Home दस्तावेज़ मोदीनामा : बीते पांच साल का हिसाब और आगामी वर्षों की भूमिका

मोदीनामा : बीते पांच साल का हिसाब और आगामी वर्षों की भूमिका

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असल में संकट ये है कि पुराना मर रहा है और नया पैदा नहीं हो सकता। इस बीच की खाली जगह में लागातार अलग-अलग तरह की बीमारियों के लक्षण पनप रहे हैं।

– अंतोनियो ग्राम्‍शी, जेल नोटबुक, 1930


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के तौर पर अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाला एक व्यक्ति नरेंद्र दामोदरदास मोदी, दुबारा भारत के प्रधानमंत्री पद के लिए चुना गया है। यह पहली बार है जब दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी सरकार दुबारा सत्ता में आई है। इनकी पिछली सरकार (1998-2004) सत्ता से बाहर कर दी गई थी। मोदी की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)– और उसके साथी नेशनल डेमोक्रेटिक अलाएंस (एनडीए)– को इस बार 2014 से भी अधिक वोट और सीटें मिलीं। लोकसभा में भाजपा के सांसदों में से एक भी मुसलमान सांसद नहीं है। यानी भारत के सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय (200 मिलियन से अधिक जनसंख्या वाले) से एक भी व्यक्ति को संसद नहीं भेजा गया है।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने कहा था कि भारत ने ‘2014 से गलत दिशा में एक लंबी छलांग लगाई है’। सेन और कुछ अन्य विद्वानों ने कहा कि इस चुनाव में भारत का विचार और उसकी छवि दांव पर है। यह अलग तरीके से तय किया गया था जिससे कि हर दो भारतीय में से एक का वोट एनडीए को गया है। भाजपा और एनडीए के समर्थकों का उत्साह, उनका जोश, उनकी ताकत और उनके उन्माद को देखकर समझ आता है कि मोदी के नया भारत या ‘न्यू इंडिया’ का जादू उनके सिर चढ़ कर बोल रहा है। मोदी के नए भारत का चेहरा बिल्कुल अलग होगा। आजादी की लड़ाई और आंदोलनों से निकले आजाद भारत से इस चेहरे का मिलान करना नामुमकिन जैसी कोई बात होगी।

2019 के लोकसभा चुनाव के परिणामों ने सबको चौंका दिया है, लेकिन इससे जो बातें सामने आई हैं वो बहुत सी और बातों को स्पष्ट कर देती हैं। मोदी और भाजपा ने सत्‍ता के लीवर पर अपनी जोरदार पकड़ बना रखी है। भारतीय संविधान के मूल्यों और सिद्धांतों के लिए उनकी प्रतिबद्धता नाममात्र है। संविधान के निर्माताओं द्वारा बनाए गए संस्थागत नियंत्रण और संतुलन को उलट-पलट देने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं है। वे भारतीय गणतंत्र को धर्म के आधार पर बहुसंख्यकों का देश बना देना चाहते हैं। धार्मिक अल्पसंख्यकों और राजनैतिक विरोधियों को वे आंतरिक शत्रुओं की तरह प्रदर्शित करते हैं। ‘भारत का मतलब हिंदू भारत’ जैसी जो अफवाहें ये उड़ाते हैं, वह बिल्कुल आरएसस और उसके सहयोगियों का नज़रिया है। राज्य की शक्तियों के बल पर किए गए प्रचार, संघ परिवार और उसके अन्य साथी संगठनों के नेटवर्क और व्यापक प्रसार की मदद से मोदी और भाजपा एक बड़े निर्वाचन क्षेत्र में अपने आड़े आने वाली जाति और धर्म की बाधाओं को पार करने में सफल रहे हैं। इन्हीं निर्वाचन क्षेत्रों ने मोदी के पुनर्निर्वाचन को फिर से हवा दी। मोदी और सिर्फ मोदी।

क्या यह कहना ही काफी नहीं कि भारत अपने धर्मनिरपेक्ष अतीत और सांप्रदायिक भविष्य के बीच फंस कर रह गया है? यह किताब मोदी के शुरुआती पांच वर्षों की समीक्षा पर आधारित है और जो किसी भी द्वंद्व के परे है। धर्मनिरपेक्ष अतीत में भी सामाजिक पदानुक्रम और धार्मिक असहिष्णुता के बीज थे, मोदी जिनका विस्तार करने में सक्षम थे। पुलवामा आतंकी आक्रमण के संदर्भ में अंध-राष्ट्रभक्ति को बाह्य शत्रु और कट्टर दुश्मन जैसे विचारों की मदद से एकत्र करना और उस उन्माद का अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लेना, युद्ध विरोधी मीडिया का आत्मसमर्पण कर देना, इन सारी घटनाओं से उस सड़ांध को साफ-साफ महसूस किया जा सकता है।

जब थोड़ी शांति होगी तब लोगों को समझ आएगा कि यह पूरा चुनाव, सोशल मीडिया खासकर व्हाट्सएप्प समूहों और चुनाव में खर्च की जा रही मोटी धनराशि से प्रभावित था और उसी के बल पर जीता गया है। ये सारी बातें सच हैं, लेकिन मीडिया और पैसे भी इसलिए सफल हो सके क्योंकि वे दशकों से संघ परिवार द्वारा बोयी जा रही दक्षिणपंथी संवेदना को हवा देने में सक्षम हो पाये। विविधता और समावेश की आवाजों को चुप करा दिया गया। किसानों के संकट, बेरोजगारी, मुद्रास्फीति, जैसे जीवन और आजीविका से जुड़े जरूरी मुद्दों की तरफ से लोगों का ध्यान पूरी तरह हटा दिया गया।

यह विपक्षी दलों के लिए गंभीर आत्मविश्लेषण का समय है। साथ ही वामपंथी दलों व अन्य क्षेत्रीय दलों के अलावा नागरिक समाज संगठनों के लिए भी उतने ही गहरे आत्मविश्लेषण का समय है। जो समावेशी और विविधतापूर्ण भारत के निर्माण का सपना देखते हैं उन्हें ये सोचना होगा कि जीवन और आजीविका जैसी आधारभूत बातें इन चुनावों का मुद्दा क्यों नहीं बन पायीं। ऐसा क्यों है कि सामान्य और सभ्य लोगों के लिए भी हिंदुत्व के ठगों और ठेकेदारों की कट्टरता और क्रूरता बेमानी हो गयी है? आज आक्रामक और मर्दवादी कट्टरवाद हमारे समाज के लिए एक सामान्य सी बात क्यों हो गयी है?

कहने का मतलब है कि ऐसा क्यों है कि बेहद जरूरी मुद्दे आज गैरजरूरी हो गये हैं? क्या इसके पीछे सिर्फ पैसा और मीडिया है या इससे भी बड़ी कोई और रुकावट है? विपक्ष के बीच की टूटन, देश के प्रमुख हिस्सों के आधे-अधूरे गठबंधन जैसी बातें कुछ हद तक तो इन सवालों के जवाब देती हैं लेकिन जो सवाल हमने यहाँ उठाए हैं वो चुनावी समीकरणों और जोड़-तोड़ से कहीं आगे और गहरे हैं। असल में मोदी और भाजपा ने सिर्फ चुनावी नक्शों को ही नहीं बदला है बल्कि सामाजिक मानदंडों के तोड़-फोड़ की भी शुरूआत कर दी है।

2019 के चुनाव के बाद दिए गए अपने पहले भाषण में मोदी ने कहा था कि वह संविधान की मर्यादा को बनाये रखेंगे जबकि उनके पहले कार्यकाल के पांच वर्षों पर गौर करें तो उनकी कथनी और करनी के अंतर को साफ-साफ देखा जा सकता है। आने वाले पांच साल, पिछले पांच वर्षों से कुछ अलग होंगे इसकी कल्पना भी करना अनाड़ीपने की हद होगी। यह किताब प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के पिछले पांच वर्षों की यात्रा को देखते हुए आने वाले पांच वर्षों के लिए एक चेतावनी है।

(सुभाष गाताड़े की नई पुस्‍तक ‘मोदीनामा’ की यह भूमिका है)


ISBN: 978-81-940778-5-5
LeftWord Books, New Delhi, 2019
Language: Hindi, 131 pages, 5.5″ x 8.5″
Price INR 195.00 Book Club Price INR 137
(https://mayday.leftword.com/catalog/product/view/id/21471)

सुभाष गाताडे (जन्म 1957) वामपंथी एक्टिविस्ट, लेखक और अनुवादक हैं. चार्वाक के वारिस (हिंदी, 2018), आंबेडकर आणि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (मराठी, 2016), बीसवीं सदी में आंबेडकर का सवाल (हिंदी, 2014), गोडसे की औलाद (उर्दू, 2013), गोडसेज़ चिल्ड्रेन: हिंदुत्व टेरर इन इंडिया (अंग्रेजी, 2011) और द सेफ्रन कंडीशन (अंग्रेजी, 2011) इनकी महत्वपूर्ण किताबें हैं। गाताडे, बीच-बीच में बच्चों के लिए भी लेखन कार्य करते हैं. पहाड़ से ऊँचा आदमी (हिंदी, 2010) उनकी ऐसी की एक रचना है।  

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