिक खींचतान का दौर था. साल 935 में ही होली सेपुखर चर्च के एक हिस्से को मस्जिद में बदल दिया किया. पाम संडे का उत्सव मना रहे ईसाइयों पर हमल भी हुए. यहूदी भी विभाजित थे. कराइटों को नए शासकों का संरक्षण मिला. ये कराइट यूरोप के विभिन्न हिस्सों में बसे हुए थे. द्वितीय विश्व युद्ध में हीटर और उसके नाज़ी हमले में इन्हें भारी तबाही का सामना करना पड़ा था जिसमें लाखों यहूदी मारे गए थे. मोंटेफ़ियोरे बताते हैं कि यह भी अजीब है कि क्रीमिया में कुछ कराइट सामी मूल के न होकर तुर्की मूल के थे. वहाँ नाज़ियों ने इस समूह की रक्षा का आदेश दिया था. तुग़ के दौर में ही इसी समय एक और नया यहूदी संप्रदाय- खाज़ार- भी जेरूसलम में आ बसा था. ये तुर्की मूल के घूमंतू थे और काला सागर से मध्य एशिया के मैदानों में इनका राज था. साल 805 में इसके शासकों ने यहूदी धर्म क़बूल कर लिया था. इज़रायल बनने से पहले यह यहूदियों का आख़िरी राज था.

                                                                           इख़्शीद के सिक्के

साल 946 में तुग़ का देहांत हो गया और उसे जेरूसलम में ही दफ़न किया गया. तुग़ के बाद उसके शासन की बागडोर उसके पसंदीदा हिजड़े अबुल मिस्क काफ़ूर के हाथ में आयी, जिसने दो दशकों से अधिक समय तक शासन किया था. इस शासक का यह नाम इत्रों और प्रसाधन से उसके लगाव के कारण पड़ा था. तुग़ ने इस ईथोपियाई ग़ुलाम को बचपन में ही ख़रीदा था. कहा जाता है कि एक बार दरबार में कुछ नायाब जानवर लाए गए थे. सभी ग़ुलाम उन जानवरों को निहारने लगे, पर काफ़ूर की नज़र अपने मालिक से नहीं हटी. इससे प्रभावित होकर तुग़ ने उसे अपने बच्चों का शिक्षक बना दिया. वह सीरिया और फ़िलिस्तीन पर दख़ल करनेवाली सेना का प्रमुख भी था. बाद में उसे मालिक की पदवी भी मिली तथा वह तुग़ के उतराधिकारी का सरांक्षक भी था. लेकिन उसके मरने के बाद उसने ख़ुद ही गद्दी हथिया ली.  चूँकि काफ़ूर मोटा, भौंडा और बदबूदार था, इसलिए वह ख़ूब मेक-अप करता था और इत्र लगाता था. मोंटेफ़ियोरे ने रेखांकित किया है कि काफ़ूर पहला ऐसा मुस्लिम शासक था- जो ग़ुलाम था, और हिजड़ा था. उसने एक यहूदी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया जिसकी अगुवाई में एक नयी इस्लामिक क्रांति होनी थी और जेरूसलम में नया साम्राज्य स्थापित होना था.

काफ़ूर के सिक्के

 


पहली किस्‍त: टाइटस की घेराबंदी
दूसरी किस्‍त: पवित्र मंदिर में आग 
तीसरी क़िस्त: और इस तरह से जेरूसलम खत्‍म हुआ…
चौथी किस्‍त: जब देवता ने मंदिर बनने का इंतजार किया
पांचवीं किस्त: जेरूसलम ‘कोलोनिया इलिया कैपिटोलिना’ और जूडिया ‘पैलेस्टाइन’ बना
छठवीं किस्त: जब एक फैसले ने बदल दी इतिहास की धारा 
सातवीं किस्त: हेलेना को मिला ईसा का सलीब 
आठवीं किस्त: ईसाई वर्चस्व और यहूदी विद्रोह  
नौवीं किस्त: बनने लगा यहूदी मंदिर, ईश्वर की दुहाई देते ईसाई
दसवीं किस्त: जेरूसलम में इतिहास का लगातार दोहराव त्रासदी या प्रहसन नहीं है
ग्यारहवीं किस्तकर्मकाण्डों के आवरण में ईसाइयत
बारहवीं किस्‍त: क्‍या ऑगस्‍टा यूडोकिया बेवफा थी!
तेरहवीं किस्त: जेरूसलम में रोमनों के आखिरी दिन
चौदहवीं किस्त: जेरूसलम में फारस का फितना 
पंद्रहवीं क़िस्त: जेरूसलम पर अतीत का अंतहीन साया 
सोलहवीं क़िस्त: जेरूसलम फिर रोमनों के हाथ में 
सत्रहवीं क़िस्त: गाज़ा में फिलिस्तीनियों की 37 लाशों पर जेरूसलम के अमेरिकी दूतावास का उद्घाटन!
अठारहवीं क़िस्त: आज का जेरूसलम: कुछ ज़रूरी तथ्य एवं आंकड़े 
उन्नीसवीं क़िस्त: इस्लाम में जेरूसलम: गाजा में इस्लाम 
बीसवीं क़िस्त: जेरूसलम में खलीफ़ा उम्र 
इक्कीसवीं क़िस्त: टेम्पल माउंट पहुंचा इस्लाम
बाइसवीं क़िस्त: जेरुसलम में सामी पंथों की सहिष्णुता 
तेईसवीं क़िस्त: टेम्पल माउंट पर सुनहरा गुम्बद 
चौबीसवीं क़िस्त: तीसरे मंदिर का यहूदी सपना
पचीसवीं किस्‍त: सुनहरे गुंबद की इमारत
छब्‍बीसवीं किस्‍त: टेंपल माउंट से यहूदी फिर बाहर
सत्‍ताईसवीं किस्‍त: अब्‍बासी खुल्‍फा ने जेरूसलम से मुंह मोड़ा
अट्ठाईसवीं किस्‍त: किरदार बदलते रहे, फ़साना वही रहा 

उन्तीसवीं किस्त:

 जेरूसलम का नया इस्लामी नाम- ‘अल क़ुद्स’

 प्रकाश के रे वरिष्ठ पत्रकार हैं                                                                                          कवर फोटो: रबीउल इस्‍लाम

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