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यहां से देखो : इमरजेंसी ने आरएसएस को गांधी-वध के दाग से कैसे मुक्‍त किया

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पिछली बार मैंने स्वतंत्र भारत के 72 साल के इतिहास में जिन पांच-छह बड़ी घटनाओं का जिक्र किया था, उसमें इमरजेंसी के अलावा 1984 के सिख विरोधी दंगे, मंडल आयोग को लागू किया जाना, बीजेपी की रथयात्रा और बाबरी मस्जिद का विध्वंस शामिल था। मुझसे गलती से शाह बानो प्रकरण छूट गया था, जिसमें राजीव गांधी की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। वह भी उतनी ही बड़ी घटना थी। मैं बहुत ही शिद्दत से यह मानता रहा हूं कि भारत में हिन्दू सांप्रदायिक इतिहास का यह टर्निंग प्वाइंट था।

वैसे कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि 1989 के भागलपुर दंगे या फिर 2002 में गुजरात में राज्य द्वारा कराये गये नरसंहार को इसमें शामिल क्यों नहीं किया गया है। इसका जवाब यह है कि ये दोनों ही घटनाएं 1984 की पुनरावृत्ति हैं। अगर 1984 के दंगाइयों को उस अपराध के लिए दंडित कर दिया गया होता तो ये दोनों घटनाएं फिर से कभी नहीं घटती। इसलिए शाह बानो वाली घटना को इसमें शामिल न किए जाने पर क्षमाप्रार्थी हूं।

बात इमरजेंसी की। इमरजेंसी लगाने के कई कारण थे, लेकिन कोई भी ऐसे कारण नहीं थे जिसे उचित माना जाए हालांकि उसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता है। संविधान सभा (कंस्टीट्यूएंट एसेंबली) में इमरजेंसी के प्रावधान को संविधान में शामिल किए जाने को लेकर जोरदार बहस हुई थी। संविधान सभा में एचवी कामत ने अन्य कुछ माननीय सदस्यों के साथ मिलकर इस बात को उठाया था कि हिटलर ने जर्मनी के संविधान में इमरजेंसी के प्रावधान का ही दुरुपयोग करके वहां आपातकाल लागू कर दिया था। इसलिए हमारे संविधान में इमरजेंसी का कोई प्रावधान नहीं होना चाहिए।

उनका यह भी तर्क था कि कश्मीर और हैदराबाद जैसी ‘परिस्थितियों’ से जब इमरजेंसी लगाए बगैर पार पाया जा सकता है, तो उससे बड़ी असाधारण परिस्थिति और क्या हो सकती है? संविधान ड्राफ्टिंग समिति के कई सदस्यों, जिसमें बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर भी शामिल थे, का मानना था कि एक बहिष्कृत और गैर-बराबरी वाले समाज को बदलने के लिए शक्तिशाली राष्ट्र-राज्‍य की अखंडता को सुरक्षित रखना जरूरी है इसलिए असाधारण परिस्थिति के लिए इमरजेंसी का प्रावधान भी होना चाहिए। और अंततः भारतीय संविधान में इमरजेंसी का प्रावधान भी शामिल कर लिया गया।

इसी का दुरुपयोग प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उस रात किया था। 25 जून की रात के सवा ग्यारह बजे राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने अपने सचिव के. बालचंद्रन को तत्काल मिलने के लिए बुलाया। दस मिनट के बाद ही बालचंद्रन वहां पहुंच गए। राष्ट्रपति ने बालचंद्रन से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ हुई बातचीत का ब्योरा देते हुए पूछा कि क्या इमरजेंसी लगाया जाना कानून-सम्मत होगा या नहीं। ‘गहन विचार-विमर्श’ के दौरान फखरुद्दीन अहमद ने कहा कि अब उन्हें प्रधानमंत्री से बात करना लाजिमी लगता है, इसलिए वह उनसे बात करने जा रहे हैं। कुछ देर के बाद जब वह लौटकर आए तो उन्होंने सूचना दी कि अभी आरके धवन इमरजेंसी का ड्राफ्ट लेकर आए थे जिस पर उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए हैं।

इंडियन एक्‍सप्रेस में प्रकाशित अबू अब्राहम का ऐतिहासिक कार्टून

अगले दिन 26 जून को मुंह अंधेरे सुबह के छह बजे कैबिनेट की बैठक बुलाई गई। कैबिनेट के किसी भी मंत्री को इसकी भनक तक नहीं थी लेकिन पूरी कैबिनेट ने बिना किसी चू-चपड़ के प्रधानमंत्री के निर्णय को ‘राष्ट्रहित’ में मान लिया और उस पर सहमति दे दी (बिल्कुल नोटबंदी के निर्णय की तरह)।

अनेक कारणों की व्याख्या अपने हिसाब से करने के बाद इंदिरा गांधी को जरूर लगा कि इमरजेंसी लगाना ही उनकी सत्ता को अक्षुण्ण बना सकता है, फिर भी यह बिना किसी लाग-लपेट के कहा जा सकता है कि इसके लिए जो दूसरा सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति जवाबदेह था उसका नाम संजय गांधी था। इमरजेंसी के दौरान जिन लोगों के हाथों में सारी ताकतें सीमित हो गईं थीं, सभी के सभी या तो संजय गांधी के चमचे थे या फिर मित्र थे।

जब 12 जून को इलाहाबाद हाइकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया तो प्रधानमंत्री आवास में मातम छा गया। यह उस दिन की तीसरी बुरी खबर थी। सुबह-सुबह इंदिरा गांधी के सबसे विश्वसनीय नौकरशाह पीएन धर का दिल्ली के गोविन्द बल्लभ पंत अस्पताल में हृदयाघात से निधन हो गया था। मृत्यु के समय उनकी उम्र मात्र 57 साल थी और वह सोवियत रूस में भारत के राजदूत थे। दूसरी बुरी खबर गुजरात से आई थी जहां चार दलों के गठबंधन से कांग्रेस पार्टी चुनाव हार गई थी। तीसरी खबर इंदिरा गांधी को अयोग्य घोषित कर दिए जाने की थी।

इंदिरा गांधी की जीवनीकार और उनकी मित्र पुपुल जयकर ने लिखा है कि इंदिरा गांधी के मन में इस्तीफा देने की बात तात्कालिक तौर पर आयी थी लेकिन बिशन टंडन ने अपनी किताब ‘पीएमओ डायरी खंड-1’ में लिखा है कि उनके और संजय गांधी के कान में आरके धवन के फुसफुसाने के बाद लोगों के फोन घनघनाने लगे और कहा कि पूरे देश में इंदिरा गांधी के सपोर्ट में जुलूस प्रदर्शन शुरू कर दिया जाए। बिशन टंडन प्रधानमंत्री कार्यालय में उस वक्त काम कर रहे थे।

उस समय के सारे लोगों को देखें तो हम पाते हैं कि हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल, नवीन चावला, आरके धवन, दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर किशन चंद, डीआइजी भिंडर- सब के सब संजय के दरबारी थे। हां, एक नाम ऐसा ज़रूर था जो संजय के दरबारी तो नहीं थे लेकिन बहुत ही ताकतवर थे- सिद्धार्थ शंकर रे- पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री। वह इंदिरा गांधी के अभिन्न मित्र थे और संजय व आरके धवन के अलावा तीसरे व्यक्ति थे जो सीधे तौर पर इंदिरा गांधी को इस्तीफा देने से मना कर रहे थे।

यह सवाल अनुत्तरित है कि 31 साल का संजय गांधी इतना ‘ताकतवर’ क्या एक दिन में बन गया था? कहने के लिए तो यह भी कहा जा सकता है कि हां, उनके पास ताकत तो हमेशा से ही थी क्योंकि वह प्रधानमंत्री का बेटा था। तो इसका जवाब यह भी है कि प्रधानमंत्री की बेटी तो इंदिरा गांधी भी थीं लेकिन वह इतना ताकतवर क्यों नहीं थीं कि नेहरू के सभी फैसलों को प्रभावित कर सकें? इस बात का जवाब पत्रकार जनार्दन ठाकुर अपनी किताब ‘ऑल द प्राइमिनिस्टर मेन’ (जिसका तर्जुमा शायद ‘सब दरबारी’ के नाम से हुआ था) में देते हैं।

किताब की शुरूआत कुछ इस तरह होती हैः ‘’मई के अंतिम हफ्ते में तीन मूर्ति भवन में नेहरू इंदिरा गांधी के साथ डिनर कर रहे थे। नेहरू की नजर स्टेट्समैन अखबार में छपी एक छोटी सी खबर पर पड़ी। नेहरू ने हंसते हुए इंदिरा गांधी से वैसे ही पूछ लिया कि कहीं इस काम में तुम्हारा बेटा भी तो शामिल नहीं है? खबर यह थी कि कुछ बड़े बाप के बेटे बड़ी गाड़ियां चोरी कर रहे हैं! इंदिरा गांधी ने जो कुछ भी बताया उससे नेहरू सन्न रह गए। खाना अधूरा छोड़कर वे अपने कमरे में चले गए। वह नेहरू की अंतिम रात थी।‘’

इमरजेंसी लगी। जयप्रकाश नारायण बहुत दिनों से इंदिरा गांधी की मुखालफ़त कर रहे थे। वह पहले व्यक्ति थे जिन्हें गिरफ्तार किया गया। किडनी की बीमारी के चलते उन्हें 12 नवम्बर 1975 को चंडीगढ़ जेल से छोड़ देना पड़ा। वह इलाज के लिए जसलोक अस्पताल मुबंई गए, वहीं से उन्होंने विपक्षी एकता की नींव डाली। चरण सिंह, पीलू मोदी, अशोक मेहता और सुरेन्द्र मोहन, जिन्हें पहले छोड़ दिया गया था, उन नेताओं से 1976 के मार्च में उन्होंने बातचीत शुरू की।

जेपी का कहना था कि आरएसएस की भूमिका विपक्षी एकता में बहुत महत्वपूर्ण है। समाजवादी धारा के मधु दंडवते, एसएम जोशी, मृणाल गोरे जैसे बड़े-बड़े नेता इसके खिलाफ थे लेकिन जेपी आरएसएस को इस मोर्चा में शामिल करने पर अड़े हुए थे। अंततः कई दौर के बाद जनता पार्टी बनी जिसमें आरएसएस की राजनीतिक शाखा जनसंघ का विलय हो गया।

इससे पहले तक आरएसएस की स्वीकार्यता बहुसंख्य भारतीय मानस में नहीं थी। जनमानस आरएसएस को महात्मा गांधी के हत्यारे के रुप में तब तक देख रहा था। आरएसएस के भीतर की छटपटाहट इस कदर थी कि वह किसी भी रूप में अपनी स्वीकार्यता चाहता था। इसके लिए वह दोहरी चाल चल रहा था। एक तरफ जनसंघ के नानाजी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता जेल में थे तो कुछ पेरोल पर छूट कर बाहर निकल रहे थे।

इंदिरा गांधी को बालासाहब देवरस का जेल से लिखा पहला पत्र

आरएसएस की दोहरी तैयारी कितनी जोरदार थी इसका अनुमान हम इस बात से लगा सकते हैं कि आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस (बालासाहेब देवरस) ने 22 अगस्त 1975 को यरवडा जेल से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखी थी जिसमें उन्होंने 15 अगस्त को लालकिले के प्राचीर से दिए गए इंदिरा के भाषण की जोरदार तारीफ की थी और सफाई देते हुए कहा था कि ‘’राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सार्वजनिक शांति, कानून व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा में कभी बाधा नहीं बनता। मेरी प्रार्थना है कि आप संघ को प्रतिबंध से मुक्त करें।‘’

इंदिरा गांधी को बालासाहब देवरस का जेल से लिखा दूसरा पत्र

10 नवंबर 1975 को यरवडा से ही एक और पत्र उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखा। उसमें उन्होंने कहा कि ‘’उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की पीठ ने आपके फैसले को वैध ठहराया है। सर्वसहमति से इसके लिए आपका हार्दिक अभिनंदन। जेपी आंदोलन से हमारा कोई संबंध नहीं। आपसे मिलने का मैं इच्छुक हूं।‘’ उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि ‘’हमने जेपी को न तो गुजरात में किसी तरह से मदद की है और न ही बिहार में मदद की जा रही है।‘’

जो भी हो, इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का सबसे बदनुमा दाग था जिसका सबसे ज्यादा लाभ आरएसएस ने उठाया। आरएसएस को यह लाभ जेपी ने जाने-अनजाने में भरपूर दिया। आरएसएस को पहली वैधानिक स्वीकार्यता इमरजेंसी के खिलाफ बनी जनता पार्टी में शामिल करके दी गई। इससे देश के जनमानस में गांधी के हत्यारे की छवि धूमिल होने लगी।

यही कारण है कि जब बीजेपी का गठन हुआ तो अगला चुनाव बीजेपी उसी घोषणापत्र पर लड़ी जिसे जनता पार्टी ने 1977 में बनाया था। रही-सही कसर 1989 में जनता दल के साथ गठबंधन करके पूरी हो गई। भाजपा को देश की मुख्यधारा की पार्टी बना दिया गया। अब ’गांधी वध’ का धब्बा उसके सिर से पूरी तरह उतर चुका है।


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यहां से देखो : इमरजेंसी की अधूरी दास्‍तान वाया जेएनयू

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