Home काॅलम यहां से देखो: हिन्‍दी का राजनीतिक एजेंडा

यहां से देखो: हिन्‍दी का राजनीतिक एजेंडा

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हिन्दी दिवस के अवसर पर 14 सितंबर को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सह गृहमंत्री अमित शाह ने हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाने की जरूरत पर बल दिया। अमित शाह के इस बयान पर उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक के सभी दलों के नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी।

डीएमके के अध्यक्ष एमके स्टालिन ने कहा, ”यह बयान देश को तोड़ने वाला है। हिन्दी थोपे जाने का हम लगातार विरोध करते रहे हैं। गृहमंत्री की टिप्पणी से हमें आघात पहुंचा है। हम अमित शाह से अपना बयान वापस लेने की अपील करते हैं।” डीएमके ने 20 सितंबर को हिन्दी थोपे जाने के विरोध में प्रदर्शन करने का फैसला किया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी शाह के बयान की आलोचना की। ममता बनर्जी ने हिन्दी दिवस पर सबको बधाई तो दी लेकिन यह कहते हुए आगाह भी किया, “हिंदी दिवस पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। हमें सभी भाषाओं और संस्कृतियों का समान रूप से सम्मान करना चाहिए। हम कई भाषाएं सीख सकते हैं लेकिन हमें अपनी मातृ-भाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए।”

अमित शाह पर सबसे धारदार हमला असदुद्दीन ओवैसी ने किया। ओवैसी ने कहा, ”हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व से कहीं बड़ा है भारत। हिंदी हर भारतीय की मातृभाषा नहीं है। क्या आप इस देश की कई मातृभाषाएं होने की विविधता और खूबसूरती की प्रशंसा करने की कोशिश करेंगे? संविधान का अनुच्छेद 29 हर भारतीय को अपनी अलग भाषा और संस्कृति का अधिकार प्रदान करता है।”

अमित शाह ने कहा था, “भारत विभिन्न भाषाओं का देश है और हर भाषा का अपना महत्व है परन्तु पूरे देश की एक भाषा होना अत्यंत आवश्यक है जो विश्व में भारत की पहचान बने। आज देश को एकता की डोर में बाँधने का काम अगर कोई एक भाषा कर सकती है तो वो सर्वाधिक बोले जाने वाली हिंदी भाषा ही है।”

शाह के इस बयान को सिर्फ हिन्दी भाषा के समर्थन में दिये गये बयान के रूप में देखना दरअसल इसके पीछे की रणनीति और भविष्य की तैयारी को नकारना है। यह काफी सोच समझकर दिया गया बयान है। अमित शाह ही नहीं बल्कि इस तथ्य को लगभग हर समझदार व्यक्ति जानता है कि इतने वर्षो के बाद भी हिन्दी विचार-विमर्श की भाषा नहीं बन पायी है, यह रोजगार मुहैया कराने वाली भाषा नहीं बनी है, विज्ञान व टेक्नोलॉजी की भाषा नहीं बनी है। इतना ही नहीं, दस राज्यों और पचास करोड़ से अधिक व्यक्तियों द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिन्दी में एक भी लेखक-पत्रकार नहीं है जो हिन्दी में लिख-पढ़कर अपना व अपने परिवार का जीवनयापन ठीक से कर पा रहा हो। फिर सवाल यही है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने का तर्क लगातार क्यों दिया जा रहा है?

हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने का यह तर्क लगभग सौ साल पुराना है। गांधीजी ने इस बात को दुहराया था, सी. राजगोपालाचारी ने न सिर्फ इसे दुहराया बल्कि 1937 में मद्रास प्रेसिडेंसी में हिन्दी को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल भी कर दिया था, जिसका विरोध सीएन अन्नादुरैई और ईवी रामास्वामी पेरियार ने उसी समय किया था, जिसमें बाद के दिनों में एम करुणानिधि भी शामिल हुए।

हिन्दी को लेकर संविधान सभा में भी लंबी बहस हुई थी। वहां कई तर्कों के अलावा सबसे लोकप्रिय तर्क यह दिया गया था कि चूंकि हिन्दी देश के कई राज्यों में बोली जाती है इसलिए हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा बनाया जाना चाहिए। द्रविड़ मुन्नेड़ कड़गम (डीएमके) बनने से पहले ही निजी तौर पर हिन्दी आंदोलन का पेरियार विरोध कर रहे थे लेकिन ‘सबसे अधिक लोगों द्वारा बोले जाने’ का तर्क हर बार दिया जाता रहा था। सबसे अधिक लोगों द्वारा बोले जाने वाली भाषा के तर्क का जवाब देते हुए अन्नादुरै ने 1963 में कहा था, ”अगर संख्या ही निर्णय करेगी कि राष्ट्रभाषा क्या हो तो मोर की जगह कौआ को राष्ट्रीय पक्षी घोषित कर दिया जाना चाहिए।”

इसलिए जो लोग हिन्दी भाषा के समर्थन में हैं या जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं वे या तो बहुत भोले हैं या बातों को समझ नहीं पा रहे हैं। हां, जिन्होंने यह जुमला उछाला है वे उस जुमले की अहमियत को बखूबी समझ रहे हैं। किसी भाषा की भविष्य में क्या अहमियत है या होगी इसके लिए रॉकेट सांइटिस्ट होने की जरूरत नहीं है, लेकिन हिन्दी पट्टी से सबसे लंबे समय तक बीजेपी सरकार में मंत्री रहने वाले संतोष गंगवार का कहना है कि उत्तर भारतीयों में प्रतिभा ही नहीं है। अगर सचमुच मान लिया जाए कि उत्तर भारतीय, मतलब हिन्दीभाषियों में प्रतिभा नहीं है तो क्‍या उत्तर भारत के लोग इतनी संख्या में दक्षिण भारत में या फिर विदेश में अपनी मूर्खता प्रदर्शित करने के लिए पलायन करते रहे हैं?

यहां सवाल हालांकि यह भी नहीं है। सवाल यह है कि अमित शाह हिन्दी नेशलिज्म का उग्र खेल खेलना चाह रहे हैं। उन्हें पता है कि हिन्दीभाषी प्रदेश में 227 लोकसभा की सीटें हैं जिनमें से 210 सीटें उनकी पार्टी को मिली हैं। 2019 का लोकसभा चुनाव हिन्दू राष्ट्रवाद के नाम पर लड़ा गया था जिसमे निशाने पर खुलेआम मुसलमान थे। दलित, पिछड़े और आदिवासी ने भी हिन्दू बनकर बीजेपी को वोट दिया था। यह अलग विषय है कि हिन्दू राष्ट्र में उनके लिए क्या है। बीजेपी हिन्दू राष्ट्र के नाम पर जितनी फसल काटना चाहती थी, काट चुकी है। उसे पता है कि हिन्दू राष्ट्र के जितने भी हथियार थे- तीन तलाक, अनुच्‍छेद 370 आदि, सबका दोहन किया जा चुका है। अब बीजेपी के लिए समस्या यह है कि एक ऐसा मसला चाहिए जिस आधार पर पूरी हिन्दी पट्टी के लोगों को गोलबंद किया जा सके। इसीलिए हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाए जाने की बहस या तैयारी शुरू हो गई है।

हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाए जाने के विचार पर अगर हम गंभीरता से विश्लेषण करना चाहते हैं तो हमें यह भी सोचना चाहिए कि इसका मतलब क्या होगा। रोजगार की तलाश में देश के हर कोने में जाकर काम करने वाली जनता अब तक हिन्दी के अलावा किसी और भाषा (मूलतः अंग्रेजी) में बोलकर अपनी जीविका चला रही है, लेकिन हिन्दी राष्ट्रवाद के उत्थान के बाद वे हिन्दी को लेकर दुराग्रही (एसर्ट करेंगें) होंगे। अब हिन्दी और अंग्रेजी के अलावा किसी और भाषा में बात करने वालों के बीच दरारें पैदा होंगी। हो सकता है, बात आगे बढ़कर मारपीट तक पहुंच जाए।

अगर ऐसा होता है तो यह बीजेपी के लिए सबसे मुफीद समय होगा, जो अवश्यंभावी है। उस परिस्थिति में हिन्दी प्रदेश से जाने वाले लोग जब बेरोजगार होकर अपने प्रदेश लौटेंगे तो उनके मन में अहिन्दीभाषियों के प्रति घृणा होगा और वे बीजेपी के स्वाभाविक समर्थक होंगे। वे इस बात का यकीन भी नहीं करेंगे कि कैसे बीजेपी की हिन्दी नीति ने उससे रोजगार छीनने में भूमिका निभाई है।

उदाहरण के लिए, अनुच्‍छेद 370 को लें। पैंतालीस दिन से ज्‍यादा हो गये और कश्मीर के विभिन्न हिस्‍सों में आज भी कर्फ्यू लगा हुआ है, स्कूल-कॉलेज बंद हैं लेकिन हिन्दी पट्टी की बहुसंख्य जनता इसका जश्न मना रही है। वह इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं है कि भारत और कश्मीर के बीच एकमात्र संधि रेखा अनुच्‍छेद 370 ही था। बीजेपी ने इस अनुच्‍छेद को हटाकर पूरे उत्तर भारत में युद्धोन्माद की स्थिति पैदा कर दी है।

अमित शाह और बीजेपी हिन्दी को उन्मादी भाषा और हिन्दीभाषी जनता को उन्मादी भीड़ में बदल देना चाहते हैं, जो हर पल उन्माद में जीये क्योंकि हम हिन्दीवासियों के लिए हिन्दी का सवाल भावनाओं का होगा, न कि रोजगार का या फिर बेहतर भविष्य का। भूलना नहीं चाहिए कि यह भावना ही है जो बीजेपी को 227 सीटों में से अधिकांश पर विजयी बनाने में मददगार साबित हुई है।


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