Home Corona असंगठित क्षेत्रों के 12 करोड़ कामगारों की आजीविका पर कोरोना का ‘काल’

असंगठित क्षेत्रों के 12 करोड़ कामगारों की आजीविका पर कोरोना का ‘काल’

कोरोना महामारी और उसके चलते हुए लॉकडाउन के कारण असंगठित क्षेत्रों के देश के क़रीब 12 करोड़ कामगारों की कमाई बंद हो गयी है। लगभग 70 से 80 फ़ीसदी इंडस्ट्रियों में काम करने वाली इस आबादी की कमाई का कोई साधन नहीं बचा है। यह रिपोर्ट चिंतित करने वाली है, क्योंकि भारत में पहले ही लगभग 26 करोड़ की आबादी ऐसी है, जो भुखमरी का शिकार है और उसके लिए दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल है।

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कोरोना महामारी और उसके चलते हुए लॉकडाउन के कारण असंगठित क्षेत्रों के देश के क़रीब 12 करोड़ कामगारों की कमाई बंद हो गयी है। लगभग 70 से 80 फ़ीसदी इंडस्ट्रियों में काम करने वाली इस आबादी की कमाई का कोई साधन नहीं बचा है। यह रिपोर्ट चिंतित करने वाली है, क्योंकि भारत में पहले ही लगभग 26 करोड़ की आबादी ऐसी है, जो भुखमरी का शिकार है और उसके लिए दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल है।

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले महीने असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लगभग 12 करोड़ कामगारों को कोई पारिश्रमिक हासिल नहीं हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि साल के बाक़ी महीनों में और भी नौकरियां जा सकती हैं, अगर कोरोना से पैदा हुई बंदी की स्थिति में बदलाव नहीं होता और मांग में बढ़ोतरी नहीं देखी गयी। यह भारतीय आर्थिकी के लिए सही संकेत नहीं हैं।

फोटोग्राफ सौ. निशांत तनेजा (https://www.pexels.com/@nishantaneja)

कंपनियों और कामगारों के बीच मध्यस्थता करने वाली कंपनी बेटरप्लेस के सह-संस्थापक प्रवीण अग्रवाल का कहना है कि “मार्च के मध्य से तेज़ आर्थिक मंदी की शुरुआत देखी जा रही है और इस वक़्त केवल 2-3 करोड़ लोगों की नौकरियां ही सुरक्षित हैं।”

लॉकडाउन और कोरोना से बिगड़ी अर्थव्यवस्था की सबसे अधिक मार यात्रा, हॉस्पिटैलिटी, टूरिज़्म, विमानन, खुदरा, मनोरंजन, भोजन और मिठाई तथा रीयल स्टेट इंडस्ट्री पर पड़ी है। इसके अलावा, मोटर वाहन, बुनियादी ज़रूरतों में नहीं गिने जाने वाले सामान, मुर्गी पालन, दुग्ध उत्पाद, शिपिंग और निर्माण से जुड़ी इंडस्ट्रीज पर भी मंदी का असर देखा जा रहा है।

फोटोग्राफ सौ. योगेंद्र सिंह
(https://www.pexels.com/@yogendras31)

टीमलीज़ की सह-संस्थापक ऋतुपर्णा चक्रवर्ती के अनुसार, “चूंकि संगठित क्षेत्रों के लगभग कर्मचारियों को लॉकडाउन के समय अभी तक समय से पूरा वेतन मिल रहा है, इसलिए अभी तक हम आर्थिकी का सबसे बिगड़ा स्वरूप नहीं देख रहे हैं, लेकिन आने वाले वक़्त स्थितियां और ज़्यादा ख़राब होनी ही हैं। लॉकडाउन के बाद चुनौतियां और बढ़ेंगी ही। असंगठित क्षेत्र के किसी कामगार के लिए, लॉकडाउन की शुरुआत से ही जिसकी आजीविका ख़त्म हो गयी, ज़िंदगी रोज़ की लड़ाई बन गयी है।”

फोटोग्राफ सौ. आरती अग्रवाल (https://www.pexels.com/@artiagarwal)

कॉन्ट्रैक्ट पर करने वाले कर्मचारी जिन्हें घन्टे के हिसाब से पारिश्रमिक मिलता है, उनके पास कोई काम नहीं बचा। बाज़ार ठप होते ही, ड्राइवर, डिलीवरी करने वाले, सेल्स और मार्केटिंग, बिजनेस डेवलपिंग से जुड़े कर्मचारियों एक से तीन महीने का गुजारा भत्ता देकर नौकरी से निकाल दिया गया। जहां नहीं निकाला गया वहां भी अब लगातार लोगों को निकाला जा रहा है, स्टाफ छोटा किया जा रहा है।

ई-कॉमर्स से जुड़े कर्मचारियों की कमाई 70 फीसदी तक गिर गयी है। फूड डिलीवरी या घरेलू सेवाओं से जुड़ी कंपनियां मांग में लगभग 50 फीसदी से ज़्यादा की गिरावट देख रही हैं। साल की आख़िरी तिमाही में आने वाले दशहरा और दीवाली जैसे त्योहारों तक अगर मांग में बढ़ोतरी नहीं हुई तो संकट और भी ज़्यादा गहरा सकता है।

जानकारों के अनुसार अगर स्थितियां सुधरनी शुरू हुईं तो दोबारा कामगारों की भर्ती में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इस वक़्त देश की मज़दूर आबादी बेहद मुश्किल स्थितियों का सामना कर रही है। लाखों मज़दूर देश के अलग-अलग हिस्सों में अभी-भी फंसे हुए हैं। उनके पास काम नहीं है, पैसे नहीं है, भोजन नहीं मिल पा रहा है, वे कोरोना महामारी से भी डरे हुए हैं और चाहते हैं कि उन्हें उनके घर भेजा जाये। सरकार और समाज की उपेक्षा का शिकार होते जाने से व्यवस्था के प्रति उपजती निराशा उन्हें जाने कहां ला छोड़ेगी। लेकिन, विडंबना है कि वक़्त और हालात के मारे यह मज़दूर जा भी कहां पाएंगे, जिन्हें रोज़ कुंआ खोदकर पानी पीना हो, वे कहां जायेंगे, फिर लौट आएंगे, जहां भी काम मिलेगा, अगर मिला तो।


प्रिय साथियों,

हम सब कोरोना महामारी के संकट से जूझ रहे हैं और अपने घरों में बंद रहने को मज़बूर हैं। इस आसन्न संकट ने समाज की गैर-बराबरी को भी सतह पर ला दिया है। पूरे देश में जगह-जगह मज़दूर फंसे हुए हैं। पहले उन्हें पैदल हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करते हुए अपने गांव की ओर बढ़ते देखा गया था। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पहले ही चौपट हो चुकी है, फसलें खेतों में खड़ी सड़ रही हैं। लेकिन लॉकडाउन के कारण दूर दराज के इलाकों से कोई ग्राउंड रिपोर्ट्स नहीं आ पा रहीं। सत्ता को साष्टांग मीडिया को तो फ़र्क़ नहीं पड़ता, लेकिन हम चाहते हैं कि मुश्किलों का सामना कर रहा ग्रामीण भारत बहस के केंद्र में होना चाहिए। 

हमारी अपील आप लेखकों, पत्रकारों और सजग नागरिकों से है कि अपने-अपने गांवों में लोगों से बात करें, हर समुदाय की स्थितियां देखें और जो समझ आये उसकी रिपोर्ट बनाकर हमें mediavigilindia@gmail.com भेजें। कोशिश करें कि मोबाइल फोन से गांव की तस्वीरें खींचकर भी भेजें। इन रिपोर्ट्स को हम अपने फेसबुक पेज़ पर साझा करेंगे और जो रिपोर्ट्स हमें बेहतर लगेंगी उन्हें मीडिया विजिल की वेबसाइट पर भी जगह दी जायेगी। 

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