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महिलाओं को सरेआम नंगा करने की घटनाएँ भारत भूमि में ही क्यों घटती हैं ?

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शीबा असलम फ़हमी

 

 बिहार की एक महिला को नंगा कर इलाक़े भर में घुमा-घुमा के पीटनेवाली घटना और इससे पहले की ऐसी ही घटनाओं की वजह से मेरे दिमाग़ में एक सवाल लगातार घूम रहा है की महिलाओं पर अत्याचार तो हर समाज में हैं. पश्चिम से ले कर पूरब तक, लेकिन महिलाओं को इस तरह सरेआम नंगा कर बे-इज़्ज़त करना सिर्फ हिन्दू समाज में ही क्यों पाया जाता है?

कभी डायन कह के, कभी बच्चा चोर कह के, कभी चोरनी या जादू-टोनेवाली कह के, नंगा कर के सारे इलाक़े में घूमाना और पीटना और अपमानित करना सिर्फ हिन्दू समाज ही करता है. दुनिया भर से महिलाओं पर जो ज़ुल्म और हिंसा की तस्वीरें आती हैं, चाहें वो इसरायली पुलिस द्वारा फिलिस्तीनी महिलाओं के टार्चर और क़त्ल की ख़बरें हों या ‘इसिस’ द्वारा महिलाओं के टार्चर और हत्या की ख़बर, इसके अलावा अफ़्रीक़ी जनजातियों के संघर्षों के चलते भी महिलाओं पर अत्याचार की ख़बरें आम है. तालिबानो ने भी पिछले दशक में महिलाओं को पीटा और क़त्ल किया, लेकिन नंगा नहीं किया. लेकिन ये जो भारत में होता है ये कहीं नहीं होता. और ज़्यादा ताजुब इस बात पर होता है की ये घिनौना तरीक़ा हिन्दू समाज अपने ही समाज के दबे-कुचले दलित वर्गों के साथ करता है.

इसके अलावा एक और बात जो बहुत नागवार गुज़रती है वो ये की अपनी बुज़ुर्ग माओं को वृद्धाश्रम और युवा विधवाओं को विधवाश्रम फ़ेंक आने की व्यवस्था भी सिर्फ हिन्दू समाज में क्यों है? विधवा और बुज़ुर्ग अकेली महिलाऐं तो हर समाज में होती हैं, उनको परिवार से काट के अलग-थलग करने की प्रक्रिया सिर्फ हिन्दू समाज में क्यों पनप गयी? 21वीं में विधवाश्रम पूरे समाज पर कलंक नहीं तो क्या है? एक दुखी महिला को उसके घर-परिवार से अलग कर बिलकुल लावारिस-अनाथ बनाने की इस व्यवस्था के विरुद्ध भारतीय नारीवाद कब खड़ा होगा?
लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। स्त्रीमुक्ति के प्रश्नों पर लगातार सक्रिय रहती हैं।


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