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पुस्‍तक अंश: खुदा, हमें इन ‘विश्‍वगुरुओं’ से बचाओ!

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कर्णसुकर्ण की कहानी से कितने लोग परिचित हैं?

चीनी यात्री हुयएन त्सांग (602-664) ने अपने लेखन में उसका जिक्र किया था। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ‘‘भारत एक खोज’’  में भी इस किस्से को बयां किया गया है।

किस्सा यह है कि हयूएन त्सांग को किसी नगरी में – जो संभवतः आज के भागलपुर के आसपास स्थित थी – कर्णसुकर्ण नामक विद्वान मिला, जिसने विचित्र किस्म की पोशाक पहनी थी। अपने पेट पर मजबूत पट्टा बांधा था और सर पर मशालनुमा कोई चीज रखी थी। उससे वार्तालाप करने के पश्चात जब हयूएन त्सांग ने उससे इस विचित्र पहनावे के बारे में पूछा तो उसका जवाब था कि उसके पास इतना ज्ञान है कि उसका पेट फटा जा रहा है और वह मशाल सर पर लिए इसलिए घूमता है कि अंधेरे में पड़े लोगों को रौशनी दिखा सके।

कर्णसुकर्ण की कहानी सुन कर हम सभी हंस सकते हैं, कोई कहेगा कि पागल होगा। मैं यह नहीं समझता हूं। अगर हयूएन त्सांग ने जिक्र करना चाहा तो निश्चित ही किसी वजह से उल्लेख किया होगा। निश्चित ही उच्च कोटी का विद्वान रहा होगा, मगर वही अपने में ही मगन। आत्ममुग्ध।

बुरा न मानें! अगर मैं कहूं कि हम सभी के अंदर ‘कर्ण सुकर्ण’ कहीं छिपा है।

दरअसल आत्ममुग्धता हमारा राष्ट्रीय गुण है।  

एक उदाहरण देना चाहूंगा, जिसका जिक्र सुश्री मीरा नंदा ने अपनी किताब ‘द गॉड मार्केट: हाउ ग्लोबलायजेशन इज मेकिंग इंडिया मोर हिन्दू’ में किया है। उनके मुताबिक जानेमाने अमेरिकी थिंक टैंक ‘प्यू रिसर्च सेन्टर’ ने वर्ष 2007 में ग्लोबल एटिटयूडस अर्थात वैश्विक प्रवृत्तियों को जानने के लिए सर्वेक्षण किया जिसमें सैंतालीस मुल्कों के प्रतिभागियों से पूछा गया कि क्या वह इस प्रश्न से सहमत या असहमत हैं: ‘ हमारे लोगों में कमी हो सकती है, मगर हमारी संस्कृति बाकियों से श्रेष्ठ है।’

इसमें भारतीय अव्वल थे, सर्वेक्षण में शामिल 93 फीसदी ने कहा कि हमारी संस्‍कृति महान है, उन्हें अपनी संस्‍कृति में कुछ ऐब नज़र नहीं आता, जबकि अध्ययन में शामिल बाकी देशों के लोग उतना आत्मसंतुष्ट नहीं दिखे, वह अपनी कमियां गिना रहे थे। भारत में उन्होंने 2043 लोगों से बात की जो सभी शहरी थे, जिसका अर्थ अधिक शिक्षित थे, अंग्रेजी के जानकार थे और सम्पन्न भी थे।

वह आगे लिखती हैं कि भले ही सभी लोगों को अपनी संस्‍कृति के बारे में अधिक प्यार हो, आदर हो, मगर भारत की तुलना अन्य ‘प्राचीन सभ्यताओं ’ से करें तो दिखता है कि ‘भारत के 93 फीसदी लोगों के बरअक्स जापान के महज 69 फीसदी और चीन के महज 71 फीसदी अपनी संस्‍कृति को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ बता रहे थे।’

‘अमेरिका जो अपने सांस्‍कृतिक साम्राज्यवाद के लिए दुनिया भर में भर्त्‍सना का शिकार होता है, वह एक तरह से ऐसे मुल्क की तस्वीर पेश करता है जो गोया हीन भावना से ग्रस्त हो: महज 55 फीसदी अमेरिकी अपनी संस्‍कृति की श्रेष्ठता पर यकीन करते हैं, 24 फीसदी ने इस पर अपना सन्देह प्रकट किया और 16 फीसदी ने इस बात से पूरी तरह इन्कार किया कि उनकी संस्‍कृति महान है (भारत के लिए इससे सम्बधित आंकड़े थे, 93, 5 और 1 फीसदी)।

अगर हम अपने में ही खुश हैं तो दूसरे के विचारों पर गौर करने की जरूरत ही कहां है, अपने समाज, अपने व्यवहार, अपनी परम्पराओं की तरफ आलोचनात्मक ढंग से देखने की जरूरत कहां है?

भारत में एक प्रबल धारा है जो अपने आप को सर्वबुद्धिमान, विश्वगुरू समझती है। उपनिवेशवाद के दिनों में उठी पुनरूत्थानवादी धारा ने इसे मजबूती दी है, जिसने अपनी हार के कारणों का विश्लेषण करने के बजाय अपना अतीतगान शुरू किया। गौर करेंगे कि हर हारा हुआ व्यक्ति अतीत का महिमामंडन करने लगता है। मैक्समुलर जैसे विद्वानों ने उस हारे हुए भारतीय मानस को यह भी समझा दिया कि तुम ‘आध्यात्मिक देश’ रहे हो, इस लौकिक गुलामी पर क्यों परेशान होना?

और हम उसी में झूमे जा रहे हैं।

दिलचस्प है कि इस मामले में आम जन और शासकजनों में अदभुत एकता दिखती है। अपनी इस इमेज पर शासकगण इतने यकीन करते दिखते हैं और इतराते रहते हैं कि ऐसी निहायत अनर्गल तकरीर देने में भी उन्हें संकोच नहीं होता जो मिथकशास्त्रा/मायथोलोजी एवं विज्ञान/साइंस का आपस में घोल बना दें।

अब यह शायद भारत में ही हो सकता है कि विज्ञान कांग्रेस में – जहां दुनिया भर में अग्रणी वैज्ञानिक जुटते हैं – एक विशेष व्याख्यान एक ऐसे अर्द्धशिक्षित व्यक्ति का कराया जाए जो विद्वतजनों को बताए कि किस तरह हजारों साल पहले यहां के विद्वानों ने विमान उड़ाना सीखा था और यह पेपर पढ़ा जाए कि गोबर लिपने से किस तरह एटम बम के विकिरणों से बचा जा सकता है !

भले ही हम अपने आप को ‘‘विश्वगुरु’’  के खिताब से खुद ही नवाजे़ं और इस बात पर पूरी तौर पर यकीं करें कि ‘‘अन्य जीवित प्राणियों’ के कल्याण के लिए हमें ‘‘मौलिक योगदान’’  करना हैं, मगर उन तमाम लोगों ने – मुसाफिरों ने, शासकों ने, सिपाहियों ने या विद्वानों ने, जो कहीं बाहर से यहां पहुंचे थे – आखिर हमारे समाज को किस तरह देखा है, यह जानना थोड़ा अलग हट कर लग सकता है। हवा की ताज़ी बयार लग सकता है और उनकी बातें हमें गोया एक आईना भी प्रदान कर सकती है, जिसमें हम अपने आप को देख सकें। (वैसे भारत के एक राष्ट्र के रूप में आधिकारिक तौर पर उभरने के पहले ‘‘अन्दरूनी’’  या ‘‘बाहरी’’  किसे कहा जाए, इसका कोई ठोस आधार नहीं है; अलबत्ता हम गुफतगू की सुविधा के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं)।

ईसापूर्व 300 साल चंद्रगुप्त मौर्य के पाटलीपुत्र स्थित दरबार में मेगास्थिनिस नामक राजनयिक सेल्युकर निकेटर के प्रतिनिधि के तौर पर कई साल रूका थां। उसने उस वक्त़ ‘‘भारत के समाज’’  के बारे में लिखा है:

सभी भारतीय आम तौर पर सात तबकों में विभाजित होते हैं। एक होते हैं सोफिस्ट/तार्किक, बाकियों की तुलना में संख्या में बहुत कम, मगर शोहरत और सम्मान में सबसे ऊंची पायदान पर, क्योंकि उनके लिए यह कोई जरूरी होता कि वह शारीरिक श्रम करे, न साझा भंडार में अपने काम का एक हिस्सा प्रदान करें, दरअसल उन पर किसी भी तरह का प्रतिबंध नहीं होता, बस उन्हें यही करना होता है कि आम जन की तरफ से वह कुर्बानी ईश्वर को पेश करें।

अल बिरूनी (973-1035) , महान पर्शियन विद्वान, खगोलशास्त्रज्ञ, गणितज्ञ, मानववंशशास्त्री, इतिहासकार और भूगोल का ज्ञाता – इस्लामिक दुनिया का शायद अब तक का बहुश्रुत व्यक्ति – वह मोहम्मद गजनवी के कालखण्ड में भारत आया था।

ध्यान रहे कि उस जमाने में सिंधु नदी के इस पार रहनेवाले लोग ‘हिन्दू’  नाम से शेष दुनिया में पहचाने जाते थे।

अल बिरूनी ने यहां की सामाजिक संरचना पर लिखा था:

हिन्दू अपनी जातियों को वर्ण अर्थात रंग से चिन्हित करते हैं और वंशावलीसम्बन्धी नज़रिये से देखें तो वह उन्हें जातक अर्थात जन्म से सम्बोधित करते हैं। शुरू से ही यह जातियां चार होती हैं।

1. सबसे श्रेष्ठ जाति होती है ब्राहमण, जिसके बारे में हिन्दुओं की किताबें बताती हैं कि वह ब्रह्मा के सिर से पैदा हुईं। और चूंकि ब्रहम महज उस शक्ति का दूसरा नाम है जिसे प्रकृति कहते हैं और चूंकि सिर प्राणी के शरीर का सर्वोच्च हिस्सा है, इसलिए ब्राहमण समूचे गण/वंश का सबसे चुनिन्दा हिस्सा होता है। इसलिए हिन्दू उन्हें मनुष्यता का सर्वोत्कृष्ट कहते हैं।

2. अगली कतार में आते हैं क्षत्रिय, जो ब्रह्मा के कंधे से – जैसा कि कहा जाता है – निर्मित हुए। उनका दर्जा ब्राहमणों से थोड़ा ही कम होता है

3. उनके बाद आते हैं वैश्य, जो बह्मा के जांघ से पैदा हुए हैं।

4. शूद्र, उसके पांव से निर्मित हुए हैं।

..शूद्र के बाद आते हैं अंत्यज, जो तरह तरह की सेवाएं प्रदान करते हैं, जिन्हें किसी जाति का हिस्सा नहीं समझा जाता, मगर उन्हें किसी पेशा/कारीगरी का सदस्य माना जाता है।

‘बाहरी’ लोगों की इस कतार में हम 18वीं सदी के ब्रिटेन के राजनेता एडमंड बुर्के को रख सकते हैं (1729 -1797) जिन्होंने कहा था:

उस मुल्क में (अर्थात भारत में) धर्म के कानून, जमीन के कानून और सम्मान के कानून, सभी एक दूसरे के साथ घुले मिले हैं और मनुष्य को चिरन्तन रूप में जिसे जाति कहा जाता है, उसमें बांधे रहते हैं।

हम आसानी से अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि इन मुसाफिरों को भारत के स्तरीकरण/स्तर विन्यास की प्रणाली में सबसे अधिक क्या बात आश्चर्यजनक लगी होगी, जब उन्होंने देखा होगा कि यहां ‘आदर/श्रद्धा/भक्ति का स्तर/पैमाना आरोही है और अवमानना/अपमान/तिरस्कार का पैमाना अवरोही है।’

वैसे अपनी संस्‍कृति, अपनी महानता आदि के बारे में जो आत्मतुष्टि की भावना दिखती है, उसके चलते मुसाफिरों को जो नज़र आया, जो बात यहां के बारे में चुभ गयी, वह यहां के प्रबुद्ध कहलानेवालों के लिए बिल्कुल सामान्य प्रतीत होती है।

जाहिर है वह जहां जहां जाते हैं, अपनी इन्हीं धारणाओं का प्रदर्शन करने में संकोच नहीं करते।

पिछले दिनों अलग अलग किस्म की ख़बरें पढ़ने को मिलीं, कुछ पुरानी थीं तो कुछ हाल की थीं। एक का ताल्लुक ब्रिटेन से था, दूसरे का सम्बन्ध मलेशिया से था तो तीसरे का ताल्लुक अमेरिका से था। दिलचस्प यह है कि तीनों ख़बरों का फोकस वहां रह रहे भारतीय और उनमें आज भी पायी जाती जातिगत भावना से था।

ब्रिटेन से आयी ख़बर में बताया गया था कि किस तरह वहां रोजगार एवं सेवाओं को प्रदान करने के मामले में दक्षिण एशिया से आने वाले लोग जातिगत भेदभाव का शिकार होते हैं। ब्रिटिश सरकार के ‘समता विभाग’ की तरफ से किए गए इस सर्वेक्षण में यही पाया गया था कि किस तरह वहां रह रहे लगभग पांच लाख एशियाई लोगों में यह स्थिति नज़र आती है, जिसके लिए विशेष कदम उठाने की जरूरत है। सरकार द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण में चन्द केस स्टडीज भी पेश किए गए थे, जिसमें दलित तबके से सम्बद्ध लोगों ने बताया था कि किस तरह उन्हें उनके वरिष्ठ – जो उंची कही जानेवाली जाति से ताल्लुक रखते थे -के हाथों प्रताडना झेलनी पड़ी। वहां एक एम्प्लायमेण्ट टिब्युनल ने भारतीय मूल की एक पूर्व घरेलू कामगार को – जो दलित ईसाई थी – को एक लाख अस्सी हजार पैंड मुआवजा देने का निर्देश दिया, जिसने इस बात को साबित किया कि जिस परिवार में वह काम करती थी, वहां उसके साथ जाति एवं धर्म दोनो ही आधारों पर भेदभाव होता था। सरकार ने वहां रह रहे दलितों को झेलने पड़ रहे इस भेदभाव को लेकर कदम उठाने का ऐलान भी किया, और फिर उन्होंने दबाव में आकर इस फैसले को दो साल तक मुल्तवी कर दिया। दबाव डालनेवाले वे हिन्दू संगठन थे, जो साधनों के मामले में अधिक सम्पन्न थे, और जिनमें वर्चस्वशाली कही जानेवाली जातियों के लोगों का नेतृत्व था और जिन्हें यह बात हजम नहीं हो रही थी कि दलितों ने ‘व्यापक हिन्दू एकता’ के उनके गढंत को चुनौती दी थी।

‘इण्टरनेशनल दलित सालिडारिटी नेटवर्क’  द्वारा सितम्बर 2013 में तैयार किए गए एक पेपर में बेगराज मामले का विशेष उल्लेख किया गया था जिसमें बताया गया था कि विजय बेगराज, जो ‘हीर मानक’ नाम से कावेन्ट्री सालिसिटर्स फर्म में पहले कार्यरत थे और उनकी पत्नी अमरदीप, जो स्वयं भी उसी फर्म में कार्यरत थी, उन्हें किस तरह अपनी फर्म के अन्दर ही जातिभेद का सामना करना पड़ा क्योंकि विजय दलित पृष्ठभूमि से था और अमरदीप ‘उंची’  जाति से ताल्लुक रखती थी। यह दरअसल पहला मामला था जब ब्रिटेन में जातिभेद की उपस्थिति को अदालत के सामने पेश किया गया।

अगर हम ब्रिटिश सरकार की अपनी वेबसाइट देखें तो सरसरी निगाह से कुछ अन्य केस स्टडीज से रूबरू हो सकते हैं: एक केस स्टडी 60 साल से अधिक उम्र की महिला की है जो रिटायर्ड हैं तथा तीन बच्चों की मां है, जो लगभग 40 साल पहले पंजाब से ब्रिटेन पहुंची हैं। दलित जाति में जनमी उपरोक्त महिला जिसने एक अस्पताल के केटरिंग सेक्शन में बीस साल तक काम किया, जहां उसके सहयोगी भारतीय ही थे तथा अधिकतर जाट सिख थे। उसका कहना था कि जब उन्होंने उसकी जाति ढूंढ निकाली तबसे उसे उनके हाथों भेदभाव का शिकार होना पड़ा।

एक अन्य केस स्टडी 16 साल की किशोरी पर केन्द्रित है जो अपने माता पिता तथा भाई बहनों के साथ साउथहाॅल में रहती हैं। उसका जन्म भारत में हुआ तथा जो बचपन में ही ब्रिटेन आयी। वह किशोरी अपने आप को हिन्दू पंजाबी के तौर पर सम्बोधित करती है और अपने धर्म के तौर पर रविदासिया बताती है, अपनी जाति वह ‘चमार’लिखती है। जब वह 12 साल की थी तबसे उसको स्कूल में प्रताडना झेलनी पड़ी, जिसकी वजह उसकी जाति थी।

कुछ समय पहले उधर मलेशिया में भारतीय मूल के निवासियों की गिरफ्तारी का मसला अचानक सुर्खियां बना था। बताया गया था कि ‘हिन्ड्राफ’ नामक संगठन के कार्यकर्ता इस बात से नाराज थे कि मलेशिया के स्कूलों में बच्चों के अध्ययन के लिए जो उपन्यास लगाया गया था, वह कथित तौर पर भारत की ‘छवि खराब’ करता है। आखिर उपरोक्त उपन्यास में ऐसी क्या बात लिखी गयी थी, जिससे वहां स्थित भारतवंशी मूल के लोग अपनी ‘मातृभूमि’ की बदनामी के बारे में चिन्तित हो उठे थेे। अगर हम बारीकी से देखें तो इस उपन्यास में एक ऐसे शख्स की कहानी थी जो तमिलनाडु से मलेशिया में किस्मत आजमाने आया है और वह यह देख कर हैरान होता है कि अपनी मातृभूमि पर उसका जिन जातीय अत्याचारों से साबिका पड़ता था, उसका नामोनिशान यहां नहीं है। यह सवाल किसी ने नहीं उठाया कि अपने यहां जिसे परम्परा के नाम पर महिमामण्डित करने में हम संकोच नहीं करते हैं, उच्च नीच अनुक्रम पर टिकी इस प्रणाली को मिली दैवी स्वीकृति की बात करते हैं, आज भी आबादी के बड़े हिस्से के साथ (जानकारों के मुताबिक) 164 अलग अलग ढंग से छूआछूत बरतते हैं, वही बात अगर सरहद पार की किताब में उपन्यास में ही लिखी गयी तो वह हमें अपमान क्यों मालूम पड़ती है।

अगर मलेशिया के भारतवंशियों को देखें तो उनका बड़ा हिस्सा तमिलनाडु से सम्बधित रहा है। और बदनामी की बात अधिक सटिक लग सकती थी, अगर हिन्दोस्तां की सरजमीं पर नहीं कमसे कम तमिलनाडु में जाति उन्मूलन के कार्यभार को हम लोगों ने पूरा किया होता। आखिर क्या है तमिलनाडु में जातीय अत्याचारों की स्थिति?

ध्यान रहे कि यह मसला सूर्खियों में आने के कुछ समय पहले ‘इण्डियन एक्स्प्रेस’ में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया था कि आज भी वहां के 32 जिलों में से 28 जिले दलित एवं आदिवासियों पर अत्याचारों के मामलों में अग्रणी हैं। विगत दो दशकों में वहां इन तबकों पर अत्याचारों के 6,668 मामले दर्ज हुए हैं। 8 तमिलनाडु वही सूबा है जहां दलित जनसंहार की आजाद हिन्दोस्तां की पहली घटना सामने आयी थी, जब 1969 में किझेवनमनी नामक स्थान पर 42 दलितों को -जिनमें अधिकतर महिलाएं एवम बच्चे शामिल थे – दबंग जातियों ने जला कर मार डाला था।

गौरतलब है कि अपने यहां की विशिष्ट गैरबराबरी का बाहर जिक्र होते देख आगबबूला होते देख मलेशिया में स्थित भारतवंशी अनोखे नहीं थे। अमेरिका की सिलिकान वैली -सैनफ्रान्सिस्को बे एरिया के दक्षिणी हिस्से में स्थित इस इलाके में दुनिया के सर्वाधिक बड़े टेक्नोलोजी कार्पोरेशन्स के दफ्तर हैं – में तो कई भारतवंशियों ने अपनी मेधा से काफी नाम कमाया है। मगर जब कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में पाठयक्रमों की पुनर्रचना होने लगी, तब हिन्दु धर्म के बारे में एक ऐसी आदर्शीकृत छवि किताबों में पेश की गयी, जिसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं था। अगर इन किताबों को पढ़ कर कोई भारत आता तो उसके लिए न जाति अत्याचार कोई मायने रखता था, न स्त्रियों के साथ दोयम व्यवहार कोई मायने रखता था। जाहिर है हिन्दू धर्म की ऐसी आदर्शीकृत छवि पेश करने में रूढिवादी किस्म की मानसिकता के लोगों का हाथ था, जिन्हें इसके वर्णनमात्रा से भारत की बदनामी होने का डर सता रहा था। साफ था इनमें से अधिकतर ऊंची कही जानेवाली जातियों में जनमे थे। अन्ततः वहां सक्रिय सेक्युलर हिन्दोस्तानियों को, अम्बेडकरवादी समूहों तथा अन्य मानवाधिकार समूहों के साथ मिल कर संघर्ष करना पड़ा और तभी पाठयक्रमों में उचित परिवर्तन मुमकिन हो सका।

  • पुस्‍तक : चार्वाक के वारिस : समाज, संस्कृति और सियासत पर प्रश्नवाचक
  • लेखक: सुभाष गाताडे
  • पृष्ठ संख्या : 314
  • प्रकाशक:ऑथर्स प्राइड पब्लिशर प्रा. लि.55-ए, पॉकेट – डी, एस.एफ.एस., मयूर विहार फेज़-III, दिल्ली 110096 फोन: 9810402776, 9810408776 ईमेल: AuthorsPridePublisher@gmail.com

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