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यहां से देखो : सौ दिन का जश्न बनाम 1925 दिन का प्रहसन

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प्रधान सेवक नरेन्द्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के सौ दिन पूरे होने को काफी धूमधाम से मनाया। वास्तव में यह उनका सौवां दिन नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के रूप में 1925वां दिन था। फिर भी दूसरी बार शपथ लेने के सौ दिन को उस रूप में पेश किया गया जैसा कि यह उनका पहला कार्यकाल है जिसका उनके पुराने कार्यकाल से कोई लेना देना नहीं है।

खैर, प्रधान सेवक मोदी सहित पूरे कुनबे व सरकार ने सौ दिन की सरकार को एक अलहदा परिघटना के रूप में पेश किया। मोदी ने अपने सौ दिन के कार्यकाल की सफलता को चंद्रयान-2 से जोड़कर इसे ‘इसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन) स्पिरिट’ का नाम भी दे दिया। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार 7 सितम्बर की सुबह एक बजकर पचास मिनट के बाद “सौ सेकेंड वह पल था जब मैंने कुछ खास महसूस किया। मैंने महसूस किया कि कैसे एक घटना ने पूरे देश को जगा दिया है। पूरे देश को एकता के सूत्र में बांध दिया है। मैं आप सबको बताना चाहता हूं कि जैसे कि स्पोर्ट्समैन स्पिरिट होता है वैसा ही हम में ‘इसरो स्पिरिट’ है… और अब देश किसी भी परिस्थिति में नकारात्मक दिशा में नहीं सोचेगा।”

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विधानसभा चुनाव के कगार पर खड़े हरियाणा के रोहतक में सभा को संबोधित करते हुए मोदी ने आगे कहा, “अब देश पुरुषार्थ की पूजा करता है, पराक्रम की पूजा करता है, अब देश परिवर्तन की आस्था को लेकर चल पड़ा है।” उन्होंने आगे कहा कि पिछला सौ दिन देश के विकास, विश्वास और बड़े परिवर्तन को समर्पित रहा है। उनकी सरकार ने किसानों के लिए महत्वपूर्ण कानून बनाए हैं, राष्ट्र की सुरक्षा के लिए कानून बनाए हैं, मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा के लिए भी बड़े कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने उस सभा में ज़ोर देकर कहा कि आर्थिक सुधार को गति देने और बैंकों के हालात बेहतर करने के लिए उन्होंने कई कदम उठाए हैं जिसका परिणाम जल्दी ही देश में दिखाई देगा।

अब प्रधानमंत्री मोदी के उस भाषण को याद कीजिए जब उन्होंने नोटबंदी की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि यह सही है कि आप लोगों को थोड़ी सी असुविधा होगी लेकिन इसे आप लोग बर्दास्त कर लीजिए क्योंकि यह सिर्फ पचास दिनों की बात है। देशहित में पचास दिन का कोई मतलब नहीं होता लेकिन पचास दिनों के बाद अगर देश के हालात नहीं बदले तो आप हमें जिस चौराहे पर बुलाएं, मैं … खाने को तैयार हूं।

उसके बाद क्या हुआ, न सिर्फ वह इतिहास है, बल्कि देश के आर्थिक और सामाजिक इतिहास का सबसे खौफनाक मंज़र है।

सबसे दुखद यह है कि इतना होने के बावजूद मोदी आज भी देश के सबसे ‘लोकप्रिय’ नेता हैं। उन्होंने देश-समाज में प्रचलित हर मुहावरे का इस्तेमाल अपने हित में कर लिया है। सत्ता में आने के पहले कार्यकाल के दौरान जब उन्होंने बिना सोचे-समझे नोटबंदी को लागू कर दिया था तो दुनिया भर के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों ने मोदी की आलोचना की थी, जिसमें हार्वर्ड विश्वविद्यालय के कुछ अर्थशास्त्री भी थे। मोदी ने अर्थशास्त्रियों की आलोचना को गंभीरता लेने के बजाय बहुत निकृष्टता के साथ उनकी समझदारी का मज़ाक उड़ाया था। उन्होंने अर्थशास्त्रियों का मखौल उड़ाते हुए ‘शब्दों की जादूगरी’ दिखाई और कहा कि हम हार्वर्ड नहीं बल्कि हार्डवर्क वाले हैं। ऐसा कहकर वे नोटबंदी के घातक परिणामों से लोगों का न केवल ध्यान हटाने में सफल रहे बल्कि अर्थशास्त्र की न्यूनतम समझदारी रखने वाली जनता को यह संदेश भी दे दिया कि नोटबंदी की आलोचना वे लोग करते हैं जो लोग मेहनत नहीं करते हैं, क्योंकि वे श्रमविरोधी हैं और भारत का बुरा चाहने वाले लोग हैं।

वह हर बार हमारे प्रचलित मुहावरे से एक शब्द उठाते हैं और उसे तोड़-मरोड़कर अपनी नाकामी छुपाने के लिए अपने हित में इस्तेमाल कर लेते हैं या फिर एक नया मुहावरा या शब्द गढ़ लेते हैं। भारत जैसे गरीब व अनपढ़ देश में जब यह नारा गरीबों व अनपढ़ों को सुनाई पड़ता है तो उन्हें लगता है कि देखो, कोई हमारे जैसा, हमारे बीच का आदमी ही हमारा प्रधानमंत्री है जबकि कायदे से होना यह चाहिए कि प्रधानमंत्री हमारे जैसा नहीं बल्कि भविष्य की रूपरेखा बनाने वाला एक भविष्यद्रष्टा होना चाहिए।

उदाहरण के लिए, सत्ता में आने के बाद उन्होंने एक नारा दिया- बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ। यह बड़ा अभियान तो बन गया लेकिन बेटी को पढ़ाने और बचाने के कोई उपाय नहीं किए गए। हम जानते हैं कि बेटी की भ्रूण में हत्या के पीछे सिर्फ पितृसत्ता ही जवाबदेह नहीं है बल्कि इसमें थोड़ी भूमिका आर्थिक पृष्ठभूमि की भी है। यही हाल स्वच्छता अभियान का रहा। खुद उनके अलावा उनकी पार्टी के सांसद भी संसद भवन में झाड़ू लगाते दिखे, लेकिन इस अभियान को सफल बनाने के लिए न्यूनतम बजट का आवंटन किया गया।

पिछले पांच से अधिक वर्षों में जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, उन्होंने हर संस्थान का इस्तेमाल निजी हित में किया है। राजनीतिशास्त्र के हर जानकार से बात कर लीजिए, वे आपको बताएंगे कि कश्मीर को भारत के साथ बनाए रखने में सबसे महती भूमिका अनुच्छेद 370 ने निभाई थी लेकिन बीजेपी को पता था कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 सिर्फ राज्य को विशेष दर्जा देने की बात नहीं थी बल्कि बीजेपी के पूर्व अवतार जनसंघ में मौजूद उनके पूर्वजों ने उस धारा को पूरी तरह सांप्रदायिक बनाकर देश की बाकी जनता के बीच पेश किया, जिसका असर पूरे देश में है। उस अनुच्छेद को हटाया गया तो देश की जनता उसे कश्मीरी मुसलमानों के खिलाफ सख्त कार्यवाही के रूप में देख रही है, न कि कश्मीर को भारत से अलग करने वाले कदम के रूप में। और परिणाम देखिए, पूरे देश में जो माहौल है उससे लगता है कि देश की सबसे बड़ी समस्या अनुच्छेद 370 था जिसे हटाकर सभी समस्याओं ने निजात पा ली गई है।

कल राजनीतिशास्त्री प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में ‘रिजीम रिवील्स इटसेल्फ’ (प्रत्यक्ष ही प्रमाण है) शीर्षक से लिखे अपने कॉलम में कहा है कि कैसे मोदी ने हर स्वतंत्र संस्थान को शिखर से शून्य पर ला दिया है। इसका सबसे हालिया सबूत चंद्रयान-20की असफलता है। जानकारों का कहना है कि इसरो इसे लांच करने के लिए तैयार नहीं था लेकिन पीएमओ का उसके ऊपर दबाव था। इसी दबाव का परिणाम था कि इसरो ने इसके लांच की तीन बार तिथि भी बदली थी।

वर्तमान में, कमोबेश पूरी दुनिया में सत्ता पर काबिज हुक्मरानों ने अपनी जनता के साथ यही सलूक किया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारे देश के मध्यमवर्ग के सपनों में बसा देश अमेरिका है जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बिल्कुल वही किया है जो मोदी भारत में कर रहे हैं लेकिन जैसा कि अरुधंति रॉय कहती हैं, वहां संस्थान इतने मज़बूत हैं कि ट्रंप चाह कर भी इतनी आसानी से उन्हें नष्ट नहीं कर पा रहे हैं। दुखद यह है कि हमारे देश का जातिवादी मध्यमवर्ग न सिर्फ मोदी के इशारे पर नाचने को तैयार बैठा है बल्कि उनका नाम सुनते ही नाचने लगता है।

अगर देश में आर्थिक और सामाजिक अराजकता है तो इसके पीछे सवर्ण व जातिवादी मानसिकता वाला मध्यमवर्ग जिम्मेदार हैं जिसने अपना स्वाभिमान और अपनी ग़ैरत सत्ता को सौंप दी है।

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