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प्रेस की आजादी पर हमले का कर्नाटक का इतिहास: गौरी लंकेश के लेखों के संग्रह से चुनिंदा अंश

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कानून बनाने वालों को पत्रकारों के बारे में फैसला सुनाने की जरूरत नहीं है

गौरी लंकेश

कर्नाटक के विधायकों में काफी पहले से अपने कीमती ‘संसदीय विशेषाधिकारों‘ के कथित हनन के लिए पत्रकारों को कठघरे में खड़ा करने की प्रवृत्ति रही है। इसका हालिया निशाना बनने वालों में दो स्थानीय समाचार पत्रों के संपादक रवि बेलागरे और अनिल राजू बने। विधानसभा अध्यक्ष और सदन की विशेषाधिकार समिति के अध्यक्ष के. बी. कोलीवाड़ ने विधायकों- कांग्रेस के बी. एम. नागराज, भारतीय जनता पार्टी के एस. आर. विश्वनाथ और स्वयं कोलीवाड़ के बारे में कथित रूप से मानहानि करने वाले लेख प्रकाशित करने और इस तरह से उनके ‘दिखावटी तौर पर नैतिक’ विशेषाधिकारों का हनन करने के कारण दोनों संपादकों को एक एक साल की कैद की सजा सुनाने के साथ ही उन पर दस-दस हजार रुपए का जुर्माना भी किया था।

यहां पर यह सवाल नहीं है कि दोनों संपादकों ने अपने अखबार में क्या प्रकाशित किया क्योंकि जैसा कि कानूनविदों ने बताया कि उन्होंने जो प्रकाशित किया था वह मानहानिकारक हो सकता है परंतु विशेषाधिकार का हनन नहीं। यहां सवाल निर्वाचित प्रतिनिधि द्वारा भोगे जा रहे औपनिवेशिक विरासत के ‘संसदीय विशेषाधिकारों’ का है। ऐसा पुराना कानून, जो विधि निर्माताओं को न्यायाधीश बनने और पत्रकारों को जेल भेजने की इजाजत देता है, लोकतंत्र में होना ही नहीं चाहिए।

1980 तक कर्नाटक में पत्रकारिता को एक शांत और गंभीर काम माना जाता था। यहां तक कि सत्तारूढ़ कुलीन वर्ग की आलोचना में भी बहुत ही संयमित भाषा का इस्तेमाल होता था। परंतु तभी लंकेश पत्रिके अपनी पूरी अनादर वाली भाषा और बुरे को बुरा कहने वाले रुख के साथ प्रकाशित हुई। अपने पाठकों को खुश करते हुए पत्रिका के संपादक पी. लंकेश ने तत्कालीन मुख्यमंत्री आर. गुंड़ू राव को ‘गम’ और वरिष्ठ मंत्री एस. बंगारप्पा को ‘बम‘ के रूप में पेश किया।

उसी समय के आसपास, 1980 के दशक में ही राज्य भर के किसान आंदोलित थे, दलित आंदोलन गोकक आंदोलन (जिसने राज्य सरकार द्वारा संचालित स्कूलों में कन्नड़ भाषा को प्रमुखता देने की मांग की थी) की तरह ही जोर पकड़ रहा था। कांग्रेस सरकार के विरुद्ध अंदर ही अंदर जबर्दस्त आक्रोश पनप रहा था। पत्रिके सभी मुद्दों की आवाज बन गया। पत्रिके के तीखे हमले से राव इतने अधिक क्रुद्ध हो गए कि 1981 में उन्होंने एक सार्वजनिक समारोह में यह घोषणा कर दीः ‘‘सभी पत्रकारों को अरब सागर में फेंक दिया जाना चाहिए।’’

यह राव के उत्तराधिकारी रामकृष्ण हेगड़े थे, जिन्होंने विधायकों के विशेषाधिकारों के नाम पर प्रेस की आजादी का गला दबाने का वास्तव में प्रयास किया हालांकि उन्हें मुख्यधारा की मीडिया ‘असली मिस्टर क्लीन‘, ‘प्रधानमंत्री बनने की तैयारी में’ आदि नामों के साथ पेश कर रही थी, परंतु एक बार फिर पत्रिके ही थी जिसने रेवाजीतू आवासीय घोटाला (1988),नान रेज़ीडेंट इंडियंस हाउसिंग एसोसिएशन भूमि घोटाला (1989) और अरक बाटलिंग ठेकों के आवंटन में अनियमितताओं (1984) को उजागर किया।

प्रेस की आजादी को संहिताबद्ध करने की आड़ में, हेगड़े ने कर्नाटक विधानमंडल (शक्तियां, विशेषाधिकार और छूट) विधेयक 1988 लाने का प्रयास किया। चूंकि इस विधेयक में पत्रकारों को ज्यादा दंड देने की अनुमति देता था, इसलिए जनता में जबर्दस्त आक्रोश हुआ। कुछ महीने बाद, हेगड़े को अपनी सरकार द्वारा टेलीफोन टैपिंग के आरोपों के कारण इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया गया। उनके उत्तराधिकारी एस. आर. बोम्मई ने इस विधेयक को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

परंतु जनता पार्टी के ही एक अन्य मुख्यमंत्री जे. एच. पटेल का मामला ऐसा नहीं था। 1997 में पत्रिके ने अपने मुखपृष्ठ के लेख में महिला विधायकों द्वारा अपने कर्तव्यों का ठीक से पालन नहीं करने के लिए उनकी आलोचना की थी (निश्चित ही ये लेख सुरुचिपूण नहीं था) महिला विधायकों ने दलगत से ऊपर उठते हुए सदन में आंसू बहाए और लंकेश से स्पष्टीकरण लेने की मांग की। मुख्यमंत्री पटेल और अन्य मंत्री तथा विधायकों ने, जिन्होंने पत्रिके की आलोचनाओं का दंश झेला था, विशेषाधिकार नोटिस का समर्थन किया।

इसका एकमात्र अपवाद निर्दलीय विधायक वाताल नागराज थे, जिन्होंने 1980 में उनके खिलाफ एक लेख प्रकाशित करने पर लंकेश पर हमला किया था। नागराज अब यह तर्क देते हैं कि हालांकि लेख हो सकता है कि मानहानिकारक रहा हो परंतु यह विधायकों के विशेषाधिकारों के अंतर्गत नहीं आता है। यद्यपि इस मुद्दे ने कुछ दिन विधानसभा में हंगामे की स्थिति पैदा कर रखी थी, तत्कालीन अध्यक्ष रमेश कुमार ने विवाद थमने का इंतजार किया और बाद में इस मामले को खामोशी से खत्म होने दिया।

यह सिर्फ लंकेश और उनका प्रकाशन ही नहीं था जिन पर विधायकों ने हमला किया। यहां तक कि टी. जे. एस. जार्ज जैसे सम्मानित पत्रकारों पर भी सदन से अभद्र भाषा में निशाना बनाया गया। इसके बाद के वर्षों में प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों और साप्ताहिक प्रकाशनों के संपादकों और लेखकों को नियमित रूप से विशेषाधिकार समिति के समक्ष बुलाया जाता रहा है। ऐसा लगता है कि समिति का यह दृढ़ मत है कि विधायकों का हवाला जिक्र करना, सदन के बाहर की उनकी कारगुजारियों या उनके द्वारा सत्ता का दुरूपयोग करने की घटनाओं का पर्दाफाश करना पत्रकारों के दायरे से बाहर है क्योंकि वे ‘निर्वाचित प्रतिनिधि’ हैं और इसलिए वे दूसरों से अलग हैं। अधिकांश शिकायतों का प्रताड़ना या क्षमा याचना के प्रकाशन से निस्तारण कर दिया गया परंतु प्रेस को आंखें दिखाने की बढ़ती प्रवृत्ति असंदिग्ध है।

2012 में, जब भारतीय जनता पार्टी के जगदीश शेट्टर राज्य के मुख्यमंत्री थे, दो विधायकों ने यह सुनिश्चित किया कि एक संपादक विधानसभा से माफी मांगे। भाजपा के अभय पाटिल और कांग्रेस के श्याम बी. जार्ज का आरोप था कि बेलगावी से प्रकाशित होने वाले मराठी दैनिक तरुण भारत ने उनके खिलाफ एक निराधार खबर प्रकाशित की है। विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष के. जी. बोपैया ने उनकी शिकायतें विशेषाधिकार समिति के पास भेज दी थी जिसने तरुण भारत के संपादक किरण ठाकुर को दोषी पाया। ठाकुर को सदन में विशेष रूप से बनाए गए कठघरे खड़ा होकर यह कहने के लिए बाध्य किया गया, ‘‘मैं क्षमा चाहता हूं। मेरे समाचार पत्र ने इस सदन की गरिमा और प्रमुखता को कम आंकने जैसा कोई सामग्री कभी भी प्रकाशित नहीं की है।‘‘ हालांकि अपने एक सहयोगी को सार्वजनिक रूप से इस तरह अपमानित होना पड़ा परंतु अजीब बात यह थी कि कर्नाटक में पूरी मीडिया बिरादरी इस पर खामोश रही।

कन्नड़ में 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों की संख्या बढ़ने के साथ ही स्थिति और अधिक चिंताजनक हो रही है। यह कहना अनावश्यक है कि अर्णब गोस्वामी जैसे स्थानीय नमूनों की कोई कमी नहीं है। वे चर्चा में भाग लेने वालों को उनके दृष्टिकोण से इतर राय रखने वाले प्रतिभागियों को चीख कर खामोेश करते हैं, वे स्वयंभू राष्ट्रवादियों से कहीं अधिक देशभक्त हैं और दिन में हर क्षण ब्रेकिंग न्यूज में तथ्यों को बढ़ा चढ़ा कर पेश करने के आदी हैं।

इस साल मार्च के महीने में कांग्रेस, भाजपा और जनता दल (सेक्यूलर) के अनेक विधायक उनके बारे में ‘गलत तरीके से तस्वीर पेश करने‘, ‘तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने’ और ‘गलत खबरें देने‘ पर टीवी चैनलों की निंदा के लिए एकजुट हुए। भाजपा के सुरेश गौड़ा, जिन्हें एक टोल बूथ पर एक कर्मचारी की पिटाई करते सीसीटीवी कैमरे ने कैद किया था, सदन में शिकायत की कि एक टीवी चैनल ने उन्हें ‘राउडी सुरेश गौड़ा‘ बताया। उन्होंने कहा, ‘‘उन्होंने गुंडा और सड़कछाप जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने जन प्रतिनिधियों के खिलाफ इनका इस्तेमाल किया।’’

अंततः कोलीवाड़ ने घोषणा की कि सभी दलों के सदस्यों वाली एक सदन की समिति मीडिया के लिए दिशानिर्देश और नियम बनाएगी। इसकी स्वाभाविक रूप से मीडिया बिरादरी में तीखी प्रतिक्रिया हुई। सबसे दिलचस्प बात तो यह हुई कि हालांकि भाजपा के अनेक विधायकों ने मीडिया के लिए दिशानिर्देश बनाने पर पहले जोर दिया था परंतु बाद में उन्होंने इस समिति में शामिल होने से यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि वे मीडिया की आजादी पर अंकुश लगाने के पक्ष में नहीं है। जबर्दस्त प्रतिवाद की वजह से ऐसा लगता है कि यह समिति सुप्त अवस्था में आ गई है।

बेलागेरे और राजू को सुनाई गई सजा की वजह से यह मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। बेलागेरे की पत्रकारिता की शैली निश्चित ही हर कोई पसंद नहीं करता है। ऐसा लगता है कि लोगों को राजू या उसके प्रकाशन एलहंका वायस के बारे में अधिक जानकारी नहीं हैं। फिर भी, महत्वपूर्ण यह है कि विधायकों को पत्रकारों के मामले में फैसला सुनाने का कोई हक नहीं है। यही सही समय है कि उन्हें उनके विशेषाधिकारों से वंचित किया जाए। यदि उन्हें लगता है कि उनकी मानहानि हुई है तो उन्हें भी आम नागरिकों की तरह ही दंड प्रक्रिया संहिता की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत कानूनी तरीका अपनाना चाहिए। एक पुराने कानून के माध्यम से आलोचकों को सजा देने की बजाए उनके लिए संवैधानिक दृष्टि से यह अधिक बेहतर तरीका होगा।


(गौरी लंकेश की चुनिंदा रचनाओं के संकलन “मेरी नजर से” का यह अंश किताब के प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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