Home काॅलम हिन्दी को तक़लीफ़ों की भाषा ही रहने दें, प्लीज़! 

हिन्दी को तक़लीफ़ों की भाषा ही रहने दें, प्लीज़! 

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14 सितंबर, हिन्दी दिवस पर विशेष

                                                                 कृष्ण प्रताप सिंह


 

कोई पूछे कि इस वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सबसे बड़ी मुश्किल क्या है और ईमानदारी से जवाब देने की शर्त लगा दे तो यकीनन, जवाब एक ही होगा-यह कि एक ओर उनकी पार्टी देश पर पचास साल राज करने के सपने देख रही है और दूसरी ओर अपने प्रधानमंत्रीकाल के पाँचवें वर्ष में ही उनका हाल यह है कि, और तो और, उनके दो तीन साल पुराने कथन भी उनके लिए असुविधाजनक हो चले हैं।

डॉलर के मुकाबले रुपये में आई ‘ऐतिहासिक’ गिरावट और पेट्रोलियम पदार्थों की अभूतपूर्व मूल्यवृद्धि से जुड़े उनके पुराने कथन तो अब उनकी पोल खोलने ही लगे हैं, हिन्दी को लेकर कही गई ‘बड़ी-बड़ी’ बातें भी इससे परहेज़ नहीं कर रहीं। खासकर 2015 में 10-12 सितम्बर को भोपाल में सम्पन्न हुए दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कही गई यह बात कि वर्तमान विश्व की छः हजार में से नब्बे प्रतिशत से ज्यादा भाषाएं सदी के अंत तक अस्तित्वसंकट में फँस जायेंगी और जो तीन उसके पार जाकर बचेंगी, उनमें अँग्रेज़ी व चीनी के साथ हिन्दी भी होगी।

अब की तो छोड़िये, जब उन्होंने यह बात कही थी, तब भी कई लोगों के लिए तय करना कठिन हो गया था कि वे इस पर हँसें या रोयें। प्रधानमंत्री के मुताबिक दुनिया की पाँच सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से भी दो-स्पैनिश और अरबी- नहीं बचने वाली, तो अन्य भारतीय भाषाओं की तो बात ही फिजूल! उस गुजराती की भी, प्रधानमंत्री बनने से पहले तक जिसकी अस्मिता की बातें करते वे थकते नहीं थे! क्या पता कि तब उन्हें उसकी विलुप्ति के खतरे का अंदाज़ा नहीं था या उन्होंने जानबूझकर उसे आगाह नहीं किया!

खैर, अपने सम्बोधन में उन्होंने यह चेतावनी भी दी थी कि हम हिन्दी को समृद्ध नहीं कर पाये तो देश के तौर पर अपना बहुत नुकसान करेंगे। साथ ही इस अंदेशे से भी जूझे थे कि वे यूपी के लोगों को चाय बेचते हुए हिन्दी नहीं सीख लेते तो उनका भविष्य जानें क्या होता? शायद उनका आशय था कि तब वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाते। तब कई लोगों ने कहा था कि बेहतर होता, इसे लेकर आत्ममुग्ध होने के बजाय वे उन हरदनहल्ली डोडेगौड़ा देवगौड़ा को याद कर लेते, जिन्हें कतई हिन्दी नहीं आती थी। देवगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने पर किसी पत्रकार ने हिन्दी न आने की ओर इशारा करते हुए उनसे पूछा कि प्रधानमंत्री के तौर पर वे भारत जैसे विशाल हिन्दी-भाषी देश को कैसे चला सकेंगे, तो उन्होंने यह कहकर उसे चुप करा दिया था कि तकलीफ़ की भाषा तो दुनिया भर में एक ही है, और वे हिन्दी न सही, लेकिन तकलीफ़ की उस भाषा को बेहतर समझते हैं! अलबत्ता, बाद में उन्होंने खासी तेज़ी से हिन्दी सीखकर अपनी ‘विकलांगता’ दूर कर ली थी और पद त्याग के बाद अपना विदाई संदेश हिन्दी में ही दिया था।

बात को यहीं से शुरू करें तो इस हिन्दी दिवस पर पूछने का मन होता है कि 2015 में प्रधानमंत्री जिस हिन्दी के बची रहने वाली तीन भाषाओं में से एक होने को लेकर आश्वस्त थे, अपने अब तक के सत्ताकाल में उसे देश के आम लोगों की तकलीफों की भाषा बनाने या बनाये रखने को लेकर किंचित भी गम्भीर क्यों नहीं दिखे हैं? उन्होंने और उनके लोगों ने भोपाल के उक्त सम्मेलन से उसे उसके साहित्य, साहित्यकारों और परम्पराओं से काटकर देखने की जो शुरुआत की थी, उसे इस अंजाम तक क्यों पहुंचा दिया है कि ज्यादातर देशवासियों को पता ही नहीं चला कि मारीशस में ग्यारहवां विश्व हिन्दी सम्मेलन कब आया और चला गया! क्यों बार-बार ऐसे अंदेशे प्रबल होते दिखते हैं कि प्रधानमंत्री और उनके भक्तों की जमात का वश चले तो वे हिन्दी को उसकी प्रगतिशील पहचान से अलगकर खास तरह के हिन्दुओं और पोंगापंथ की पैरोकार होने की शर्त पर ही बचने दें! तभी तो हिन्दी के समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और न्यूज चैनलों को अपना अनुगत बनाने के फेर में उनके बड़े हिस्से को ऐसे हाल में पहुँचा दिया है जहां आम लोगों के लिहाज से उनका होना न होने से ज्यादा ख़तरनाक हो गया है।

इस स्थिति से जुड़े अंदेशे इस तथ्य के मद्देनजर और गम्भीर हो जाते हैं कि यह देश हर किसी को उसकी पहचान से अलग करने के कठिन दौर से गुज़र रहा है। इसके चलते भारत ‘इंडिया’ होकर बचने को अभिशप्त है और लोकतंत्र ऐसी व्यवस्था में बदलकर, जिसमें कुछ लोगों को उसकी सारी उपलब्धियों को ऊपर-ऊपर लोक लेने की आज़ादी है। इसके उलट ढेर सारे लोग केवल वोट देने, तालियाँ बजाने व जयकारे लगाने भर को ‘आज़ाद’ और इस हद तक निराश हैं कि कहते हैं, उन्हें उनके बचने से क्या और न बचने से क्या! कोउ नृप होहि हमैं का हानी!

सवाल है कि इन्हीं की तरह हिन्दी ‘बच’ जाये और ‘डिजिटल’ होती हुई शीर्ष पहुँच जाये, लेकिन, ग़ैरबराबरी, दलन, शोषण व अत्याचार के प्रतिकार व प्रतिरोध की भाषा न रह जाये तो हमारे किस काम की? हम, समय के अँधेरों से जूझने वालों को तो उससे ऐसे उजाले की ओर ले जाने वाली भूमिका की दरकार है, जो हमारी आँखों को चैंधियाकर अंधी न करे बल्कि भविष्य की इबारतें पढ़ने में उनकी मदद करे और बुरे समय में भी सच्ची अस्मिता व संस्कृति से जोड़े रखे।

याद कीजिए, स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हिन्दी ने ऐसी ही भूमिका निभायी और इतिहास गवाह है कि उसी दौर के संघर्षों में तपकर उसने सबसे ज्यादा मंज़िलें तय कीं। उन दिनों के उलट अलगाव, उद्वेलन, घृणा, पुरातनपंथ और पोंगापंथ के साथ संकीर्णताओं, प्रतिगामिताओं व क्षुद्रताओं के पैरोकार उस पर कब्ज़ा करने की अपनी साज़िशें सफल कर लें, उसे विज्ञापन, व्यापार व मनोरंजन के क्षेत्रों तक सीमित कर दें, वोट मांगने की भाषा ही बनाये रखें, सत्ता व शासन की भाषा न बनने दें, चिंतन-मनन, ज्ञान-विज्ञान व विचार-विमर्श के दायरों से बाहर बैठा दें और दलितों, स्त्रियों व अल्पसंख्यकों समेत हर पीड़ित समुदाय की अस्मिताओं व चेतनाओं को मुँह चिढ़़ाने के लिए प्रयोग करें, तो उसके होने का क्या अर्थ? देश में ‘जो सच बोलेंगे, मारे जायेंगे’ की हालत हो, हत्यारे खुलेआम बताते फिर रहे हों कि अगला नम्बर किसका है और उसके साहित्य व पत्रकारिता के कई अलम्बरदार उनके विरुद्ध अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने के बजाय उच्च मध्यवर्गों की विलास-लीला के बखान में ही अपनी सार्थकता तलाशें तो हम उसके भविष्य को लेकर किस हद तक भावुक हो सकते हैं? तब क्या वह हमें उस विकास से भी कहीं ज्यादा गर्हित नहीं लगेगी, शासक दल गाहे-ब-गाहे जिसे अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं और उसका ढोल पीटते हुए यह भी नहीं देख पाते कि त्रस्त जनता छाती पीटते हुए उसकी अगवानी करने को मजबूर है।

लेकिन फिर से प्रधानमंत्री के उक्त पुराने भाषण पर लौटें तो एक बात उन्होंने सौ टके की कही। यह कि भाषा तो हवा का बहता हुआ झोंका होती है। ऐसा झोंका, जो बगीचे से गुज़रे तो उसकी सुगंध और ड्रेनेज से गुजरे तो उसकी दुर्गंध बटोर लेता है। लेकिन हिन्दी का हित उनके यह बताने से ज्यादा सधता कि देश में ड्रेनेज बढ़ते और बगीचे घटते क्यों जा रहे हैं? वे जो नया भारत नहीं, बल्कि ‘न्यू इंडिया’ बनाने जा रहे हैं, उसकी अपनी मातृभाषा व राष्ट्रभाषा से ही नहीं, जमीन व विरासत तक से कटाव को अभिशप्त नई पीढ़ी हिन्दी को आखिर क्योंकर समृद्ध कर सकती है? भले ही वह दुनिया मुट्ठी में करने को आतुर हो और इसके लिए पंख फैलाकर उड़ रही हो। हिन्दी की तो वह उतनी भी सेवा नहीं कर रही, जितनी ग़ुलामी के दौर में गिरमिटिये मज़दूरों ने की थी! सात समुन्दर पार गये वे मज़दूर उस ग़ुलामी व लाचारी में भी अपनी भाषा व संस्कृति को लेकर स्वाभिमान से भरे हुए थे, जबकि ग़ुलामी के ख़ुमार में डूबी यह नयी पीढ़ी उन्हें लेकर कतई इमोशनल नहीं। हों भी कैसे, जब इस धारणा की शिकार है कि हिन्दी पढ़ने या उसमें लिखने से मिलता क्या है? तभी तो हिन्दी भाषी अंचलों के दूरदराज़ के गाँवों तक में चमकते-दमकते ‘इंग्लिश मीडियम स्कूल’ अपने हाल पर रोते हिन्दी माध्यम स्कूलों को हिकारत की निगाह से तो देखते ही हैं, यह भी जताते हैं कि दिखावे की भावुकता के पीछे का कर्णधारों का हिन्दी-विरोधी चेहरा कितना वीभत्स है!



वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह मीजिया विजिल के सलाहकार मंडल के सदस्य हैं और फ़ैज़ाबाद से प्रकाशित जनमोर्चा के संपादक हैं।



 

 

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