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प्रमुख सचिव से करोड़ों का विज्ञापन झटकने वाला औसत पत्रकार बना संपादक !

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भाऊ कहिन-9

यह तस्वीर भाऊ की है…भाऊ यानी राघवेंद्र दुबे। वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे को लखनऊ,गोरखपुर, दिल्ली से लेकर कोलकाता तक इसी नाम से जाना जाता है। भाऊ ने पत्रकारिता में लंबा समय बिताया है और कई संस्थानों से जुड़े रहे हैं। उनके पास अनुभवों ख़ज़ाना है जिसे अपने मशहूर बेबाक अंदाज़ और सम्मोहित करने वाली भाषा के ज़रिए जब वे सामने लाते हैं तो वाक़ई इतिहास का पहला ड्राफ़्ट नज़र आता है। पाठकों को याद होगा कि क़रीब छह महीने पहले मीडिया विजिल में ‘भाऊ कहिन‘ की पाँच कड़ियों वाली शृंखला छपी थी जिससे हम बाबरी मस्जिद तोड़े जाते वक़्त हिंदी अख़बारों की भूमिका के कई शर्मनाक पहलुओं से वाक़िफ़ हो सके थे। भाऊ ने इधर फिर से अपने अनुभवों की पोटली खोली है और हमें हिंदी पत्रकारिता की एक ऐसी पतनकथा से रूबरू कराया है जिसमें रिपोर्टर को अपना कुत्ता समझने वाले, अपराधियों को संपादकीय प्रभारी बनाने वाले और नाम के साथ अपनी जाति ना लिखने के बावजूद जातिवाद का नंगानाच करने वाले संपादकों का चेहरा झिलमिलाता है। ये वही हैं जिन्होंने 40 की उम्र पार कर चुके लोगों की नियुक्ति पर पाबंदी लगवा दी है ताकि भूल से भी कोई ऐसा ना आ सके जिसके सामने उनकी चमक फ़ीकी पड़ जाए ! ‘मीडिया विजिल’ इन फ़ेसबुक संस्मरणों को ‘भाऊ कहिन’ के उसी सिलसिले से जोड़कर पेश कर रहा है जो पाँच कड़ियों के बाद स्थगित हो गया था-संपादक

 

हम अपने लिये कब लड़ेंगे साथी ?

यह प्रमुख सचिव यह भी तय करता था कि खबर क्या हो ।
घण्टों इस दरबार में नियमित हाजिरी लगाने वाले उसके न्यूज सेंस की तारीफ करते अघाते नहीं थे ।
एक गंम्भीर बीमार , किसी हस्पताल में भर्ती पत्रकार के लिये अच्छे होने तक चिकित्सा में आर्थिक सहायता की दरख्वास्त लेकर गए उसके साथी को उसने घूर कर ऊपर से नीचे तक देखा ।
वह सिहर गया था ।
प्रमुख सचिव ने पूछा –
आज तो बॉटम स्टोरी आपकी देखी ।
— जी , वह … दरअसल ..।
— ठीक है , लेकिन ख्याल रखा कीजिए .. आप लोगों से कितनी फ्रेंडली है यह सरकार ।
— जी ।
एक दूसरे से इर्ष्या और एक दूसरे का ‘ काम लगाना ‘ तो यहां सतत चलते रहने वाला सहज आचरण है । यही धारण करने योग्य उच्च जीवन मूल्य भी । अब धर्म भी ।
एक बहुत ही प्रभावी, तकरीबन आला हैसियत के एक मंत्री से एक पत्रकार ने पूछा –
— वह .. ( किसी का नाम लेकर ) सुबह सबेरे ही रोज आपके आवास पर आकर क्यों बैठ जाता है ..
— और मिलना मेरी मजबूरी है .. इसलिये कि मैं पीछे से निकल जाऊं , संभव नहीं है । मेरे आवास में पीछे से निकल जाने का कोई रास्ता नहीं है ।
मंत्री के यहां आने-जाने वालों में एक थुलथुल और गंजे वह पत्रकार भी थे जिन्होंने अंग्रेजी , तय है मेडिकल रिप्रजेंटेटिव या एयर होस्टेस से ही सीखी होगी ।
उन्हें अयोध्या में बाबरी ध्वंस या नेपाल राजघराने में ही एक लोहमर्षक कांड की रिपोर्टिग के दौरान देखा तो था , लेकिन रिपोर्ट नहीं पढ़ी ।
अंग्रेजी को लेकर एहसास – ए- कमतरी के शिकार एक हिन्दी अखबार के प्रधान संपादक को वह भा गये ।
वह स्टेट हेड इसलिए बना दिए गए कि अंग्रेजी में बात कर सकते थे ।
हो सकता है प्रधान संपादक के टंग ट्वीस्टर हो गए हों ।
प्रधान संपादक को अक्सर संपादक के अभिनय वाला संवाद बोलना पड़ता था ।
अपने हिन्दी साम्राज्य की गरीब प्रजा के आगे 5 – 7 लाइन अंग्रेजी बोलने का दहशत पैदा करने वाला असर होता है ।
इस प्रमुख सचिव से अपने अखबार के लिये कुछ करोड़ का विज्ञापन लाने के एवज में एक बहुत औसत पत्रकार राज्य संपादक और चैनल हेड भी हो गया ।
उसका यश चतुर्दिक फैलने लगा और सरकार ने उसे अलंकृत भी कर दिया ।
विज्ञापन किसी अखबार या चैनल की अधिनिर्धारक , चालक ताकत होती है । वह अलग ही संप्रभु निकाय खड़ा करता है ।
Jअमेरिका की एक पत्रिका न्यूयार्कर में भारत के भी एक अखबार व्यवसायी का इंटरव्यू छपा था ।
उसने कहा था — … हम खबरों का नहीं यानि समाचार पत्र का नहीं विज्ञापन का व्यवसाय करते हैं ।
जाहिर हैं अखबार में 80 प्रतिशत खबरें विज्ञापन के हलके से होती हैं ।
समाज की वास्तविक अंतरयात्रा से निकले नैरेशन की जगह बेहद कम हो गई है ।
बाजार और मालिक के हित से हमबिस्तर कुछ टुच्चे संपादकों ने ऐसा ढांचा खड़ा किया है कि कहना ही होगा —
जो हलाल नहीं हुये , सब के सब दलाल हैं । जो परेशान नहीं हैं बहुत कलुषित हैं ।
दांत निपोरते , हाथ जोड़ते खड़े हैं ।
उनकी रीढ़ गायब है ।
इसीलिये ढाबे के बुझे चूल्हे में फायर झोंक कर जला रहे एक जादूगर को देख सब तालियां पीट रहे हैं ।
जिसने खींस नहीं निपोरी उसे नहीं मिलेगा इतिहास का रफ ड्राफ्ट तैयार करने का मौका ।

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मालिक और कमतर संपादकों की साज़िश ने नैसर्गिक प्रतिभा के अंकुरों पर पाथर रख दिया है !

 

इसी आने वाले 21 सितम्बर 2017 को , अपना 64 वां साल पूरा करुंगा ।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के अपने गंवई समाज में किसी के 50 पूरा करते – करते , उसे बूढ़ा मान लिया जाता है ।
इन बेचारों को हॉलीवुड के 55 पार के एक्शन हीरोज के बारे में नहीं पता ।
इन्होंने उन विज्ञापनों की बड़ी – बड़ी होर्डिंग नहीं देखी होगी जिसमें किसी सुंदरी से चिपटा , थ्री पीस सूट पहने , पकी दाढ़ी वाला कोई , किसी सूट – शर्ट वाली कम्पनी का ब्रांड दूत होता है ।
मैं उनसे अपनी तुलना नहीं कर रहा । न बाजार विज्ञापित जवानी मुझे चाहिये ।
में तो बस इतना बताना चाहता हूं कि करईल माटी से बना मैं बहुत कठजीवी , सख्तजान हूं ।
नहीं मरूंगा किसी के लाख मारे ।
10 किलोमीटर तक बिना रुके , किसी से भी तेज , आज भी चल सकता हूं ।
ट्रेन के जनरल डिब्बे में लटक कर लखनऊ से दिल्ली तक की यात्रा कर सकता हूं ।
दमा होने के बावजूद बहुत सांस है । इनहेलर जरूर रखता हूं ।
आलोचना किसी की हो सकती है ।
कमियां कुछ न कुछ सबमें होती हैं ।
लेकिन किसी को उसकी पूरी सम्पूर्णता में ,असहमति के साथ भी देखा जाना चाहिये ।

राज्यसभा सदस्य ( नहीं मालूम इस वक्त भी हैं या नहीं ) और प्रभात खबर के संपादक रहे हरिबंश जी बहुत याद आ रहे हैं । पहली मुलाकात में ही इतनी आत्मीयता से मिले कि आज तक याद हैं । बात भोजपुरी में हुई ।
उनका लिखा आज तक याद है ।
नवीन जोशी जिनकी ढाई दशक पहले लिखी एक रपट आज तक याद है — ‘ नम दूब , गुनगुनी धूप और नाश्ते में जूही चावला ।
उनके नैरेशन की तारीफ महाश्वेता जी तक ने की थी ।
यशस्वी कवि और शब्द – विचार साधक , प्रखर जन बुद्धिधर्मी वीरेन डंगवाल जिन्होंने कानपुर से प्रकाशित अमर उजाला को क्लासिक अखबार बना दिया ।
और भी कई नाम हैं । उनका जिक्र करुंगा ।

मुझे उदयन शर्मा भी याद आ रहे हैं ।
बात शायद 1991 की है ।
बस्ती में एक समारोह के दौरान कुछ बच्चे फूड प्वाइजनिंग का शिकार होकर मर गए और कुछ गंम्भीर बीमार पड़े ।
शर्मा जी तब संडे आब्जर्वर के संपादक थे ।
रिपोर्टिंग के लिए खुद ही बस्ती पहुंच गये ।
1994 में उनसे एक सेमिनार में मुलाकात हुई , चन्द्रशेखर जी , कमलेश्वर जी और रामजेठमलानी के साथ । लखनऊ में ।
वह मुझे पहले से नहीं जानते थे ।

मैंने उनसे कहा —
आप ने बस्ती के जिस हादसे की ( पूरा संदर्भ बता कर ) रिपोर्टिग की थी , उसकी रिपोर्ट मैंने भी की थी ।
उन्होंने चन्द्रशेखर जी के सामने ही मेरा कंधा थपथपाते कहा –
तुमने मुझसे अच्छी रिपोर्ट लिखी थी ।
जानता हूं उन्होंने मुझ मुफस्सिल संवाददाता की रिपोर्ट नहीं पढ़ी होगी । उत्साह बढ़ाने के लिए एक प्यारा झूठ बोल दिया होगा । किसी को सराह सकने या उसे मान्यता देने का यह हौसला आज के असुरक्षा की भावना से पीड़ित , खुद को हीन समझ रहे संपादकों में है क्या ?

किसी ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है — … मानें न मानें टैलेंट की कमी है । बल्कि उसका अकाल है ।
उन्हें वह सूरत नहीं नजर आती कि सरकार – मालिक और कमतर संपादकों की साजिशी एका की तिकड़ी ने नैसर्गिक प्रतिभा के अंकुरों पर पाथर रख दिया है ।
मैं उनकी बात सिरे से खारिज करता हूं ।
वो बतायेंगे कि आज के प्रबंध संपादकों , संपादकों को कैसा टैलेंट चाहिए ।
रामेश्वर पाण्डेय ‘ काका ‘ को इस बहस में हस्तक्षेप करना चाहिये ।
आज उनकी भी याद आ रही है ।

जारी….

भाऊ कहिन-6 —संपादक ने कहा- ये रिपोर्टर मेरा बुलडॉग है, जिसको कहूँ फाड़ डाले !

भाऊ कहिन-7–  वह संपादक सरनेम नहीं लिखता, पर मोटी खाल में छिपा जनेऊ दिखता है !

भाऊ कहिन-8- दिल्ली से फ़रमान आया- ‘प्रभाष जोशी के देहावसान की ख़बर नही जाएगी !’

5 COMMENTS

  1. Dear bhau ! Even before finishing I thought of REASONS why we specially Hindi walas( may be other indian languages also) are such . It seems primarily it is a VICIOUS CYCLE covering masses type and media. Masses are APOLITICAL .WHY ? MADE SO BY CORPORATE MEDIA .BUT WHEN YOU BECOME A BIT INTELLECTUAL THEN C MEDIA IS FORCED TO PUBLISH GOOD articles ETC

  2. We in media vigil are mainly concentrating on corporate m. Bhau talked about good JOURNALISTS
    . BUT PLEASE TELL THE PEOPLE ABOUT GOOD MEDIA. TOO MANY? WHY NOT A front OF 200 GOOD ,PRO PEOPLE ,SMALL PRINT AND NET MEDIA ?

  3. Areas of town city get english and hindi daily. So advertise s of equal cost should be given to to them all. And why not stop advertising Altogether? In city ward members will disseminate information by a rickshaw on Monday at 7to 9 pm. In village pradhan will do it. Same day same time

  4. Crores of farmers , industrial labour ,poor THELI WALA don’t get coverage or enough coverage. A coverage from revolutionary CLASS ANGLE is rare ! These crores will buy , become your hawkers. Not only that give you INPUTS . BUT capital IS listening !!! It will accept this challenge also .

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