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रोज़ ब रोज़ : जो खो गया उसे न ढूँढ़ पाए तो बचेगा क्या?

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बहुत पुरानी नहीं सिर्फ़ तीन साल पहले की बात है। 

एक लोकतांत्रिक देश की राजधानी में स्थित एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के एक हॉस्टल से एक छात्र ग़ायब हो गया। इन तीन सालों में एक नेता का कुत्ता खोया, मिल गया। एक नेता की भैंस खोई, मिल गई। सबसे बड़े नेता की भतीजी का पर्स खोया, मिल गया। लेकिन वह छात्र देश से भाईचारे की तरह ऐसा खोया कि पुलिस, सी बी आई, आई बी किसी को नहीं मिला। उसकी माँ के आँसू सूख गए। लड़ी। पुलिस ने घसीटा। सब हुआ। लेकिन वह नहीं मिला तो नहीं मिला। 

नजीब नाम था उसका। उसके दोस्त उसके साथ-साथ देश से खोए हुए भाईचारे को भी तलाशने मे लगे हैं। कभी देशद्रोही कहा गया उन्हें, कभी मुफ्तखोर। यह देश जो कभी यह सवाल नहीं करता कि हमारे टैक्स के पैसों से मंत्रियों-अफ़सरों के लिए इतनी अय्याशी क्यों उपलब्ध कराई जाती है उसने उन छात्रों से पूछा कि तुम हमारे पैसों से पढ़ते क्यों हो? यह देश जो कभी सत्ता से यह सवाल नहीं करता कि शिक्षा और स्वास्थ्य बाज़ार को क्यों सौंप दिया गया इन छात्रों से पूछता है कि तुम अपनी पढ़ाई के बदले अपने बाप को कर्ज़ मे डुबो दिए जाने का विरोध क्यों करते हो? यह देश जो कभी यह नहीं पूछता कि राजभवनों में राजनीति से बाहर हो चुके बूढ़े नेताओं की शहंशाही क्यों वह बच्चों से पूछता है – क्या करोगे इतना पढ़कर? बारहवीं पास कर झोला क्यों न उठा लिया किसी मल्टीनेशनल का माल बेचने के लिए?

जो देश सही सवाल पूछना भूल जाता है वहाँ नजीब फिर कभी नहीं मिलते। जो देश सही सवाल पूछना भूल जाता है वहाँ कोई लोया सच के साथ खड़े होने की हिम्मत नहीं करता, वहाँ मीडिया सरकार की जगह विपक्ष और जनता से सवाल करने लगती है और नोटबंदी से नेटबंदी तक उत्सव बन जाता है। क्रूरता वहाँ एक मूल्य बन जाती है और हिंसा न्याय। कल जब कश्मीर में हम दमन की बात कर रहे थे तो हमें कहाँ पता था कि उत्तर प्रदेश में कल ऐसे हालात बन जाएँगे? बहुत पुरानी घटना है। दिल्ली में हम किसी बात पर जंतर-मंतर जा रहे थे प्रोटेस्ट करने। एक कश्मीरी साथी हिचक रहे थे। लगभग जबरदस्ती ले गया। वहाँ से लौटते हुए वह आश्चर्यचकित थे। कहा- ‘आप इतनी ऊंची आवाज़ मे सरकार के खिलाफ़ नारे लगाते हैं और कुछ नहीं होता? हम तो अगर मौन जुलूस भी निकाल दें सरकार के खिलाफ़ श्रीनगर में तो पुलिस उठा ले जाएगी।’ पिछले दसेक दिनों में उत्तर प्रदेश ने जैसे कश्मीर मॉडेल अपना लिया है। जहाँ कश्मीर मे पाँच अगस्त के बाद अब तक कुल 5161 लोग गिरफ़्तार या डीटेन हुए हैं वहाँ उत्तर प्रदेश मे केवल दस दिन मे 1113 लोग डीटेन हुए हैं और 5558 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। अनेक वीडियोज़ आए हैं जिनमें पुलिस के दमन के भयावह सबूत हैं और जो मौतें हुई हैं वे गोलियों से! देशी मीडिया चुप है विदेशी मीडिया मुखर। कल ही मुख्यमंत्री महोदय को आतंकवादी भिक्षु कहा गया है। मुझे फिर कश्मीर याद आता है। इसी दमन ने लड़कों मे वह गुस्सा भरा कि वे मौत से डरना भूल गए। वहाँ तो पाकिस्तान था, हथियार थे, आजादी के नारे थे, यहाँ सिर्फ़ गुस्सा है और डर है और निराशा है। यह किस दिशा मे ले जाएगी लोगों को – किसे पता?

और लोग खुश हैं। तालियाँ बजा रहे हैं। सरकार की तारीफ़ कर रहे हैं। पिशाच सुने थे, अब देख रहे हैं। एक क़िस्सा आया है इसी बीच तमिलनाडु मे कोयंबटूर के पास मेत्तुपलायम तालुके के नादूर गाँव में एक कथित सवर्ण ने दलितों को दूर रखने के लिए एक दीवार बनवाई। दीवार गिर गई और 17 लोग मारे गए। दलितों ने एस सी/एस टी एक्ट के तहत कार्यवाही की माँग की। नहीं मानी गई तो आंदोलन शुरू हुआ – अंततः फ़ैसला किया गया उनकी पंचायत में इस्लाम अपना लेने का। आगामी पाँच जनवरी को वे इस्लाम अपनाने जा रहे हैं- कीजिए इसकी विवेचना अपने हिन्दू-मुस्लिम-राष्ट्रवाद-देशद्रोह के औजारों से। 

जो आज खुश हैं कल लखनऊ में मार दिए गए सवर्ण मध्यवर्गीय एकजीक्यूटिव के लिए दुखी थे। परसों फिर दुखी होंगे। पुलिस-सेना बनाई जाती है क़ानून के तहत नागरिकों को सुरक्षा देने के लिए। जब उन्हें पॉवर टू किल का अधिकार दे दिया जाता है तो वे फिर जनता को अपना ग़ुलाम समझते हैं। जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला ने जब पुलिस को अपराधियों का संगठित गिरोह कहा था तो यों ही नहीं। किसी दिन आप भी पाले पड़ेंगे उसके और तब आपके ये अट्टाहासी फ़ेसबुक स्टेटस करुण क्रंदन मे बदल जाएंगे। 

खैर, जैसा कि संजीव बालियान साहब ने रायटर को बताया अंदाज़ा साहब बहादुर सहित किसी को नहीं था कि नजीब के इतने दोस्त हैं। इस क़दर गुस्सा भरा है उनमें कि इतने दमन के बाद भी रोज़ नए रूप में चले आएंगे सड़कों पर। वे नहीं जानते थे कि जिन लड़कियों पर रोज़ तंज होते हैं, जिनके कपड़ों के चलते उनका अपमान होता है, जिन्हें बलात्कार और ईव टीजिंग के डर के साए मे जीना सिखाना चाहते थे लोग वे मुट्ठियाँ ताने पुलिस की आँखों मे आँखें डालकर नारा लगाएंगी – ये सड़क हमारे आप की/ नहीं किसी के बाप की। सीएए और एनआरसी के खिलाफ़ आंदोलन फैलता ही जा रहा है। देश मे और देश के बाहर भी। लाख कोशिशों के बाद भी न तो यह हिंसक हो सका है न धार्मिक। शाहीन बाग कॉलोनी की औरतों ने मोर्चा संभाला है तो अंबेडकर और गांधी की तस्वीरों के साथ। लड़कियाँ हाथ मे गुलाब का फूल लिए आई हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर बढ़ते लोगों ने हाथ बांध लिए अपने तो मुंबई के आज़ाद मैदान पर जैसे बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहु सांस्कृतिक भारत जीवंत हो उठा।  हालत यह कि बंगाल मे भाजपा प्रमुख दिलीप घोष से लेकर गोवा के भाजपाई मंत्री तक कह रहे हैं कि एन आर सी की जरूरत नहीं। बाक़ी जो झूठ-सच बोला जा रहा वह आप जानते ही हैं। 

उधर प्याज़ है कि डेढ़ सौ से नीचे उतरने को तैयार ही नहीं। वित्तमंत्री लहसुन नहीं खातीं तो वह भी उछलकर तीन सौ पर जा बैठी। आलू तो जैन भी खाते हैं लेकिन जरूर नुकसानदायक होगा तो वह भी उछलने को बेक़रार है। गृहमंत्री का दावा है कि वैश्विक मंदी से उबरने मे भारत का पहला नम्बर होगा तो पूर्व आर्थिक सलाहकार कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था आई सी यू की ओर जा रही है। दुख बड़ा यह है कि डॉक्टर का ध्यान कहीं और है। उसके मंहगे चश्मे से मरीज़ स्वस्थ दिखता है। उसके बिरहमन ने कहा कि ये साल अच्छा है। 

जन्मदिन था कल मिर्ज़ा ग़ालिब का। मैं 1857 की तबाही के बाद उनके लिखे की याद कर रहा था। बिजनौर से मेरठ और लखनऊ से बनारस तक गिरफ़्तार और हताहत लोगों की गलियों से गुज़रते ग़ालिब अब तो लिख भी नहीं पाते कुछ। शायद तुलसी की तरह श्राप देते – जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी/ सो नृप अवसि नरक अधिकारी। 

देश को ही नरक मे तब्दील कर रहे राजाओं को नरक का कौन सा डर होगा लेकिन? हाँ जब आप 31 दिसम्बर की रात जश्न मे डूबें तो याद कीजिए एक दुधमुँही बच्ची जेल मे बंद अपने बेक़सूर माँ-बाप के लिए तड़प रही है। मेरा यार दीपक कबीर जेल की अंधेरी कोठरी मे है। सदफ़ जफ़र की कोई कराह किसी अंधेरे कोने मे उठ के सो गई होगी। जवान बेटा खो चूका कोई बूढ़ा रोते-रोते खामोश हो गया होगा। 

देश काग़ज़ पर बना नक़्शा तो नहीं होता। जो खो गया न ढूँढ़ पाए वह तो यक़ीन जानिए काग़ज़ पर बना यह नक़्शा धुंधला जाएगा एक दिन। 

 

साप्ताहिक स्तम्भ रोज़-ब-रोज़ के लेखक अशोक कुमार पाण्डेय हिंदी के चर्चित कवि और लेखक हैं। 

 



 

 

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