Home काॅलम प्रपंचतंत्र : राहुल कोटियाल की दादी

प्रपंचतंत्र : राहुल कोटियाल की दादी

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अनिल यादव

राहुल कोटियाल एक जटाधारी पत्रकार है. ‘अ जर्नो विद लांगहेयर’ या ‘स्क्राइब विद बी-हाइव’ में वो बात नहीं है.

जटाधारी कहने से धुंधला सा अंदाजा होने लगता है कि वह कैसे अपनी दादी से वैसी मीठी हुज्जत से बात कर लेता होगा जैसे मुंडन के दिन मंदिर की ओर जाता पांच साल का बच्चा करता है. गढ़वाली बोलती दादी के लजाने और हंसने के बीच रैप संगीत के धड़ाके से खुलने का मजा है. उससे भी अधिक मानीखेज यह कहानी है जो वे सुना रही हैं. उनकी हंसी के बाद जो बचता है, मुझे तो वह धर्म और मनुष्य के बीच रहस्यमय बना दिए गए रिश्ते का सादा सा पुरातन सत्य लगता है.

दादी से सुनिए एक और मज़ेदार क़िस्सा…जिन्हें गढ़वाली समझ नहीं आती उनके लिए इस क़िस्से का भावार्थ:एक बुढ़िया थी. वो जब भागवत सुनती थी तो रोने लगती थी. भागवत पढ़ने वाले व्यास ने कई दिनों तक देखा कि ये बुढ़िया रोज़ कथा सुनते हुए रोने लगती है. उसे लगा ज़रूर ये बहुत ज्ञानी होगी, क्योंकि जो भागवत का सार समझ सकेगा उसके ही आँसू निकलेंगे. जिसे कथा समझ ही नहीं आएगी वह क्योंकर ही रुआँसा होगा.तो एक दिन व्यास उस बुढ़िया के घर जा पहुँचा. व्यास ने बुढ़िया से कहा, ‘माता जी मैं आपको धन्यवाद कहने आया हूं.’ बुढ़िया ने हैरानी से पूछा, ‘धन्यवाद किस लिए?’व्यास ने जवाब दिया, ‘आपके ज्ञान के लिए. मैंने देखा है कि भागवत सुनते हुए आपके आँसू निकलते हैं, आप रोने लगती हैं. और कथा सुनते हुए वही रोता है जो कथा का भाव समझता है.’बुढ़िया बोली, ‘मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आता भागवत में.’ व्यास हैरान हुआ. उसने बुढ़िया से पूछा, ‘कुछ समझ नहीं आता तो कथा सुनते हुए आप रोते क्यों हो?’बुढ़िया ने जवाब दिया, ‘ए ब्राह्मण. मैं इसलिए रोती हूं क्योंकि जैसी तेरी दाढ़ी है, ठीक वैसी ही मेरी भेड़ की भी दाढ़ी थी. तुझे देखती हूं तो मुझे अपनी भेड़ याद आती है इसलिए रोने लगती हूं.’

Posted by Rahul Kotiyal on Thursday, January 3, 2019

कहानी यूं है- एक बुढ़िया भागवत कथा सुनने जाती थी. सुनती थी तो रोने लगती थी. भागवत पढ़ने वाले व्यास ने कई दिनों तक देखा कि ये बुढ़िया रोज़ कथा सुनते हुए रोने लगती है. उसे लगा ज़रूर ये बहुत ज्ञानी होगी  क्योंकि जो भागवत का सार समझ सकेगा उसके ही आँसू निकलेंगे. जिसे कथा समझ ही नहीं आएगी वह क्योंकर रोएगा?

एक दिन व्यास उस बुढ़िया के घर जा पहुँचा. व्यास ने बुढ़िया से कहा, “माता जी, मैं आपको धन्यवाद कहने आया हूं.” बुढ़िया ने हैरानी से पूछा, “धन्यवाद काहे लिए?”

व्यास ने जवाब दिया, “आपके ज्ञान के लिए. मैंने देखा है कि भागवत सुनते हुए आपके आँसू निकलते हैं, आप रोने लगती हैं… और कथा सुनते हुए वही रोता है जो कथा का भाव समझता है.”

बुढ़िया बोली, “मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आता भागवत में.”

व्यास हैरान हुआ. उसने बुढ़िया से पूछा, “कुछ समझो नहीं आता तो कथा सुनते हुए आप रोती क्यों हो?” बुढ़िया ने जवाब दिया, “ए बामण, मैं इसलिए रोती हूं क्योंकि जैसी तेरी दाढ़ी है, ठीक वैसी ही मेरे बकरे की भी दाढ़ी थी. तुझे देखती हूं तो मुझे अपने बकरे की याद आती है इसलिए रोने लगती हूं!”

इस कहानी को सुनते हुए मुझे अपने कबीरपंथी नाना की याद आई जिनकी दाढ़ी में बहुत कम बाल थे. वे नाई के यहां जाने के बजाय उन्हें चुटकी में पकड़ कर नोच डालते थे और पत्थर की मूर्ति के आगे घंटी हिलाने वालों को चिकोटी काटते थे- ‘ताते यह चाकी भली पीस खाय संसार’.

ननिहाल के पास हिरावनपुर गांव के बिरहा बनाने वाले लोककवि रामजनम याद आए. वह अपनी पान की गुमटी में बैठे, धार्मिक प्रश्नों का जवाब देने के लिए एक कॉपी में बिरहा लिखते थे ताकि लोकगायकी दंगल में उनका पट्ठा कमजोर न पड़े. सारी रात चलने वाले जवाबी बिरहा के दंगल में गायकी का मुकाबला तगड़ा हुआ करता था. ऐसी ही एक बिरहा में हनुमान जी, रावण द्वारा हरण कर ली गई सीता जी की खोज में लंका से पहले भटक कर, समुद्र के ऊपर उड़ते हुए अमेरिका पहुंच जाते हैं. वहां न्यूयार्क के एक डिपार्टमेंटल स्टोर में बहुत कम कपड़े पहने एक पुतली (मैनेक्विन) को सीता माता समझ लेते हैं. चकित हनुमान जी पूछते हैं, “माते, इन वस्त्रों में आप यहां!”

इस तरह की सबसे अधिक कहानियां औढरदानी शंकर भगवान के बारे में प्रचलित हैं जिनकी रास्ता चलते वरदान बांटने की आदत के कारण विचित्र संयोग घटित हुआ करते थे.इन किस्सों से छलकने वाली हंसी से ठीक पहले मन में जो उमड़ने वाला एक खास भाव है, वह उस प्रतिक्रिया से बहुत अलग है जो स्टैंडअप कॉमेडियन पैदा करते हैं. वह भाव ईश्वर और उसके व्याख्याता एजेंट पुजारी, पादरी, मौलवियों को उनके उच्चासनों से उतार कर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में बुलाने के बाद मिर्जा गालिब जैसी नितांत सादा,मानवीय दृष्टि से देख लिए जाने से पैदा होता है- “कहां मयखाने का दरवाजा गालिब और कहां वाइज. पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले.”

बच्चों में यह भाव सबसे अधिक जागृत होता है. इसलिए वे पूछ सकते हैं कि भगवानों के दाढ़ी-मूंछ क्यों नहीं जमती या वे सिले हुए कपड़े क्यों नहीं पहनते. उनकी अबोधता पर हंस लेने के बाद क्षौरकर्म और सिले हुए कपड़ों के इतिहास की खोज शुरू होती है जो अंततः इस मूल प्रश्न तक जाती है कि आखिर भगवान है या नहीं. अगर है तो उससे दुनिया में फैला इतना अत्याचार कैसे सहन होता है. जिधर अन्याय है शक्ति उधर ही क्यों होती है. आदमी की बनाई न्याय व्यवस्था का मकसद तो अपराधी को सुधार कर समाज को अच्छे नागरिक के रुप में वापस करना है लेकिन ईश्वर के दंड विधान में नरक और वहां दी जाने वाली यातनाओं के आगे कुछ क्यों नहीं है.

इन दिनों आरएसएस-भाजपा का मनमाना एक धर्म उफान पर है जिसमें प्रकृति पूजक आदिवासी भी हिंदू बना दिए गए हैं. मुसलमानों से घृणा करना और उनके कपोल कल्पित अत्याचारों का हिंदुओं की कपोल कल्पित वीरता से बदला लेना ही प्रमुख धार्मिक कार्य है. इतिहास को मरोड़ कर पैदा की गई अफवाहों के जरिए यह धार्मिक कार्य चुनाव में सरकार बनाने लायक बहुमत पाने तक अबाध चलता रहता है. यहीं इससे राष्ट्र भी नत्थी हो जाता है क्योंकि जो इससे इतर सोचता है वह राष्ट्रविरोधी है उसे पाकिस्तान भेज दिया जाना चाहिए. यह एक बंद धर्म है जिसमें किसी और नजरिए की गुंजाइश नहीं है. वह उस बुढ़िया की करूणा को नहीं पहचान सकता जिसकी आंखें बामण की दाढ़ी देखकर, जंगल में खो गए अपने बकरे की याद में भर आती हैं. जबकि यह करुणा ही ईश्वरीय शक्ति है.

धर्म को साधारण लोगों की नजर से देखा जाना चाहिए तभी वह उनकी जिंदगी से जुड़कर विकसित हो सकेगा. वरना कुछ भी ठहर जाए तो सड़कर खत्म हो ही जाता है क्योंकि प्रकृति का इकलौता नियम परिवर्तन है.

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