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चुनाव चर्चा: ‘स्वर्णिम तेलंगाना’ की राह में 60 हज़ार प्रति व्यक्ति क़र्ज का बोझ

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चंद्र प्रकाश झा 


स्वतंत्र भारत संघ गणराज्य के नवीनतम राज्य, तेलंगाना की प्रथम विधानसभा का कार्यकाल जुलाई 2019 में समाप्त होना था। द्वितीय विधान सभा के चुनाव अगले बरस नई लोकसभा के निर्धारित चुनाव के साथ कराने की संभावना थी, लेकिन अब वहाँ चुनाव राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम की विधानसभा के चुनाव और कर्नाटक में लोकसभा की तीन सीटों, मांड्या, शिमोगा पर उप चुनाव के साथ ही नवम्बर–दिसम्बर 2018 में कराये जा रहे हैं। तेलंगाना में वोटिंग सात दिसम्बर को होगी। सभी चुनाव की मतगणनाएक साथ 11 दिसम्बर को होनी है।

तेलंगाना के प्रथम मुख्यमंत्री एवं सत्तारूढ तेलंगाना राष्ट्र समिति ( टीआरएस) के सर्वेसर्वा के.चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने समय से पहले ही विधानसभा भंग कर नया चुनाव कराना श्रेयस्कर माना तो इसके गहरे अंतर्निहित राजनीतिक कारण हैं. घाट-घाट की राजनीति का पानी पिये हुए राव साहिब को शायद ऐसा लगा होगा कि तेलंगाना के चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराने में उन्हें ज्यादा जोखिम उठाना पड़ सकता है। अगले आम चुनाव के साथ ही करीब दस राज्यों के भी चुनाव कराये जा सकते हैं, जिनमें आंध्र प्रदेश भी शामिल है। पृथक तेलंगाना राज्य का गठन आंध्र प्रदेश को ही विभाजित कर किया गया। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस ( यूपीअए) की मनमोहन सिंह सरकार के द्वितीय शासन-काल में इस नए राज्य का गठन कुछ हड़बड़ी में, 2013 में किया गया था।

तेलंगाना विधानसभा में 119 सीटें हैं। भंग विधान सभा में कांग्रेस के 21, टीडीपी के 15 सदस्य थे। टीडीपी ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी 2014 का पिछ्ला चुनाव भाजपा के साथ गठबंधन कर लड़ा था। टीडीपी के 15 विधायक निर्वाचित हुए थे। इनमें से अधिकतर बाद में टीआरएस के पाले में चले गए।

इस बार के चुनाव में कांग्रेस ने तेलुगु देशम पार्टी ( टीडीपी ) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( भाकपा) और तेलंगाना जन समिति के साथ ‘ महा कुटुमी’ मोर्चा बनाया है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम ) ने 28 छोटी पार्टियों के संग मिलकर ‘ बहुजन लेफ्ट फ्रंट’ ( बीएलएफ) नामक नया चुनावी मोर्चा बनाया है। टीआरएस और भाजपा तेलंगाना में अलग-अलग और किसी से भी गठबंधन किये बगैर अकेले ही चुनाव लड़ेंगी। भाजपा का चुनाव घोषणापत्र तैयार किया जा रहा है और उसके प्रत्याशियों के नाम दो किस्तों में जारी करने की खबर है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राज्य में चुनाव प्रचार का पहला दौर पूरा कर चुके हैं। भाजपा के राष्ट्रीय नेता तेलंगाना के चुनाव प्रचार मैदान में अभी नहीं उतरे हैं। इन चुनावों के लिए टीआरएस प्रत्याशियों के नामों की घोषणा सितम्बर 2018 से शुरू कर दी गई थी।

‘चुनाव चर्चा’ कॉलम के 29 अगस्त के अंक में तेलंगाना पर केंद्रित आलेख की पहली पंक्ति में ही यह ऊल्लेख किया गया था कि राव साहिब ने जब प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी से नई दिल्ली में चार अगस्त 2018 को भेंट की तो हिन्दुस्तान का माहौल कुल मिलाकर चुनावी बनना शुरू हो चुका था। राव साहिब को शायद लगा होगा कि देश में आम चुनाव अब कभी भी कराये जा सकते हैं।

कांग्रेस कहती रही है कि टीआरएस ने भाजपा के साथ ‘ गुप्त ‘ चुनावी समझौता कर लिया है। टीसीआर इसका खंडन करते हुए कहती है कि वह आगामी आम चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस, दोनों के ही खिलाफ क्षेत्रीय दलों का एक ‘फेडरल फ्रंट’ बनाने के अपने इरादे को लेकर अटल है। उसका कहना है कि वह कोई हड़बड़ी में नहीं हैं। फेडरलफ्रंट बनने में समय लग सकता है लेकिन उसकी वास्तविक जरूरत है। टीआरएस का दावा है कि पार्टी तेलांगाना में आगामी विधानसभा ही नहीं लोकसभा चुनाव भी चुनाव अपने बूते पर लड़ेगी।

केसीआर ने चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से पहले ही पिछले 15 अगस्त को चुनावी बिगुल बजा दिया। केसीआर ने राज्य के लोगों से एक पुरजोर अपील की। अपील थी कि लोग उन्हें इस राज्य को ‘ स्वर्णिम तेलंगाना’ में परिणत करने के उनके प्रयास के प्रति समर्थन बरकरार रखें। उन्होंने स्वतन्त्रता दिवस पर हैदराबाद में इस राज्य के मुख्य राजकीय समारोह में अपने भाषण में मोदी जी की तारीफ करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। केसीआर ने मोदी जी के संसद में हालिया सम्बोधन में तेलांगाना के आंध्रप्रदेश से पृथक होकर ‘ विकास के पथ पर परिपक्वता से आगे बढ़ने’ के जिक्र का विशेष उल्लेख किया। मोदी जी को इंगित करते हुए केसीआर ने ऐलान किया, ” जैसा कि उन्होंने (मोदीजी) ने कहा है, हमने घटिया राजनीति से हट कर और अनावश्यक विवाद को तूल देने के बजाय विकास कार्यों को श्रेयस्कर समझा है। टीआरएस ने राज्य सभा के उप सभापति के हाल के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) में शामिल, बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के जनता दल – यूनाइटेड के प्रत्याशी एवं प्रभात खबर हिंदी दैनिक के पूर्व सम्पादक, हरिवंश सिंह का समर्थन किया था। इसके अलावा टीआरएस ने मोदी सरकार के विरुद्ध लोकसभा के मानसून सत्र में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रा बाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी और अन्य द्वारा पेश अविश्वास प्रस्ताव पर मत-विभाजन में भाग नहीं लेकर मोदी सरकार का अप्रत्यक्ष साथ दिया था। टीआरएस ने राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के चुनाव में भी भाजपा के प्रत्याशियों क्रमशः रामनाथ कोविद और एम.वेंकैया नायडू का खुल कर समर्थन किया था।

सियासी हल्कों में चर्चा है कि टीआरएस, मई 2019 के पहले निर्धारित आगामी लोक सभा चुनाव में भाजपा का हाथ थाम सकती है। टीआरएस, एनडीए में अभी शामिल नहीं है। स्पष्ट है कि केसीआर, चुनावी कदम फूँक -फूँक कर उठा रहे हैं। उन्हें बखूबी पता है कि तेलांगाना में अल्पसंख्यक मतदाता किसी भी पार्टी की संभावित जीत को हार और निश्चित हार को जीत में तब्दील कर सकते हैं। खुद टीआरएस ने कहा है उनकी पार्टी ‘ सेक्युलर’ बनी रहेगी और उसके भाजपा के साथ चुनावी गठबंधन करने की कोई संभावना नहीं है. केसीआर कहते रहे हैं कि उनकी पार्टी का एनडीए के प्रति समर्थन , मुद्दों पर आधारित है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हाल में तेलंगाना में चुनावी जनसभा में मुख्यमंत्री केसीआर को जम कर लताड़ा। उनका कहना था कि राज्य पर दो लाख करोड़ रूपये का क़र्ज़ है। उन्होंने दावा किया कि राज्य में टीआरएस शासन में 4500 किसानों को आत्महत्या करने पर विवश होना पड़ा। उन्होंने ऐलानिया कहा तो यही है कि कांग्रेस के राज्य की सत्ता में में आने पर किसानों के दो लाख रूपये तक के कर्ज माफ कर दिए जाएंगे, साल भर में एक लाख सरकारी नौकरियों की रिक्ति भरी जाएगी और आदिवासियों के हितों की रक्षा की जाएगी। कांग्रेस अध्यक्ष ने टीआरएस सरकार पर आरोपों की झड़ी लगाते हुए कहा कि इसने राज्य पर दो लाख करोड़ रूपये का कर्ज लाद दिया है, प्रत्येक तेलंगानावासी पर 60 हज़ार रूपये का कर्ज है, मुख्यमंत्री राव ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है और अपने परिवार का प्रभुत्व जमाया है।”



(मीडियाविजिल के लिए यह विशेष श्रृंखला वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा लिख रहे हैं, जिन्हें मीडिया हल्कों में सिर्फ ‘सी.पी’ कहते हैं। सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण, फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है।)



 

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