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यहां से देखाे : तवलीन सिंह को भारतीय मीडिया पर शर्म क्यों आयी?

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विगत रविवार 29 सितम्बर को दक्षिणपंथी टिप्पणीकार व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सब बड़ी प्रशंसक तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस अखबार के ‘फिफ्थ कॉलम’ में लिखे अपने लेख में भारतीय मीडिया को पानी पी-पी कर कोसा है। ‘प्रोपगंडा इन प्लेस ऑफ जर्नलिज्म’ (पत्रकारिता की जगह कुप्रचार) शीर्षक से लिखे लेख में उन्होंने लिखा है कि “मैं चालीस वर्षों से अधिक समय से पत्रकारिता कर रही हूं लेकिन जिस रूप में ‘हाउडी मोदी’ का कवरेज हुआ है उससे शर्मिंदगी का एहसास हो रहा है।”

तवलीन का कहना है कि वह लगातार कभी हिन्दी चैनल तो कभी अंग्रेजी चैनल को बार-बार बदल-बदल कर देख रही थीं जिससे पता चल सके कि वास्तव में हो क्या रहा है, लेकिन “मुझे बहुत ग्लानि हुई क्योंकि किसी भी चैनल में रिपोर्टिंग नहीं हो रही थी बल्कि बेशर्मी से प्रचार किया जा रहा था।” उनके अनुसार, पहले एकमात्र पब्लिक ब्रॉडकास्टर दूरदर्शन के समय भी रिपोर्टर अपनी गरिमा को बचाकर रिपोर्टिंग करते थे जबकि वह सरकारी था, लेकिन अब निजी चैनलों ने भक्ति के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।

तवलीन सिंह हालांकि यह कहने से नहीं हिचकती हैं कि “पत्रकार देशभक्त हो सकते हैं और अक्सर होते भी हैं लेकिन समझदार पत्रकार कभी अपनी पत्रकारिता में देशभक्ति इस हद तक नहीं लाते कि पत्रकार न रहकर सरकारी प्रवक्ता बन जाएं।”

अगर आपको याद हो तो जब डोनाल्ड ट्रंप और इमरान खान मीडिया को साथ-साथ संबोधित कर रहे थे तब पाकिस्तानी पत्रकारों ने भारत को लेकर काफी उल्टे-पुल्टे सवाल ट्रंप से पूछे थे। इस पर ट्रंप ने इमरान खान से पूछा कि क्या ये आपकी टीम के लोग हैं? और यही बात ट्रंप ने भारतीय पत्रकारों के बारे मे भी दोहरायी। दोनों देशों के “अपने पत्रकारों” को देखकर डोनाल्ड ट्रंप ने अफसोस प्रकट करते हुए कहा- “काश, हमारे देश में भी इस तरह के पत्रकार होते!”

पिछले हफ्ते न्यूयॉर्क में मिलिंडा एंड बिल गेट्स फाउंडेशन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ग्लोबल गोलकीपर्स अवॉर्ड दिया। फाउंडेशन के अनुसार यह पुरस्कार मोदी को इसलिए दिया गया क्योंकि उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान चलाकर भारत में खुले में शौच करने से देश की जनता को मुक्त कर दिया है। इस पुरस्कार में छुपे विरोधाभास को ज़रा गौर से देखिए।

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के भावखेड़ी गांव में 12 वर्षीय रोशनी और 10 वर्षीय अविनाश सुबह शौच के लिए सड़क के किनारे बैठे थे। तभी कुछ दूरी पर रहने वाले हाकिम यादव और उसके भाई रामेश्वर यादव ने उनके सिर पर लाठी मारकर उनकी हत्या कर दी। कायदे से भावखेड़ी गांव ‘खुले में शौच मुक्त’ यानी ओडीएफ घोषित है, फिर भी बच्चे खुले में शौच जाने के लिए क्यों मजबूर हुए थे? उनके घर में शौचालय क्यों नहीं था? हकीकत यह है कि मारे गए दोनों बच्चों के परिजन को शौचालय मिला ही नहीं था। वैसे यह अलग बात है, लेकिन हकीकत यह भी है कि जिन लोगों को शौचालय मिल गया है, वे भी शौचालय का इस्तेमाल नहीं करते हैं क्योंकि वहां पानी का स्रोत नहीं है।

अगर भारतीय मीडिया की हैसियत होती तो कायदे से इस घटना को रिपोर्ट करना चाहिए था, इसकी जांच-पड़ताल होनी चाहिए थी कि जिसके लिए मोदीजी का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, पुरस्कार मिल रहा है, उसी घटना के चलते दो बच्चों की हत्या कर दी गई है! लेकिन नहीं, भारतीय मीडिया का स्वरूप जैसे−जैसे बदला है, वह इस संस्था के पतन की महागाथा है।

हमारे देश में मीडिया की इस दुर्दशा के लिए सबसे अधिक जवाबदेह हिन्दी अखबारों के संपादक रहे हैं जिनमें अखबारों के मालिकान से बड़ी भूमिका निभायी है। अपवादों को छोड़कर हिन्दी अखबारों के संपादकों ने अपने-अपने मालिकान से सिर्फ इस बात की गारंटी चाही कि उन्हें कितने अधिक पर्क्स मिलेंगे और वे मालिक के लिए क्या-क्या दलाली करेंगे। इसी का परिणाम था कि नब्बे के दशक के बाद ज्यादातर हिन्दी अखबारों के संपादक किसी न किसी नेता के ‘कोटरी’ में शामिल लोग थे। वे अपने-अपने अखबारों के मालिकों का हित सर्वोपरि रखते थे, उसके लिए दलाली करते-करवाते थे और अपने मातहत काम करने वाले पत्रकारों से यह अपेक्षा रखते थे कि उनकी पहुंच सत्ता के उन गलियारों में भी हो, जहां तक संपादक की खुद की पहुंच नहीं थी।

वे पत्रकारों को मिलने वाली सुविधा के बारे में नहीं सोचते थे, बल्कि उनसे उनकी अपेक्षा होती थी कि वे उनका वे हर काम कर दें जो वे कर नहीं पा रहे हैं! इसका परिणाम यह हुआ कि ढेर सारे बेहतरीन पत्रकार या तो इस पेशे को छोड़कर बाहर निकल गए या फिर विकल्पहीनता के अभाव में रोजी-रोजगार को बचाए रखने के डर से घुटने लगे। इन पत्रकारों को बाद में ‘कैरियरिस्ट पत्रकारों’ ने रिप्लेस कर दिया।

कांग्रेस का शासन इस शासन से अलग इस रूप में था कि वह बहुत आक्रामक नहीं था, हालांकि इसके कई उदाहरण आपको मिल जाएंगे कि कुछ बहुत ही काबिल पत्रकारों को कांग्रेस शासनकाल में नौकरी से बाहर करवाया गया। कई बार यह मालिक पर दबाव डालकर करवाया गया तो बहुत बार संपादक खुद इसके लिए तैयार बैठा था। हिन्दी के संपादकों के लिए वह काबिल पत्रकार ‘किसी काम का नहीं’ था क्योंकि वह उनके कहे अनुसार लायज़निंग नहीं करता था।

बीजेपी ने इस ट्रेंड को सबसे बेहतर ढंग से समझा। बीजेपी के किरदारों को लगा कि जब लायज़निंग का काम हिन्दी के संपादक कर सकते हैं तो यही काम अंग्रेजी अखबार वाले क्यों नहीं कर सकते। अंग्रेजी अखबारों के संपादकों को अपने फोल्ड में लाने में बीजेपी की वही समझदारी थी जिसके तहत पहले बलबीर पुंज, चंदन मित्रा जैसे लोग राज्यसभा में लाए गए और बाद में स्वपन दासगुप्ता जैसे लोगों की एंट्री हुई। बीजेपी वाले हालांकि कुछ ज्यादा ही होशियार निकले। उन्हें यह बात समझ में आ गई थी कि पढ़े-लिखे आदमी कभी कभी ‘नैतिक’ बन जाते हैं और सरकार के खिलाफ भी खड़े हो जा सकते हैं। इसलिए उसे यह जरूरी लगा कि अब संपादकों को नहीं बल्कि मालिकों को साधने की जरूरत है। मीडिया को लेकर बीजेपी की स्पष्ट समझदारी है कि संपादक और पत्रकार अपने मन से कभी भी फैसला ले सकता है लेकिन मालिकान अपने आर्थिक हित से समझौता नहीं कर सकते! इसी का परिणाम है कि मोदी सरकार ने मालिकान की ही नकेल कस दी।

अपवादों को छोड़ दें तो भारतीय मीडिया की समस्या यह भी है कि सारे मीडिया घराने अखबार या टीवी चैनल चलाने के अलावा और भी कई तरह के धंधों में शामिल हैं। अगर अखबार या टीवी चैनल सरकार के खिलाफ कोई खबर चलाता है तो दूसरे धंधे पर सरकार नकेल कसने लगती है। दूसरी बात, अगर विज्ञापन का पैटर्न देखा जाए तो आज भी अधिकतम विज्ञापन सरकार की तरफ से आते हैं। खासकर हिन्दी अखबारों की अधिकतम कमाई सरकारी विज्ञापनों से है।

इसलिए तवलीन सिंह को जितनी भी शर्म आए, सारे पत्रकार उसी ‘मजबूरी’ के मारे हैं। या तो उनके पास सब कुछ है (घर, बंगला, शोफर, विदेश यात्रा, मोटी पगार, बच्चों के लिए बेहतर स्कूल, बार-बार सपरिवार विदेश यात्रा और समाज में शोहरत) या फिर कुछ भी नहीं- मतलब बेरोजगारी! यही कारण है कि कई संपादक दलाली करते हुए पकड़े भी गए हैं जिसमें शायद मालिक के बराबर ही उनका हिस्सा भी था।

इससे अलग दूसरी सच्चाई यह है कि पत्रकारों के लिए सामाजिक सुरक्षा के नाम पर कुछ भी नहीं है, जिसके चलते भी वे इतनी आसानी से संपादक और मैनेजमेंट के सामने घुटने टेक देते हैं।


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