Home काॅलम प्रपंचतंत्र : एक रोमांटिक संन्‍यासी की मौत

प्रपंचतंत्र : एक रोमांटिक संन्‍यासी की मौत

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अनिल यादव

गंगा माई को बचाने के लिए एक सौ ग्यारह दिनों के भूखे स्वामी सानंद उर्फ आईटी के प्रोफेसर गुरुदास अग्रवाल की उपेक्षा के सरकारी असलहे से हत्या के बाद मुझे उन्नाव में गंगा की कटरी में रहने वाले एक और बाबा की याद आई. उनका नाम है संत शोभन सरकार.

ठीक पांच साल पहले यही अक्तूबर का महीना था. उन्नाव के डौंडियाखेड़ा में रहने वाले संत शोभन सरकार को सपना आया कि वहां जमीन के नीचे हजारों टन सोना दबा है. केंद्र सरकार के एक उड़िया मंत्री को भी वही सपना दिखा. मंत्री के चंपू आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) के डाइरेक्टर ने डौंडियाखेड़ा में दो-चार फावड़े चलवा रिपोर्ट बना दी कि सोना जैसा कुछ है. कांग्रेस की सरकार ने बाबा के कहने पर भारत को फिर से सोने की चिड़िया बनाने के लिए वहां राजा राव रामबख्श के किले में खोदाई शुरू करा दी. देश भर का मीडिया पहुंचा. तमाशा देखने वालों ऐसा मेला लगा कि बज्जर देहात में किस्तों पर मोटरसाइकिल और फ्रिज देने वाले कंपनियों के स्टाल लग गए.

अभी मां गंगा ने बुलाया नहीं था लेकिन उन दिनों मोदी स्वामी सानंद के गंगा अभियान के समर्थक थे और कांग्रेस पर फालिज की तरह झपट रहे थे. तय हो चुका था कि वे चुनाव अभियान उन्नाव से सटे कानपुर से शुरू करेंगे. उन्होंने एक सभा में बाबा के सपने और केंद्र सरकार की मूर्खता का मजाक बनाया. बाबा के भक्तों ने चिट्ठी लिखकर भाजपा से पूछना शुरू किया कि मोदी की ब्रांडिंग पर खर्च किया जा रहा करोड़ों रुपया काला है कि सफेद. तीन चार दिन में प्रधानमंत्री पद के दावेदार मोदी की वैज्ञानिक चेतना ठंडी हो गई. वे बाबा शोभन सरकार के त्याग तपस्या की तारीफ करते हुए श्रद्धालुओं पर उनके प्रभाव का सटीक आकलन करने लगे.

राजनेता उन्हीं बाबाओं को भाव देते हैं जो दो चार सीटों की जनता पर चुनाव हराने जिताने लायक असर रखते हैं. बाकी बाबा उनके लिए एक यांत्रिक नमस्कार से ज्यादा की औकात नहीं रखते. स्वामी सानंद का भी गुरूमुख हुए लाख दो लाख चेलों वाला कोई मठ होता तो ऐसी मौत नहीं मरते. क्या पता नदियों की चिंता करने वाला मंत्रालय चलाने का मौका भी मिल जाता. दारुण मृत्यु के सदमे से उबरने के कुछ घंटों बाद दिखने लगा कि वे एक रोमांटिक किस्म के संन्‍यासी थे जिन्होंने इस कल्पना से सुख और बाद में बहुत दुख पाया था कि चीलर पालने वाले साधुओं के बीच आईटी के अंग्रेजी बोलने वाले प्रोफेसर बाबा की चमक कुछ और ही होगी. उनके त्याग और अथक संघर्ष से प्रेरित होकर लाखों धर्मप्राण लोग अपनी मोक्षदायिनी मां गंगा के बचाने के लिए उनके पीछे चल पड़ेंगे. यह कुछ वैसा ही फितूर था जिसके वशीभूत होकर विदेशी प्रेमिका पाने का सपना देखने वाले खाते-पीते घरों के लड़के बनारस में कुछ दिन अंग्रेजी बोलते हुए रिक्शा चलाते हैं.

प्रोफेसर सानंद वैज्ञानिक तो थे ही, काश वे आस्था का यह दिलफरेब डायनामिक्स पकड़ पाते! काश वे देख पाते कि पर्वों, त्यौहारों पर श्रद्धालु जनता कैसे गंगा में सामने बहती लाशों से आंखें चुराकर गोता लगाती है, कैसे कचरे को ठेलकर जो जगह बनती है वहां से पानी उठाकर आचमन किया जाता है, रसायनों से गंधाता बैक्टिरिया सिक्त जल लोटे में भरकर देवताओं पर चढ़ा दिया जाता है, बिना पलक झपकाए प्लास्टिक की पन्नियों में भरा कूड़ा पुल से उछाल दिया जाता है. गंगा से जन्मों का नाता है लेकिन किसी की धार्मिक भावनाएं आहत नहीं होतीं. यह आस्था दायित्वहीन है, सिर्फ मांगना और लेना जानती है. चढ़ावा भी किसी न किसी शर्त पर रिश्वत की तरह चढ़ाती है.

करोड़ों श्रद्धालुओं की गंगा यह नदी है ही नहीं जिसे टिहरी में बांध से रोक दिया गया है, कानपुर में जिसके सौ मिलीलीटर पानी में दो लाख कोलीफार्म बैक्टिरिया कुलबुलाते हैं. उनकी गंगा स्मृति की नदी है. उसे किसी कैलेंडर के सामने खड़े होकर ज्यादा स्पष्ट पहचाना जा सकता है. वह शिव की जटाओं में उलझी हुई है, भगीरथ हाथ जोड़े खड़े हैं, राजा सगर के साठ हजार पुरखों की आत्माएं भटक रही हैं. उस मिथक की धवल धारा में सीवर और कारखानों का जहरीला कचरा डालना तो दूर कोई छू भी नहीं सकता. इन्हीं धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक इस्तेमाल के उस्ताद मोदी हैं. इसी मिथकीय मां गंगा ने उन्हें बनारस से चुनाव लड़ने के लिए वात्सल्य भाव से बुलाया था. हो सकता है आने वाले वर्षों में गंगा की जगह सिर्फ सूखी खोह बचे तब भी पूजा चलती रहेगी और वे मनोकामनाएं पूरी करती रहेंगी.

श्रद्धालु गंगा माई से मोक्ष मांगते हैं जो मरने के बाद मिलेगा. उससे पहले वे ऐसा जीवन भी मांगते हैं जिसमें गाड़ी, बंगला, एसी, पछांही कमोड, मोटा बैंक बैलेंस का सुख हो. किसी चीज के लिए सोफे से उठना न पड़े, सारा काम प्रतिष्ठापूर्ण ढंग से मशीनें करें. ऐसा संघर्षहीन बेसुध रंगारंग जीवन बिना उस लुटेरे विकास के मिल नहीं सकता जिसकी फितरत जंगल, नदी, पहाड़ समेत सभी किस्म के प्राकृतिक संसाधनों को चंद अंबानियों का खजाना भरने के लिए बर्बाद करना है. जब तक श्रद्धालुजन इस विकास की चौकीदारी करने का मन नहीं बनाते गंगा समेत तमाम महान नदियां और स्वामी सानंद जैसे रोमांटिक संन्‍यासी मरते रहेंगे.