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जेरूसलम: टेंपल माउंट पर सुनहरा गुंबद !

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प्रकाश के रे


 

साल 661 में इस्लाम के चौथे खलीफा हजरत अली की हत्या के करीब छह माह बाद जेरूसलम की अल-अक्सा मस्जिद में मजहब के बड़े-बुजुर्गों की मौजूदगी में मुआविया को इस्लाम का खलीफा घोषित कर दिया गया. इसी के साथ उम्मयद खलीफाओं का दौर शुरू हुआ जो एक सदी तक कायम रहा. हालांकि तीसरे खलीफा हजरत उस्मान भी उम्मयद थे, पर वंशानुगत खिलाफत की परंपरा मुआविया से शुरू होती है. हजरत अली के दौर में ही इस्लामी साम्राज्य के भीतर गृहयुद्ध गंभीर हो चुका था, पर मुआविया ने अली के बेटे हसन के साथ शांति समझौता कर लिया था. यह और बात है कि इस समझौते की एक भी शर्त पर उसने अमल नहीं किया. खलीफा बनने के बाद उसने मदीना के लोगों से कहा कि वह भी अबु बक्र और उमर की राह पर चलना चाहता था, पर ऐसा हो न सका. लेकिन मुझसे नाराजगी के बावजूद तुम लोगों के लिए मैं इंतजाम कर रहा हूं. कमोबेश जो मिले, उसे लो. झगड़ा-झंझट से किसी को फायदा नहीं. उसने यह भी दावा किया कि आचरण-व्यवहार में वह अबु बक्र और उमर की तरह नहीं हो सकता है, पर उसके बाद आनेवाले भी उसका मुकाबला न कर सकेंगे.

 

First Umayyad gold dinar, Caliph Abd al-Malik

 

मुआविया ने जेरूसलम समेत सीरिया-फिलीस्तीन पर बीस साल बतौर गवर्नर और बीस साल बतौर खलीफा शासन किया था. उसने इस्लामी साम्राज्य की राजधानी मदीना से हटाकर दमिश्क में बना दी. जेरूसलम में अपनी खिलाफत की घोषणा के तुरंत बाद उसने शहर के पवित्र ईसाई स्थलों का दौरा किया और यह संदेश दिया कि शासक के रूप में वह इन जगहों का संरक्षक है. भले उसकी राजधानी दमिश्क थी, पर वह अक्सर जेरूसलम में होता था. एक बार तो शहर में उसके ऊपर जानलेवा हमला भी हुआ था. राजधानी को मदीने से दमिश्क ले जाने का बड़ा कारण यह था कि अब साम्राज्य का विस्तार उत्तरी अफ्रीका में लीबिया से अफगानिस्तान तक हो गया था. मुआविया के इस फैसले से फिलीस्तीन और जेरूसलम को बहुत फायदा हुआ क्योंकि अब वे शासन और उसके आर्थिक संपन्नता के बेहद करीब थे.

 

Drachm of Yazid I, 676-67

 

यहूदी परंपरा के अनुरूप उसकी भी मान्यता थी कि इसी शहर में कयामत के दिन सबके फैसले होंगे. अल अक्सा के बारे में वह कहा करता था कि दुनिया की किसी भी जगह से ज्यादा अल्लाह को यह जगह पसंद है. ईसाईयत और यहूदी धर्म के प्रति वह बहुत सहिष्णु था. उसके शासन में बड़े-बड़े प्रशासनिक और सैनिक अधिकारी ईसाई थे और उनमें से कुछ बैजेंटाइन साम्राज्य में भी काम कर चुके थे. ईसाई अरबी कबीलों का भरोसा जीतने के लिए उसने उनके मुखिया की बेटी से शादी भी की थी. रोमन सम्राट हेराक्लियस का बड़ा अधिकारी मंसूर इब्न संजुन मुआविया के शासन का काम देखता था. वह ईसाई था. ईसाई आख्यानों में उसे इंसाफपसंद कहा गया है तथा उसके दौर को अमन-चैन का दौर कहा गया है. यहूदी उसे इजरायल (यहूदी कौम) से प्यार करनेवाला मानते थे. अरब के यहूदियों की नजदीकी का फायदा उसने फिलीस्तीन में उठाया और ज्यादा यहूदियों को जेरूसलम में बसने की अनुमति दी. इतना ही नहीं, उसके राज में यहूदी टेंपल माउंट पर पूजा भी कर सकते थे.

टेंपल माउंट पर भले ही यहूदियों को कुछ धार्मिक अधिकार मिले थे, पर मुआविया के दौर में ही इस जगह का इस्लामीकरण हुआ. वहां उसने मस्जिद समेत कई इमारतें बनवाईं और पहले की इमारतों का विस्तार किया. मंदिर प्रांगण के ठीक बीच में उसने एक गुंबद भी बनाया जिसे डोम ऑफ द चेन या कुब्बत-उल-सिलसिला कहा जाता है. इसके बनाने के पीछे क्या कारण था, इसके बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता है. बहुत समय बाद ईसाई धर्मयोद्धाओं ने जेरूसलम को जीता, तो उसे उन्होंने धार्मिक प्रयोजन के लिए इस्तेमाल किया. अय्युबियों के समय इसे फिर से नमाज पढ़ने की जगह बना दी गयी. बाद के समयों में कई बार इसकी मरम्मत होती रही है.

 

Dome of the Chain

 

मुआविया इस्लाम के लिए एक महान शासक साबित हुआ. साम्राज्य विस्तार के साथ ही उसने ताकतवर नौसेना खड़ी की तथा कूटनीति और मेल-जोल का ज्यादा इस्तेमाल किया. मोंटेफियोरे ने लिखा है कि मुआविया इस बात का बड़ा उदाहरण है कि हमेशा पूरी ताकत आदमी को पूरी तरह से खराब नहीं बनाती है. वह कहा करता था कि अगर कोड़े से काम चल जाये, तो वह तलवार का इस्तेमाल नहीं करता, और अगर जबान से काम बन जाये, तो वह कोड़े का इस्तेमाल नहीं करता. वह यह भी कहता था कि अगर वह अपने लोगों से एक बाल के जरिये भी जुड़ा हो, तो वह उसे टूटने नहीं देगा. वह कुस्तुंतुनिया पर हर साल नियमित रूप से हमला करता था. एक बार तो इस्लामी सेनाओं ने बैजेंटाइन राजधानी को जमीन और समुद्र की ओर से तीन सालों तक घेरे रखा था.

 

from inside Dome of the Chain

उसके खाते में दो और खास उपलब्धियां हैं. शुरुआती इस्लामी मस्जिदों में मिंबर नहीं हुआ करता है, जो बाद में मस्जिदों में एक जरूरी चीज जैसी हो गयी और जिसके ऊपर खड़े होकर या बैठकर खिताब किया जाने लगा. पहले इस मजहब में बराबरी की भावना बहुत ठोस थी. मिस्र में मुआविया के गवर्नर अम्र ने पहली बार मिंबर बनवाया था. मुआविया ने भी इसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. उसके मिंबर के चारों ओर एक घेरा जैसा रहता था ताकि तीर या भाले के हमले से उसका बचाव हो सके. मुआविया बाद में बहुत मोटा हो गया था. इस कारण वह पहले के खलीफाओं की तरह तकिये पर नहीं बैठ सकता था. उसने अपनी सुविधा के लिए पीठ टिकाने का इंतजाम किया. इस तरह से वह पहला अरबी शासक हुआ, जो तख्त या राजगद्दी पर बैठा.

उसके मोटापे के बारे में मोंटेफियोरे ने बड़ा दिलचस्प किस्सा उल्लिखित किया है. ताकतवर होने के बावजूद मुआविया हंसी-मजाक पसंद करता था और उसमें बहुत सहजता थी. एक बार उसने किसी मोटे दरबारी से मजाक किया कि उसे ऐसी गुलाम लड़की चाहिए जिसकी जांघें तुम्हारी जांघों की तरह हो. उस दरबारी ने जवाब दिया- ‘और उसका नितंब खलीफा की तरह हो.’ मुआविया ने हंसते हुए कहा, ठीक है, पर कोई चीज शुरू करो, तो उसके नतीजे के लिए भी तैयार रहो. उसे अपने सेक्सुअल ताकत पर भी खूब गुमान था. एक प्रसंग है कि वह एक खुरासानी लड़की के साथ अपने हरम में था. तभी उसे कोई और लड़की पेश की गयी, जिसके साथ उसने तुरंत संभोग किया. फिर वह खुरासानी लड़की की ओर बढ़ा और घमंड में बोला कि फारसी में शेर को क्या कहते हैं. लड़की ने जवाब दिया- कफ्तार. इस शब्द को उसने दरबारियों के सामने गौरव से दुहराया, तो किसी ने कहा कि क्या खलीफा को इस शब्द का मतलब पता है. मुआविया ने कहा कि इसका मतलब शेर है. एक दरबारी ने उसे दुरुस्त करते हुए कहा- इसका मतलब लंगड़ा लकड़बग्घा होता है. मुआविया हंस पड़ा और बोला- उस खुरासानी लड़की को बदला लेना आता है.

 

 

Dinar of Abd-al-Malik

 

उम्र की आठवीं दहाई में मुआविया की मौत हो गयी और उसका अय्याश बेटा यजीद खलीफा बना. यह भी जेरूसलम में टेंपल माउंट पर हुआ. हमेशा अपने पालतू बंदर के साथ रहनेवाले यजीद को तुरंत ही अरबिया और इराक में विद्रोहों का सामना करना पड़ा. यह इस्लाम के इतिहास का दूसरे फित्ने का आगाज था. कर्बला में हुसैन और पैगंबर मुहम्मद और हजरत अली के अनेक रिश्तेदारों की शहादत इसी फित्ने के दौरान 680 में हुई. साल 683 में युवा यजीद की भी मौत हो गयी. सीरियाई सेना ने उसके एक रिश्तेदार मारवान को इस्लाम का खलीफा तय कर दिया. अप्रैल, 685 में मारवान भी चल बसा. अब उसका बेटा अब्द अल-मलिक नया खलीफा था. पर, अभी साम्राज्य की हालत बेहद नाजुक थी. दमिश्क के खलीफा के हाथ से मक्का, इराक और फारस निकल चुके थे. उन पर अन्य इस्लामी विद्रोहियों का कब्जा था.

 

 

Drachm from Yazid I to Marwan I;Talha governor

अब्द अल-मलिक ने साम्राज्य को स्थायित्व देने के इरादे से शासन के तंत्र में बड़े फेर-बदल किये तथा बैजेंटाईन और फारसी शासन के ढर्रे को हटाते हुए अरबी प्रणाली लागू की, जो कि मजहबी सिद्धांतों पर आधारित केंद्रीय राजशाही थी. इन इंतजामों के बाद और अपने साम्राज्य की हिफाजत निश्चित कर उसने जेरूसलम की बेहतरी पर ध्यान देना शुरू किया. बाकी उम्मयद खलीफाओं की तरह शहर से उसे भी बहुत लगाव था. उसी के निर्देश पर और देख-रेख में जेरूसलम की बह इमारत बनी, जो आज भी शहर की मुख्य पहचान है, और जेरूसलम पर दावे का केंद्रीय प्रतीक है- डोम ऑफ द रॉक यानी कुब्बत अल-सखरा.

 

Dome of Rock 1920s

 

पहली किस्‍त: टाइटस की घेराबंदी

दूसरी किस्‍त: पवित्र मंदिर में आग 

तीसरी क़िस्त: और इस तरह से जेरूसलम खत्‍म हुआ…

चौथी किस्‍त: जब देवता ने मंदिर बनने का इंतजार किया

पांचवीं किस्त: जेरूसलम ‘कोलोनिया इलिया कैपिटोलिना’ और जूडिया ‘पैलेस्टाइन’ बना

छठवीं किस्त: जब एक फैसले ने बदल दी इतिहास की धारा 

सातवीं किस्त: हेलेना को मिला ईसा का सलीब 

आठवीं किस्त: ईसाई वर्चस्व और यहूदी विद्रोह  

नौवीं किस्त: बनने लगा यहूदी मंदिर, ईश्वर की दुहाई देते ईसाई

दसवीं किस्त: जेरूसलम में इतिहास का लगातार दोहराव त्रासदी या प्रहसन नहीं है

ग्यारहवीं किस्तकर्मकाण्डों के आवरण में ईसाइयत

बारहवीं किस्‍त: क्‍या ऑगस्‍टा यूडोकिया बेवफा थी!

तेरहवीं किस्त: जेरूसलम में रोमनों के आखिरी दिन

चौदहवीं किस्त: जेरूसलम में फारस का फितना 

पंद्रहवीं क़िस्त: जेरूसलम पर अतीत का अंतहीन साया 

सोलहवीं क़िस्त: जेरूसलम फिर रोमनों के हाथ में 

सत्रहवीं क़िस्त: गाज़ा में फिलिस्तीनियों की 37 लाशों पर जेरूसलम के अमेरिकी दूतावास का उद्घाटन!

अठारहवीं क़िस्त: आज का जेरूसलम: कुछ ज़रूरी तथ्य एवं आंकड़े 

उन्नीसवीं क़िस्त: इस्लाम में जेरूसलम: गाजा में इस्लाम 

बीसवीं क़िस्त: जेरूसलम में खलीफ़ा उम्र 

इक्कीसवीं क़िस्त: टेम्पल माउंट पहुंचा इस्लाम

बाइसवीं क़िस्त: जेरुसलम में सामी पंथों की सहिष्णुता