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राम मंदिर पर अध्‍यादेश को लेकर सत्‍तारूढ़ पार्टी की उतावली क्‍या कहती है

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राजेश कुमार

फरवरी में अंतरिम बजट या लेखानुदान पारित कराने के बाद सरकार के पास 4 मार्च को कुम्भ मेला खत्म होने से पहले किसी समय राम मंदिर मुद्दे पर अध्यादेश लाने का विकल्प है, लेकिन इसे अदालत में चुनौती दिया जाना लगभग तय है और अयोध्या में विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाये रखने के अदालती आदेश को देखते हुये इसके खिलाफ स्थगन आदेश की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। लिहाजा भाजपा अध्यादेश जारी नहीं करेगी। पार्टी अध्यक्षअमित शाह अभी ज़ी टीवी के अपने चहेते सुधीर चौधरी को कह भी चुके हैं कि मामले के सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन रहते अध्यादेश लाना ठीक नहीं होगा। ठीक नहीं होने का मतलब अनुचित होनानहीं है, उचित-अनुचितके मूल्यबोध से मुक्ति के बाद इसका संभावित अर्थ अनुकूल नहीं होना ही हो सकता है।

प्रधानमंत्री अभी पिछले महीने ही अलवर में कह चुके हैं कि विवाद पर कानून बनाने के लिये राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत है नहीं और कांग्रेस इस मामले की सुनवाई टालने के लिये सुप्रीम कोर्ट के जजों को महाभियोग की धमकी तक दे रही है। ऐसे में, सत्ता में साढे चार साल की चुप्पी और लोकसभा चुनावों के करीब आकर ‘अविलम्ब भव्य राम मंदिर का निर्माण शुरू करने’ के आरएसएस, विहिप, शिवसेना और साधु-संतों की समर्पित जमात के नारों के बीच राज्यसभा के नामजद सदस्य और ‘संघ के विचारक’ प्रोफेसर राकेश सिन्हा ने इसके लिये सदन में ‘प्राइवेट मेम्बर बिल’ लाने की बात कही है।)

देश में 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को उच्चतर माध्यमिक स्तर तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराने के 1996 के गैर-सरकारी विधेयक के प्रस्तावक के उलट, अभी साढ़े तीन साल पहले द्रविड़ मुन्‍नेत्र कषगम के तिरुचि शिवा उभयलिंगी लोगों के अधिकारों की रक्षा और उनके सकल विकास के लिये एक व्यापक राष्ट्रीय नीति बनाने और लागू करने के प्रावधान वाला अपना विधेयक वापस लेने की तमाम अपीलों पर भौंचक नहीं थे। उद्योगपति टी. सुब्बारामी रेड्डी भौंचक थे। शायद दो-चार महीने पहले ही कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर पहली बार लोकसभा में पहुंचे थे। वह भौंचक थे कि मानव संसाधन विकास मंत्री एस.आर. बोम्मई उनसे विधेयक वापस लेने की अपील क्यों कर रहे थे, जबकि अगस्त 1996 की उस चर्चा में गीता मुखर्जी, रमेश चेन्नीथला, रामकुमार कुसुमारिया, ममता बनर्जी, सत्यदेव सिंह सहित विभिन्न दलों के बीसियों सदस्यों ने विधेयक का समर्थन किया था। याद नहीं कि तब पीठासीन उप-सभापति कौन थे, लेकिन वह बार-बार पूछ रहे थे कि क्या वह विधेयक पर मतदान करायें और लम्बी उहापोह के बाद सुब्बारामी रेड्डी ने विधेयक वापस ले लिया था।

तिरुचि शिवा भी पहली बार 1996 में ही 11वीं वीं लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुये थे, लेकिन 24 अप्रैल 2015 को चर्चा में 22 सदस्यों की शिरकत और दलगत मतभेदों से परे, लगभग सभी सदस्यों के समर्थन के बावजूद जब सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत और संसदीय कार्य राज्यमंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने उनसे विधेयक वापस लेने की अपील की, तो उन्हें कतई आश्चर्य नहीं हुआ। तब भी नहीं जब थावरचंद गहलोत ने कहा, ‘‘हम भावनात्मक रूप से सहमत हैं और हमने सब विभागों से बातचीत की है। सब विभाग सकारात्मक रूख अपना रहे हैं और हम इस पर एक विस्तृत कानून लाने का प्रयास कर रहे हैं। मैं विश्वास दिलाता हूं, पहले किसने क्या आश्वासन दिया, क्या हुआ, नहीं हुआ या हुआ, परन्तु मेरी सरकार जो आश्वासन देगी, उसको पूरा करेगी।’’ उन्हें तब भी आश्चर्य नहीं हुआ, जब पीठासीन उपाध्यक्ष ने कहा, ‘‘राज्यसभा में परम्परा यह है कि बहस के बाद आम तौर पर गैर-सरकारी विधेयक, पता नहीं कोई अपवाद भी है या नहीं, पर अधिकतर गैर-सरकारी विधेयक वापस ले लिये जाते है। परम्परा यही है और मुझे आशा है कि आप परम्परा का पालन करेंगे।’’ जब उपाध्यक्ष ने आखिरी बार पूछा कि आप विधेयक वापस ले रहे हैं या नहीं, तो शिवा ने स्पष्ट कह दिया कि ‘’कतई नहीं… ब्रिटिश पार्लियामेंट पिछले तीन साल में 17 और कनाडा 229 प्राइवेट मेम्बर बिल पारित कर चुका है।’’ आखिर वह इस सदी के शुरू से ही लगातार राज्यसभा के सदस्य हैं!

शिवा सरकार के आश्वासनों से मुतमइन नहीं थे। फिर उनका कहना यह भी था कि सदन में उनका यह विधेयक पारित होने के बाद भी सरकार इस पर एक व्यापक विधेयक ला सकती है और अनुमोदन के बाद वह अपने-आप इसकी जगह ले लेगा। सो मुश्किल क्या है\ यह विधेयक ध्वनिमत से पारित भी हुआ और फिलहाल यह लोकसभा के विचारार्थ लम्बित है। अलबत्ता सदन के नेता और वित्तमंत्री अरुण जेटली के आग्रह पर मत-विभाजन कराने की अपनी मांग उन्होंने छोड़ दी। जेटली का अनुरोध था कि ‘‘समाज का यह तबका हम सबके सरोकार का विषय है। माननीय मंत्री ने इसीलिये इसे गंभीरता से लेने और इस बारे में एक आधिकारिक नीति या कानून बनाने पर विचार करने का भरोसा दिया है। अगर सदन इसे पारित भी कर दे तो यह कानून तो बन नहीं जायेगा। हद-से-हद यह सदन की भावना की अभिव्यक्ति होगी, लगभग एक संकल्प की तरह। सो इसे पारित कराने पर जोर नहीं देने के अलावा विकल्प एक ही है कि मत-विभाजन की बजाय इसे ध्वनि-मत से पारित कर सदन की सर्वसम्मत भावना बना दिया जाये।’’

गैर-सरकारी विधेयकों के साथ होता यही है- उसे पेश करने में हजार मुश्किलें हैं, उसका कानून बनना और भी दुष्कर। अगर आप मंत्री नहीं हैं और कोई विधेयक पेश करना चाहते हैं तो पहले तो आप एक महीने पहले नोटिस दीजिये। फिर संबद्ध सदन का सचिवालय उसे सूचीबद्ध करने से पहले इस बात की पड़ताल करेगा कि विधेयक संवैधानिक व्यवस्थाओं के अनुकूल है या नहीं। ऐसी नोटिसें अफ़रात होंगी, सो इंतजार कीजिये कि लाटरी या बैलट में आपका नाम आ जाये। अगर आपका विधेयक किसी ऐसे विषय से संबंधित है, जिसमें सरकार पर वित्तीय भार आ सकता है तो राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी भी हासिल कीजिये। पहले तो हर सप्ताह तीन गैर-सरकारी विधेयक पेश करने की व्यवस्था थी और इससे ऐसे विधेयकों का अम्बार हो जाता था लेकिन यह संख्या हर सत्र में तीन तक सीमित करने के तत्कालीन राज्यसभा अध्यक्ष के.आर. नारायणन के 1997 के फैसले के बावजूद केवल शुक्रवार को ऐसे विधेयक चर्चा के लिये लेने की परम्परा बने रहने से सदनों पर इनका बोझ बरकरार रहा। इन सब बाधाओं के पार सदन में बहस के बाद अगर मतदान की नौबत आयी, तो बहुमत के समर्थन की तो दरकार होगी ही।

इस जटिल और समय-साध्य प्रक्रिया में होता यह है कि कई बार आपका विषय अप्रासंगिक हो जाता है, आप अधबीच दिलचस्पी खो देते हैं, आपका विधेयक संयुक्त समिति या प्रवर समिति के विचारार्थ दे दिया जाता है, सदन में बहस तक पहुंचने से पहले ही आपका कार्यकाल खत्म हो जाता है। इस सब के पार अगर आप बहस तक पहुंच गये तो ‘‘आपके विषय के मुतल्लिक व्यापक विधेयक लाने के आश्वासन के साथ विधेयक वापस लेने की सरकार की अपील’’ होगी। फिर अगर आपने आश्वासन और अपील की भी परवाह नहीं की तो सत्ताधारी दल के सदस्यों के समर्थन के बिना मतदान में ऐसे विधेयक का गिर जाना आम है। कह सकते हैं कि किसी ‘प्राइवेट मेम्बर बिल’ के कानून बनने तक का सफर तय करना बहुत हद तक सत्तापक्ष और सरकार के समर्थन पर निर्भर होता है। अकारण नहीं है कि संसदीय और विधायी कार्यवाहियों की रिपोर्टिंग के पत्रकारों के अधिकार की रक्षा के फिरोज गांधी के विधेयक सहित अब तक जो 14 गैर-सरकारी विधेयक पारित हुए हैं और कानून तक बन सके हैं, वे सब के सब 1956 से 1970 के बीच पारित हुए, जब कांग्रेस सत्ता में थी और दो विधेयकों को छोड, सभी कांग्रेस के ही सांसदों ने रखे थे। महिला आश्रमों, अनाथालयों और अन्य समरूप संस्थानों की लाइसेंसिंग का 1956 का विधेयक और आपराधिक मामलों में सुप्रीम कोर्ट का अपीली क्षेत्र विस्तृत करने का 1970 का विधेयक ही था, जिन्हें लोकसभा में दो निर्दलीय सदस्यों ने पेश किया था- पहले को राजमाता कमलेन्दुमति शाह ने और दूसरे को आनंद नारायण मुल्ला ने।

गैर-सरकारी विधेयन में सत्तापक्ष के सदस्यों की पहल का मामला हालांकि अलग है। आंकडे बताते हैं कि सत्तारूढ पार्टी के सदस्य अपेक्षाकृत कम संख्या में गैर-सरकारी विधेयक पेश करते हैं और यह कोई अबूझ पहेली भी नहीं है। बात बस इतनी सी है कि आम तौर पर विपक्ष के ही नहीं, सत्ता पक्ष के भी गैर-मंत्री सदस्य मोटे तौर पर दो किस्म के मुद्दों पर विधेयन की पहल लेते हैं– एक, जो अवाम, अखबारों, चैनलों, दूसरे समाचार माध्यमों और सरकार की भी दिलचस्पी से बाहर होते हैं और दूसरे वे, जिनमें प्रत्यक्षतः लोगों की तो दिलचस्पी होती है, लेकिन तमाम कथ-अकथ कारणों से सरकार जिनके खिलाफ होती है। प्रीवी पर्स खत्म करने के 1971 के 26वें संविधान संशोधन में भाकपा के भूपेश गुप्ता, कांग्रेस के जोगेशचंद्र चटर्जी, फारवर्ड ब्लाक के चित्त बसु तथा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के बांके बिहारी दास के गैर-सरकारी विधेयक की और मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करने के 61वें संशोधन में भूपेश गुप्ता] भाजपा के शिवचंद्र झा तथा जनता दल के सत्यप्रकाश मालवीय के प्राइवेट बिल की उतप्रेरक भूमिका बहुज्ञात है।

विवादित स्थल पर राममंदिर के निर्माण को लेकर तो हमारे समय की सरकार का कोई विरोध नहीं है] कोई उदासीनता भी नहीं] कथ-अकथ कारणों से वह साढ़े चार साल चुप्पी जरूर साधे रही है। अब आम चुनाव करीब आने पर सत्तारूढ़ पार्टी के तमाम साथी संगठन इसकी उतावली प्रदर्शित कर रहे हैं, तो इसके भी कारण रहस्य नहीं हैं। क्या इस बार भी बहस पूरी हो जाने की हालत में गृह मंत्री विधेयक वापस लेने की अपील करेंगे और संसदीय कार्य मंत्री गैर-सरकारी विधेयकों को वापस लेने की परम्परा याद दिला पायेंगे और सदन के नेता मत-विभाजन का आग्रह छोड़ देने की सलाह दें सकेंगे\

अगर नहीं, तो कहीं इस बारे में पहल की सत्तारूढ पार्टी के ही एक सदस्य की घोषणा इसी प्रदर्शनकारी उतावली का विस्तार तो नहीं है और गैर-सरकारी विधेयन के मूल आशयों को सिर के बल खड़ा कर देने की कवायद भी!

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