Monday, July 23, 2018
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डॉ.आंबेडकर ने मुसलमानों से हाथ मिलाया!

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डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी – 9

पिछले दिनों एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में डॉ.आंबेडकर को महात्मा गाँधी के बाद सबसे महान भारतीय चुना गया। भारत के लोकतंत्र को एक आधुनिक सांविधानिक स्वरूप देने में डॉ.आंबेडकर का योगदान अब एक स्थापित तथ्य है जिसे शायद ही कोई चुनौती दे सकता है। डॉ.आंबेडकर को मिले इस मुकाम के पीछे एक लंबी जद्दोजहद है। ऐसे मेंयह देखना दिलचस्प होगा कि डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की शुरुआत में उन्हें लेकर कैसी बातें हो रही थीं। हम इस सिलसिले में हम महत्वपूर्ण  स्रोतग्रंथ  डॉ.अांबेडकर और अछूत आंदोलन  का हिंदी अनुवाद पेश कर रहे हैं। इसमें डॉ.अंबेडकर को लेकर ख़ुफ़िया और अख़बारों की रपटों को सम्मलित किया गया है। मीडिया विजिल के लिए यह महत्वपूर्ण अनुवाद प्रख्यात लेखक और समाजशास्त्री कँवल भारती कर रहे हैं जो इस वेबसाइट के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य भी हैं। प्रस्तुत है इस साप्ताहिक शृंखला की नवीं कड़ी – सम्पादक

 

 

 

81.

 

आंबेडकर के विरुद्ध

(दि बाम्बे क्रानिकल, 28 अक्टूबर 1931)

‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ के अतिथि स्तम्भ में डा.आंबेडकर और मि. श्रीनिवासन, जो सरकार द्वारा दलित वर्गों के हित में काम करने के लिए चुने गए हैं, महात्मा गाॅंधी की कुछ गलत बयानबाजी में लिप्त हैं। वे दलितों के लिए पृथक निर्वाचन को स्वीकार करने के उनके इन्कार को गलत मानते हैं। गाॅंधी जी ठीक ही पृथक निर्वाचन की बुराई के विस्तार के विरुद्ध है,और वे तथा काॅंग्रेस सचमुच ऐसी निर्वाचन पद्धति से पीछा छुड़ाने के लिए कुछ भी करेंगे। वे दलितों के एक बड़ा वर्ग के साथ समझते हैं कि कोई भी पृथक आन्दोलन उनको अन्य हिन्दुओं से फिर से पृथक कर देगा और इस प्रकार उनकी स्थिति और भी खराब हो जायेगी। कहा जाता है कि डा. आंबेडकर ने भी हाल ही में नागपुर में हुए दलित वर्गों के एक सम्मेलन में संयुक्त निर्वाचन की सिफारिश की है। उनका अपना समुदाय भी अब उनका खण्डन कर रहा है, जैसाकि देश के बहुत से भागों में दलितों की अनेकों जनसभाओं में उनके वर्तमान रवैये का खण्डन करते हुए देखा गया है।

 

 

82.

 

एक और अपवित्र गठबन्धन

आंबेडकर ने मुसलमानों से हाथ मिलाया

(दि फ्री प्रेस जर्नल, 31 अक्टूबर 1931)

खबर है कि दलित वर्गों और मुस्लिम प्रतिनिधियों के बीच साम्प्रदायिक और राजनीतिक विषयों को उठाने और उन पर साझा चर्चा करने के लिए एक संयुक्त मोरचा बन गया है।

यह गौरतलब है कि डा. आंबेडकर कल दोपहर बाद सेंट जेम्स पैलेस के परिसर में मौजूद थे, परन्तु उन्होंने सरकार के साथ गैर-मुस्लिमों को भी धमकाने के उद्देश्य से मुस्लिम प्रतिनिधियों के मौन प्रदर्शन के प्रति सहानुभूति में फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी की बैठक में भाग नहीं लिया था।

 

 

83.

 

प्रेषक,

पुलिस आयुक्त

बम्बई।

सेवा में,

डी. सी. पी.

स्पेशल ब्रान्च

मैं आंबेडकर के वालन्टियर वालवलकर से मिलना चाहता हूॅं, जो 12 अक्टूबर को मुझसे मिलने भेजे गए हैं।

(हस्ताक्षर)

10 अक्टूबर।

आर. बी. देसाई,

कृपया व्यवस्था करें।

(हस्ताक्षर)

10 अक्टूबर

महोदय,

वालवल्कर के बाहर होने के कारण उनके भाई को सन्देश दे दिया है।

(हस्ताक्षर)

12 अक्टूबर

 

 

 

84.

 

डा. आंबेडकर की स्वराज विरोधी भूमिका

(दि बाम्बे क्रानिकल, 2 नवम्बर 1931)

 

मि. मोहनलाल, सचिव, पंजाब ‘अछूत उद्धार मण्डल’ लिखते हैं-

‘आज के राजनीतिज्ञों में नैतिकता कदाचित ही मिलती है। गोलमेज सम्मेलन में दलित वर्गों के प्रतिनिधि डा.आंबेडकर भी इस तरह के राजनीतिज्ञों में अपवाद नहीं हैं। अब वे स्वराजवादियों के ही खिलाफ हो गए हैं, क्योंकि दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के बारे में उनके विचारों को स्वराज-संविधान में महात्मा गाॅंधी के साथ स्वीकृति नहीं मिल सकी। अल्पसंख्यक उपसमिति में उन्होंने जो भाषण दिया था, उसके सन्दर्भ में निम्नलिखित बताया जाता है-

‘डा. आबेडकर ने स्पष्ट रूप से यह इच्छा प्रकट की है कि दलित वर्गों ने अंग्रेजों से भारतीयों के हाथों में तुरन्त सत्ता के हस्तान्तरण का कोई आन्दोलन शुरु नहीं किया था। अंग्रेज लोगों के साथ उनकी कुछ शिकायतें जरूर हैं, परन्तु वे इसके लिए राजनीतिक सत्ता के हस्तान्तरण की माॅंग नहीं कर रहे हैं। उनके हालात अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं।’

1931 के इस मुबारक वर्ष में ये हैं डा. आंबेडकर के विचार। लेकिन ये उनके वे विचार नहीं हैं, जो उन्होंने पिछले वर्ष नागपुर में दलित वर्गों के सममेलन में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहे थे। उस अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा था-

‘अंग्रेजों से पहले आप लोग अपनी अस्पृश्यता के कारण बदतर स्थिति में थे। क्या अंग्रेज सरकार ने आपकी अस्पृश्यता को मिटाने का काम किया? अंग्रेज सरकार से पहले आप लोग गाॅंव के कुॅंओं से पानी नहीं ले सकते थे। क्या अंग्रेज सरकार ने उन कुॅंओं से पानी निकालने के लिए आपको अधिकार दिया? अंग्रेजों के आने से पहले आप लोग हिन्दू मन्दिरों में प्रवेश नहीं कर सकते थे। क्या अब आप प्रवेश कर सकते हैं? अंगे्रजों से पहले आपको पुलिस में भर्ती नहीं किया जाता था। क्या अंग्रेज सरकार आपको पुलिस में भर्ती करती है? अंग्रेजों से पहले आपको सेना में नहीं लिया जाता था। क्या अब लिया जाता है? सज्जनों, आप इनमें से किसी भी प्रश्न का उत्तर हाॅं में नहीं दे सकते। आपके साथ ये सारे अन्याय खुले घावों की तरह ज्यों के त्यों हैं, और उनको ठीक नहीं किया गया है। इसलिए मैं कहता हूॅं कि अंग्रेज सरकार, जो सर्वोत्तम उद्देश्यों और सिद्धान्तों से प्रेरित है, कोई भी परिवर्तन लाने में हमेशा असमर्थ रहेंगे। आपके कष्टों को कोई दूर नहीं कर सकता, हालांकि आप कर सकते हैं, लेकिन आप भी अपने कष्टों को तब तक दूर नहीं कर सकते, जब तक कि आपके हाथों में राजनीतिक ताकत नहीं आयेगी। राजनीतिक सत्ता में भागीदारी आपको तभी तक मिल सकती है, जब तक अंगे्रज सरकार यहाॅं बनी हुई है।’

पददलित अछूतों के कष्टों को कैसे दूर किया जा सकता है, इस सम्बन्ध में भी डा. आंबेडकर ने अपने उसी भाषण में कहा था-

‘हमारे पास एक ऐसी सरकार होनी चाहिए, जिसमें सत्ता में आने वाले लोगों में देश के सर्वोत्तम हित के लिए अटूट निष्ठा हो। हमारे पास एक ऐसी सरकार होनी चाहिए, जिसमें सत्ता में आने वाले लोग, इस बात को जानकर कि जहाॅं निष्ठा खत्म होगी और विरोध शुरु होगा, वहाॅं जीवन के उन सामाजिक और आर्थिक नियमों को बदलने में डरेंगे नही, जो न्याय की माॅंग करते हैं। यह भूमिका अंग्रेज सरकार निभाने में कभी समर्थ नहीं होगी। यह भूमिका केवल जनता की, जनता के लिए और जनता के द्वारा चलने वाली सरकार ही निभा सकती है, दूसरे शब्दों में, यही स्वराज है, जो इसे सम्भव बनायेगी।’

1930 में अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में डा.आंबेडकर की स्वराज के पक्ष में इस सशक्त घोषणा के आलोक में क्या अल्पसंख्यक उपसमिति में उनका यह कहना कि दलित वर्ग स्वराज नहीं माॅग रहे हैं, सरासर धृष्टता नहीं है? निश्चित रूप से विसंगतियों की एक सीमा होती है, जिसके पार जाना डा. आबंडकर जैसे जिम्मेदार राजनीतिक के लिए घातक है। सार्वजनिक जीवन एक बड़ा मजाक है, अगर वे लोग, जिनसे अपने जीवन के महत्वपूर्ण सिद्धान्त के साथ खेलने की अपेक्षा की जाती है।

 

 

85.

 

डा. आंबेडकर की दो आवाजें

लन्दन से नासिक मन्दिर सत्याग्रह को शुभकामनाएॅं

हमने सरकार पर काफी भरोसा किया है

(दि बाम्बे क्रानिकल, 3 नवम्बर 1931)

 

बम्बई, 2 नवम्बर।

नासिक मन्दिर प्रवेश सत्याग्रह समिति के महासचिव को लन्दन से डा. आंबेडकर का निम्नलिखित पत्र प्राप्त हुआ है-

‘मुझे अत्यन्त खेद है कि मैं आपके पत्र का जवाब नहीं दे सका, जो पिछले दिनों आपने कमिशनर के साथ अपनी बातचीत का जिक्र करते हुए भेजा था। मैंने यहाॅं अल्पसंख्यकों के प्रश्न पर बहुत सी बातें रखी हैं, परन्तु जैसाकि आप जानते हैं, मि. गाॅंधी के रवैये के कारण बहुत मुश्किल हो गया है। इसलिए मेरे पास एक मिनट का समय भी नहीं है-

आपके अनुमान के मुताबिक मुझे आयुक्त सी.डी. का पत्र मिला है, जिसमें उन्होंने मुझे नासिक सत्याग्रह को रुकवाने की सलाह दी है। मैंने उन्हें जवाब नहीं दिया है, परन्तु अब देने जा रहा हूॅं। मैं उन्हें बताने जा रहा हूॅं कि हम सत्याग्रह को नहीं रोक सकते। सो आप लोगों को बता दो कि अपना काम जारी रखें। हमें सरकार से अपना आदेश उसी तरह नहीं लेना चाहिए, जिस तरह हमें रूढ़िवादी हिन्दुओं से नहीं लेना चाहिए।

हमने सरकार पर काफी भरोसा किया है

हमने अस्पृश्यता को समाप्त करने के लिए सरकार पर काफी भरोसा किया है। किन्तु उसने इस मामले में कुछ भी करने के लिए एक उंगली तक नहीं उठाई है। इसलिए उसे सत्याग्रह को रोकने की सलाह देने का कोई अधिकार नहीं है। हमें सारा बोझ अपने कन्धों पर लेना होगा और हमें हर कीमत पर इस कलंक से मुक्ति पाने के लिए कुछ भी करना होगा। यदि सरकार हमारी सहायता नहीं करती है, तो कम-से-कम उसे हमारे न्यायोचित कार्य में बाधा नहीं डालनी चाहिए। हमें यह बताने का कोई लाभ नहीं है कि हम विभिन्न वर्ग और समुदायों के बीच दुर्भावना पैदा कर रहे हैं। यह अपील सरकार को अकेले हमसे ही नहीं करनी चाहिए, बल्कि समस्त समुदायों से करनी चाहिए। विशेष रूप से यह अपील उन समुदायों से करनी चाहिए, जो अन्याय और पाप कर रहे हैं।

मेरे लोगों को मेरी जरूरत नहीं

आप इसके अनुवाद का परचा बनाकर छाप सकते हैं और उसे हमारे लोगों में बाॅंट सकते हैं। मैं मुखेड़ में अपने लोगों और सवर्णों के बीच हुए संघर्ष के सम्बन्ध में प्राप्त टेलिग्राम पढ़ चुका हूॅं। मुझे यह जानकर खुशी हुई है कि हमारे लोग अपनी लड़ाई को हर कीमत पर सफल बनाने के लिए तैयार हो गए हैं। मैं उनके शानदार संकल्प के लिए उन्हें बधाई देता हूॅं। मुझे पता चला है कि आप लोग 5 नवम्बर को सत्याग्रह आरम्भ कर रहे हैं। मुझे आशा है कि आपने इसकी अच्छी तैयारी कर ली होगी। मुझे खेद है कि मैं वहाॅं आपकी सहायता के लिए मौजूद नहीं हूॅं। किन्तु मैं जानता हूॅं कि अब हमारे लोग अपनी समस्या के प्रति सचेत हो गए हैं और हर वक्त अब उन्हें मेरी जरूरत नहीं है। -ए. पी.

 

 

86.

 

अछूत और मि. गाॅंधी

(दि टाइम्स आॅफ इंडिया, 3 नवम्बर 1931)

 

पिछले सप्ताह के अन्त में मि. गाॅंधी विलाप कर रहे थे कि लन्दन के अखबार भारत की बदनामी कर रहे हैं। उनको काॅंग्रेस प्रचार के पवित्र और निष्कलंक हितों को सच्चाई के साथ प्रस्तुत करने की पेशकश की गई थी। एक दिन बाद राव बहादुर एम. सी. राजा ने पंजाब के गुड़गाॅंव में अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए कहा कि ‘हम लन्दन में बहुत सारे गलत बयान देख रहे हैं।’ उन्होंने यह भी दिखाया कि कैसे मि. गाॅंधी अछूतों के मामले को गलत ढ़ग से पेश कर रहे हैं। राव बहादुर ने आगे कहा कि मि. गाॅंधी एक अच्छे दिल वाले और महान व्यक्ति हैं, हालांकि कुछ प्रतिद्वन्द्वी इत्यादि भी हैं, जो सभी बहुत विनम्र और प्रशंसनीय हैं, परन्तु ‘राजनीतिक गाॅंधी से सावधान रहने की जरूरत है। यह कहने का एक दूसरा तरीका केवल यह था कि गोलमेज सम्मेलन में दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हुए डा. आंबेडकर और मि. श्रीनिवासन ने जो पत्र में लिखा था, उसे हमने पिछले सप्ताह प्रकाशित कर दिया था। उन्होंने दलित वर्गों के दावों के प्रति मि. गाॅंधी की शत्रुता को उजागर कर दिया था और कहा था कि ‘मि. गाॅंधी न केवल दलित वर्गों के मित्र की भूमिका नहीं निभा रहे हैं, अपितु एक ईमानदार शत्रु की भूमिका भी नहीं निभा रहे हैं।’ जब जिम्मेदार लोगों द्वारा उस प्रकार के आरोप लगाए जाते हैं, तो इससे मि. गाॅंधी दुखी होकर पुराना राग अलापने लगते हैं कि अंग्रेजी के अखबार भारत के लिए सही नहीं हैं, क्योंकि जो देश में हो रहा है, वे उसका गलत विवरण दे रहे हैं। सबसे अच्छे समय में यह कोई बहुत फायदेमन्द विलाप नहीं है, और इस मामले में यह केवल इसी पुराने प्रश्न को उठाता है कि ‘सत्य क्या है?’ मि. गाॅंधी के बारे में, जैसाकि उन्होंने अक्सर कहा है कि उन्होंने सत्य के लिए अपना अधिक जीवन समर्पित किया है, उनके जवाब देने की कठिनाई को थोड़े ही लोग जान सकते हैं।

इस विवाद में मि. गाॅंधी और अछूतों के बीच जो लगातार वक्तव्य दिए जा रहे हैं, उनके सही या गलत का पता होना चाहिए। यह अमूर्त में सत्य को खोजने का मामला नहीं है, बल्कि एक ऐसा तर्क है, जो काॅंग्रेस और मि. गाॅंधी के द्वारा दिया गया है। राव बहादुर एम. सी. राजा मि. गाॅंधी के इस दावे का दृढ़ता से खण्डन करते हैं कि काॅंग्रेस ने आरम्भ से ही हमेशा अछूतों का ध्यान रखा है, और वह अस्पृश्यता को मिटाने के लिए हमेशा खड़ी रही है, और अभी भी खड़ी हुई है तथा अछूतों की समस्या की हमेशा समर्थक रही है। राव बहादुर राजा का जोरदार जवाब यह है, ‘मैं कहता हूॅं कि काॅंग्रेस के ये सारे दावे झूठे हैं।’ क्या इनमें से किसी चुनौती को उसने हाथ में लिया है? या इनमें डा. आंबेडकर और मि. श्रीनिवासन के द्वारा लगाए गए आरोपों को भी, जो इसी मूल प्रकृति के हैं, जोड़ दिया जाए, जिनका उत्तर नहीं दिया गया है? यह मामला ऐसा नहीं है, जिसे अकेला छोड़ा जा सकता है। जब मि. गाॅंधी ने इस तरह का हमला कर ही दिया है, तो वे लन्दन प्रेस के खिलाफ गलतबयानी के निराधार आरोप लगाकर स्वयं को, और काॅंग्रेस को बचाकर नहीं निकल सकते। ‘अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलन’ की सभा से पहले ही सत्य का दूत यह कहते हुए कि उन बहुत से वर्गाों के बारे में यह सत्य नहीं है, बेनकाब हो गया है। क्या हमें मि. गाॅंधी से यही सुनना है कि हमारे बयान सत्य नहीं हैं? समस्या हर दिन ज्यादा रोचक और ज्यादा स्पष्ट होती जा रही है। किन्तु उस हृदय के परिवर्तन का कोई चिन्ह नहीं है, जिसे राव बहादुर राजा समस्या के समाधान के लिए आवश्यक मानते हैं।

जाहिरा तौर पर अछूत भले ही स्वयं को सन्तुष्ट कर लें, परन्तु वे ‘यंग इंडिया’ में मि. गाॅंधी के इस हालिया आश्वासन से सन्तुष्ट नहीं हो सकते हैं, कि यदि उनकी नहीं सुनी गई, तो वे उनकी ओर से नागरिक प्रतिरोध का अभियान चलायेंगे और रूढ़िवादी हिन्दुओं के विरोध को कमजोर कर देंगे। यह आश्वासन कदाचित इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि विश्वसनीय नहीं है, कि मि. गाॅंधी को ऐसे अभियान चलाने के अनेक अवसर मिले थे, जिनको चलाने से उन्होंने इन्कार कर दिया था। असल में ये सारे ही समाधान और दावे बहुत कम हैं।़़ सिद्धान्तों के एक पाउण्ड की तुलना में अमल का एक औंस कहीं ज्यादा बेहतर है। इन फार्मूलों पर बात करने का क्या लाभ है, जब हम यह देखते हैं कि देश के कोने-कोने में हकीकत में हमारें साथ क्या हो रहा है? सार्वजनिक मार्ग से पालकी में अपनी धार्मिक पुस्तक ले जाते हुए अछूतों के एक दल पर खद्दरधारी लोग हमला करते हैं और ‘महात्मा गाॅंधी की जय’ बोलते हैं। महात्मा गाॅंधी के गढ़ कहे जाने वाले अहमदाबाद शहर के राजपुरा में, अछूतों पर इसलिए हमला किया गया, क्योंकि उन्होंने बारात में अपने दूल्हे को पालकी में ले जाने का साहस किया था। एक स्कूल से सवर्ण हिन्दुओं ने अपने बच्चों को निकाल लिया, क्योंकि दो अछूत बच्चों को उनके साथ बैठने की इजाजत दे दी गई थी। प्रतिदिन ऐसी घटनाएॅं होती हैं, जिनका अन्त नहीं है। अभी तक लगभग सौ घटनाएॅं हो चुकी हैं, जो सत्य के व्यावहारिक मनुष्य अर्थात मि. गाॅंधी और काॅंग्रेस के दावों को खोखला साबित करती हैं।ये सारी घटनाएॅं पिछले कुछ हफ्तों में हुई हैं, जबकि मि. गाॅंधी को अस्पृश्यता निवारण का कार्य करते हुए और स्वराज की योग्यता का प्रमाण देते हुए पूरे दस साल हो गए हैं।

 

 

 

87.

 

डा. आंबेडकर पर हमले का आरोप

मजिस्ट्रेट आदेश के विरुद्ध अपील मंजूर

(दि टाइम्स आॅफ इंडिया, 4 नवम्बर 1931)

 

बम्बई उच्च न्यायालय की अपीलीय पीठ ने डा. आंबेडकर के विरुद्ध मारपीट, लूटमार और एक सहकारी समिति  के गैरकानूनी सदस्य होने के आरोप में दर्ज शिकायत को खारिज करने के प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट, पाॅंचवी कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील को मंजूर कर लिया है।

इस मामले में याचिकाकर्ता टी. एस. रामकृष्ण हैं, जो डा. आंबेडकर की अध्यक्षता वाली एलफिंस्टन रोड कोआॅपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी के पूर्व सचिव हैं। कथित अपराध सोसाइटी के पदाधिकारियों के चुनाव से सम्बन्धित है। मजिस्ट्रेट ने यह मानते हुए कि कोआॅपरेटिव सोसाइटी के रजिस्ट्रार की पूर्व स्वीकृति जरूरी थी, शिकायत को खारिज कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने पुनरीक्षण याचिका दायर की, जो माननीय मुख्य न्यायाधीश और माननीय न्यायाधीश मि. ब्रूमफील्ड द्वारा स्वीकार कर ली गई है। उन्हें जो कारण बताओ नोटिस जारी हुआ है, उसमें कहा गया है कि क्यों न इस मामले को कोआॅपरेटिव सोसाइटी एक्ट की धारा 63 के आधार पर निपटारे के लिए मजिस्ट्रेट को वापस भेज दिया जाए।

याचिकाकर्ता ने कहा है कि वह जून 1928 से 10 अगस्त 1931 तक एलफिंस्टन रोड कोआॅपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी के सचिव थे। प्रतिवादी (डा. आंबेडकर) सोसाइटी के कार्यवाह अध्यक्ष थे। विगत 20 जून को हुई वार्षिक सभा में प्रतिवादी उपस्थित नहीं हुए थे और कुछ सदस्य, जो सभा के सभापति मि. एस. बी. कुलकर्णी की वोट देने की व्यवस्था से असन्तुष्ट थे, सभा से वाक आउट कर गए थे। इस तरह वादी पुनः सचिव निर्वाचित नहीं हुआ।

 

चुनाव अवैध

बाद में असन्तुष्ट सदस्यों की माॅंग पर, डा. आंबेडकर ने, जो उस बैठक में पुनः अध्यक्ष चुन लिए गए थे, याची को चुनाव की वैधता पर विचार करने के लिए 26 जुलाई को बैठक बुलाने का आदेश दिया। याची का आरोप है कि प्रतिवादी ने उस बैठक में वोट प्राप्त किए बिना ही पदाधिकारियों के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। उस वक्त डा. आंबेडकर नए सिरे से पदाधिकारियों के चुनाव कराना चाहते थे, किन्तु चूॅंकि यह विषय एजेण्डे में नहीं था, इसलिए उन्होंने 9 अगस्त को चुनाव कराए जाने की घोषणा की। इसी बीच, असन्तुष्ट सदस्यों ने कोआॅपरेटिव सोसाइटीज के रजिस्ट्रार से हस्तक्षेप करने की अपील की और रजिस्ट्रार ने अध्यक्ष को मामले को देखने के लिए पत्र लिखा और कहा कि चुनाव के विवाद के निपटारे को लम्वित रखते हुए वर्ष 1930-31 की प्रबन्ध समिति के पदाधिकारी यथावत बनाए रखें।

याची का यह भी आरोप है कि 10 अगस्त को डा. आंबेडकर ने उसे अपने कार्यालय में बुलाया और नए सचिव को चार्ज सौंपने को कहा। याची ने इसके लिए कुछ समय माॅंगा। दूसरे दिन जब याची सुबह 8.30 पर कार्यालय पहुॅंचा, उसी समय डा. आंबेडकर ने लगभग अन्य 20 साथियों के साथ कार्यालय में प्रवेश किया और उसे तुरन्त चार्ज सौंपने को कहा। किन्तु याची ने कहा कि वह चार्ज देने का काम अभी नहीं कर सकता और वे मुझे रजिस्ट्रार के पत्र की काॅपी दिखाएॅं, जिसमें कहा गया है कि इस मामले में जाॅंच के लिए एक मध्यस्थता मण्डल (आरबिट्रेशन बोर्ड) नियुक्त किया गया है।

 

चाबियाॅं छीन लीं

इस पर, याची का कहना है कि प्रतिवादी ने उसे पकड़कर, जबरन कुर्सी से खींच लिया, उसके हाथ में चाबियाॅं छीन लीं और कहा कि यहाॅं से निकल जाओ। याची का आरोप है कि इसके बाद उसे कार्यालय से निकाल दिया गया, और उसने सोसाइटी से सम्बन्धित नकदी तथा अन्य वाउचर वहीं छोड़ दिए। इस प्रकार उसने डा. आंबेडकर पर हमला करने, लूटने और एक गैरकानूनी समिति के सदस्य होने का आरोप लगाया है।

याची ने बताया कि उसने अपनी शिकायत मि. एन. टी. जंगलवाला, प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट, पाॅंचवी अदालत में दर्ज कराई थी, जिन्होंने याची के वकील को प्रतिवादी के पास जाकर उनका मत जानने को कहा। याची के वकील ने उसी दिन जाकर प्रतिवादी डा. आंबेडकर से बात की, और सारी बातचीत से मजिस्ट्रेट को अवगत कराया। उसके बाद मजिस्ट्रेट ने कारण बताओ नोटिस जारी किया और तुरन्त अभिलेखों को प्रस्तुत करने को कहा। अगले दिन, प्रतिवादी ने अदालत में मूल बिन्दु उठाया कि कोआपरेटिव सोसाइटीज एक्ट की धारा 63 के अन्तर्गत कोआपरेटिव सोसाइटीज के रजिस्ट्रार की स्वीकृति के बिना इस शिकायत पर विचार नहीं किया जा सकता। अतः मजिस्ट्रेट ने प्रतिवादी की दलील सुनने के बाद शिकायत को खारिज कर दिया और नोटिस भी रद्द कर दिया।

इस आदेश के विरुद्ध, याची ने एक पुनरीक्षण याचिका इस विरोध के साथ दायर की है कि मजिस्ट्रेट ने उनके वकील से प्रतिवादी के साथ सलाह करने की गलत प्रक्रिया अपनाई थी और इस मामले में रजिस्ट्रार की पूर्व स्वीकृति भी आवश्यक नहीं थी।

माननीय उच्च न्यायालय ने अपील को स्वीकार कर लिया है।

 

 

88.

 

डा. आंबेडकर की तुरही बजी

(दि बाम्बे क्रानिकल, 10 नवम्बर 1931)

 

लन्दन, 19 नवम्बर।

दलित वर्गों के प्रतिनिधि कहते हैं कि .उन्हें अहमदाबाद सहित देश के सभी भागों से दलित वर्गों के लोगों से 54 टेलीग्राम मिले हैं, जिनमें सिर्फ दो को छोड़कर, बाकी सबने महात्मा गाॅंधी के दावे का पुरजोर विरोध किया है और डा. आंबेडकर तथा श्रीनिवासन में पूर्ण भरोसा व्यक्त करते हुए पृथक निर्वाचन के द्वारा विशेष प्रतिनिधित्व की माॅंग का समर्थन किया है।

डा. आंबेडकर ने एक साक्षात्कार में कहा है कि ये टेलीग्राम साबित करते हैं कि उन्होंने दलित वर्गों की भावनाओं और राय को सही ढ़ग से प्रस्तुत किया है। उन्होंने यह भी कहा कि वे दो प्रतिकूल टेलीग्राम भी गलतफहमी के कारण भेजे गए हैं। उन्होंने कहा कि भारत में यह प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रही है कि गाॅंधी जी विशेष प्रतिनिधित्व के सहमत हो चुके हैं, मतभेद सिर्फ इस संयुक्त बनाम पृथक निर्वाचन के मुद्दे तक सीमित है। डा. आंबेडकर ने कहा कि जब दलितों को यह महसूस किया कि गाॅंधी जी दलित वर्गों को आरक्षित सीटों के साथ संयुक्त निर्वाचन भी देने को राजी नहीं हैं, तो उनळोंने ऐसा दबाव बनाया कि उनके दृष्टिकोण को ही बदल दिया। (राॅयटर का गोलमेज सम्मेलन विशेष)

 

 

89.

 

डा. आंबेडकर के विरुद्ध समन वापिस आया

(दि टाइम्स आॅफ इंडिया, 21 नवम्बर 1931)

एलफिंस्टन रोड कोआपेटिव क्रेडिट सोसाइटी के सचिव टी. एस. रामकृष्ण द्वारा डा, आंबेडकर पर लगाए गए मारपीट, लूटपाट और गैर कानूनी सदस्य बनने के आरोप में बम्बई उच्च न्यायालय द्वारा भेजा गया समन उन्हें प्राप्त कराए बिना ही वापिस आ गया है, क्योंकि डा. आंबेडकर गोलमेज सम्मेलन में प्रतिनिधि के रूप में इंग्लैण्ड में हैं। अब यह उनके वापिस आने के बाद ही उन्हे प्राप्त कराया जायेगा। इस केस की सुनवाई मि. एन. टी. जंगलवाला, प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट, पाॅंचवी अदालत, बम्बई में होनी है।

 

 

90.

 

महात्मा का प्रभाव सबसे ज्यादा

एक प्रेक्षक का विचार

डा. आंबेडकर डिन्हार्ड के ढोलकिया के रूप में

(दि बाम्बे क्रानिकल, 27 नवम्बर 1931)

(हमारे विशेष संवाददाता द्वारा)

नई दिल्ली, 24 नवम्बर।

अब जब गोलमेज सम्मेलन अपने श्रम के अन्त तक पहुॅंच रहा है, वहाॅं उपस्थित प्रतिनिधियों ने अपने जो प्रभाव छोड़े, उनको एक उपस्थित प्रेक्षक की दृष्टि से देखना दिलचस्प है।

अपने भाषणों से सबसे ज्यादा प्रभाव महात्मा गाॅंधी ने पैदा किया, जो, हर अवसर पर, उस व्यक्तित्व के अनुसार ही क्षमता, ईमानदारी और व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता था, जिसकी अनेक किंवदन्तियों को बुना जा चुका है। पूरे सम्मेलन में उनके विरुद्ध केवल एक ही प्रतिकूल टिप्पणी की गई थी कि उन्होंने सम्मेलन के प्रतिनिधियों के बीच अपने व्यक्तित्व के इर्दगिर्द निष्ठा का जाल बुना है, उस अर्थ में उन्होंने राष्ट्रीय नेतृत्व पर जीत हासिल नहीं की है, और उन्होंने हर समय अपने पृथक व्यक्तित्व और काॅंग्रेस के स्वयम्भू होने पर जोर दिया है।

सप्रू-जयकर प्रभाव

उनके बाद, कहा जाता है, सर तेज बहादुर सप्रू और मि. जयकर अपने प्रभाव को बनाकर रखा, जिन्होंने लार्ड संकेय और अन्य ब्रिटिश प्रतिनिधियों के दिलों को जीता।

मुस्लिम प्रतिनिधियों में चैधरी जफरुल्लाह खाॅं ने, हालांकि साम्प्रदायिक राग ही गाया, पर आसानी से अपनी प्रतिभा और वक्तृता में मोहम्मद शफी, मि. जिन्ना और डा. शफात अहमद खाॅं को पीछे छोड़ दिया। इस प्रेक्षक की दृष्टि में वह सचमुच अन्य मुस्लिम प्रतिनिधियों पर भारी थे। सिख प्रतिनिधियों ने तु़लनात्मक दृष्टि से खराब प्रभाव डाला, जबकि डा. आंबेडकर ने कमोबेश डिनहर्डस के ढोलकिया की भूमिका निभाई और तारीफ पाई, पर किसी भी कोने से उन्हें सम्मान नहीं मिला।

विन्टरटोन का धमाका

जहाॅं तक लार्ड विन्टरटोन के द्वारा किए गए इस धमाके का सम्बन्ध है, कि गोलमेज सम्मेलन की बजाए संसद में भारतीय नीति की घोषणा की जाए, तो यहाॅं जानकार हलकों में, यह कहा जाता है कि वह प्रधानमन्त्री को रास्ते से विचलित नहीं करेगा, जिस पर वह चल पड़े हैं, और न ही वह उन्हें सम्मेलन में अपना वक्तव्य देने से रोकेगा, बेशक, यह वक्तव्य एक साथ संसद में दिया जा सकता है, जो अब एक सत्र है।

मैं समझता हूॅं कि यह घोषणा एक सप्ताह के बाद आनी वाली है। .़

 

 

पिछली कड़ियाँ—

 

8. जब अछूतों ने कहा- हमें आंबेडकर नहीं, गाँधी पर भरोसा!

7. दलित वर्ग का प्रतिनिधि कौन- गाँधी या अांबेडकर?

6. दलित वर्गों के लिए सांविधानिक संरक्षण ज़रूरी-डॉ.अांबेडकर

5. अंधविश्वासों के ख़िलाफ़ प्रभावी क़ानून ज़रूरी- डॉ.आंबेडकर

4. ईश्वर सवर्ण हिन्दुओं को मेरे दुख को समझने की शक्ति और सद्बुद्धि दे !

3 .डॉ.आंबेडकर ने मनुस्मृति जलाई तो भड़का रूढ़िवादी प्रेस !

2. डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी

1. डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी

 



कँवल भारती : महत्‍वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक चिंतक, पत्रकारिता से लेखन की शुरुआत, दलित विषयों पर तीखी टिप्‍पणियों के लिए ख्‍यात, कई पुस्‍तकें प्रकाशित। चर्चित स्तंभकार। मीडिया विजिल के सलाहकार मंडल के सदस्य।

 




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