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आ गया..! आ गया..! हिन्दी में रवीश कुमार से जानिए राफे़ल सौदे से जुड़े सवाल-जवाब..!

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रवीश कुमार

 

 

सबसे पहले दो तीन तारीखों को लेकर स्पष्ट हो जाइये। 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद रफाल डील का एलान करते हैं।

इसके 16 दिन पहले यानी 25 मार्च 2015 को राफेल विमान बनाने वाली कंपनी डास्सो एविएशन के सीईओ मीडिया से बात करते हुए हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड के चेयरमैन का ज़िक्र करते हैं। कहते हैं कि “एचएएल चेयरमैन से सुनकर आप सुनकर मेरे संतोष की कल्पना कर सकते हैं कि हमने ज़िम्मेदारियों के साझा करने से सहमत हैं. हम रिक्वेस्ट फ़ॉर प्रपोजल( ROP) तय की गई प्रक्रिया को लेकर प्रतिबद्द हैं. मुझे पूरा भरोसा है कि कांट्रेक्ट को पूरा करने और और उस पर हस्ताक्षर करने का काम जल्दी हो जाएगा।”

आपने ठीक से पढ़ा न। बातचीत की सारी प्रक्रिया यूपीए के समय जारी रिक्वेस्ट ऑफ प्रपोजल के हिसाब से चल रही है। यानी नया कुछ नहीं हुआ है। यह वो समय है जब प्रधानमंत्री की यात्रा को लेकर तैयारियां चल रही हैं। माहौल बनाया जा रहा है। 16 दिन बाद प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस के लिए रवाना होते हैं। यानी अब तक इस डील की प्रक्रिया में हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड कंपनी शामिल है, तभी तो रफाल कंपनी के चेयरमैन उनका नाम लेते हैं। हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स सार्वजनिक क्षेत्र की यानी सरकारी कंपनी है। इसका इस क्षेत्र में कई दशकों का अनुभव है।

यात्रा के दिन करीब आते जा रहे हैं। दो दिन पहले 8 अप्रैल 2015 को तब के विदेश सचिव एस जयशंकर प्रेस से बात करते हुए कहते हैं कि “राफेल को लेकर मेरी समझ यह है कि फ्रेंच कंपनी, हमारा रक्षा मंत्रालय और हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड के बीच चर्चा चल रही है. ये सभी टेक्निकल और डिटेल चर्चा है. नेतृत्व के स्तर पर जो यात्रा होती है उसमें हम रक्षा सौदों को लेकर शामिल नहीं करते हैं. वो अलग ही ट्रैक पर चल रहा होता है।”

अभी तक आपने देखा कि 25 मार्च से लेकर 8 अप्रैल 2015 तक विदेश सचिव और राफेल बनाने वाली कंपनी डास्सो एविएशन के सीईओ हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड का नाम ले रहे हैं यानी पता चल रहा है कि यह कंपनी इस डील का पार्ट है। डील का काम इसे ही मिलना है।

अब यहां पर एक और तथ्य है जिस पर अपनी नज़र बनाए रखिए। मार्च 2014 में हिन्दुस्तान एविएशन लिमिटेड और डास्सो एविशेन के बीच एक करार हो चुका होता है कि 108 लड़ाकू विमान भारत में ही बनाए जाएंगे इसलिए उसे लाइसेंस और टेक्नालजी मिलेगी। 70 फीसदी काम हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड का होगा, बाकी 30 फीसदी डास्सो करेगी।

10 अप्रैल को जब प्रधानमंत्री मोदी डील का एलान करते हैं तब इस सरकारी कंपनी का नाम कट जाता है। वो पूरी प्रक्रिया से ग़ायब हो जाती है और एक नई कंपनी वजूद में आ जाती है, जिसके अनुभव पर सवाल है, जिसके कुछ ही दिन पहले बनाये जाने की बात उठी है, उसे काम मिल जाता है। प्रशांत भूषण, यशंवत सिन्हा और अरुण शौरी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में यह आरोप लगाए हैं। उन्हीं की प्रेस रीलीज़ से मैंने ये घटनाओं का सिलसिला आपके लिए अपने हिसाब से पेश किया है।

अब इस जगह आप ठहर जाइये। चलिए चलते हैं वहां जहां राफेल विमान की बात शुरू होती है। 2007 में भारतीय वायुसेना ने सरकार को अपनी ज़रूरत बताई थी और उस आधार पर यूपीए सरकार ने रिक्वेस्ट ऑफ प्रपोज़ल (ROP) तैयार किया था कि वह 167 मीडियम मल्टी रोल कंबैट (MMRC) एयरक्राफ्ट खरीदेगा। इसके लिए जो टेंडर जारी होगा उसमें यह सब भी होगा कि शुरुआती ख़रीद की लागत क्या होगी, विमान कंपनी भारत को टेक्नॉलजी देगी और भारत में उत्पादन के लाइसेंस देगी।

टेंडर जारी होता है और लड़ाकू विमान बनाने वाली 6 कंपनियां उसमें हिससा लेती हैं। सभी विमानों के परीक्षण और कंपनियों से बातचीत के बाद भारत की वायु सेना 2011 में अपनी पंसद बताती है कि दो कंपनियों के विमान उसकी ज़रूरत के नज़दीक हैं। एक डास्सा एविएशन का राफेल और दूसरा यूरोफाइटर्स का विमान। 2012 के टेंडर में डास्सो ने सबसे कम रेट दिया था। इसके आधार पर भारत सरकार और डास्सो कंपनी के बीच बातचीत शुरू होती है।

अब सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी ने जो डील की है वो पहले से चली आ रही प्रक्रिया और उसकी शर्तों के मुताबिक थी या फिर उसमें बदलाव किया गया? क्यों बदलाव हुआ? क्या भारतीय वायुसेना ने कोई नया प्रस्ताव दिया था, क्या डास्सो कंपनी ने नए दरों यानी कम दरों पर सप्लाई का कोई नया प्रस्ताव दिया था?

क्योंकि 10 अप्रैल 2015 के साझा बयान में जिस डील का ज़िक्र है वो 2012 से 8 अप्रैल 2015 तक चली आ रही प्रक्रिया और शर्तों से बिल्कुल अलग थी। 8 अप्रैल की बात इसलिए कही क्योंकि इसीदिन विदेश सचिव एस जयशंकर कह रहे हैं कि बातचीत पुरानी प्रक्रिया का हिस्सा है और उसमें हिन्दुसतान एयरोनोटिक्स लिमिटेड शामिल है। जबकि यह कंपनी दो दिन बाद इस डील से बाहर हो जाती है। एच ए एल को डील से बाहर करने का फैसला कब हुआ, किस स्तर पर हुआ, कौन कौन शामिल था, क्या वायु सेना की कोई राय ली गई थी?

अब यहां पर प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा आरोप लगाते हैं कि 60 साल की अनुभवी कंपनी हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स( HAL) को सौदे से बाहर कर दिया जाता है और एक ऐसी कंपनी अचानक इस सौदे में प्रवेश करती है जिसका कहीं ज़िक्र नहीं था। होता तो विदेश सचिव एस जयशंकर HAL की जगह रिलायंस डिफेंस लिमिटेड का नाम लेते। 25 मार्च को डास्सो एविएशन के सी ई ओ HAL की जगह रिलायंस डिफेंस का नाम लेते।

प्रशांत भूषण का कहना है कि रिलायंस डिफेंस पर भारतीय बैंकों का 8000 करोड़ का कर्ज़ा बाकी है। कंपनी घाटे में चल रही है। अनुभव भी नहीं है क्योंकि इनकी कंपनी भारतीय नौ सेना को एक जहाज़ बनाकर देने का वादा पूरा नहीं कर पाई। फिर अनिल अंबानी की इस कंपनी पर ये मेहरबानी क्यों की गई? फ्री में ?

अनिल अंबानी की कंपनी ने इस सवाल पर एक जवाब दिया है। उसे यहां बीच में ला रहा हूं। ” हमें अपने तथ्य सही कर लेने चाहिए. इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत कोई लड़ाकू विमान नहीं बनाए जाने हैं क्योंकि सभी विमान फ्रांस से फ्लाई अवे कंडीशन में आने हैं. भारत में HAL को छोड़ किसी भी कंपनी को लड़ाकू विमान बनाने का अनुभव नहीं है. अगर इस तर्क के हिसाब से चलें तो इसका मतलब होगा कि हम जो अभी है उसके अलावा कभी कोई नई क्षमता नहीं बना पाएंगे. और रक्षा से जुड़े 70% हार्डवेयर को आयात करते रहेंगे”

ओह तो भारत सरकार ने एक नई कंपनी को प्रमोट करने के लिए अनुभवी कंपनी को सौदे से बाहर कर दिया? “रक्षा से जुड़े 70 फीसदी हार्डवेयर का आयात ही करते रहेंगे।” अनिल अंबानी को बताना चाहिए कि वो कौन कौन से हार्डवेयर बना रहे हैं जिसके कारण भारत को आयात नहीं करना पड़ेगा। क्या उन्हें नहीं पता कि इस डील के तहत ट्रांसफर ऑफ टेक्नालजी नहीं हुई है। यानी डास्सो ने अपनी तकनीक भारतीय कंपनी से साझा करने का कोई वादा नहीं किया है। इस पर भी प्रशांत भूषण ने सवाल उठाए हैं कि यूपीए के समय ट्रांसफर ऑफ टेक्नालजी देने की बात हुई थी, वो बात क्यों ग़ायब हो गई। बहरहाल अनिल अंबानी की कंपनी स्वीकार कर लेती है कि वह नई है। अनुभव नहीं है। आप फिर से ऊपर के पैराग्राफ जाकर पढ़ सकते हैं।

भारत सरकार की बातें निराली हैं। जब यह मामला राहुल गांधी ने उठाया तो रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि देश के सामने सब रख देंगे। मगर बाद में मुकर गईं। कहने लगीं कि फ्रांस से गुप्तता का क़रार हुआ है।

जबकि 13 अप्रैल 2015 को दूरदर्शन को इंटरव्यू देते हुए रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर बता चुके थे कि 126 एयरक्राफ्ट की कीमत 90,000 करोड़ होगी.

एक रक्षा मंत्री कह रहे हैं कि 90,000 करोड़ की डील हैं और एक रक्षा मंत्री कह रही हैं कि कितने की डील है, हम नहीं बताएंगे।

यही नहीं दो मौके पर संसद में रक्षा राज्य मंत्री दाम के बारे में बता चुके थे तो फिर दाम बताने में क्या हर्ज है। आरोप है कि जब टेक्नालजी नहीं दे रहा है तब फिर इस विमान का दाम प्रति विमान 1000 करोड़ ज़्यादा कैसे हो गया? यूपीए के समय वही विमान 700 करोड़ में आ रहा था, अब आरोप है कि एक विमान के 1600-1700 करोड़ दिए जा रहे हैं। किसके फायदे के लिए?

अजय शुक्ला ने भी लिखा है कि डील के बाद प्रेस से एक अनौपचारिक ब्रीफिंग में सबको दाम बताए गए थे। उन् लोगों ने रिपोर्ट भी की थी। इसी फेसबुक पेज @RavishKaPage पर मैंने अजय शुक्ला की रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद किया है।

इस साल फ्रांस के राष्ट्रपति मैंक्रां भारत आए थे। उन्होंने इंडिया टुडे चैनल से कहा था कि भारत सरकार चाहे तो विपक्ष को भरोसे में लेने के लिए कुछ बातें बता सकती हैं। उन्हें ऐतराज़ नहीं है। आप ख़ुद भी इंटरनेट पर इस इंटरव्यू को सर्च कर सकते हैं।

अब यहां पर आप फिर से 25 मार्च 2015, 8 अप्रैल 2015 और 10 अप्रैल 2015 की तारीखों को याद कीजिए। प्रशांत भूषण का आरोप है कि 28 मार्च 2015 को अदानी डिफेंस सिस्टम एंड टेक्नॉलजी लिमिटेड और 28 मार्च को रिलायंस डिफेंस लिमिटेड कंपनी को इस प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाता है। जो खेल 28 मार्च को हो गया था उसके बारे में भारत के विदेश सचिव को पता ही नहीं है। वो तो HAL का नाम ले रहे थे। यानी उन्हें कुछ पता नहीं था कि क्या होने जा रहा है।

प्रशांत भूषण इस स्तर पर एक नई बात कहते हैं। वे कहते हैं कि अगर किसी स्तर पर कोई नई कंपनी डील में शामिल होती है तो इसके लिए अलग से नियम बने हैं। 2005 में बने इस नियमावली को आफसेट नियमावली कहते हैं। इस नियम के अनुसार उस कंपनी का मूल्यांकन होगा और रक्षा मंत्री साइन करेंगे। तो क्या रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने किसी फाइल पर साइन किया था, क्या उन्हें इस बारे में पता था? साथ ही रक्षा मामलों की कैबिनेट कमीटी में क्या इस पर चर्चा हुई थी?

एक प्रश्न और उठाया है। 4 जुलाई 2014 को यूरोफाइटर्स रक्षा मंत्री अरुण जेटली को पत्र लिखती है कि वह अपनी लागत में 20 प्रतिशत की कटौती के लिए तैयार है। याद कीजिए कि 2011 में भारतीय वायु सेना ने दो कंपनियों को अपने हिसाब का बताया था। एक डास्सो और दूसरी यूरोफाइटर्स। प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा का आरोप है कि जब यह कंपनी सस्ते में विमान दे रही थी तब नया टेंडर क्यों नहीं निकाला गया?

यूपीए के समय 18 विमान उड़ान के लिए तैयार अवस्था में देने की बात हो रही थी, अब 36 विमानों की बात होने लगी। क्या इसके लिए भारतीय वायु सेना अपनी तरफ से कुछ कहा था कि हमें 18 नहीं 36 चाहिएं? और अगर इसे तुरंत हासिल किया जाना था तो आज उस डील के तीन साल से अधिक हो गए, एक भी राफेल विमान क्यों नहीं भारत पहुंचा है?

रिलायंस डिफेंस का कहना है कि उस पर ग़लत आरोप लगाए जा रहे हैं कि इस सौदे से 30,000 करोड़ का ठेका मिला है। कंपनी का कहना है कि रिलायंस डिफेंस या रिलायंस ग्रुप की किसी और कंपनी ने अभी तक 36 राफेल विमानों से जुड़ा कोई कॉन्ट्रैक्ट रक्षा मंत्रालय से हासिल नहीं किया है. ये बातें पूरी तरह निराधार हैं।

जवाब में इस बात पर ग़ौर करें, “कोई कांट्रेक्ट रक्षा मंत्रालय से हासिल नहीं किया गया है। ”

लेकिन अपने प्रेस रीलीज में रिलायंस डिफेंस कंपनी एक और आरोप के जवाब में कहती है कि “विदेशी वेंडरस के भारतीय पार्टनर्स के चयन में रक्षा मंत्रालय की कोई भूमिका नहीं है. 2005 से अभी तक 50 ऑफसेट कांट्रेक्ट साइन हो चुके हैं, सब में एक ही प्रक्रिया अपनाई गई है. रिलायंस डिफेंस ने इसके जवाब में कहा है कि इस सवाल का जवाब रक्षा मंत्रालय ही सबसे सही दे सकता है।”

प्रशांत भूषण कहते हैं कि आफसेट कंपनी के लिए अलग से रूल है। आप समझ गए होंगे कि यहां रिलायंस डिफेंस कंपनी इसी आफसेट कंपनी के दायरे में आती है। प्रशांत कह रहे हैं कि ऐसी कंपनी के मामले में रक्षा मंत्री साइन करेंगे। अनिल अंबानी की कंपनी कहती है कि रक्षा मंत्रालय की कोई भूमिका नहीं होती है कि विदेशी वेंडर्स(विमान कंपनी) किस भारतीय कंपनी को अपना साझीदार चुनेगा?

क्या वाकई रक्षा मंत्रालय की इसमें कोई भूमिका नहीं है? मगर प्रशांत भूषण ने तो आफसेट नियमावली का पूरा आदेश पत्र दिया है। अनिल अंबानी को कैसे पता कि अभी तक 50 आफसेट कांट्रेक्ट साइन हो चुके हैं और सबमें एक ही प्रक्रिया अपनाई गई है? क्या रक्षा मंत्रालय के हिस्से का जवाब रक्षा मंत्रालय को नहीं देना चाहिए?

अब रिलायंस डिफेंस रक्षा मंत्रालय के बारे में एक और बात कहती है। ” ये समझना बेहतर होगा कि DPP-2016 के मुताबिक विदेशी वेंडर को इस चुनाव की सुविधा है कि वो ऑफ़सेट क्रेडिट्स के दावे के समय अपने ऑफसेट पार्टनर्स का ब्योरा दे सके। इस मामले में ऑफसेट obligations सितंबर 2019 के बाद ही ड्यू होंगी। इसलिए ये संभव है कि रक्षा मंत्रालय को Dassault से उसके ऑफ़सेट पार्टनर्स के बारे में कोई औपचारिक जानकारी ना मिली हो।

कमाल है। अनिल अंबानी को यह भी पता है कि रक्षा मंत्रालय में 50 आफसेट डील एक ही तरह से हुए हैं। यह भी पता है कि उनके डील के बारे में रक्षा मंत्रालय को पता ही न हो। वाह मोदी जी वाह ( ये अनायास निकल गया। माफी)

HAL के बाहर किए जाने पर रिलायंस डिफेंस की प्रेस रीलीज में जवाब है कि HAL 126 MMRCA प्रोग्राम के तहत नामांकित प्रोडक्शन एजेंसी थी जो कभी कॉन्ट्रैक्ट की स्टेज तक नहीं पहुंची।

लेकिन आपने शुरू में क्या पढ़ा, यही न कि 25 मार्च 2015 को डास्सो एविशन कंपनी के सीईओ HAL के चेयरमैन का शुक्रिया अदा कर रहे हैं और 8 अप्रैल 2015 को विदेश सचिव HAL के प्रक्रिया में बने रहने की बात कहते हैं। अगर यह कंपनी कांट्रेक्ट की स्टेज तक नहीं पहुंची तो डील के दो दिन पहले तक इसका नाम क्यों लिया जा रहा है।

सवाल तो यही है कि रिलायंस डिफेंस कैसे कांट्रेक्ट के स्टेज पर पहुंची, कब पहुंची, क्या उसने इसका जवाब दिया है, मुझे तो नहीं मिला मगर फिर भी एक बार और उनके प्रेस रीलीज़ को पढूंगा।

यह कैसी डील है कि अप्रैल 2015 से अगस्त 2018 आ गया अभी तक रक्षा मंत्रालय को जानकारी ही नहीं है, डास्सो एविएशन ने जानकारी ही नहीं दी है, और रिलायंस को सब पता है कि रक्षा मंत्रालय को क्या जानकारी है और क्या जानकारी नहीं है। वाह मोदी जी वाह( सॉरी फिर से निकल गया। )

आपने एक बात पर ग़ौर किया। सरकार कहती है कि इस डील से संबंधित कोई बात नहीं बता सकते। देश की सुरक्षा का सवाल है और गुप्तता का करार है। लेकिन यहां तो रिलायंस डिफेंस कंपनी चार पन्ने का प्रेस रीलीज़ दे रही है। तो क्या गुप्पतता का करार डील में हिस्सेदार कंपनी पर लागू नहीं है? सिर्फ मोदी जी की सरकार पर लागू है? वाह मोदी जी वाह( कान पकड़ता हूं, अब नहीं बोलूंगा, अनायस ही निकल गया)

अब तो रक्षा मंत्रालय को जवाब देना बनता है। रक्षा मंत्री नहीं बोल सकती तो कोई और मंत्री बोल दें। कोई ब्लाग लिख दे, कोई ट्विट कर दे। इस सरकार की यही तो खूबी है। कृषि पर फैसला होता है तो गृहमंत्री बोलते हैं और रक्षा मंत्रालय के बारे में कानून मंत्री बोलते हैं।

रिलायंस डिफेंस कहती है कि उसे 30,000 करोड़ का ठेका नहीं मिला है। डास्सो एविएशन किस ऑफसेट पार्टनर को कितना काम देगी, यह अभी तय नहीं हुआ है। डास्सो एविएशन ने इसके लिए 100 से अधिक भारतीय कंपनियों को इशारा किया है। इसमें से दो सरकारी कंपनियां हैं एचएएल और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड।

क्या डास्सो एविएशन ने आंख मार कर इशारा किया है या सीटी बजाई है। 100 कंपनियां पार्टरन बनने वाली हैं फिर भी रक्षा मंत्रालय को आफसेट पार्टरन के बारे में पता नहीं होगा? रिलायंस को पता है मगर रक्षा मंत्रालय को नहीं। दो सरकारी कंपनियां हैं, उनके बारे में सरकार को तो पता होगा।

आप सभी पाठकों से निवेदन हैं कि मैंने हिन्दी की सेवा के लिए इतनी मेहनत की है। हिन्दी के अख़बारों में ये सब होता नहीं है। आप इसे करोड़ों लोगों तक पहुंचा दें।

अगर यशंवत सिन्हा, प्रशांत भूषण और अरुण शौरी के प्रेस कांफ्रेंस के बाद सरकार जवाब देगी तो उसे भी विस्तार से पेश करूंगा। इनकी प्रेस रीलीज़ बहुत लंबी है, अंग्रेज़ी में है इसलिए सारी बातें यहां पेश नहीं की हैं और न ही रिलायस डिफेंस के जवाब की सारी बातें। आप दोनों ही इंटरनेट पर सर्च कर सकतें हैं।

 

 

लेखक मशहूर टी.वी पत्रकार हैं।

 

 



 

1 COMMENT

  1. Unfortunately none not even Prashant bhusan is quite elaborate or as elaborate as an article in rupe-india.org, no 61 – – – Rising Corporate Military complex….. Some examples… 41 Ordnance Factories, 8 defence psu, 52 DRDO labs. DRDO has 5000 scientists 25000 personnel. Achievement after 50 years. Zero. From last 30 years 17000 CRORES spent but yet to develop Tejas light combat. Even a simple assault rifle was not developed. Due to neglect of defence psu in an international tender Psu minister Praful Patel in 2013 wrote to prime minister. He stated there are many excellent psu capable but denied to take part just because they are psu

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