Home काॅलम चुनाव चर्चा : पूर्वोत्तर जीत कर ‘पूरब’ में उलझी भाजपा !

चुनाव चर्चा : पूर्वोत्तर जीत कर ‘पूरब’ में उलझी भाजपा !

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चंद्र प्रकाश झा 

पूर्वोत्तर के त्रिपुरा , मेघालय और नगालैंड के विधानसभा चुनाव में अपने  ब्रांड के राष्ट्रवाद की कीमत पर जीत दर्ज करने के बाद अब भाजपा की पूरब में बिहार और उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में “घर वापसी” है.

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव की समाजवादी पार्टी (सपा ) को पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और पूर्व रक्षा  मंत्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने भी अपना समर्थन घोषित कर  दिया है. कुछ और पार्टियों के भी सपा का समर्थन करने की संभावना है. कांग्रेस ने अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं।  दोनों सीटों पर उसके प्रत्याशी पहले से मैदान में हैं।

लोकसभा में उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर तथा बिहार की अररिया सीटों पर 11 मार्च को उपचुनाव है। बिहार में विधानसभा की दो रिक्त सीटों , जहानाबाद और भभुआ पर उपचुनाव भी 11 मार्च को ही कराये जा रहे हैं। इन सभी उप चुनाव के परिणाम 13 मार्च को निकलेंगे. अररिया में राजद तस्लीमुद्दीन के पुत्र सरफराज आलम को टिकट दिया है जो पहले जनता दल यूनाइटेड के विधयाक हुआ करते थे. वहां भाजपा ने पूर्व सांसद प्रदीप सिंह को प्रत्याशी बनाया है जिनके लिए प्रचार करने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी जाने वाले हैं.

ये उपचुनाव कई अर्थ में अहम है. इन्हें 2019 के आम चुनाव का रिहर्सल भी कहा जा रहा है. लोकसभा में बीजेपी के अभी अपने 274 सदस्य है जिनमें अध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी शामिल हैं. यह साधारण बहुमत की 271 सीटों से सिर्फ दो ज्यादा है. इसका सीधा अर्थ यह है कि एक भी सीट कम हुई तो उसे बहुमत के लिये अपने सहयोगी दलो पर निर्भर होना पड़ेगा. अगर ऐसा हुआ तो उसके मौजूदा सहयोगी दलों में से शिवसेना के उद्धव ठाकरे और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं तेलुगु देशम के सर्वेसर्वा चंद्रा बाबू नायडु की बांझें खिल जाएंगी जो गठबंधन की राजनीति में मंजे हुए खिलाड़ी हैं.

उत्तर प्रदेश मे लोकसभा की गोरखपुर और फूलपुर की सीट क्रमशः मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख़्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या के सांसद पद से इस्तीफा देने से रिक्त हुई है जो वहाँ से 2014 के आम चुनाव में जीते थे। .उन्होंने विधानसभा के पिछले वर्ष मार्च में संपन्न चुनाव के बाद गठित नई  सरकार में मुख्यमंत्री और उपमुख़्यमंत्री बन जाने के बावजूद सांसद पद से इस्तीफे जुलाई 2017 में राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा प्रत्याशी राम नाथ कोविद की जीत सुनिश्चित करने के लिए गणितीय रणनीति के कारण तत्काल नहीं दिए थे।

बिहार में लोकसभा की अररिया सीट, राष्ट्रीय जनता दल ( राजद) के सदस्य तस्लीमुद्दीन के निधन से रिक्त है. जहानाबाद और भभुआ की सीट वहाँ 2016 के विधानसभा चुनाव में जीते क्रमशः राजद के ही मुंद्रिका यादव और भाजपा के आनंद भूषण पांडेय के निधन से रिक्त है।

मीडिया की चुनावी खबरें ऐसी है कि बिहार के बाहर के अखबार बिहार की खबरें कम देते है. यही हाल दूसरे राज्यों का है . बहुत कम को पता लग सका कि पूर्वोत्तर राज्यों की जिन दो विधान सभा सीट पर चुनाव एक-एक प्रत्याशी के निधन के कारण रद्द कर दिए गए थे वहां भी पूरब के इन उपचुनाव के आगे -पीछे ही नए सिरे से चुनाव हो रहे है . बिहार में विधान सभा की जहानाबाद और भभुआ सीटों पर उपचुनाव का पूरा ब्यौरा शायद ही किसी ” राष्ट्रीय “अखबार में छपा हो. अग्रणी पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा यूँ ही नहीं कहते अखबार हिंदुस्तान के लोगों को उनके राज्य और खास कर जिला की ही खबरे देते है . क्या यही है राष्ट्रीयता ?

राष्ट्रीय मीडिया, त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाजपा की शून्य दशा से सरकार बनाने की ताकत बन जाने की “शानदार” जीत और राज्य में 25 बरस सरकार चलाने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की “करारी” हार से शायद उतना नहीं चौंकी जितना “बहन जी” के इस कदम से चौंकी नजर आती है.

अखिलेश जी, स्नेह से मायावती जी को ‘बहुत पहले से “बुआ” बोलते हैं . बसपा की यह नई रणनीति , भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकती है. योगी जी के लिए गोरखपुर की सीट खास है. पिछले 8 बार लगातार उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ और फिर खुद वे 2014 तक जीते हैं .

उपचुनाव को लेकर बसपा के बदले मिजाज का राज पूरी तरह नही खुला है. मायावती जी के लखनऊ आवास पर गत शनिवार एक बैठक के बाद सपा को समर्थन देने का ऐलान किया गया. यह ऐलान खुद उन्होंने नहीं बल्कि बसपा के गोरखपुर समन्वयक ने किया . विपक्ष की एकता नहीं हुई तो बीजेपी को गोरखपुर में कोई खास दिक्कत नहीं होनी चाहिए.

वामपंथी दलों ने फूलपुर तथा गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा को हराने के लिए सपा र्को समर्थन देने का निर्णय लिया है. वामपंथी दलों की 6 मार्च की बैठक में .यह निर्णय लिया गया। इसमे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) , भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले) और फारवर्ड ब्लाक शामिल थे । बैठक में यह राय थी कि भाजपा फासीवादी मनोवृत्ति से संचालित पार्टी है जो घोर साम्प्रदायिक है। जब से भाजपा सरकार कायम हुई है, आम जनता का संकट बढ़ने के साथ ही भारतीय संविधान एवं लोकतंत्र पर खतरा भी बढ़ गया है। अल्पसंख्यकों, दलितों तथा महिलाओं पर हमलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है और जनता की एकता को भारी चोट पहुंचायी जा रही है। ऐसी स्थिति में साम्प्रदायिक एवं जनविरोधी भाजपा को हराना जनता तथा देश के हित में अत्यंत जरूरी हो गया है। प्रदेश में भाजपा के खिलाफ जनवादी सेकुलर ताकतें एक साथ आ रही हैं, बसपा द्वारा इस चुनाव में समर्थन देना एक अच्छी शुरूआत है। जनता की यही इच्छा और समय की मांग है कि देश बचाने के लिए सभी सेकुलर, जनवादी वामपंथी ताकतें एक साथ खड़ी हों।

फूलपुर में बीजेपी की जीत आसान नहीं होगी. लोकसभा की फूलपुर की सीट पर भाजपा केवल 2014 में जीती है. उसके प्रत्याशी कौशलेंद्र सिंह पटेल हैं .फूलपुर का प्रतिनिधित्व करने वालों में स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु अव्वल है. काँग्रेस ने इस बार मनीष मिश्र को टिकट दे दिया . आपराधिक इतिहास के निर्दलीय अतीक अहमद भी चुनाव मैदान में है जो 2004 में सपा की टिकट पर जीते थे.

इन उप चुनाव को लेकर खबरें खास कर गोरखपुर ओर योगी जी पर केंद्रित रखी है. मीडिया में यह बड़ी खबर है कि 2007 में गोरखपुर की सांप्रदायिक हिंसा मामले में योगी आदित्यनाथ के खिलाफ मुक़दमा चलाने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दाखिल याचिका 22 फरवरी को खारिज कर दी गई.  दैनिक भाष्कर के जयपुर संस्करण तक में योगी आदित्यनाथ और गोरखपुर पहले पन्ने पर है. इस अखबार में सोमवार को योगी जी के हवाले से “खबर” थी कि उपचुनाव मे सपा संग बसपा का हो जाना सांप और नेवला का साथ आ जाना है . गोरखपुर में भाजपा के उपेन्द्र दत्त शुक्ल , सपा के प्रवीण निषाद मैदान में हैं.

चुनावी दुमछल्ला

पत्रकारों को चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी नहीं करनी चाहिए । पर उन्हें अपनी चुनावी रिपोर्ट में आंकलन तो करना ही पड़ता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के वर्ष 1996 के चुनाव में मेरा निजी आंकलन था कि किसी को स्पष्ट बहुमत शायद ही मिल सकेगा। अंततः वही हुआ भी। बीजेपी के एक बड़े नेता ने वोटिंग के पहले निजी मुलाक़ात में पूछा कि परिणाम क्या निकल सकते हैं। मैंने उनको स्पष्ट कहा ,” भविष्यवाणी तो नहीं कर सकता लेकिन अपना निजी आंकलन आपकी निजी जानकारी के लिए बता सकता हूँ”. उन्होंने मेरा आंकलन जानकार कहा कि इसे अखबारों के लिए मत लिखें तो बेहतर रहेगा वरना अखबारों में अगर यह छापना शुरू हो गया कि इस बार विखंडित जनादेश निकलने की संभावना है तो वास्तव में भी वही हो जाएगा। उनका यह भी कहना था कि सच में ऐसा ही हो गया जो मेरा आंकलन था , तो वो क्या करेंगे. वैसे भी चुनाव की भविष्यवाणी-परक खबरें मैं नहीं देता। इसलिए उनके अहम की संतुष्टी के लिए अपने आंकलन के आधार पर कोई रिपोर्ट ना लिखने की हामी भरने में क्षण भर की भी देरी नहीं लगी।

जब चुनाव परिणाम अधिकृत तौर पर घोषित हो गए तो बीजेपी के उक्त नेता ने मुझे फोन कर कहा, ” आपकी भविष्यवाणी तो सच साबित हो गई”, मैंने तपाक से उन्हें याद दिलाया, ” मैंने तो कोई भविष्यवाणी की ही नहीं थी। अलबत्ता, आपसे अनौपचारिक बातचीत में स्वयं आपके पूछने पर सिर्फ आपकी निजी जानकारी के लिए अपना आंकलन बताया था कि शायद ही किसी पक्ष को स्पष्ट बहुमत मिल सकेगा। वर्ष  1996 के चुनाव के बाद बीजेपी को थक -हार कर बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती जी से फिर हाथ मिला छह-छह माह वाली हिन्दुस्तान की अभूतपूर्व सरकार बनानी पड़ी.

बीजेपी के वह नेता बाद में केंद्र में मंत्री बने और अभी भी सांसद हैं. उन्होंने हाल में पूछा कि उत्तर प्रदेश के उपचुनाव के परिणाम के प्रति मेरी क्या भविष्यवाणी है। मुझे दो टूक कहना पड़ा कि उत्तर प्रदेश से निकले हुए 18 बरस हो गए हैं ,वहाँ की जमीनी वास्तविकताओं से रत्ती भर भी वाकिफ नहीं। अब तो मतदान और मतगणना भी इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों के जरिये ही कराये जाते हैं। भले ही उनमें किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं हो सकने का भरोसा पैदा करने के लिए वीवीपीएटी से मिली परची मिलती है कि उसने वोट किसको दिया.

 



मीडियाविजिल के लिए यह विशेष श्रृंखला वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा लिख रहे हैं, जिन्हें मीडिया हल्कों में सिर्फ ‘सी.पी’ कहते हैं। सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण, फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है। सीपी की इस श्रृंखला की कड़ियाँ हम चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और चुनाव बाद भी पेश करते रहेंगे। 



 

 

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