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डॉ.आंबेडकर ने मनुस्मृति जलाई तो भड़का रूढ़िवादी प्रेस !

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डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़़ुबानी – 3

 

पिछले दिनों एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में डॉ.आंबेडकर को महात्मा गाँधी के बाद सबसे महान भारतीय चुना गया। भारत के लोकतंत्र को एक आधुनिक सांविधानिक स्वरूप देने में डॉ.आंबेडकर का योगदान अब एक स्थापित तथ्य है जिसे शायद ही कोई चुनौती दे सकता है। डॉ.आंबेडकर को मिले इस मुकाम के पीछे एक लंबी जद्दोजहद है। ऐसे मेंयह देखना दिलचस्प होगा कि डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की शुरुआत में उन्हें लेकर कैसी बातें हो रही थीं। हम इस सिलसिले में हम महत्वपूर्ण  स्रोतग्रंथ  डॉ.अांबेडकर और अछूत आंदोलन  का हिंदी अनुवाद पेश कर रहे हैं। इसमें डॉ.अंबेडकर को लेकर ख़ुफ़िया और अख़बारों की रपटों को सम्मलित किया गया है। मीडिया विजिल के लिए यह महत्वपूर्ण अनुवाद प्रख्यात लेखक और समाजशास्त्री कँवल भारती कर रहे हैं जो इस वेबसाइट के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य भी हैं। प्रस्तुत है इस साप्ताहिक शृंखला की तीसरी कड़ी – सम्पादक

 

 

21.

 

महाद में अछूतों का सत्याग्रह

(बाम्बे सीक्रेट एबस्टेªक्ट, दिनाॅंक 12 अप्रेल 1927)

868, बम्बई सिटी विशेष शाखा, 31 अक्टूबर- विगत मार्च में कोलाबा जनपद के महाद में उन महारों, मांगों और भंगियों का एक सम्मेलन हुआ, जिनका सनातनी हिन्दुओं ने गाॅंव के तालाब से पानी लेना प्रतिबन्धित कर दिया है। बताया ताजा है कि जिन लोगों ने कानून अपने हाथ लेकर अछूतों के विरुद्ध प्रतिबन्ध लगाया है, उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करा दिया गया है। चूँकि इस घटना ने बम्बई के अछूतों को उत्तेजित कर दिया है, इसलिए डा. भीमराव रामजी आंबेडकर उसका नेतृत्व कर रहे हैं।

इसी विषय को लेकर लगभग एक हजार अछूतों की एक सभा डा. आंबेडकर की अध्यक्षता में 30 अक्टूबर के अपराह्न में ‘सर कोवासजी जहाॅंगीर हाल में हुई, जिसमें अघ्यक्ष ने महाद की घटना के बारे में तथ्यों से अवगत कराया और कहा कि इस घटना ने अछूतों को अपने अधिकारों की रक्षा हेतु उठ खड़े होने के लिए बाध्य कर दिया है। एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसके द्वारा यह निश्चय किया गया कि आगामी 25 दिसम्बर को महाद में सार्वजनिक तालाब से पानी लेने के अपने अधिकार को प्राप्त करने के लिए सम्मेलन किया जाएगा और यदि रोका गया, तो सत्याग्रह किया जाएगा। इस सभा में लगभग 570 रु. का चन्दा जमा हुआ। श्रोताओं में से यह सुझाव भी आया कि ऐसा ही एक आन्दोलन नवम्बर के मध्य में अमरावती में मन्दिर मामले में किया जाएगा।

 

 

22 .

 

संख्या एच/3447

दिनाॅंक: 22 दिसम्बर 1927

सेवा में,

पुलिस उपाधीक्षक

कोलाबा, अजीबाग।

 

महोदय,

सन्दर्भ- प्रस्तर 868/बी.एस.ए.

इसी 21 की रात्रि में हुई दलित वर्गों की सभा के सम्बन्ध में, 250 लोग उपस्थित थे, जिसकी अध्यक्षता डा. बी. आर. आंबेडकर, बार-एट-लाॅ ने की। अध्यक्ष, सम्भाजी सन्तोजी वाघमारे, निमनदारकर, ाीवलवाडेकर और जुन्नारकर ने लोगों को अछूतों को तालाब से पानी लेने पर रोक लगाने के खिलाफ इसी 25 दिसम्बर को महाद में होने वाले सत्याग्रह आन्दोलन में श्भाग लेने के लिए भाषण दिए।

सादर,

.(ह…)

पुलिस उपायुक्त, विशेष शाखा

22 दिसम्बर 1927

 

 

23.

 

महाद में सत्याग्रह

सामाजिक निर्योग्यताओं के उन्मूलन के लिए डा. आंबेडकर के विचार

(दि इण्डियन नेशनल हेराल्ड, 25 नवम्बर 1927)

निम्नलिखित डा. बी. आर. आंबेडकर, एम.ए., पीएच.डी., डी.एससी. बार-एट-लाॅ, एम.एल.सी. द्वारा 25 दिसम्बर 1927 को महाद (जनपद कोलाबा) में सत्याग्रह सम्मेलन में दिए गए भाषण का सारांश है।

डा. आंबेडकर ने ‘सत्याग्रह समिति’ की ओर से, जिसके वे अध्यक्ष हैं, सत्याग्रहियों का स्वागत करते हुए उनको उस पूर्व सम्मेलन के दुखद अन्त का स्मरण कराया, जो गत मार्च में इसी स्थान पर हुआ था और जिसमें तथाकथित उच्च हिन्दुओं ने उनके अनेक प्रतिनिधियों के साथ उस समय मारपीट और अपमानजनक दुर्व्यवहार किया था, जब वे ‘चावदार’ नामक सार्वजनिक तालाब से पानी ले रहे थे। दलित वर्गों के लोगों को तालाब से पानी लेने से किसी ने नहीं रोका था, पर कुछ सरगना नेताओं ने सम्मेलन में आए प्रतिनिधियों को दण्डित करने की सनक सवार हो गई थी, जिन्होंने भीड़ को उत्तेजित करके उनपर हमला करवाया। उनमें से कुछ को अदालत ने दोषी माना और प्रत्येक को चार साल के कारावास की दण्ड दिया है।

डा. आंबेडकर ने आगे कहा, ‘यदि सवर्ण हिन्दू तालाब के उपयोग पर दलित वर्गों के अधिकार को स्वीकार कर लेते, तो सत्याग्रह की जरूरत नहीं पड़ती। किन्तु, दुर्भाग्य से, सवर्ण हिन्दू अपने रवैये में दुराग्रही और जिद्दी थे, जिन्होंने तालाब पर दलित वर्गों के अधिकार को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया, जबकि वह मुसलमानों तथा अन्य गैर-हिन्दुओं सहित सभी जातियों के लिए खुला था। विडम्बना देखिए कि उसमें तथाकथित अछूतों के जानवरों को जाने की इजाजत है, पर उन जानवरों के मालिकों का जाना प्रतिबन्धित है, जो उतने ही अच्छे प्राणी हैं, जितने कि दूसरे लोग हैं।

हिन्दू अपनी मानवीय सम्वेदनाओं के लिए विख्यात हैं, वे पशु-जीवन का भी सम्मान करते हैं। कुछ हिन्दू तो जहरीले साॅंपों तक को नहीं मारते हैं। हट्टे-कट्टे होकर भीख माॅंगने वाले साधुओं की एक विशाल सेना हिन्दुओं के पास है, जो यह मानते हैं कि वे उन्हें आहार, वस्त्र और धन इसलिए दान करते हैं, क्योंकि उन्होंने पुण्य-कर्म किए हैं। हिन्दू-दर्शन सर्वव्यापी आत्मा के सिद्धान्त की शिक्षा देता है और उनको ‘गीता’ यह उपदेश देती है कि ब्राह्मण तथा चाण्डाल में कोई अन्तर नहीं है।

इसलिए सवाल उठता है कि जब हिन्दुओं की परम्परा परमार्थ और मानवीयता की है और उनका दर्शन इतना महान है, तो वे इतने अविवेकपूर्ण ढंग से अपने इन साथियों के साथ अमानवीय व्यवहार क्यों करते हैं? इस सवाल के जवाब में ही इस सम्मेलन की सार्थकता निहित है। हिन्दू समाज जातिव्यवस्था के फौलादी चैखटे में जड़ हो गया है, जिसमें सामाजिक स्तर पर हर एक जाति दूसरी जाति से नीची है और उसी के अनुसार उसके विशेषाधिकार और निर्योग्यताएॅं निर्धारित हैं। इस व्यवस्था ने उन निहित स्वार्थों को जन्म दिया, जो इस व्यवस्था से उत्पन्न असमानता को बनाए रखने पर निर्भर रहते हैं।

तथाकथित सवर्ण हिन्दू तालाब के उपयोग के लिए पंचम वर्ण का विरोध, जिसके अन्तर्गत दलित वर्ग आते हैं, इसलिए नहीं करते हैं कि वे यह मानते हैं कि उससे तालाब का पानी दूषित हो जायगा या महारों और दूसरों के उपयोग से उसका पानी भाप बन जायगा, बल्कि वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें अपनी जातीय उच्चता खोने और दलित-सवर्ण के बीच समानता कायम हो जाने का भय है। हमने इस सत्याग्रह को इसलिए फिर से शुरु नहीं किया है कि इस तालाब का पानी उच्च गुणवत्ता वाला है और अपवाद है, बल्कि इसलिए शुरु किया है, क्योंकि हमें नागरिक और मानव प्राणी होने के नाते अपने प्राकृतिक अधिकारों को स्थापित करना है।

 

समानता के लिए संघर्ष

यह सम्मेलन समानता का ध्वज फहराने के लिए किया गया है। इसलिए इसे 1789 के फ्रांस आयोजन की राष्ट्रीय असेम्बली से जोड़ा जा सकता है। हमारे सम्मेलन का उद्देश्य भी सामाजिक, धार्मिक, नागरिक और आर्थिक मामलों में उसी उपलब्धि को हासिल करना है, जो फ्रांस की राष्ट्रीय असेम्बली ने हासिल किया था। हमें भी जातिव्यवस्था के फौलादी चैखटे को चूर-चूर करना है।

 

छोटा ध्येय एक अपराध है

कुछ लोग कह सकते हैं कि हमें केवल अस्पृश्यता के उन्मूलन से सन्तुष्ट हो जाना चाहिए, और जातिव्यवस्था को यों ही छोड़ देना चाहिए। जातिव्यवस्था में निहित असमानता को समाप्त किए बगैर केवल अस्पृश्यता को समाप्त करने का ध्येय एक बहुत ही छोटा ध्येय है। याद रखो, ‘विफलता नहीं, छोटा ध्येय अपराध है।’ हमें बुराई को उसकी मूल जड़ से उखाड़ना है और सिर्फ अपने दर्द को कम करने के तरीके से सन्तुष्ट नहीं होना है। यदि रोग की पहिचान ठीक से नहीं होती है, तो उसका इलाज भी ठीक से नहीं हो सकता और वह रोग यथावत बना रहता है।

अस्पृश्यता और सामाजिक प्रतिबन्ध केवल अन्तरजातीय भोजों से दूर नहीं होंगे, बल्कि हिन्दुओं की विभिन्न जातियों के बीच अन्तरजातीय विवाह भी सामान्यतः होने चाहिए। इसी से सच्ची समानता आयगी। क्योंकि अगर यह मान भी लिया जाए कि अस्पृश्यता का कलंक मिट जाता है, तो भी यह सवाल फिर भी बना रहेगा कि वर्तमान अछूतों का सामाजिक स्तर क्या होगा। अधिक से अधिक वे शूद्र माने जायेंगे। और शूद्रों के क्या अधिकार हैं? ‘स्मृतियाॅं’ उन्हें सिर्फ गुलाम (्रमसवजे) मानती हैं और जातिव्यवस्था के मामले में सवर्ण हिन्दू ‘समृतियों’ का अनुसरण करते हैं। क्या तुम शूद्र बनना चाहते हो? क्या तुम गुलामों जैसा स्तर चाहते हो? क्या तुम अपना भविष्य उच्च हिन्दुओं के हाथों में सौंपने के लिए तैयार हो?

 

अपनी सेवा स्वयं

यदि समानता के आधार पर हिन्दू समाज का पुनर्निर्माण होता है, तो यह कहने की आवश्यकता नहीं कि जातिव्यवस्था खत्म हो जायगी, क्योंकि अस्पृश्यता की जड़ें जातिव्यवस्था में हैं। पर, वे ब्राह्मणों से यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि वे जातिव्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह करेंगे, क्योंकि यह व्यवस्था उन्हें विशेषाधिकार प्रदान करती है, जो उन्हें सर्वोच्च बनाती है। इसलिए वे अपने विशेषाधिकार छोड़ने को कभी तैयार नहीं होंगे। हिन्दूधर्म में उनकी जो आनुवंशिक सर्वोच्चता है, वह स्मृतियों पर आधारित है। उनसे यह अपेक्षा भी नहीं की जा सकती कि वे जापान के ‘समुराईयों’ की तरह अपने समस्त विशेषाधिकारों को त्याग देंगे। हम गैर-ब्राह्मणों पर भी भरोसा नहीं कर सकते कि वे हमारी लड़ाई लड़ेंगे। उनमें से बहुत-से अभी भी जातिव्यवस्था पर मुग्ध हैं और ब्राह्मणों के हाथों की कठपुतलियाॅं बने हुए हैं। कुछ दूसरे लोग भी, जो ब्राह्मणों की उच्चता से द्वेष रखते हैं, दबे-कुचले वर्गों को ऊपर उठाने की बजाए ब्राह्मण को नीचे बिराने में रुचि रखते हैं। वे भी उन लोगों की तरह होना चाहते हैं, जो दलितों का तिरस्कार करते हैं और इस बात से संतुष्ट रहते हैं कि वे समाज में पददलित वर्ग नहीं हैं। इसका मतलब है कि हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी और स्वयं पर भरोसा करना होगा। हम देश में सबसे ज्यादा पददलित वर्ग हैं। कमारे लिए सेना, पुलिस और सरकारी दफ्तरों में नौकरी मिलने के सभी दरवाजे बन्द कर दिए गए हैं। हम अपनी दूकानें भी नहीं खोल सकते, क्योंकि अनेक व्यवसायों से भी हम बहिष्कृत कर दिए गए हैं, जिसकी वजह से हम आर्थिक रूप से कमजोर हो गए हैं। और इस सब का कारण अस्पृश्यता और समाज में हमारा निम्न स्तर होना है, जिससे हमारी उपेक्षा होती है। यदि हम नागरिक और मानव प्राणी होने के अपने अधिकारों को हासिल करने में विफल रहते हैं, तो हम हमेशा के लिए पतन के गर्त में चले जायेंगे।

 

राष्ट्र की असली सेवा

हमारा यह जो आन्दोलन है, उसका उद्देश्य सिर्फ अस्पृश्यता और अपनी निर्याेग्यताओं को दूर करना नहीं है, बल्कि हमारा उद्देश्य सामाजिक क्रान्ति लाना है, ऐसी क्रान्ति, जो सभी लोगों को आगे बढ़ने और तरक्की करने के लिए समान अवसर देकर और मनुष्य-मनुष्य के बीच नागरिक अधिकारों के सम्बन्ध में कोई भेदभाव न करके सभी मानव-निर्मित जातीय बाधाओं को समाप्त करेगी। यदि हम अपने आन्दोलन से सभी हिन्दुओं को एक ही जाति में संगठित करने में सफल हो जाते हैं, तो हम भारतीय राष्ट्र की और विशेषकर हिन्दू समुदाय की सबसे बड़ी सेवा करेंगे। वर्तमान जातिव्यवस्था अपने पक्षपातपूर्ण भेदभाव और अन्यायपूर्ण विधान की वजह से हमारी साम्प्रदायिक और राष्ट्रीय दुर्बलता का सबसे बड़ा स्रोत है। हमारा आन्दोलन समानता, स्वतन्त्रता और बन्धुता के लिए शक्ति और एकात्मता का समर्थक है। हम अपने आन्दोलन को, जितना हम कर सकते हैं, शान्तिपूर्ण ढंग से चलाना चाहते हैं। फिर भी अहिंसक बने रहने का हमारा निर्णय हमारे शत्रुओं के व्यवहार पर निर्भर करेगा। हम हमलावर लोग नहीं हैं, और पीढ़ियों से हमारे दमन ने भी हमें हमलावर नहीं बनाया, यह भी आश्चर्यजनक है। हम अंधकार युग के शास्त्रों और स्मृतियों के नियमों से प्रतिबन्धित और नियन्त्रित होकर रहने से इन्कार करते हैं। हमारा दावा न्याय और मानवता पर आधारित है।

 

 

24.

 

महाद में मनुस्मृति को जलाया

 

डा. आंबेडकर ने हिन्दू समाज से जातिप्रथा खत्म करने की माॅंग की

हमारा उद्देश्य सामाजिक क्रान्ति है

कलेक्टर के कहने पर सत्याग्रह स्थगित

(दि इडियन नेशनल हेराल्ड, 31 दिसम्बर 1927)

 

(फ्री प्रेस आॅफ इण्डिया, महाद, 29 दिसम्बर)

तथाकथित अछूतों के सार्वजनिक तालाब से पानी लेने के अधिकार को प्राप्त करने के लिए महाद में किए गए सत्याग्रह का विवरण अब उपलब्ध हो गया है। सवर्णों की कानूनी कार्यवाही ने संकट को बढ़ा दिया है, जिन्होंने अछूतों के हक के विरुद्ध सिविल कोर्ट से निषेधाज्ञा लेने के लिए यह दलील प्रस्तुत की है कि तालाब उनकी निजी मिल्कियत है, इसलिए जब तक मालिकाना हक तय नहीं हो जाता है, तब तक तथाकथित अछूतों को तालाब का उपयोग करने से रोका जाना चाहिए।

महाद तालाब पर अपने अधिकार के पक्ष में किया गया सत्याग्रह सम्मेलन अब विशेष रूप से सिविल कोर्ट के आदेश से उत्पन्न स्थिति पर विचार कर रहा है। यह सम्मेलन, जिसमें अधिकतम 5000 महारों ने भाग लिया था, इसी 25 दिसम्बर को डा. आंबेडकर, एम.एल.सी., बार-एट-लाॅ, जो ‘अछूत’ समुदाय से हैं, की अध्यक्षता में हुआ था। सम्मेलन में ‘कोलाबा समाचार’ के आर. एन. माण्डलिक भी उपस्थित थे और दो दर्जन मुसलमानों तथा प्रभुओं ने भी भाग लिया था और अछूतो के साथ सहयोग किया था। डा. सोलंकी, एम.एल.सी. और लोकमान्य के पुत्र तिलक बंधुओं ने सम्मेलन के लिए अपनी सद्भावनाएॅं भेजी थीं।

 

मानवाधिकारों का समर्थन

प्रार्थनाओं के साथ कार्यवाही का आरम्भ हुआ, तदुपरान्त डा. आंबेडकर ने भारत में अछूत आन्दोलन के इतिहास पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए कहा कि वे यहाॅं इस सत्य को स्थापित करने के लिए एकत्रित हुए हैं कि वे मानव प्राणी हैं, न कि एक तालाब विशेष से पानी लेने के लिए। उनके सम्मेलन का उद्देश्य अछूतों के लिए समान अधिकार प्राप्त करना हैं। आगे डा. आंबेडकर ने सम्मेलन की तुलना 5 मई 1789 के वर्सेल्स की फ्रेंच क्रान्ति से की और घोषणा की कि अछूतों का उत्थान राष्ट्र का उत्थान है। अछूत वर्णाश्रम का खात्मा चाहते हैं और इस सिद्धान्त को स्थापित करना चाहते हैं कि किसी के अधिकारों, कार्य-भारों और सामाजिक स्तर का निर्धारण उसके जन्म से नहीं, बल्कि गुण से किया जाना चाहिए। इसलिए एक महान सामाजिक क्रान्ति ही अछूतों का उद्देश्य है।

एक ब्राह्मण व्यक्ति मि. जी. एन. सहस्रबुद्धे ने ‘मनुस्मृति’ से उन अंशों को पढ़कर सुनाया, जो शूद्रों के प्रति भेदभाव की व्यवस्था देते हैं।

 

मनुस्मृति जलाई

 

पहला प्रस्ताव जो पारित हुआ, वह इस प्रकार है-

मनुस्मृति में शूद्रों से सम्बन्धित टिप्पणियों तथा ऐसी ही कुछ दूसरी घृणित पुस्तकों पर, जो मानवाधिकारों का उल्लंघन करती हैं, विचार करते हुए, यह सभा उनका खण्डन करती है और उन्हें जलाने का प्रस्ताव करती है तथा हिन्दू समाज के पुनर्निर्माण के लिए अधिकारों को आधार बनाने की घोषणा करती है।

इस घोषणा-पत्र में कहा गया है कि सभी हिन्दू एक ही वर्ण के माने जाएॅं और ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्ण के प्रयोग पर कानूनन प्रतिबन्ध लगाया जाए।

दूसरा प्रस्ताव इस माॅंग को लेकर था कि हिन्दू पुरोहित की नियुक्ति के लिए प्रतियोगिता-परीक्षा कराई जाए और परीक्षा में उत्तीर्ण प्रतिभागी को पुरोहिती का लाइसेंस दिया जाए।

भाषणों में मुख्यतयः ब्राह्मणों और ब्राह्मणवाद का विरोध किया गया। मि. माण्डलिक ने सभा में बोलने की अनुमति माॅंगी, परन्तु अध्यक्ष ने अनुमति नहीं दी। मि. डी. वी. प्रधान, जो सवर्ण हैं, ने मनुस्मृति को जलाने का समर्थन किया। अन्त में, मनुस्मृति को जलाने की कार्यवाही शुरु हुई और तत्पश्चात सम्मेलन अगले दिन के लिए स्थगित हो गया।

सम्मेलन में कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और 100 सशस्त्र पुलिस के जवान मौजूद थे। रात्रि में ‘हरिकीर्तन’ हुआ, जिसकी रचना एक अछूत द्वारा की गई थी और जिसमें ब्राह्मणों पर प्रहार किए गए थे।

 

कलेक्टर का पत्र

दूसरे दिन के सम्मेलन की कार्यवाही 26 दिसम्बर की सुबह शुरु हुई। डा. आंबेडकर ने कलेक्टर का पत्र पढ़कर सुनाया, जिसमें कहा गया था कि सरकार चाहती है कि अछूत सिविल कोर्ट की निषेधाज्ञा का पालन करें। अछूतों के साथ सरकार की पूरी हमदर्दी है और वह सार्वजनिक स्थानों पर उनके अधिकारों को हासिल करने के लिए उनकी हर कानूनी तरीके से सहायता करना चाहती है। पर अदालत द्वारा अस्थाई रोक लगाए जाने से वह असहाय स्थिति में है। इसलिए वह चाहती है कि इस समय अछूत सत्याग्रह को आगे चलाना बन्द कर दें।

सम्पूर्ण सम्मेलन तब एक विषय-समिति में बदल गया, जब डा. आंबेडकर ने पूरी स्थिति पर पुनर्विचार करते हुए प्रतिनिधियों को सिविल कोर्ट की निषेधाज्ञा के विरुद्ध इस शर्त पर सत्याग्रह जारी रखने की सलाह दी कि उन्हें उसके परिणामों को भोगने, उन्हें जेल जाने और अन्य कष्ट भी वालियन्टरों की तरह खुश होकर झेलने के लिए तैयार रहना होगा।

सम्मेलन की आम समझ सलाह के पक्ष में तुरन्त सत्याग्रह जारी रखने की थी और अध्यक्ष सत्याग्रह को स्थगित करने वाले किसी भी वक्ता की बात नहीं सुन पा रहे थे।

3000 स्वयंसेवकों ने प्रतिज्ञा की

इसके बाद डा. आंबेडकर ने लोगों की वास्तविक भावनाओं की थाह लेने के लिए सुझाव दिया कि जो लोग सत्याग्रह के पक्ष में हैं, वे अपनी सहमति लिखित में दें। तद्नुसार, सत्याग्रह के पक्ष में एक घण्टे में 3,884 प्रतिनिधियों के पंजीकरण हो गए। अतः, कलेक्टर को सूचित किया गया कि सम्मेलन सत्याग्रह जारी रखने के पक्ष में है, तब कलेक्टर ने स्वयं सम्मेलन को सम्बोधित करने की इच्छा व्यक्त की।

 

सम्मेलन में कलेक्टर का सम्बोधन

शाम को 5 बजे पुनः सभा शुरु हुई, जिसमें कलेक्टर मि. हूड और पुलिस अधीक्षक उपस्थित हुए। कलेक्टर ने मराठी में सभा को सम्बोधित किया। उन्होंने कहा- मैं जानता हॅूं कि आप यहाॅं क्यों एकत्रित हुए हैं? मैं यह भी जानता हूॅं कि मैंने आपको सत्याग्रह को स्थगित करने की सलाह दी है, जिससे आप सब बहुत ज्यादा दुखी हैं, क्योंकि आप पिछले तीन महीने से इसकी तैयारी कर रहे हैं। किन्तु, आप सब जानते हैं कि बम्बई विधान परिषद ने सार्वजनिक तालाबों और स्कूलों में दलित वर्गों को प्रवेश देने के लिए प्रस्ताव पारित किया है और तद्नुसार बम्बई सरकार ने उसे कार्यान्वित करने के निर्देश जारी कर दिए हैं तथा स्थानीय परिषद को भी ऐसा करने की सलाह दी गई है। मि. हूड ने कहा, सरकार चाहती है कि तालाब पर उनको हक मिले, किन्तु 10 दिन पहले इस मामले में एक नया विवाद आ गया है। सवर्ण लोगों ने अछूतों के विरुद्ध यह दावा दायर करके कि तालाब उनकी निजी सम्पत्ति है, अदालत से अपने पक्ष में अस्थाई आदेश प्राप्त कर लिया है।

‘मैं आपसे जनपद के कलेक्टर की हैसियत से बात कर रहा हूॅं, अतः सरकार की ओर से मैं आपको विश्वास दिलाता हूॅं कि सरकार अछूतों के साथ है और मैं तथा सरकार आपके मित्र हैं। मैं यह देखकर बहुत दुखी हूॅं कि आपमें से कुछ लोग कोर्ट के आदेश की अवज्ञा करके सत्याग्रह को जारी रखना चाहते हैं। आपका यह निर्णय बहुत हानिकारक होगा, मेरी आपको यह सलाह है कि आप लोग अपने केस को अदालत में कानूनी तरीके से लड़ने की तैयारी करें। मुझे पूरा विश्वास है कि फैसला आपके ही पक्ष में होगा।’

मि. जावलकर ने, जो सुबह ही सम्मेलन में आ गए थे, कहा कि वह यहाॅं ‘नान-ब्राह्मन पार्टी’ का सन्देश लेकर आए हैं कि अछूतों को अदालत के निषेध-आदेश का पालन करना चाहिए और अदालत के फैसले के बाद ही सत्याग्रह करना चाहिए। सूबेदार घाटगे और अन्य वक्ताओं ने कहा कि वे यहाॅं सवर्णों के खिलाफ सत्याग्रह करने आए हैं, न कि सरकार के खिलाफ।

 

यह हमारी विजय है

इसके बाद डा. आंबेडकर ने सभा को सम्बोधित किया। उन्होंने कहा- ‘अब यह आपको तय करना है कि क्या करना है? मैं समझता हूॅं कि यह हमारी जीत है कि खुद कलेक्टर ने यहाॅं आकर व्यक्तिगत रूप से आपको समझाया है। इससे आपकी शक्ति का पता चलता है। अतः इन परिस्थितियों में सम्मेलन को स्थगित करना हमारी हार नहीं है। आप में से बहुतों ने सत्याग्रह के लिए लिखित सहमतियाॅं दी हैं, उस दृष्टि से सत्याग्रह को स्थगित करने को हमारी कमजोरी नहीं माना जा सकता। मुझे यह देखकर गर्व होता है कि आप लोग जेल जाने की कीमत पर भी सत्याग्रह करने के लिए तैयार हैं। मेरा सम्पूर्ण मिशन आपको आपकी अत्यधिक अमानवोचित और दुखद स्थिति के प्रति जागरूक करना और अपनी बेहतर स्थिति के लिए संघर्षशील बनाना है। और, मुझे लगता है, इस सम्मेलन की यही उपलब्धि है कि हम यह जान गए हैं कि हम लड़ सकते हैं।’

सम्मेलन अगले दिन 27 तक के लिए स्थगित हो गया।

 

 

सत्याग्रह स्थगित

27 दिसम्बर, मंगलवार को सुबह 10 बजे सम्मेलन में पुनः लोग एकत्रित हुए। पिछली रात्रि के विचार-विमर्श के परिणाम-स्वरूप, निम्नलिखित प्रस्ताव स्वीकार किया गया-

‘इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि महाद के सवर्ण वर्गों ने अन्तिम समय में सिविल कोर्ट से दलित वर्गों के विरुद्ध उन्हें सरकार के साथ संघर्ष में उलझाने के इरादे से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर ली है, जिस पर सत्याग्रह को स्थगित करने के सरकार के प्रस्ताव पर कल कलेक्टर को सुनने के बाद तथा खुली सभा में उनके द्वारा दिए गए इस आश्वासन पर कि समान अधिकारों के लिए दलित वर्गों के संघर्ष में सरकार हमेशा उनके साथ है, विचार करते हुए यह प्रस्ताव पारित किया जाता है कि सिविल कोर्ट का निर्णय आने तक सत्याग्रह स्थगित रहेगा।’

 

नगर में प्रदर्शन

सम्मेलन स्थगित होने के बाद उसने जुलूस का रूप ले लिया, और वह दलित वर्गों के स्काउट दल के नेतृत्व में गीत गाता हुआ, पूरे नगर में निकला। चार-चार के ग्रुप में पीछे महिलाएॅं चल रही थीं, जिनके हाथों नारे लिखे झण्डे थे। जिला पुलिस अधीक्षक जुलूस के साथ थे। वे लोग सन्त एकनाथ, ज्ञानोबा और आगरकर, रामाशास्त्री, महात्मा गाॅंधी जैसे सुधारकों, तथा दलित वर्गों के अन्य हितैषियों शिवाजी और छत्रपति महाराज की ‘जय-जयकार’ के नारों से आकाश गूॅंज रहा था। दो घण्टे के बाद जुलूस सम्मेलन के पण्डाल में वापस आया, जहाॅं आरती उतारकर डा. आंबेडकर का स्वागत किया गया, और तत्पश्चात सवर्ण साथियों- जैसे मि. टिपनिस, मि. पोटनिस और मि. पातकी को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद दिया गया।

शाम को डा. आंबेडकर ने जूता बनाने वालों की सभा को सम्बोधित किया और उनसे अपने अधिकारों की लड़ाई में सक्रिय भाग लेने की अपील की।

 

 

25.

 

 

रायगढ़ में डा. आंबेडकर

गंगासागर टेंक में अछूतों का स्नान

(दि बाम्बे क्रानिकल, 12 जनवरी 1928)

 

एक संवाददाता 5 जनवरी को ‘पेन’ के ‘कोलाबा समाचार’ में लिखता है, ‘सत्याग्रह सम्मेलन के समापन के बाद डा. आंबेडकर लगभग एक सौ अछूतों का साथ देने के लिए प्रसिद्ध गढ़ी शिवाजी की राजधानी रायगढ़ गए। रायगढ़ धर्मशाला में ही उन्होंने पड़ाव डाला। वहाॅं का चैकीदार येशू शेडगे, जो महरट्टा जाति का है, धर्मशाला समिति की ओर से रखरखाव के लिए रखा गया है, वही आगन्तुकों की भी देखभाल करता है। उसने उन्हें हिदायत दी कि वे गंगासागर टेंक का पानी न छुएं। उसने उन्हें सुझाव दिया कि अगर उन्हें नहाना है, तो वे पास में ही एक दूसरे टेंक में जाकर नहा सकते हैं, जो विशेष रूप से अछूतों के लिए बनाया गया है। किन्तु डा. आंबेडकर और उनके अछूत साथियों ने ‘गंगासागर’ के पानी में ही नहाकर उसे दूषित कर दिया।

संवाददाता यह भी लिखता है कि इससे रायगढ़ घाटी के महरट्टा, जिनमें से बहुत से सेना में सिपाही हैं, बहुत उत्तेजित हैं।

 

 

26.

 

टिप्पणियाॅं

(कोलाबा समाचार, 7 जनवरी 1927)

इस प्रकरण पर ‘कोलाबा समाचार’ अपने 7 जनवरी के अंक में अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में डा. आंबेडकर के द्वारा अपनाए गए तरीके पर सुझाव देते हुए लिखता है कि इस मामले में सरकार को डा. आंबेडकर और उनके अनुयायियों पर मुकदमा चलाना चाहिए। पत्र इस आधार पर सुझावों के विरुद्ध कड़ रुख अपनाता है कि भारतीयों को जितना सम्भव हो सके, अपने झगड़े समाप्त करने चाहिए और उसमें सरकार को हस्तक्षेप करने के लिए नहीं बुलाना चाहिए।

 

 

27.

 

महाद में अछूतों का सत्याग्रह

 

(बम्बई सीक्रेट एबस्ट्रेक्ट, 14 जनवरी 1928)

41, प्रस्तर 15, कोलाबा, 31 दिसम्बर 1927।  डा. आंबेडकर यहाॅं 25 दिसम्बर की सुबह लगभग 500 अछूतों के साथ दासगाॅंव होते हुए पहुॅंचे। लगश्रभग 6000 अछूत यहाॅं पहुॅंचे हैं। शाम को डा. आंबेडकर की अध्यक्षता में जनसभा हुई। बहुत से भाषण हुए, जिनका मुख्य बिन्दु यह था कि सभी हिन्दुओं की एक जाति होनी चाहिए और सब समान होने चाहिए। ‘मनुस्मृति’ के बारे में यह घोषणा की गई कि यह अछूतों को दबाकर रखने के लिए ब्राह्मणों का दुष्कर्म है और सभा के अन्त में उसे जलाकर नष्ट का दिया गया। 26 दिसम्बर को पूरे दिन इस सवाल पर चर्चा हुई कि चावदार तालाब पर सत्याग्रह जारी रखा जाय या नहीं। अन्ततः, जिला मजिस्ट्रेट की सलाह पर अदालत का फैसला आने तक सत्याग्रह को स्थगित करने का निश्चय किया गया। 27 दिसम्बर को अछूतों की अन्तिम सभा हुई, डा. आंबेडकर ने अछूतों की सहायता करने के लिए महार निवासी वामन विनायक पातकी और कमलाकर काशीनाथ टिपनिस को सोने की दो अंगूठियाॅं भेंट कीं, जिनका प्रत्येक का वनज लगभग 9 मासा था। नगर में जुलूस निकालने के बाद अछूत अपने घरों को लौट गए। सम्मेलन के दौरान किसी समय कोई अप्रिय घटना नहीं हुई, जुलूस शुरु से अन्त तक बहुत ही सुव्यवस्थित था।

यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि जब तक सम्मेलन चला, अछूतों को किसी ने भी दूध की आपूर्ति नहीं की, और शुरु के दो दिनों तक उनके पास खाने को भी कुछ नहीं था, क्योंकि खाना बनाने वाले उनके बड़े बर्तन वहाॅं पहुॅंचे नहीं थे और महाद में किसी ने भी उनको किराए पर बर्तन नहीं दिए थे। इसके बाद भी उनका व्यवहार सुशील और निष्ठावान था।

चार दिनों तक, जब तक अछूतों का सम्मेलन चला, महाद में ब्राह्मण तत्व परोक्ष रूप से दिखाई नहीं दिए।

 

 

 

28.

 

 

रूढ़िवादी पागल हो गए

महार होने की बर्बर सजा दी अछूतों को

 

(दि बाम्बे क्रानिकल, 25 फरवरी 1928)

 

अहमदाबाद से श्री केशवजी रणछोड़जी वघेला ने डा. बी. आर. आंबेडकर, अध्यक्ष, बहिष्कृत हितकारिणी सभा को निम्नलिखित सूचना प्रषित की है-

 

बापूराव लक्ष्मन और उसके भाई कौराव पिछले छह सालों से अहमदाबाद के निवासी हैं। वे दकन के कुछ लोगों, अर्थात् मराठा जाति के दो पुत्रों के साथ रहते हैं। दामू और लक्ष्मन मराठों की भजन-मण्डली में भाग लेते हैं। हाल में उन्हें यह पता चल गया कि दोनों भाई दामू और लक्ष्मन महार जाति से हैं। हमारी जाति का पता लगाने के लिए उन्होंने विशेष रूप से अहमदाबाद और सूरत के बीच पार्सल ट्रेन में काम करने वाले दो महारों को बुलाया गया, जो हमें पहचानते थे। इसके बाद उन्होंने उन्हें इसी 11 तारीख को रात में कालूपुर, भंडारी पोल में भजन-मण्डली में बुलाया। वहाॅं उन्होंने उनसे उनकी जाति पूछी, जिसके जवाब में दामू और लक्ष्मन ने कहा, वे सूर्यवंशी हैं। यह सुनकर मराठे भड़क गए और गालियाॅं देने लगे कि तुमने हमें और हमारे स्थल को दूषित कर दिया है। मराठों ने दोनों महार बंधुओं पर हमला बोल दिया। एक भाई सोने की अंगूठी पहने हुए था। वह उससे बलपूर्वक छीन ली और 11 रुपए में बेच दी। उनमें से 6 रुपए उन महारों को दे दिए, जिन्हें उन्होंने पहिचानने के लिए सूरत से बुलाया था। दामू और लक्ष्मन ने उनसे गिड़गिड़ाकर अपने घर वापस जाने की भीख माॅंगी। पर उन्होंने कहा कि जब तक 500 रुपए जुर्माना नहीं दोगे, तब तक घर नहीं जा सकते। जब महार बंधुओं ने इतनी बड़ी रकम देने में असमर्थता जताई, तो एक मराठा ने 125 रुपए देने का सुझाव दिया। पर एक अन्य मराठा ने यह कहकर जुर्माने का विरोध किया कि इनसे जुर्माना लेकर सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए। इन्होंने जाति छिपाने का अपराध किया है, अतः इन्हें इसकी सजा देनी चाहिए। इसके बाद दोनों महार भाइयों को रात भर बन्द करके रखा। सुबह 9 बजे उनको बर्बरतापूर्वक अपमानित किया गया। उनकी बाईं तरफ की मूॅंछें और दाईं तरफ की भौंहें साफ की गईं, उनके जिस्मों पर तेल मिली कालिख पोती गई और गले में पुराने जूतों का हार डालकर उनमें एक के हाथ में झाड़ू पकड़ाई और दूसरे के हाथ में यह इबारत लिखकर तख्ती थमाई गई कि इन्हें सवर्णों को छूने का साहस करने की सजा दी गई है। इसके बाद उन मराठों ने दोनों महार भाईयों का जुलूस निकाला, जिसके आगे-आगे ढोल बजाते हुए लोग चल रहे थे। जुलूस में लगभग 75 सवर्ण शामिल थे।

 

दोनों महारों द्वारा पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी गई है। अभियुक्तों ने अपने बयान में स्वीकार किया है कि उन्होंने ही दामू और लक्ष्मन के साथ दुर्व्यवहार किया है, परन्तु उनका तर्क है कि शिकायतकर्ता महारों की सहमति से ही उन्हें सजा दी गई थी। स्पष्ट है दामू और लक्ष्मन उस समय असहाय थे, जब उनको बर्बरतापूर्वक अपमानित और उत्पीड़ित किया रहा था। इस मामले से तथाकथित अछूतों में भारी क्षोभ है और उत्पीड़ितों को उचित विधिक सहायता देने के प्रयास किए जा रहे हैं।

 

 

29.

महाराष्ट्र में विरोध

डा. आंबेडकर की सफाई

(दि बाम्बे क्रानिकल, 27 फरवरी 1928)

 

महाद में डा. आंबेडकर और अछूतों के सत्याग्रह सम्मेलन के कुछ सप्ताह बाद न केवल रूढ़िवादी प्रेस, बल्कि वे  अखबार भी, जो अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए प्रतिबद्ध हैं, सम्मेलन की कटु आलोचना कर रहे हैं। इनमें बहुत से मराठी अखबार भी इसी श्रेणी में थे, और जिसके बोलने वाले आम तौर से एन.सी.ओ., प्रतिक्रियावादी और गैर-ब्राह्मण इन तीन वर्गों के लोग हैं। इन अखबारों ने डा. आंबेडकर और उनके मित्रों पर जिन बिन्दुओं पर हमला किया है, वे ये हैं- (1) मनुस्मृति जलाने की उनकी ज्यादती, और (2) सत्याग्रह रोकने के लिए कोलाबा कलेक्टर के आदेश में उसकी मौन सम्मति। इस सम्पूर्ण विवाद में बहुत से अन्य आरोप-प्रत्यारोप लगाए गए, पर वे बहुत ज्यादा सारपूर्ण नहीं हैं। डा. आंबेडकर ने अब बहिष्कृत भारत में सम्मेलन का विस्तृत विवरण प्रकाशित किया है और विरोधियों के सभी आरोपों का खण्डन किया है। वे पहले आरोप से भड़के नहीं हैं, बल्कि उन्होंने यह कहकर उसका खण्डन किया है कि ये मनुस्मृति के कानून ही हैं, जो तथाकथित उच्च हिन्दू सदियों से अछूतों का दमन और शोषण करते आ रहे हैं, इसलिए हिन्दुओं के इस वर्तमान कानून को जलाना उचित था। दूसरे आरोप के सम्बन्ध में डा. आंबेडकर ने अपने विरोधियों को यह कहकर मात दे दी कि ऐसा कोई प्रतिबन्ध लगाने वाला आदेश पारित ही नहीं हुआ था, इसलिए उसकी अवज्ञा करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। उन्हें सत्याग्रह स्थगित करने के लिए कोलाबा के कलेक्टर द्वारा एक दिन बाद कहा गया था और उन्होंने जो भी किया, वह पूरी तरह सत्याग्रहियों और अछूतों के हित में किया था। उन्होंने कहा कि वह इस स्पष्ट आधार पर भी अपने आलोचकों को कुछ भी कहने की पूरी छूट देते हैं।

 

30.

 

महाद में अछूत पुनः सत्याग्रह करेंगे

(दि इण्डियन नेशनल हेराल्ड)

 

विषय- जज ने अंतरिम निषेधाज्ञा समाप्त की।

(पी. आर. लेले)

महाद के चावदार तालाब पर अछूतों के प्रसिद्ध सत्याग्रह पर महाद के सब-जज द्वारा वाद का निपटारा होने तक डा. आंबेडकर और अन्य अछूतों को तालाब से पानी लेने पर अस्थाई रोक लगा दी गई थी। उस समय, अर्थात् गत दिसम्बर में उन्होंने सम्मेलन की सफलता से सन्तुष्ट होकर उसे समाप्त कर दिया था और अनेक मंचों से वे सवर्ण हिन्दुओं की तानाशाही के विरुद्ध अपनी जोरदार आवाज उठा रहे थे।

सम्मेलन के प्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं ने एक विशाल जुलूस निकाल कर तानाशाहों पर अपनी शक्ति का प्रभाव डाल दिया है। उसके बाद डा. आंबेडकर अपने कुछ चुनिन्दा साथियों के साथ महाद तालुका गए और तत्पश्चात रायगढ़ किला भी गए। उनकी रायगढ़ यात्रा के बारे में, चूॅंकि मैं कुछ भी कहने से बचता हूँ, डा. आंबेडकर या तो विचार कर रहे हैं या उन्होंने उन दस्तावेजों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरु कर दी है, जो कथित तौर पर रिपोर्ट को भ्रमित करते हैं।

उनकी यात्रा ने महाद तालुका में उत्तेजना पैदा कर दी है, क्योंकि रिपोर्ट को भ्रमित करने वाले दस्तावेजों से गाॅंव के नजदीकी मुसलमानों में भी सनसनी फैल गई है।

 

अन्तरिम रोक समाप्त

अब महाद के सब-जज ने अछूतों के लिए तालाब पर लगाई गई अन्तरिम रोक को समाप्त कर दिया है। मुझे अभी वाद के फैसले की प्रति प्राप्त नहीं हुई है, पर निश्चित खबर है।

जज ने कहा है कि उन्हें अन्तरिम राहत देने के लिए भ्रमित किया गया था और अब वे उन भ्रामक दस्तावेजों से अछूतों के अपमान और दुखों को बढ़ाने के लिए खेद व्यक्त करते हैं। इससे ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि मुख्य मामला अभी विचाराधीन है। फिर भी हाल-फिलहाल के लिए यह न्याय की बड़ी जीत है। तथाकथित अछूतों द्वारा नागरिक अधिकारों की प्राप्ति में वे अवरोध अब हट गए हैं, जो एक ओर न्यायपालिका ने लगाए थे और दूसरी ओर रूढ़िवादी हिन्दुओं ने।

महान ‘गुरु का बाग’ संघर्ष में, सिख सत्याग्रहियों के साथ कम-से-कम जनता की सच्ची हमदर्दी थी। किन्तु महाद मामले में ऐसा भी नहीं था। रूढ़िवादी हिन्दू नेताओं ने पूना के स्वामियों और हिन्दू महासभा वालों की सलाह को भी सुनने से इन्कार कर दिया था। अछूतों के वास्तविक अधिकारों के लिए वे नेता भी महार सत्याग्रहियों के पक्ष में आकर नहीं खड़े नहीं हुए थे, जिन्होंने रूढ़िवादियों को सलाह दी थी। अब सत्याग्रह पुनः आरम्भ हो सकता है।

 

अगला आन्दोलन

और अब यह पुनः आरम्भ होने जा रहा है। इस बार जोखिम कम है और सफलता की सम्भावना ज्यादा है। डा. आंबेडकर के वापस आने के बाद, जो बजट पर अपना विशिष्ट ज्ञानवर्द्धक भाषण देने के बाद एक मुकदमें के सिलसिले में मनाड गए हुए थे, इसी 26 तारीख, रविवार को परेल के दामोदर ठाकरसे हाल में एक जनसभा का आयोजन किया गया।

डा. आंबेडकर ने भाषण करते हुए अपने अनुयायियों को स्थिति से अवगत कराया और आन्दोलन को पुनः आरम्भ करने के लिए किसी नजदीकी तारीख को तय करने को कहा। सभा में दलित वर्गों के लगभग एक हजार लोगों ने भाग लिया। हाल खचाखच भरा था और मंच पर तथाकथित अछूतों के कुछ हिन्दू मित्रों के अलावा दलित वर्गों के भी विशिष्ट लोग विराजमान थे।

अधिकांश वक्ताओं ने अपने भाषणों में डा. आंबेडकर के प्रति कृतज्ञता और समर्पण का भाव व्यक्त किया। एक वक्त ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया, क्योंकि वह उन लोगों में शामिल था, जिन्होंने विगत अप्रेल में चावदार तालाब से पानी लेने का प्रयास किया था और जिन्हें सवर्ण हिन्दुओं के हमले से चोटें आईं थीं।

उस समय जैसे ही तालाब में अछूतों द्वारा स्नान करने की अफवाह उड़ी, एक निर्दोष सज्जन पुरुष पर अकारण हमला कर दिया गया था, जिसकी वजह सिर्फ उसका मोची जाति का होना था। एक अन्य वक्ता ने कहा कि असल में तालाब से पानी लेने का काम उसने किया था, पर हमला एक निर्दोष व्यक्ति को झेलना पड़ा, जिसका नाम राजभोज है और जिसे मजाक में भोज राजा बुलाते हैं। पिछले रविवार की उस जनसभा में कोई भी उनके जीवन को साफ देख सकता था।

 

एक माह में

उनको देखने और सुनने के बाद उन्हें अछूत कहना हास्यास्पद होगा। उनकी और रूढ़िवादियों की आॅंखों में कोई फर्क नहीं है, दोनों ही एक जैसी हैं। उन्होंने न केवल अपनी अस्पृश्यता का उपचार स्वयं किया है, बल्कि पूर्वाग्रह की दलदल में डूबे हुए रूढ़िवादियों को भी दलदल से बाहर निकाला है। उनका संघर्ष लाजिमी तौर पर देशभक्ति और मानवीयता का संघर्ष है। अगर हिन्दूधर्म इन तथाकथित अछूतों गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कर उनके समान मूल अधिकारों को स्वीकार नहीं करता है, और उन्हें उनके अधिकार नहीं देता है, तो इस विशाल मृतकतुल्य समाज के साथ राष्ट्र उन्नति नहीं कर सकता। अछूत वर्गों के इन योद्धाओं को उनके अधिकार मिलने और उनके उन्नति करने से देश और हिन्दूधर्म दोनों की उन्नति होगी। डा. आंबेडकर फिलहाल अगले आन्दोलन की तैयारी में व्यस्त हैं। यह आन्दोलन सम्भवतः एक माह में, हिन्दू नव वर्ष पर, जब हर हिन्दू घर पर ध्वज लहराता है, आरम्भ करने का निश्चय किया गया है। उस दिन दलित वर्गों के नेता ‘सबके लिए समान अधिकार’ वाला ध्वज फहरायेंगे। परमात्मा उन्हें सफल करे।

 

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कँवल भारती : महत्‍वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक चिंतक, पत्रकारिता से लेखन की शुरुआत, दलित विषयों पर तीखी टिप्‍पणियों के लिए ख्‍यात, कई पुस्‍तकें प्रकाशित। चर्चित स्तंभकार। मीडिया विजिल के सलाहकार मंडल के सदस्य।