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यहां से देखो : संविधान की बात करने वालों को अदालतें देशद्रोही क्यों कह रही हैं?

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बिहार के मुजफ्फरपुर में रामचंद्र गुहा सहित देश के 49 लब्ध प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज कराया गया है। मुजफ्फरपुर के वकील सुधीर कुमार ओझा की याचिका पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सूर्यकांत तिवारी ने आदेश दिया कि इन लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज की जाए। याचिकाकर्ता वकील ने अपनी याचिका में देश की छवि को खराब करने और प्रधानमंत्री के बढ़िया काम को कम आंकने का इल्जाम लगाया था।

उन बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम खुला पत्र लिखकर देश में भीड़ द्वारा हत्या की बढ़ती घटनाओं पर चिंता ज़ाहिर की थी। पत्र लिखने वाले बुद्धिजीवियों का मानना था (और है भी) कि बीजेपी के सत्ता में आने के बाद मुसलमानों और दलितों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। मोदी को पत्र लिखने वालों में रामचन्द्र गुहा के अलावा श्याम बेनेगल, मणिरत्नम, अनुराग कश्यप, अपर्णा सेन, शुभा मुद्गल, आदि नामचीन लोगों के नाम शामिल हैं।

अगर आप लोगों को याद हो तो रामचंद्र गुहा देश के सबसे पहले बुद्धिजीवी रहे हैं जिन्होंने मोदी के प्रधानमंत्री कैंपेन शुरू से होने के तत्काल बाद ही उनके फासिस्ट न होने का प्रमाणपत्र दे दिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा था कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने में कोई बुराई नहीं है। नीतिश कुमार का हालांकि कोई सांप्रदायिक अतीत नहीं रहा है, लेकिन एक छोटे अंतराल को छोड़ दिया जाए तो लगभग 25 वर्षों से वे बीजेपी के सबसे विश्वसनीय सहयोगी रहे हैं। दूसरी बार बीजेपी के सहयोग से सत्ता में लौटने के बाद नीतीश कुमार में भी रामचंद्र गुहा प्रधानमंत्री बनने की संभावना देखा करते थे।

जिस व्यक्ति को पूरा देश सांप्रदायिक व फासिस्ट कह रहा था, उसे राम गुहा ने सांप्रदायिक व फासिस्ट न होने का सर्टिफिकेट दे दिया था। वह व्यक्ति जब प्रधानमंत्री बन जाता है तो उनकी ट्रॉल आर्मी राम गुहा के पीछे पड़ जाती है। उन्हें लगातार हर बात कहने के लिए परेशान किया जाता है। दूसरे, जिस नीतिश कुमार को गुहा प्रधानमंत्री मैटेरियल मानते थे (जो येन-केन प्रकारेण मुख्यमंत्री बने रहने के लिए हर तरह का समझौता करते हैं) उसी नीतीश कुमार के शासन में उनके खिलाफ देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज हो चुका है!

अगर हमें सामान्य जानकारी भी है तो हम जानते हैं कि अदालतों का काम संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है, लेकिन बिहार में नागरिकों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन पुलिस ने नहीं बल्कि न्यायालय ने किया है। अदालत के कहने पर मौलिक अधिकार को अपराध मानकर मुक़दमा दर्ज किया गया है! इस सवाल का जवाब खोजने की जरूरत है कि लोकतांत्रिक समाज में जब संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार माना गया है तब खुद न्यायालय इस अपराधिक कृत्य में कैसे शामिल हो गया!

इन 49 गणमान्य लोगों पर मुकदमा दायर किए जाने के बाद महत्वपूर्ण घटना यह हुई है कि फिर से तकरीबन 200 बुद्धिजीवियों ने लगभग इसी तरह का पत्र प्रधानमंत्री मोदी को यह कहते हुए लिखा है कि अगर अल्पसंख्यकों और दलितों के खिलाफ हिंसा रोकने की मांग करना अपराध है तो हमारे खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया जाए। कुल मिलाकर बहुत दिनों के बाद बुद्धिजीवियों ने अपनी भूमिका स्पष्ट की है।

इस संदर्भ में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या देश-समाज में यह परिस्थिति एक दिन में पैदा हुई है? इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। बीजेपी और उसके पूर्ववर्ती जनसंघ ने आजादी के समय से ही सवर्णों के बीच एक पैगाम देना शुरू कर दिया था कि तुम्हारे लिए इस देश के संविधान में कुछ भी नहीं छोड़ा गया है, जबकि देश सिर्फ तुम्हारा (सवर्णों का) है। इस बात को साबित करने के लिए बीजेपी हमेशा ही आरक्षण का उदाहरण देती है। बीजेपी स्पष्ट रूप से मानती है (राजनीतिक दबाव के कारण बार-बार उसे अपनी स्थिति साफ करनी पड़ती है) कि वह ‘एक देश, एक विधान, एक संविधान’ में विश्वास रखती है और उसी नारे के सहारे वह हर ‘अफर्मेटिव एक्शन’ के खिलाफ जनमानस को तैयार करती रही है।

अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को शुरू से ही आरक्षण दिया गया था, लेकिन मंडल आयोग की अनुशंसा द्वारा अन्य पिछड़े वर्गों-ओबीसी को पहले सरकारी नौकरियों में और बाद में शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण दिया गया। मंडल आयोग की सिफारिश को वीपी सिंह की सरकार ने 1990 में लागू किया। पिछड़ों को आरक्षण मिलते ही बीजेपी को आम सवर्णों के मन में यह बैठाने में एक बार फिर अवसर दे दिया कि चूंकि संविधान बाबासाहेब अंबेडकर ने बनाया था जो खुद दलित थे, इसलिए इसमें सिर्फ दलितों और पिछड़ों के हक की बात कही गई है और यह संविधान सर्वणों के खिलाफ है।

आरएसएस-बीजेपी ने इसे इस रूप में आम लोगों में पेश किया कि इस संविधान में मुसलमानों को विशेष दर्जा मिला हुआ है, उसे तरह-तरह के लाभ दिए गए हैं, उन्हें चार-चार शादियां करने की छूट है, आदि-इत्यादि। बीजेपी ने आम लोगों में संविधान में मिले विशेष प्रावधान को हिन्दू बनाम मुसलमान बनाकर इस रूप में पेश किया कि जिन दलितों व पिछड़ों को इससे लाभ मिल रहा है, वे भी इस संविधान के खिलाफ खड़े हो गए हैं।

नौकरशाही व न्यायपालिका में सवर्णों की बहुलता भी वह कारण रहा जिसके चलते संवैधानिक प्रावधानों की अवहेलना करने वालों के खिलाफ किसी भी पूर्ववर्ती सरकार ने कठोर कार्यवाही की व्यवस्था नहीं की। इसका परिणाम यह हुआ कि जो तत्व हमारी सार्वजनिक जिन्दगी ही नहीं, बल्कि निजी जिंदगी को निर्देशित करने वाला होना चाहिए था, उसके लिए हमारे मन में कभी आदर ही नहीं पैदा हो पाया। इसका सबसे खतरनाक परिणाम यह हुआ कि जब कार्यपालिका का इस संविधान के प्रति कोई आदर नहीं रह गया तो आम जनता में इसके प्रति आदर पैदा होने का सवाल कहां से उठता!

बाबासाहेब अंबेडकर के उसी संविधान के प्रति सवर्णों के हिकारत का परिणाम है कि जिस न्यायाधीश पर न्याय व्यवस्था और संविधान की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वह न्यायधीश लोकतंत्र के बुनियादी सवाल को नजरअंदाज करके लोकतांत्रिक व संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने की मांग करने वालों के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज करने का आदेश दे देता है!

इसी का परिणाम है कि जब भी कोई व्यक्ति संविधान मानने या संवैधानिक जवाबदेही निभाने की मांग करता है, तो भाजपा समर्थकों को लगता है कि वह देशद्रोही है।


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