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जन्नत और दोज़ख़ के बीच झूलते ईरान में तूफ़ानी बदलाव की आहट !

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ईरान से लौटकर रामशरण जोशी

                       मज़िल से  कितनी दूर -कितनी पास :  ईरान की  इस्लामी क्रांति -1

रामशरण जोशी

  

प्रस्तुत  यात्रा टिप्पणी ईरान की राजधानी  तेहरान  के सात दिवसीय प्रवास के  दौरान हुए अनुभवों  और अवलोकन पर आधारित है. ईरान  को  सम्पूर्णता  से जानने का दावा लेखक का नहीं क्योंकि  शहर की सरहदों के पार जिंदगी कैसी है, उसमें झाँकने का  मौक़ा ही नहीं मिला। बीते साल 24  से 30 नवम्बर  के  प्रवास में राजनेताओं, राजनयिकों, बुद्धिजीवियों, मीडिया-वृतचित्र कर्मियों, विद्याथियों, समाजकर्मियों, सामान्यजनों, उद्योगपतियों  जैसों के साथ संवाद करने में  वक़्त कैसे गुज़र गया, पता ही नहीं  चला! सो, इस  टिप्पणी की  अन्तर्निहित  सीमाएं  होंगी! अतः आरम्भ में ही इसे  स्पष्ट कर दिया गया है.

   “ यदि  अमेरिकी  आधिपत्य या अन्य ताकतों के अधीन जीनेवाले दुनिया भर के  उत्पीड़ित-जन  जागरूक नहीं बनते हैं, उठ खड़े नहीं होते हैं और संगठित  नहीं हो जाते हैं, तो शैतान  की अधीनता ख़त्म नहीं होगी। हम  सभी मिल कर  दुनिया भर के उत्पीड़ितों को एकजुट करने का  स्वप्न साकार करें……. हम सभी प्रकार की गुलामियों को  खत्म करने के लिए कटिबद्ध रहें।” ( इमाम खोमैनी, 11 मई,1983; संस्थापक, इस्लामी  ईरान गणतंत्र)

ईरान देखने की तम्मना पुरानी रही है। वजह, भारत और ईरान की सभ्यताएं और सम्बन्ध नए नहीं,सहस्त्राब्दियों  पुराने हैं। काफी कुछ मिलता जुलता है। करीब चालीस बरस पहले  इस  देश में  ‘इस्लामी क्रांति ‘हुई और  अप्रैल,1979 में  ईरान  ‘इस्लामी गणतंत्र ‘ बना। अव्वल दर्जे  की  सामंतशाही  व  पश्चिमशाही  से मज़हबी लोकशाही में तब्दील हो गया। रातोंरात एक  नया  सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक  आख्यान (नरेटिव ) अस्तित्व में आया। इसमें झाँकने-समझने की इच्छा बलवती हुई जो पूरी हुई 24 नवम्बर,2018 की सुबह। एक मीडिया शिष्टमंडल के सदस्य के रूप में मैं वहाँ गया। आठ -दस सदस्य थे इस मंडल के।

मुझे याद आया, इस्लामी क्रांति के दस साल पूरे होने पर मैंने 1989 में किसी ईरानी मीडिया को इंटरव्यू दिया था। उस इंटरव्यू में इस्लामी क्रांति की उपलब्धियों के साथ कुछ शंकाएं भी सामने रखीं थीं। यह यात्रा एक अवसर था उपलब्धियों और शंकाओं की शिनाख्त का; क्या यह  क्रांति या इंकलाब  लोगों की जिंदगियों में बदलाव ला सका? क्या सामजिक न्याय व विषमता मुक्त समाज स्थापित कर सका? क्या  ईरान  शोषण-उत्पीड़न मुक्त राष्ट्र बन सका? क्या इमाम खोमैनी का ख्वाब साकार हो गया ? क्या इस्लामी न्याय व्यवस्था स्थापित हो सकी? क्या  स्त्री-पुरुष को समान  अधिकार मिले हुए हैं ? इस धार्मिक देश में  धार्मिकता और आधुनिक वैज्ञानिकता के बीच कैसे सम्बन्ध हैं,किस प्रकार का ताल-मेल है? क्या  ईरान राष्ट्र को  मध्ययुगीनता + आधुनिकता + गैर पूंजीवादी  व समाजवादी  क्रांति की प्रयोगशाला कहा जा सकता है? इस तरह के सवालों से लदे दिमाग को लेकर मैं तेहरान पहुँचता  हूँ।

बेशक़ कई भ्रम टूटे। पहली सुबह ही तेहरान, साफ़-सुथरी-चमचमाती  सड़कों  का शहर नजर आया। सड़कों पर कतारबद्ध  कारें, न कोई  डेंट-न खरोंच। अपनी  अपनी लेनों में अनुशासित, अपनी-अपनी  मज़िल को जाते हुए वाहन ! न कोई धुआं-न प्रदूषण।  कारें भी छोटी नहीं, खासी लम्बी-आरामदायक। स्टीयरिंग पर  स्त्री-पुरुष, सामान रूप से दोनों नज़र आए हवा से  बातें करते हुए। ऐसे में दिल्ली-मुम्बई  का ज़िस्म  याद न आए और तौबा  करने को जी न करे, यह  कैसे हो सकता है !

मध्य तेहरान के  एक चार सितारा होटल सिमोर्घ  में ठहराया गया। बिलकुल  फैशनपरस्त  इलाका। दिल्ली का  ग्रेटर कैलाश, कोलकाता का  पार्क स्ट्रीट, मुम्बई का  पैडर रोड  आँखों में उतर आये। सिर्फ हिज़ाब से मज़हब की लाज रखते हुए  और अपनी बाहों को   वैनिटी बैग से  सजाये महिलाएं चहलकदमी करती  मिलीं। मर्दजात से कोई फासला नहीं। रात दस बजे बाद सर से हिज़ाब भी  आसमान में गायब होता मिला।   इसके बाद किसी भी  पश्चिमी देश के नज़ारे जिंदा होते मिले। सड़क किनारे कार सटा महिलाओं के लबों से उठता धुआं; फुटपाथों पर  टकराहट लबों की; बाहों को बाहों से सटा कर टहलना  खरामा खरामा; दिन में  पार्कों के झुरमुटों में  प्रणय -व्यापार; रेस्तरां  में  कॉफ़ी की चुस्कियां; लंच-डिनर पर  उमंगों का सैलाब !

कुल मिलाकर तेहरान में जीवन के प्रत्येक  क्षेत्र में  मर्द के कंधे से कंधा मिलाते हुए औरत मिली। पूरी तौर पर कामकाजी;  होटल रहे या रेस्तरां;  दफ्तर हो या शोध संस्थान; मीडिया रहे या  तेहरान विश्विद्यालय; या  फिर  ईरानी संसद  रहे या  समाजी  व मज़हबी संस्थाएं- महिलाओं की  मौजूदगी  पुरुषों को चिढ़ाती हुई दिखाई देंगी। कुछ क्षेत्रों में तो पुरुषों को मात देती हैं और पचास फीसदी से ज्यादा हैं। 95% ओरतें साक्षर हैं ग्रामीण क्षेत्रों में।

एक नितांत अनुपम अनुभव हुआ। क्या किसी  मुस्लिम देश में  हिन्दू -मुस्लिम विवाह की कल्पना की जा सकती है! लेकिन इस शिया प्रधान इस्लामी देश में हिन्दू युवक और शिया युवती वैवाहिक सूत्र में बंधे मिले। तेहरान  विश्विद्यालय के  अन्तर्राष्ट्रीय विभाग के विद्यार्थी थे; युवक था पूना का  मराठी अभिषेक  और पत्नी थी  सारा। ‘शरू में थोड़ी बहुत दिक्कतें पेश हुईं,लेकिन बाद में सबने स्वीकार कर लिया। हम दोनों खुश हैं अपने नए जीवन से।’ मुस्कराते हुए दोनों ने बताया। पत्नी ने हिजाब ज़रूर ओढ़े  रखा था। अभिषेक  अपनी सामान्य पोशाक में था। हिंदी -मराठी के साथ फारसी भी बोल रहा था। युवक सांवला था, और सारा गोरी-चट्टी। अलबत्ता ईरान में  खूबसूरती पर ख़ुदा की नेमत   बरसी है।

दिलचस्प  यह है कि जहाँ भारत में   पिछले चार सालों से  ‘लव जेहादियों ‘ का कहर बरपा है, वहीँ  यह  हिन्दू -मुस्लिम दम्पति,  स्वच्छंद रूप से  तेहरान शहर की साँसों में बसा हुआ है। मुझे अपने देश के  ताज़ा माहौल पर  ‘शर्म’ क्यों  न आये!

तो  क्या  तेहरान की  आँखों में  मज़हबी सुरूर उतरा हुआ है? बिलकुल भी नहीं ! चाँद का टुकड़ा दिखाई देगा। किसी भी पूंजीवादी देश की अभिजात वर्गीय  जीवन शैली  छितरी मिलेगी। आम लोगों के लिए बस  स्टॉप पर  स्त्री -पुरुष यात्रियों की कतारें दिखाई देंगी। पिकनिक स्थलों पर मौज-मस्ती, बच्चों के साथ धूम-धड़ाका,स्कूली  विद्यार्थियों के हुजूम के साथ शिक्षिकाएं आधुनिक लिबास में, विश्व की  सबसे लम्बी  छठी ‘मिलाद मीनार’ को देखने आईँ  दर्ज़नों  छात्र-छात्राएं  और शिक्षिकाओं को देखकर रोमांचक अनुभव हुआ। इस बात का अहसास  कहीं भी नहीं था कि ये बच्चे किसी मध्य युग में अटके हुए हैं। उनकी शिक्षिकाएं भी वैसी ही मिलीं; फर्राटेदार इंग्लिश और आधुनिक बोध से लैस। अमिताभ बच्चन,शाहरुख़ खां, आमिर खान,सलमान खान और  हिंदी फिल्मों व संगीत में  दिलचस्पी; महात्मा गाँधी, नेहरु और इंदिरा गाँधी के लिए आदर भाव; इंडिया का नाम सुनते ही बच्चे तो उछलने लगे और शिक्षकों के चहरों पर चमक थी।

इस्लामी क्रांति के बाद बुर्कों से  ढका, सड़कों पर ‘मोरल पुलिसिंग’,लम्बे लम्बे काले अबा (लबादा)  व  मोटे मोटे सफ़ेद  दस्तार  से लदे और लम्बी लम्बी दाढ़ीवाले  धर्मगुरुओं से सामना होग- दिल्ली में ऐसा था भ्रम जो तेहरान में टूटा। कई भ्रम थे ऐसे ही, जो आहिस्ता आहिस्ता काफूर होते गए, जैसे-जैसे मैं इस शहर में  उतरता चला  गया।

चांदनी चौक,फतेहपुरी, करोलबाग के  दृश्यों की याद  दिलाते हुए बाज़ार भी मिले। वही भीड़-भाड़, वही धक्का-मुक्की, कानफोड़  शोर, अपनी तरफ ग्राहकों को लुभाते इशारे;  मेवा की दूकानों पर उमड़ी भीड़; दिल्ली में तिब्बती विस्थापितों  की थडियों की तरह अफगानी-ब्लोचिस्तानी विस्थापितों की थडियां और बिकते ऊनी कपडे; चौराहों-दूकानों  पर विशेष पोशाक पहने स्त्री-पुरुष  ऊद-ऊदी-लोभान से  पैसा बटोरते हुए, छुप -छुप कर भीख मांगते हुए’ लोग; अमेरिकी डॉलर के लिए दीवानगी  और   ब्लैक  मार्किट में यांकी  मुद्रा  के साथ साथ भारतीय  मुद्रा की भी खरीद-फरोख्त; दो हज़ार  रूपये के नोट से मुहब्बत; काला बाज़ारी का बोलबाला, पर नमाज़ पांचो वक़्त।

लाउड  स्पीकर की चीखें मस्जिद से, कानों से नहीं  टकरायीं।  ज़रूर  स्पर्श करता  रहा  कानों को अजानों का   माधुर्य। कुकुरमुत्ता सी फैली हुई नहीं थीं मस्जिदें। इक्के-दुक्के चर्च भी दिखाई दिए। बिलकुल साफ़-सुथरे। गुरुद्वारा भी गए। ग्रंथी, दिल्ली से पहुंचे हुए थे। पंजाब के सेवादार संतुष्ट मिले। ‘पाठ-पूजा-सबद की पूरी छूट। लंगर भी लगता है।’ बाजारों में प्रेम-प्यार, आदर भाव।  सिख सेवादार ने स्वीकार किया। भारत सरकार द्वारा संचालित ‘केंद्रीय विद्यालय ‘भी मिला, जिसके प्रधानाचार्य थे एक मराठी। हिंदी  व इंग्लिश के साथ साथ  फारसी में शिक्षा.मिश्रित वातावरण था विद्यालय में।

तेहरान में सिर्फ अमन-चैन की ही  बंसी बजाई जाती है, यह  सोचना भी एक  भ्रम होगा। इस शहर की साँसों में भी  ‘दर्दभरे नाले ‘ बसे हैं। इसका अहसास मुझे पार्क में घूमते हुआ।  हुआ यह कि मैं एक दोपहर होटल से निकल कर एक खूबसूरत पार्क में तफरीह के लिए पहुँच गया। कुछ पढ़े लिखे व बेरोज़गार नौजवानों से मुठभेड़ हुई। गपशप होने लगी। वे धड़ल्ले से इंग्लिश बोल रहे थे। जब सुना मैं  इंडिया से हूँ तो और  दिलचस्पी जगी। इली नाम का युवक कहने लगा,” सर जिस होटल में आप ठहरें हैं वह काफी महंगा है। उसमें अमीर लोग ही जा सकते हैं। यह शहर  तीन जिंदगियों में तकसीम  हुआ है- नोर्थ, मिडिल  और  साउथ; नोर्थ  में तो बड़े बड़े विला और बीएमडब्लू, मर्सिडीज़, टोयटा  जैसी कारें मिलेगीं, बिलकुल अमेरिका का टुकड़ा है, ज़न्नत है; साउथ दोज़ख है  जहाँ हम  लोगों की जिंदगी है,अँधेरे  में डूबी,घुटी घुटी ,सांस लेना मुहाल; जहाँ आपकी होटल है वह मिडिल है, लेकिन  नोर्थ का ही एक्सटेंशन है।”

“‘क्या आप जानते हैं, ऐसे भी इलाके हैं जहाँ के लोग घास  भी खाते हैं जिंदा रहने के लिए ? रोज़गार नहीं है, आधा पेट रहना पड़ता है; कुछ लोग तो कब्रिस्तान में सोते हैं; अमीर और अमीर हो रहे हैं, गरीब और गरीब;  ख़बरें दबा  दी जाती हैं, रंगीन चैनलों -अख़बारों में झूठ होता है;  फेक न्यूज़ होती है; धर्मगुरुओं  की जमात की मुखालफ़त नहीं कर सकते, करते हैं तो मारे जाते हैं। पहले वे  अल्लाह का  वास्ता देते हैं, फिर मारते हैं; सरकारी और प्राइवेट दफ्तरों में सिफारिश, कनेक्शन और पैसे से नौकरियां मिलती हैं। 90 फ़ीसदी लोग सरकार से संतुष्ट नहीं हैं। ख़ुफ़िया पुलिस का जाल फैला हुआ है; हमें  असली आज़ादी चाहिए,हम खौफ़ और हुकुमत  की ताक़त तले जी रहे हैं। अब  हमें  ‘evolution to revolution चाहिए।”

इसी इलाके में एक बुक शॉप में गया। अच्छी -खासी किताबें थीं  फारसी व इंग्लिश में। ब्रिटिश,रूसी  कथाकारों के उपन्यासों (युद्ध और शांति,पुनर्जन्म, माँ,ओलिवर ट्विस्ट) से सजे हुए शेल्फ। वहीँ राजनीतिक-आर्थिक साहित्य भी दिखाई दिया। दिलचस्पी होने लगी। देखा,मार्क्स,लेनिन,स्टालिन,माओ,गाँधी, नेहरु,मंडेला जैसे  चिंतकों-युग निर्माताओं का साहित्य भी इंग्लिश और फारसी में उपलब्ध है। अच्छा लगा,एक मुस्लिम देश में ऐसे साहित्य का होना। आस्तिकों के बीच  नास्तिकों-काफिरों के  साहित्य का होना धार्मिक उदारता की अंतर्धारा का प्रतीक है। ईरान के  मौजूदा राष्ट्रपति हसन  रूहानी  और  सर्वोच्च धार्मिक नेता या  सुप्रीम लीडर अली खेमेनी को अपने  पूर्वर्तियों से अधिक उदार माना जाता है- तेहरान में यह सुनाई दिया।

शेल्फों के एक कोने में एक पतली कद-काठी का युवक बैठा हुआ था किताब में डूबा हुआ। दिलचस्पी हुई। करीब जा कर बातचीत की। उसने भी अच्छी इंग्लिश में ज़वाब दिया। देश में फैली गरीबी और बेरोज़गारी की बात की। ग्रामीण व कस्बाई ईरान में आज भी पिछड़ापन है। भुखमरी की स्थिति है। हर जगह धार्मिक  पुलिसिंग और गुप्तचरी है। विरोध करने पर  दमन का कहर टूटता है। वामपंथियों को तो बिलकुल बर्दाश्त नहीं किया जाता है। मीडिया सिर्फ सरकार की बात कहता है। सही हालात को दबा दिया जाता है। ‘यदि यही हाल रहा तो नौजवान  खड़े होंगे,विश्विद्यालय खामोश नहीं रहेंगे। मज़हबी नेताओं की मनमानी के खिलाफ़.ज़लज़ला आएगा।’ बार बार पूछा,लेकिन नाम नहीं बताया। युवक की वैचारिक काया  और देह से इतना ही अंदाज़ लगा सका कि यह  कोई वामपंथी हो सकता है।  किसी क्षेत्र में एक्टिविस्ट भी! इतना ज़रूर था, जब मैंने  अपने देश और वैचारिक भाषा की पहचान उसके सामने रखी तो  वह  खुश हुआ। मुझ में भरोसा जगा और खुलकर बातचीत करने लगा पर  नाम से  गुमनाम रहना ही पसंद किया.

सभी को अभिव्यक्ति की आज़ादी चाहिए। मैं जिस होटल में रुका हूँ ख़बरों के चैनल नियंत्रित हैं। काफी ज़द्दोज़हद के बाद  दूसरे देशों के चैनल मिल पाते हैं। वाई-फाई में भी यही समस्या है। आसानी से फेसबुक, गूगल,ट्विटर जैसे  सोशल मीडिया नहीं मिल पाते। घुमा-फिरा  कर पकड़ में आते,फिर भी दावा है कि  मीडिया के मामले में ईरान एक ‘खुला देश ‘ है। मीडिया पर कोई पाबंदी नहीं है; 22 राष्ट्रीय और 60 प्रादेशिक चैनल हैं; सभी चैनलों की मालिक सरकार है। इसी में शामिल हैं इंग्लिश,अरबी और उर्दू के 7 चैनल भी। एक-दो चैनल पर बोलीवुड की फिल्में ज़रूर दिखाई जाती हैं। अधिकाँश चैनलों पर शहीदों और शहादत को गौर्वान्वित किया जाता है। मज़हबी प्रचार होता है। इस्लामी संघर्ष के  व्याख्यानों को पेश किया जाता है। इस्लामी क्रांति के इतिहास को दोहराया जाता है। तेहरान  का  युद्ध संग्रहालय देखने लायक है।

ज़ाहिर है, इससे जनता को  अनुकूलित  किया जाता  है, बड़ी बारीकी के साथ। फिर भी लोग जुगाड़ कर ही लेते हैं पश्चिमी मीडिया में झाँकने का। दुनिया भर के सोशल मीडिया से चिपके रहते हैं और  आज़ादी की हवा उनके  सपनों  और विचारों को   स्पर्श करती रहती है।

अलबत्ता,प्रिंट मीडिया  निजी क्षेत्र में है। काफी हद तक स्वतंत्र है। ईरान की प्रसिद्द फारस न्यूज़ एजेंसी के दफ्तर भी गए। बताया गया कि कुल 49 न्यूज़ एजेंसीज हैं जिसमें  ‘इरना’ सरकारी है।  इंग्लिश भाषा के प्रमुख अखबार हैं तेहरान टाइम्स और क्य्हम इंटरनेशनल। देश में कुल 23 दैनिक निकलते हैं जिनमें 3 इंग्लिश और एक अरबी में है। 2002-4 के बीच 85 अख़बारों को बंद कर दिया गया था। वैसे  दावा है कि मीडिया पूरी तौर पर आज़ाद है।कोई सेंसरशिप नहीं है। सरकार की नीतियों की आलोचना की जाती है। सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। पत्रकारों की पेशेवर आज़ादी के लिए एक अलग से  अदालत होती है। कोई नेता,मंत्री,अधिकारी  या धार्मिक नेता प्रेस को धमकता है-डराता है तो उसके खिलाफ इस अदालत में शिकायत की जा सकती है। पत्रकार सम्पादक का दावा था, “सोशल मीडिया बहुत ताकतवर  और जीवंत है। सारांश में, ऐसा कोई क्षेत्र या विषय नहीं जिस पर हम क़लम नहीं चला सकते। अलबत्ता, कुछ कानून-कायदों का ध्यान रखना पड़ता है। झूठे आरोपों व मानहानि से बचना होता है। यह फेक न्यूज़ का ज़माना है इसलिए अतिरिक्त सावधानी ज़रूरी भी है क्योंकि अधिकतर फेक न्यूज़ फासीवाद से जुड़ी रहती हैं। कट्टरवाद का प्रचार करती हैं और गुमराह करती हैं।” मीडिया  ज़मीन से जुड़ा है और गाँव तक फ़ैल गया है। इसलिए  धार्मिक राष्ट्र के बावजूद लोगों की लोकतान्त्रिक नज़रें शासकों पर ज़रूर टिकी हुई है। इसलिए  ज़लज़ले की रफ़्तार तेज़ रहेगी। 2011 में मिस्र के ‘स्प्रिंग रेवोलुशन‘ के प्रति चेतना  आम लोगों में दिखाई दी।

एक सत्य को  स्वीकार करना होगा। ईरानियों में है बला की जिजीविषा; 1979 में इस्लामी क्रांति के तुरंत बाद शिया बहुल जनसंख्या वाले पड़ोसी इराक़ के साथ  युद्ध झेला। आठ  सालों (22 सितम्बर 1980  से 20 अगस्त,1988 ) तक। दोनों देशों के करीब पांच लाख लोग मरे , हजारों हताहत हुए; 1980 से ही ईरान  अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने इन प्रतिबंधों को और कड़ा कर दिया है। लेकिन, सरकारी और  आम लोग, दोनों ही प्रतिबंधों  से  बेपरवाह हैं। निश्चिन्त हो कर  अपने राष्ट्र की दिनचर्या को जारी रखे हुए हैं।ईरानियों की नज़र  में “70 प्रतिशत प्रतिबन्ध मनोवैज्ञानिक हैं, 30 प्रतिशत वास्तविक हैं।” मगर यह देश विचित्र विडम्बनाओं का शिकार भी मिला; एक तरफ़ औसत  ईरानी की नज़र में राष्ट्रपति ट्रम्प  ‘महाखलनायक’ हैं, वहीँ  दूसरी तरफ  अमेरिका या पश्चिमी जगत में बसने की बेपनाह ख्वाहिश  भी है! गोरों के लिए मोहब्बत भी है। इस मुद्दे पर  राज्य और अवाम के बीच सहमति भी मिली, और असहमतियां भी। बावजूद उपभोक्तावाद के, ईरानी परम्पराओं को लेकर गर्व भी करता  है और फ़ौलादी इरादे भी रखता है। और  यही इरादे ‘तूफानी  बदलाव  का सबब’ भी  बनेंगे!

जारी……

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विजिल संपादक मंडल के सम्मानित सदस्य हैं।