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370 पर राज़ी थे श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सवाल उठाया था मौलाना हसरत मोहानी ने !

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कश्मीर में स्वायत्तता का अर्थ और इतिहास 

अशोक कुमार पाण्डेय

 

स्वायत्तता और आज़ादी को लेकर जो बहस शुरू हुई है वह दरअसल या तो किसी भ्रम और अज्ञान के कारण शुरू हुई है या फिर भ्रम और अज्ञान फैलाने के लिए।

कश्मीर के संदर्भ मे स्वायत्तता और आज़ादी के मानी समझना कोई मुश्किल काम नहीं बशर्ते आप इतिहास से थोड़ा परिचित हों। 15 अगस्त 1947 को भारत छोडने से पहले अंग्रेजों ने सभी रजवाड़ों को यह ऑप्शन दिया था कि वे भारत या पाकिस्तान से विलय कर लें। आमतौर पर मुस्लिम बहुल इलाक़े पाकिस्तान गए और हिन्दू बहुल इलाक़े भारत से मिले। हालांकि यह प्रक्रिया इतनी सहज और सरल नहीं रही। अनेक हिन्दू राजा पाकिस्तान से बेहतर डील मिलने के कारण उधर जाने को तैयार बैठे थे। विस्तार से जानने के लिए उस समय सरदार पटेल के सचिव रहे वीपी मेनन की किताब  द स्टोरी ऑफ़ इंटीग्रेशन ऑफ़ इन्डियन स्टेट्स ( ओरियेंट लॉन्गमैन, कोलकाता-1955) पढ़ी जा सकती है।

इस पूरी प्रक्रिया मे तीन ऐसे रजवाड़े थे जिनमें बहुसंख्यक जनता और शासक का धर्म अलग-अलग था। जम्मू और कश्मीर जहां बहुसंख्यक जनता मुस्लिम थी और राजा हिन्दू तथा जूनागढ़ और हैदराबाद जहाँ बहुसंख्यक जनता हिन्दू थी और शासक मुसलमान। इन सबके संदर्भ मे यह नीति बनाई गई कि विलय के लिए जनता की मर्ज़ी जानी जाएगी और जनमतसंग्रह द्वारा निर्णय होगा। इसी के चलते जूनागढ़ और हैदराबाद अपने शासकों की इच्छा के विरूद्ध भारत के साथ रहे। कश्मीर के शासक हरि सिंह भारत और पाकिस्तान दोनों से दोस्ताना रिश्ते क़ायम रखते हुए आज़ाद रहना चाहते थे। कहानी लंबी है और उसके लिए ‘कश्मीरनामा’ की प्रतीक्षा करें, अभी यहाँ इतना कि भारत और पाकिस्तान से उनकी बातचीत चल ही रही थी कि इसी बीच पाकिस्तान की तरफ से क़बायली हमला हुआ और हरि सिंह के लिए कश्मीर तथा अपनी जान बचाने के लिए भारत की सहायता मांगने, भारत समर्थक कश्मीरी नेता शेख़ अब्दुल्ला को रिहा करने और भारत के साथ विलय का प्रस्ताव स्वीकार करने के अलावा कोई चारा न रहा।

लेकिन यह विलय सशर्त था। भारत को रक्षा, संचार और विदेशी मामलों मे कश्मीर पर पूर्ण अधिकार मिला जबकि इसके अलावा सभी मामले कश्मीर सरकार के पास रहे। इसी शर्त को क़ानूनी जामा पहनाने के लिए अनुच्छेद 370 बना जिस पर भारतीय संविधान सभा के सदस्य श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सरदार पटेल, नेहरू, गोपालस्वामी आयंगर सहित सब राजी हुए, सवाल बस एक व्यक्ति ने उठाया – मौलाना हसरत मोहानी। जवाब मे गोपालस्वामी आयंगर ने कहा – यह भेदभाव कश्मीर की विशिष्ट परिस्थितियों के कारण है । वह विशेष राज्य अब तक इस तरह के एकीकरण के लिए तैयार नहीं है । यहाँ बैठे हर व्यक्ति को यह उम्मीद है कि समय के साथ-साथ जम्मू और कश्मीर भी उस तरह के एकीकरण के लिए तैयार हो जाएगा जैसा अन्य राज्यों के साथ हुआ है । वर्तमान में उस एकीकरण को हासिल करना संभव नहीं है । इस बात के अनेक कारण हैं कि यह इस वक़्त संभव क्यों नहीं है  …भारत सरकार कश्मीर के लोगों के प्रति कुछ मामलों में वचनबद्ध है । उन्होंने इस अवस्थिति के प्रति वचनबद्धता प्रकट की है कि राज्य के लोगों को यह तय करने का मौक़ा दिया जाएगा कि वे गणराज्य के साथ रहना चाहते हैं या इससे बाहर जाना चाहते हैं । हम लोग इस बात के लिए भी वचनबद्ध हैं कि जनता की इच्छा जनमतसंग्रह द्वारा तय की जायेगी  बशर्ते शांतिपूर्ण और सामान्य स्थितियाँ क़ायम हों और जनमतसंग्रह की निष्पक्षता की गारंटी दी जा सके । हम इस बात से भी सहमत हुए हैं कि राज्य की संविधान सभा के माध्यम से लोगों की इच्छा के अनुसार राज्य का संविधान स्थापित किया जाएगा और राज्य पर केंद्र का प्राधिकार तय किया जाएगा …जब तक राज्य की संविधान सभा निर्मित नहीं होती केवल एक अंतरिम व्यवस्था ही संभव है और ऐसी व्यवस्था नहीं संभव है जैसी अन्य राज्यों के मामलों में है । अब, यदि आपको मेरे द्वारा प्रस्तुत किये गए विचार बिंदु याद हों तो यह एक अवश्यंभावी निष्कर्ष है कि हम केवल एक अंतरिम व्यवस्था लागू कर सकते हैं ।  अनुच्छेद 306 ए (370) ऐसी ही व्यवस्था स्थापित करने की एक कोशिश है ।”

तो स्पष्ट है कि यह ‘स्वायत्तता’ संविधान के भीतर विशेषाधिकार है न कि संविधान के बाहर आज़ादी। जिस राज्य के संचार, रक्षा और विदेशी मामलों पर केंद्र का अधिकार हो वह ‘आज़ाद’ कैसे हो सकता है?

स्वायत्तता को लेकर लंबी बात हो सकती है, 47 के बाद से अब तक इसे लेकर कई बार कई-कई तरह की चर्चा हुई है। जम्मू और लद्दाख ने अपने लिए स्वायत्तता की मांगे एकाधिक बार की हैं जिन पर विस्तार से बात किताब मे है। अभी एक उद्धरण :

1951 में  स्थापित हुई जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में  21 अक्टूबर 1951 को हुई पहली राष्ट्रीय समिति की बैठक में जो पहला घोषणापत्र जारी हुआ उसमें चार प्रमुख मुद्दों पर ज़ोर दिया गया, भारतीय संस्कृति पर आधारित शिक्षा पद्धति, स्कूलों में  हिंदी का प्रयोग, अल्पसंख्यकों को किसी भी तरह के विशेषाधिकार का विरोध और जम्मू और कश्मीर का भारतीय संघ में  पूर्ण एकीकरण । पार्टी ने इन्हीं मुद्दों पर चुनाव लड़ा और हालाँकि उसे लोकसभा में केवल 3 सीटें मिलीं लेकिन सदन के भीतर वह अकाली दल सहित अन्य दलों के 32 सांसदों का समर्थन हासिल करने में सफल रहे और इसे राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चे का नाम दिया गया । जिन दो मुद्दों पर आन्दोलन शुरू करने का तय किया गया वे थे अनुच्छेद 370 और पाकिस्तान से आये रिफ्यूजियों के हालात । जनसंघ, हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह आन्दोलन दिल्ली से पंजाब होते हुए जम्मू तक चलाने का फ़ैसला किया था । नारा तय किया गया : “एक देश में  दो विधान/एक देश में  दो निशान/ एक देश में  दो प्रधान/नहीं चलेगा, नहीं चलेगा ।” अभी हाल तक महाराजा के पीछे स्वतंत्र जम्मू और कश्मीर राज्य की माँग के लिए खड़ी प्रजा परिषद की भारत के प्रति देशभक्ति ऐसी जागी कि उससे जुड़े छात्रों ने तिरंगे के साथ लगे राज्य के झंडे को जलाने की कोशिश की । ज़ाहिर साम्प्रदायिक एजेंडे के तहत शुरू किया गए इस आन्दोलन ने जम्मू में जनजीवन को तहस-नहस कर दिया । सरकारी संपत्ति की तोड़ फोड़ से लेकर हिंसा तक की घटनाएँ हुईं । राष्ट्रभक्ति की इस आग को भड़काने में  राष्ट्रीय प्रेस ने भी अपनी भूमिका निभाई । नेहरू इसे लेकर बेहद चिंतित थे । इन पाँच सालों में पहली बार वह कश्मीर के भविष्य को लेकर सशंकित थे । उन्होंने इंटेलीजेंस ब्यूरो के तत्कालीन उप निदेशक बी एन मलिक को हालात का अध्ययन करने के लिए जम्मू भेजा । मलिक का दावा है कि नेहरू ने दो कामों के लिए भेजा था । पहला यह कि प्रजा परिषद को अपना आन्दोलन ख़त्म करने पर राजी करें और यह कि उन्हें समझाएँ कि कश्मीर से भारत का एकीकरण अधूरा नहीं पूरा है लेकिन चूँकि मामला सुरक्षा परिषद में है इसलिए कश्मीर के लिए ख़ास दर्ज़ा कुछ और सालों तक बनाकर रखना पड़ेगा । कुछ सालों बाद ये विशेष अधिकार अपने आप ख़त्म हो जायेंगे और कश्मीर भी दूसरे किसी राज्य की तरह ही  हो जाएगा और दूसरा यह कि शेख़ अब्दुल्ला से बात करके उन्हें साम्प्रदायिक और हिन्दू विरोधी भाषणों से बचने का आग्रह करें । (देखें, पेज़ 30, माई इयर्स विथ नेहरू : कश्मीर, बी एन मलिक, अलाइड पब्लिशर्स, नई दिल्ली -1971)

1-मलिक के दावे की सच्चाई की जाँच करने के लिए आज हमारे पास कोई तरीक़ा नहीं है लेकिन 1953 में  शेख़ की गिरफ़्तारी के बाद जिस तरह कश्मीर के भारत से एकीकरण और अनुच्छेद 370 को धुंधला करने की जितनी कोशिशें हुईं उसे देखते हुए इस संभावना को पूरी तरह खारिज़ भी नहीं किया जा सकता । जम्मू में आन्दोलन पर एक हद तक क़ाबू पाने के बाद 5 फ़रवरी 1953 को नेहरू ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखा कि उन्हें इस बात को लेकर ज़रा सी भी आशंका नहीं है कि भारत के साम्प्रदायिक और संकीर्ण मानसिकता वाले तत्त्वों द्वारा समर्थित परिषद का साम्प्रदायिक आन्दोलन बर्बादी लेकर आयेगा, केवल जम्मू और कश्मीर के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए । मुखर्जी ने आन्दोलन तो नहीं ख़त्म किया लेकिन शेख़, नेहरू और मुखर्जी के बीच लगातार ख़त-ओ-किताबत चलती रही । मई में अनधिकार प्रवेश के चलते मुखर्जी श्रीनगर में गिरफ़्तार कर लिए गए लेकिन पत्राचार जारी रहा । अंततः तीनों के बीच में एक सहमति बनी जिसके तहत जम्मू, लद्दाख और कश्मीर की क्षेत्रीय स्वायतत्ता और दिल्ली समझौते के तहत अनुच्छेद 370 पर सहमति बन गई । मुखर्जी तुरंत आन्दोलन वापस नहीं ले सकते थे क्योंकि यह कायरता समझी जाती। इसी बीच जेल में  श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु हो गई । नेहरू ने प्रजा परिषद से अपना आन्दोलन वापस लेने की अपील करते हुए कहा कि क्षेत्रीय स्वायत्ता की बात मान ली गई है । 2 जुलाई को जम्मू और कश्मीर सरकार ने भी नेहरू की बात से सहमति ज़ाहिर करते हुए प्रजा परिषद के नेताओं को रिहा कर दिया और 3 तारीख़ को वे दिल्ली जाकर मिले तथा क्षेत्रीय स्वायत्ता तथा दिल्ली समझौते को लेकर सहमति बनी । इसके तहत जम्मू और कश्मीर राज्य को भारत के भीतर स्वायत्ता मिलनी थी तथा जम्मू, कश्मीर घाटी तथा लेह को जम्मू और कश्मीर राज्य के भीतर । अगर यह समझौता लागू हो पाया होता तो शायद कश्मीर समस्या पैदा ही नहीं होती या फिर होती तो भी उसका यह स्वरूप नहीं होता । लेकिन जनसंघ ने इसे मानने से इंकार कर दिया । बलराज मधोक के अनुसार इसके लिए उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अनुदेश मिले  थे । इसके बाद जनसंघ ने 370 तथा क्षेत्रीय स्वायत्ता के ख़िलाफ़ ज़ोर-शोर से आन्दोलन शुरू कर दिया ।( देखें, ग्रेटर कश्मीर में बलराज पुरी का लेख)  

2- नब्बे के दशक की भयानक स्थितियों के बाद भारत सरकार की ओर से कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया फिर से शुरू करने और बातचीत द्वारा मुद्दे को हल करने की पहली कोशिश 4 नवम्बर 1995 को हुई जब पश्चिम अफ्रीकी देश बुर्किना फासो से तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहाराव ने राष्ट्र के नाम एक संबोधन में जम्मू और कश्मीर के नागरिकों को संबोधित करते हुए कहा- पिछले छः सालों में कश्मीर के लोगों ने आतंकवाद के चलते अभूतपूर्व कष्ट सहे हैं. लोगों ने अकथ हिंसा झेली है जो मौतों और तबाही में तब्दील हुई है. हज़ारों लोग अपने घर-परिवार से उखाड़ दिए गए हैं. यह आभासी छद्म युद्ध सीमा पार से छेड़ा गया है जो पूरी तरह से अंतर्राष्ट्रीय नियमों, अच्छे पड़ोसी सम्बन्धों और मानवीय व्यवहार तथा शिष्टाचार के सभी सिद्धांतों का उल्लंघन है…जम्मू और कश्मीर राज्य और उसके निवासी भारत के वैविध्यपूर्ण अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है. इसलिए हम उनके कष्टों के मूकदर्शक नहीं हो सकते. पहले ही उन्होंने बहुत सहा है. हम राज्य में सामान्य स्थिति लाने का और हर आँख से आँसू पोछ देने का अपना संकल्प ज़ाहिर करते हैं.  

 इसी भाषण में उन्होंने एक योजना प्रस्तुत की जिसमें 370 को जारी रखने, भारतीय संविधान के तहत स्वायत्तता  देने और सदर ए रियासत तथा वज़ीर ए आज़म का संबोधन फिर से देने, राज्य के लिए राजनैतिक तथा आर्थिक पैकेज के साथ-साथ राज्य का विभाजन न करने तथा शेख़ अब्दुल्ला और इंदिरा गाँधी के बीच हुए कश्मीर समझौते के तहत आगे बढ़ने की बात थी. हालाँकि इसे लेकर कश्मीर में कोई सकारात्मक माहौल नहीं बना और यह नेशनल कॉन्फ्रेंस तक को प्रभावित करने में असफल रहा लेकिन इसने आगे बढ़ने का रास्ता तो खोला ही. दुलत बताते हैं कि नरसिंहाराव शब्बीर शाह को कश्मीर चुनावों में हिस्सा लेने के लिए राज़ी करना चाहते थे. यह दिल्ली की किसी अलगाववादी नेता को मुख्यधारा में लाने की पहली कोशिश थी. लेकिन शब्बीर के टालमटोल के चलते यह संभव नहीं हुआ. (द बाजपेयी इयर्स, दुलत-75-77) नरसिंहा राव के पास बहुत समय था भी नहीं.

मई 1996 के चुनावों में कांग्रेस हार गई. जम्मू और कश्मीर में इस चुनाव का व्यापक पैमाने पर बहिष्कार हुआ. लेकिन उसी साल जम्मू और कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए और राष्ट्रपति शासन के लम्बे दौर का अंत हुआ. देश की नई गठबंधन सरकार ने नवम्बर 1996 में राज्य की आतंरिक स्वायत्तता  को परिभाषित करने के लिए एक राज्य स्वायत्तता  कमेटी बनाई जिसका अध्यक्ष करण सिंह को बनाया गया. कमेटी शुरू से ही विवादों में रही. अब्दुल्ला परिवार और करण सिंह की अनबन जगज़ाहिर थी. मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला पर हस्तक्षेप का आरोप लगाकर करण सिंह ने अगस्त, 1997 में इस्तीफ़ा दे दिया तो क्षेत्रीय स्वायत्तता  पर बनी एक उप समिति के अध्यक्ष बलराज पुरी को समिति से हटा दिया गया. वर्ष 2000 में जब समिति की रिपोर्ट आई तो केंद्र में बाजपेयी की सरकार आ चुकी थी. राज्य विधानसभा से पारित इस रिपोर्ट को एनडीए की सरकार ने खारिज़ कर दिया. (देखें, पेज़ 123-126, माय कश्मीर द डाइंग ऑफ़ द लाईट, वजाहत हबीबुल्लाह, पेंग्विन बुक्स, दिल्ली- 2014)

असल में कश्मीर को फिर से 1953 वाली स्थिति मे ले जाने के प्रस्ताव वाली इस रिपोर्ट से सिवाय नेशनल कॉन्फ्रेंस के कोई ख़ुश नहीं था, न बाजपेयी, न जम्मू और कश्मीर का विपक्ष और न ही हुर्रियत कॉन्फ्रेंस। हालाँकि बाद में वाजपेयी ने रुख बदला और बार-बार स्वायत्तता की बात की जिसे हाल ही में चिदम्बरम ने दोहराया और प्रधानमंत्री मोदी से ‘देशविरोध ’ का तमगा पाया।

(अशोक कुमार पाण्डेय की किताब ‘कश्मीरनामा : इतिहास और समकाल’ राजपाल एंड संस प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य है।)

 

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