Home दस्तावेज़ फ़ीरोज़ गाँधी: जिन्होंने पत्रकारों के लिए खुलवाए संसद के दरवाज़े

फ़ीरोज़ गाँधी: जिन्होंने पत्रकारों के लिए खुलवाए संसद के दरवाज़े

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8 सितंबर, पुण्यतिथि पर विशेष…

भारतीय राजनीति में गाँधी परिवार के असर से बच्चा-बच्चा वाक़िफ़ है, लेकिन इस परिवार के पितृपुरुष यानी फ़ीरोज़ गाँधी के बारे में बड़े-बडे भी कम ही जानते हैं। हालाँकि इंदिरा गाँधी के पति, राजीव गाँधी और संजय गाँधी के पिता, सोनिया गाँधी के श्वसुर और मौजुदा काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के दादा फ़ीरोज़ गाँधी की भूमिका, भारत के संसदीय इतिहास में ऐसी नहीं हैं कि वे गुमनाम हो सकें।

आज संसद की कार्यवाही लोग घर बैठे टेलिविज़न पर देखते हैं। न सिर्फ़ बहस-मुबाहिसा बल्कि अक्सर होने वाला हो-हल्ला भी लोगों की नज़र के सामने रहता है अख़बार और निजी चैनलों में भी संसद की कार्यवाही की रिपोर्टिंग होती है। यह लोकतंत्र में पारदर्शिता की मिसाल है। लेकिन जो व्यक्ति इसकी बुनियाद मे है उस फ़ीरोज़ गाँधी के बारे में आमतौर पर पत्रकार भी, इस संबंध में कोई चर्चा नहीं करते। जबकि भारत की पत्रकारिता के इतिहास में फ़ीरोज़ गाँधी का नाम कभी भुलाया नहीं जा सकता। इसकी वजह वह प्रसिद्ध ‘संसदीय कार्यवाही संरक्षण विधेयक-1956’  है जो उन्होंने निजी हैसियत से पेश किया था। देश के संसदीय इतिहास में बहुत कम निजी बिल (14 या 15) ही ऐसे हैं जो क़ानून की शक्ल ले सके।

संसद की कार्यवही पहले ‘विशेषाधिकार’ के तहत आती थी। अख़बारों में इसकी रिपोर्टिंग नहीं हो सकती थी। लेकिन इस विधेयक के क़ानून बन जाने की वजह से संसद की कार्यवाही को सच्चाई के साथ पेश करने वाले पत्र और पत्रकारों को क़ानूनी संरक्षण हासिल हो गया। राज्यों में विधानसभा की कार्यवाही की भी रिपोर्टिंग होने लगी। अभियव्यक्ति की आज़ादी के लिहाज़ से इसे एक बड़ा क़दम था। फ़ीरोज़ गाँधी ख़ुद पत्रकार थे और नेहरू द्वारा स्थापित नेशनल हेराल्ड के संचालन में उनकी अहम भूमिका थी।

फ़ीरोज़ गाँधी लोकतंत्र और भ्रष्टाचार के लिए काफ़ी मुखर थे। नेहरू सरकार के दौर में जड़ पकड़ रहे भ्रष्टाचार के मामलों को उठाने में वे किसी विपक्षी नेता से भी आगे रहे। उन्हें सरकारी पक्ष में विपक्ष के नेता की हैसियत प्राप्त थी जो अपने तर्कों और तथ्यों से नेहरू जैसे स्टैट्समैन को भी असहज कर देता था। प्रसिद्ध मूँदड़ा कांड में, उनके दमदार संसदीय वक्तव्यों की वजह से ही वित्तमंत्री टी.टी.कृष्णामाचारी को इस्तीफ़ा देना पड़ा था। आज के दौर में जब सत्ताधारी दल का हर सांसद आँख मूँदकर सरकार की हाँ में हाँ मिलाता है, फ़ीरोज़ गाँधी संसदीय इतिहास में एक सुखद उपस्थिति की तरह लगते हैं।

फ़िरोज़ गाँधी स्वतंत्रता सेनानी थे। कभी गाँधी जी ने कहा था कि अगर फ़ीरोज़ की तरह सात नौजवान उन्हें मिल जाएँ तो भारत को जल्द से जल्द स्वराज मिल सकता है। इलाहाबाद के रहने वाले फ़ीरोज़ का ‘सुराजी’ कमला नेहरू का आंदोलन में साथ देने की वजह से आनंद भवन आना-जाना शुरू हुआ जिसकी परिणति 1942 में इंदिरा गाँधी के साथ उनके विवाह से हुआ। किसी पारसी का किसी ब्राह्मण कन्या से विवाह, उस दौर में एक क्रांतिकारी घटना थी। समाजवादी विचारों और पश्चिमी संगीत का इंदिरा पर शुरुआती प्रभाव फ़ीरोज़ की वजह से ही था।

फ़ीरोज़ मस्तमौला क़िस्म के आदमी थे और काफ़ी लोकप्रिय भी। इंदिरा के साथ उनके संबंधों में खटास आ गई थी। इंदिरा पिता के साथ रहने लगी थीं। कभी एक ही ‘समाजवादी क्लब’ में रहे पति-पत्नी के विचारों में भी दूरी आ गई थी। काँग्रेस अध्यक्ष के रूप में इंदिरा गाँधी ने 1959 में दुनिया की पहली चुनी कम्युनिस्ट सरकार, यानी ईएमएस नंबदूरीपाद के नेतृत्व में बनी सरकार को बरख़ास्त कराने में अहम भूमिका निभाई तो सबसे ज़्यादा विरोध फ़ीरोज़ गाँधी ने ही किया। कहा जाता है कि तीन मूर्ति भवन मे उनका इंदिरा से ज़ोरदार झगड़ा हुआ और उसके बाद जीते जी कभी उस घर में लौट कर नहीं गए। यह भवन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आवास था जहाँ इंदिरा उनकी देखभाल के लिए रहती थीं।

फ़ीरोज़ गाँधी ने 1952 और 1957 में रायबरेली से लोकसभा चुनाव जीता था। 8 सितंबर 1960 को सिर्फ़ 47 साल की उम्र में उनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। कहा जाता है कि यह तब हुआ जब उनका पारिवारिक जीवन फिर से स्थिर होने वाला था। तमाम मतभेद कमज़ोर पड़े थे और इंदिरा और बच्चों के साथ वे प्रधानमंत्री आवास से अलग रहने के लिए दिल्ली में घर बनाने की तैयारी कर रहे थे। इंदिरा गाँधी की जीवनीकार, पत्रकार डॉम मोरस ने लिखा है कि उन्होंने पूछा था कि उन्हें सबसे ज़्यादा तक़लीफ़ किसकी मौत से हुई ? इंदिरा ने जवाब दिया था-“मेरे पति फ़ीरोज़ की मौत से क्योंकि वे अचानक इस दुनिया से चले गए। मैं शायद उन्हें नापसंद करने लगी थी लेकिन मैं उन्हें बहुत प्यार भी करती थी।”

शायद यह प्यार ही था कि इंदिरा गाँधी ने फ़ीरोज़ गाँधी के क्षेत्र रायबरेली को अपना कर्मक्षेत्र बना लिया। जहाँ वे पहली बार फ़ीरोज़ का चुनाव संभालने पहुँची थीं। यह क्षेत्र फ़ीरोज़ गाँधी की गर्मजोशियों की यादों से भरा था जहाँ वे सड़क किनारे चाट खा सकते थे या फिर किसी ग़रीब के घर चारपाई पर बेतक़ल्लुफ़ बैठ मिलते थे।

 

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